Friday, April 29, 2011

जैतापुर के लोगों का दर्द


जैतापुर न्यूक्लियर प्लांट को लेकर चल रहे आंदोलन की कई वजहें हैं। ये पूरी तरह जायज हैं। कारण, कई हालिया अध्ययन परमाणु ऊर्जा को लेकर नकारात्मक राय रखते हैं। जापान में फुकुशिमा में हुए हादसे के बाद तो जैतापुर में आंदोलन के तेवर और तीखे हो गए हैं। प्लांट को लेकर राजनीति भी हो रही है लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आंदोलन स्वत:स्फरू त है। यह प्लांट 233 एकड़ में बन रहा है और ज्यादातर लोगों की जमीनों का अधिग्रहण भी उनकी मर्जी के खिलाफ किया गया है। रेडिएशन ही नहीं, लोगों की चिंता अपनी रोजी-रोटी को भी लेकर है। यह पूरा इलाका आम के लिए मशहूर है। लोगों को आशंका है कि प्लांट बनने के बाद आम के व्यापार पर असर पड़ेगा। फिर न्यूक्लियर प्लांट समुद्र के किनारे बनाया जा रहा है। इलाके में मछुआरों की आबादी काफी अधिक है। लोगों को डर है कि प्लांट बनने के बाद समुद्र का पानी जहरीला हो सकता है और इससे मछलियों से जुड़ा उनका रोजगार भी चौपट हो जाएगा। जाहिर है स्थानीय लोगों की चिंता जायज है और उन्हें विरोध करने का भी हक है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवा कर साबित किया है कि वह परमाणु ऊर्जा को लेकर किसी भी स्तर तक जा सकती है, भले ही इसमें कितने भी खतरे हों। एक और बात गौर करने वाली है कि यहां जो परमाणु रिएक्टर बनना है उसे रिक्टर स्केल पर 6.5 तीव्रता तक भूकंप झेलने के लिए डिजाइन किया गया है, जबकि यहां 6.2 तीव्रता का भूकंप 1993 में आ चुका है। ऐसे में खतरा कितना बड़ा है, यह सहज ही समझा जा सकता है। परमाणु ऊर्जा का महत्व सरकार द्वारा हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है जबकि ऊर्जा का यह माध्यम न सिर्फ खर्चीला है बल्कि इसमें खतरे ही खतरे हैं। विकिरण के खतरे और परमाणु कचरे के निस्तारण से जुड़े खतरे तो इतने गंभीर हैं कि हमें इसके बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। यकीनन हमें पवन, सौर और जल ऊर्जा जैसे विकल्पों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। ये माध्यम एक तो अक्षय हैं, दूसरे सस्ते और सर्वसुलभ। साथ ही हमें इनके विकास के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भरता की जरूरत नहीं है। विकिरण जैसे खतरे का कोई सवाल ही नहीं है। गौर करने वाली बात है कि इस बात को ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने, जहां यूरेनियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, मान लिया है और वे परमाणु ऊर्जा पर अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं। 1970 के बाद अमेरिका में भी कोई नया रिएक्टर नहीं बनाया गया है। जापान में आई सुनामी के बाद शायद ही वहां कोई नया न्यूक्लियर प्लांट बने। भारत अभी परमाणु ऊर्जा के उत्पादन पर सालाना 20 अरब डॉलर खर्च करता है। इसके बावजूद परमाणु रिएक्टरों से हमारी केवल तीन फीसद बिजली ही पैदा होती है। फिर परमाणु बिजलीघर की शुरुआत करने में ही दो तिहाई से अधिक पूंजी खर्च हो जाती है। अगर किसी वजह से ईधन की सप्लाई रुक जाए तो यह कितने नुकसान वाली बात है इसे समझा जाना चाहिए। परमाणु रिएक्टरों से उत्पन्न खतरे की आशंका पर भी विचार होना चाहिए। 1986 में सोवियत संघ में चैरनोबिल दुर्घटना ने विकिरण की कैसी समस्या खड़ी कर दी थी। हमारे नरोरा परमाणु संयंत्र में भी आग लगने की घटना हो चुकी है। इसी तरह कुछ ही दिन पूर्व भारी जल के दुरुपयोग की घटना भी हो चुकी है। फिर रिएक्टर में कूलैंट के रूप में एक तो काफी जल चाहिए और दूसरा इसके समुद्र में छोड़े जाने से जैव विविधता पर हानिकारक प्रभाव होना तय होता है। ऐसे में अगर जैतापुर के लोग सड़कों पर उतरे हैं तो हमें उनका दर्द समझना चाहिए।


Monday, April 25, 2011

न्यायपालिका की भी हो सकती है निगरानी


लोकपाल के गठन की कवायद और अन्य मसलों पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी….
पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ न्यायविद राम जेठमलानी अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं। वह अन्ना हजारे के आंदोलन पर उठ रहे सवालों को फिजूल तो बताते ही हैं, मसौदा समिति पर किए जा रहे हमलों से भी नाखुश हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में तो उन्होंने अपनी ही पार्टी भाजपा को गलत ठहरा दिया। पेश हैं दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता मुकेश केजरीवाल से उनकी लंबी बातचीत के प्रमुख अंश- लोकपाल के लिए बनी साझा समिति की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई है। क्या आप ऐसी व्यवस्था से सहमत हैं? इसमें क्या समस्या है? जानकार या ईमानदार व्यक्ति क्या सिर्फ सरकारी तंत्र में ही हो सकते हैं? कानून का साधारण जानकार भी बता सकता है कि इस देश में कितने पुराने और अव्यवहारिक कानून चल रहे हैं? इस देश में 50 फीसदी कानूनी झगड़े का कारण कानून की खराब ड्राफ्टिंग है। जितना मैं समझता हूं, इसमें कोई वैधानिक समस्या नहीं। कुछ लोग अन्ना के तरीके को ब्लैकमेल तक बता रहे हैं? भ्रष्ट सरकार से लड़ने के लिए आम आदमी के पास क्या साधन है? या तो हथियार उठाए या फिर जनता की अदालत में जाए। अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन के जरिए दिखाया है कि देश की आम जनता क्या कर सकती है। क्या आपको लगता है कि न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए? प्रधानमंत्री क्या देवता हैं जो उन्हें किसी भी समीक्षा और निगरानी के तहत नहीं लाया जा सकता? बेहद ईमानदार बताए जाने वाले इन्हीं प्रधानमंत्री के बनाए कैबिनेट मंत्री जेल में तशरीफ फरमा रहे हैं। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है, सैद्धांतिक रूप से मैं इसके खिलाफ नहीं हूं। मगर देखना होगा कि लोकपाल के अंदर इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए क्या व्यवस्था हो? यह तो नहीं हो सकता कि देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ किसी भी आरोप की जांच कोई भी करने लगे, लेकिन अगर ईमानदार और सुविचारित व्यवस्था हो तो लोकपाल के तहत न्यायपालिका को भी लाया जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लोकपाल कितना अहम साबित होगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ हम सभी ने एक व्यापक लड़ाई की बात की है। अन्ना हजारे हों या कोई और, जो भी इस तरह का काम कर रहा है, मेरा समर्थन उसके साथ है। लोकपाल तो इस व्यापक लड़ाई का हिस्सा है। हालांकि यह इस लड़ाई का अंतिम लक्ष्य नहीं। जब तक ईमानदारी से कानूनों का पालन नहीं होता, निष्पक्ष जांच नहीं होती, किसी को सजा कैसे मिलेगी? बहुत से लोगों ने साझा समिति में पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण के होने पर भी एतराज जताया है? ऐसे सवाल उठाना बहुत ओछापन है। ये दोनों बाप-बेटे भले हों, लेकिन दोनों अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं। ये दो अलग-अलग लोग हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि आप जैसे बहुत से दूसरे बड़े कानूनविद भी तो हैं.. तो क्या सभी को इसमें शामिल कर लिया जाना चाहिए? काले धन पर आप सरकार पर जो आरोप लगाते रहे हैं उन्हें साबित करने के लिए आपके पास कोई तथ्य हैं? इन आरोपों से जुड़े तथ्य कहीं खोजने की जरूरत नहीं। मगर बड़े गम के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं। ये न तो काले धन को वापस लाना चाहते हैं और न ही चोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना चाहते हैं। मैं बहुत जवाबदेही के साथ कह रहा हूं कि ऐसी भ्रष्ट सरकार आज तक नहीं देखी। लेकिन भ्रष्टाचारी तो सभी पार्टी में हैं.. तो मैंने कब कहा है कि सिर्फ एक पार्टी के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करो। जो भी दोषी है, उसे सजा मिले। विनायक सेन को आपकी सरकार नक्सली बता जेल में डालती है और आप उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ते हैं? मेरी सरकार क्या गलत काम नहीं करती? आप अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं? जी हां। यह बात मैं अच्छी तरह सोच-समझ कर कह रहा हूं। विनायक सेन जैसे आदमी को पकड़ कर आप समझते हैं कि नक्सली समस्या दूर कर लेंगे तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। नक्सली साहित्य तो मेरे पास भी है, डाल दो मुझे भी जेल में। नक्सली समस्या से लड़ना है तो एक योजना बनाओ। गरीबों और आदिवासियों तक ईमानदारी से विकास योजनाओं को पहुंचाओ। नक्सली विचारधारा गलत नहीं। वहां कुछ लोग गलत हो सकते हैं। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। नक्सली तो बंदूक की नोक पर सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं। यह गलत प्रचार है। मुझे नहीं लगता कि विनायक सेन ने सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की बात की है। जो लोग ऐसा कहते हैं, उनको पकडि़ए, मगर यह क्या बात हुई कि उससे हमदर्दी रखने वाले को जेल में सड़ा दो। क्या आपकी पुलिस लोगों के दिलों पर भी पहरा लगा सकती है? कहा जाता है कि आपको नरेंद्र मोदी का मुकदमा लड़ने के बदले राज्यसभा सीट मिली? मैंने गुजरात से तो राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ा था, राजस्थान से लड़ा था। न ही राजनीति में मैं आज आया हूं। इस राज्यसभा में ही मैं पूरे पांच टर्म तक सदस्य रहा हूं। 1985 से इसका सदस्य हूं। और फिर अगर मान लें कि भाजपा को यह लगता है कि उसकी पार्टी में एक वकील भी होना चाहिए तो इसमें किसी को क्या एतराज है? मैं नरेंद्र मोदी का मुकदमा राज्यसभा पहुंचने से पहले से लड़ रहा हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गुजरात के बारे में कांग्रेस ने जानबूझकर एक दुष्प्रचार किया है। गुजरात में दंगे कब भड़के? जब वहां 58 निर्दोष लोगों को आग में जला दिया गया और कांग्रेस ने इसे भी एक दुर्घटना करार देने की कोशिश की। आज सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एसआईटी ने साफ कहा है कि यह एक साजिश थी, जो बड़ी तादाद में निर्दोष लोगों को मारने के लिए रची गई थी। लेकिन आप गोधरा बाद की घटनाओं को कैसे जायज ठहरा सकते हैं? मैं मानता हूं कि जनता ने बहुत जबर्दस्त प्रतिक्रिया की, कुछ अफसरों ने अपना फर्ज पूरा नहीं किया होगा, लेकिन उनके मन में भी गुस्सा था। इसके लिए नरेंद्र मोदी को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मैंने बेस्ट बेकरी के हत्यारों की वकालत नहीं की। मैं इस मामले में तब आया, जब सीधे मुख्यमंत्री को घसीटा जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि गुजरात पुलिस ने हर मामले में चार्जशीट दाखिल की है|

लोकपाल दायरे से बड़ी अदालतों को अलग रखने पर सहमति


लोकपाल बिल पर रविवार को हुई एक कांफ्रेंस में इस बात पर सहमति बनी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बनने वाले कानून से उच्च न्यायपालिका को बाहर रखा जाना चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने पर अलग-अलग राय हैं। सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व प्रधान न्यायाधीश और लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 4 सदस्यों की उपस्थिति में हुई राउंड टेबल बैठक में यह सहमति बनी कि उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के किसी भी मामले से निपटने के लिए एक अलग तंत्र होना चाहिए। सिटिजंस फॉर पब्लिक अकाउंटेबिल्टी (सीपीए) के बैनर तले दिन भर चली कांफ्रेंस के बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया और न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने संवाददाताओं को बताया, न्यायिक जवाबदेही होनी चाहिए, लेकिन यह लोकपाल का एक हिस्सा नहीं होना चाहिए। उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक बेहतर तंत्र की आवश्यकता है। उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के मामले में आम सहमति होने का दावा करते हुए सेवानिवृत्त न्यायधीशों ने कहा कि लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में नागरिक समाज के प्रतिनिधि भी ऐसा ही महसूस करते हैं। इस बीच प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखे जाने पर उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लोगों की अलग-अलग राय है। उन्होंने कहा, हमें विश्वास है कि वह (प्रधानमंत्री) सिर्फ राज्य में अस्थिरता के लिए और इसके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के लिए जवाबदेह हैं। इस मुद्दे पर विभिन्न राय आईं और हम किसी हल पर नहीं पहुंच सके तथा इस मामले पर संसद को ही निर्णय लेने के लिए छोड़ देना चाहिए। राउंड टेबल कांफ्रेंस में भ्रष्टाचार विरोधी कानून और देश में उसको अमल में लाने के मामले के अलावा सीवीसी, सीबीआइ और लोकपाल के सहज एकीकरण और राज्यों में मजबूत और स्वतंत्र लोकायुक्त के निर्माण पर भी चर्चा हुई। कांफ्रेंस में जस्टिस वेंकटचलैया और जस्टिस जेएस वर्मा के अतिरिक्त सरकार की मसौदा समिति के सदस्य, कर्नाटक लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रख्यात वकील शांति भूषण, उनके बेटे प्रशांत भूषण, आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति, पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा और कुछ प्रख्यात न्यायविद भी मौजूद थे। 

मतदाताओं की लम्बी कतारों के संकेत


विधानसभा चुनावों एवं जम्मू-कश्मीर के स्थानीय चुनावों में मतदाताओं की लम्बी कतारों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। तमिलनाडु में 1967 के बाद सबसे ज्यादा करीब 79 प्रतिशत मतदान हुआ है। '67 में 75.67 प्रतिशत मतदान हुआ था। केरल में 75 प्रतिशत से ज्यादा, असम में करीब 76 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 84 प्रतिशत एवं दूसरे चरण में 85 प्रतिशत से भी अधिक तथा पुडुचेरी में करीब 86 प्रतिशत मतदान हुआ है। तमिलनाडु के करूर जिले में 86 प्रतिशत से ज्यादा तो केरल के कोझिकोड में 81.30 प्रतिशत एवं असम के धुबरी में 85.65 प्रतिशत मतदान हुआ। हालांकि इन राज्यों के पिछले विधानसभा चुनाव में भी रिकॉर्ड मतदान हुआ था। असम में 75.72 प्रतिशत, केरल में 72.38 प्रतिशत, तमिलनाडु में 70.82 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल में 81.97 प्रतिशत मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाया था किंतु इस बार मतदाताओं की संख्या उससे ज्यादा होना काफी महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में 10 सालों के बाद हो रहे स्थानीय चुनावों के दो चरणों में क्रमश: 77 एवं 81.2 प्रतिशत मतदान होना असाधारण है। पिछले लोकसभा चुनाव से अगर तुलना करें तो पहली नजर में ये आंकड़े विश्वसनीय ही नहीं लगेंगे। लोकसभा चुनाव में औसत मतदान 58 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा था। यानी 17 से 22 प्रतिशत का अंतर। जम्मू-कश्मीर के 2008 के विधानसभा चुनाव में करीब 50 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो दो चरणों का औसत 29 प्रतिशत ज्यादा है। हिंसाग्रस्त और सीमापार से राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की तमाम कोशिशों के बीच इतना भारी मतदान पूरी दुनिया के लिए आश्र्चयजनक है। तीन प्रश्नों को आधार बनाकर हम इसका निहितार्थ समझ सकते हैं। पहला-ऐसा क्यों हुआ? दूसरा-इसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि क्या है? और तीसरा- संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीति की दृष्टि से यह किस बात का संकेतक है? गहराई से देखें तो ये तीनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हैं, क्यों हुआ-का उत्तर चुनाव आयोग ने एक समान दिया है। मलसन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओें ने अच्छा काम किया, लोगों तक जाकर वे उन्हें मतदान का महत्व समझा पाए, युवाओं ने भारी संख्या में मतदान किया, चुनाव आयोग के लोकजागरण अभियान का असर हुआ एवं उसकी सख्ती, धन जब्त करने आदि से चुनाव का माहौल बना। पहले मतदाताओं को मतदान केंद्र तक आने के लिए प्रेरित करने के पीछे केवल राजनीतिक पार्टियों की भूमिका होती थी; अब चुनाव आयोग के एजेंट भी यह भूमिका निभा रहे हैं और अनेक मीडिया तथा गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठन भी। 2006 के बाद जुड़े युवा मतदाताओं ने जिनकी संख्या 15 से 20 प्रतिशत है, मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह दिखाया है। लगभग 40 प्रतिशत मतदाता 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। युवाओं में मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह है क्या नई पीढ़ी में संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीतिक पण्राली के प्रति गहरी आस्था है जिससे प्रेरित होकर वे मतदान कर रहे हैं? एक निष्कर्ष यह है कि वे शासन को लेकर अपनी पूर्व पीढ़ी से ज्यादा जागरूक हैं। मतदान केंद्रों की कतार पर खड़े युवाओं से प्रश्न करने पर वे यह तो कहते हैं कि 'हम अपने अधिकार का उपयोग करना चाहते हैं और हमारे सामने भाग्य का फैसला करने का यह सबसे बड़ा हथियार है' किंतु इसके बारे में बहुत स्पष्ट राजनीतिक विचार सुनने को नहीं मिलता। सच कहें तो एक सामूहिक कारण या सोच की एक प्रवृत्ति ढूंढनी मुश्किल है। कश्मीर में यह लोकतांत्रिक पण्राली के प्रति विश्वास का संकेत माना जा सकता है, किंतु यह विश्लेषण भी स्थानीय चुनाव की मूल प्रवृत्तियों का सरलीकरण होगा। वास्तव में भारी मतदान भारतीय समाज के ऐसे जटिल सामूहिक मनोविज्ञान की परिणति है, जिसकी हम अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर सकते हैं। चुनाव शास्त्र की सामान्य धारणा के अनुसार मतदाताओं की संख्या बढ़ना सत्तारूढ़ पार्टी को बनाये रखने का संकेत नहीं माना जाता। इस आधार पर चारों राज्यों में राजनीतिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में पिछले पांच विधानसभा चुनावों में हर बार सत्ता बदली है और उसका मतदाताओं की संख्या बढ़ने से कोई लेना-देना नहीं रहा है। हालांकि विडम्बना देखिए कि '67 में जब रिकॉर्ड मतदान हुआ था तो पहली बार द्रमुक कांग्रेस को पराजित कर सत्ता में पहुंची थी। चुनाव में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब मतदान का प्रतिशत बढ़ा एवं सत्तारूढ़ घटक ही शासन में वापस आया। बिहार विधानसभा चुनाव इसका ज्वलंत उदाहरण है। जब मतदान की संख्या में कमी आने की प्रवृत्ति या सामान्यत: कम मतदान की परम्परा का अंत हो जाए तो मतदान प्रतिशत के आधार पर राजनीतिक आकलन कठिन हो जाता है। यही हमारे यहां हो रहा है। बावजूद इसके, इस समय तमिलनाडु से लेकर केरल एवं पश्चिम बंगाल में बदलाव की प्रवृत्ति महसूस की जा रही है। हालांकि असम में बदलाव की ऐसी आक्रामक सामूहिक प्रतिध्वनि नहीं सुनाई पड़ी है, जैसी इन तीन राज्यों में। इसलिए वहां की तस्वीर थोड़ी धुंधली है। भारी मतदान का एक राजनीतिक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि परिणाम निर्णायक आएगा। इस परिणाम का असर संप्रग के आंतरिक समीकरण पर पड़ना निश्चित है। कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु में द्रमुक के तथा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के छोटे साझेदार के तौर पर चुनाव मैदान में है। इन दोनों के कुल 37 सांसद संप्रग सरकार की रीढ़ हैं। तृणमूल कांग्रेस 19 सांसदों के साथ कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी तथा द्रमुक 18 सांसदों के साथ तीसरे स्थान पर है। द्रमुक की पराजय का अर्थ मोलतोल में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना तथा तृणमूल की शक्ति बढ़ने का अर्थ इसके विपरीत है। कुल मिलाकर ऐसा परिणाम केंद्र सरकार की स्थिरता सुनिश्चित करने वाला होगा। केरल में यदि कांग्रेस वाममोर्चा को पराजित कर शासन में वापसी करती है एवं असम में कुर्सी बनाए रखती है तो इससे कांग्रेस के अंदर आत्मविश्वास बढ़ेगा। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही हैं किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता की सोच की अभिव्यक्ति माना जाता है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था कह दिया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जैसा माहौल कुछ संगठनों, राजनीतिक दलों एवं मीडिया की कृपा से बना है, सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के विरुद्ध जैसी वितृष्णा पैदा करने की कोशिश की गई है, उसका असर मतदाताओं पर पड़ा है। यानी भारी मतदान के पीछे राज्य से असंतोष का भाव भी प्रमुख कारण है। लेकिन किसी एक से नाराजगी के बावजूद समर्थन का विकल्प सीमित है। इसलिए जिस किसी को जीत मिले उसका यह अर्थ नहीं कि जनता की नजर में वह उपयुक्त विकल्प है। मतदान का ऐसा अर्थ व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता को नकारना होगा। शहरी मध्यम वर्ग में मतदान को लेकर अरुचि की प्रवृत्ति के विपरीत अर्धशहरी एवं ग्रामीण इलाकों में मतदान में गहरी रुचि दिखी है। उदाहरण के लिए चेन्नई में 69.02 प्रतिशत, असम के कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले में (जिसमें गुवाहाटी भी है) 64.70 प्रतिशत तथा केरल के तिरुवअनंतपुरम में 68.30 प्रतिशत मतदान हुआ है। 2006 में भी इन जगहों पर क्रमश: 65 प्रतिशत, 56.4 एवं 64 प्रतिशत मतदान हुआ था। यानी असंतोष एवं परिवर्तन की चाहत अर्धशहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है। यह ऐसा गम्भीर पहलू है जिसे गहराई से समझने की जरूरत है। फिर चुनाव आयोग की अत्यधिक भूमिका लोकतंत्र के भविष्य की दृष्टि से अच्छा संकेत नहीं है। आयोग द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने की भूमिका तो समझ में आती है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों का लोगों तक मतदाता पर्ची पहुंचाना स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। मतदाताओं तक पर्ची लेकर जाना राजनीतिक दलों की भूमिका होनी चाहिए। मतदाताओं की संख्या चाहे जितनी बढ़ जाए लेकिन चुनाव प्रक्रिया से राजनीतिक दलों एवं आम जनता की भूमिका कम होना तथा चुनाव आयोग जैसी नौकरशाही एवं सरकारी कर्मचारियों की वाली संस्था का एकाधिकार लोकतंत्र की मूल भावना के ही विपरीत है। वास्तव में मतदाताओं की लम्बी कतारों की जितनी सरल और सामान्य व्याख्या की जा रही है उससे समग्र वस्तुस्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही है किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता के सोच की अभिव्यक्ति मानी जाती है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था, कह दिया है.



लोकतंत्र को शर्मसार करता वाक्या


अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के जश्न और उसके बाद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर आरोपों की बौछार ने पूरे देश में ऐसा माहौल बना दिया जैसे कि वही देश की सबसे बड़ी समस्या हो। इस पूरे विवाद में सीडी के सरताज अमर सिंह की एंट्री ने इस गंभीर मुद्दे को और भी अधिक मनोरंजक बनाने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई। सीडी के शोर के बीच एक ऐसी खबर दबकर रह गई जिसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया और साठ साल से ज्यादा पुराने हमारे गणतंत्र पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। देश में सबसे ज्यादा साक्षर लोगों के प्रदेश के रूप में एक अलग पहचान बना चुका केरल में एक ऐसा वाकया हुआ जो सभ्य समाज के मुंह पर करारा तमाचा है। केरल सरकार में एक वरिष्ठ दलित अधिकारी के रिटायर होने के दिन ही उनके दफ्तर में काम करने वाले लोगों ने पूरे दफ्तर का शुद्धीकरण कर डाला। सूबे के रजिस्ट्री विभाग में इंसपेक्टर जनरल के पद पर काम करने वाले एके रामकृष्णन जब पिछले 31 मार्च को सेवानिवृत्त हुए तो उस दिन उनकी विदाई के बाद उनके ही दफ्तर में काम करने वाले कुछ लोगों ने उनकी कार को पहले पानी से धोया और फिर मंत्रोच्चार के बीच सार्वजनिक रूप से कार का शुद्धीकरण किया गया। बात इतने पर ही नहीं रुकी अगले दिन तो रजिस्ट्रार के दफ्तर के लोगों ने और आगे बढ़कर रामकृष्णन के बैठनेवाले कमरे और उनकी कुर्सी को भी पवित्र पानी में गाय के गोबर को घोलकर उससे साफ किया। पानी में गाय के गोबर को मिलाकर शुद्धीकरण करने की केरल में पुरानी मान्यता है। एक सरकारी दफ्तर में सरेआम इस तरह का वाकया हो और पूरा दफ्तर खामोश रहकर देखता रहे तो इस बात का पता चलता है कि हमारे समाज में जाति व्यवस्था कितने अंदर तक पैठ चुकी है। केरल की राजधानी में यह सब कुछ तब घटित हो रहा था जबकि लगभग एक पखवाड़े बाद सूबे में विधानसभा का चुनाव होने वाला था। अफसोस यह की किसी भी राजनीतिक दल ने इस शर्मनाक वाकये को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। उस कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर कोई जनआंदोलन नहीं छेड़ा और न ही कोई मुहिम चलाई जो अपने आपको महात्मा गांधी की विरासत का वारिस कहते नहीं थकती। उस कांग्रेस पार्टी के नेताओं को भी यह मुद्दा नहीं लगा जिसके केरल के ही नेता और अब केंद्र में मंत्री वायलार रवि के बेटे के विवाह के बाद गुरुवायूर मंदिर को शुद्ध किया गया था। सामाजिक समानता की बात करनेवाली वामपंथी पार्टी जो कि इस वक्त तक केरल में सत्ता में है,उसने भी इस मामले के सामने आने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की। इस मामले में शिकायत मिलने के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने सरकार के राजस्व विभाग से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है। रिपोर्ट आने के बाद क्या कोई कार्रवाई हो पाएगी इस सवाल का जबाव तो अभी समय के गर्भ में ही है। एक जमाने में केरल के समाज में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता समाज में गहरे तक धंसा था। स्वामी विवेकानंद ने केरल के समाज में भेदभाव की उस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी और महात्मा गांधी ने भी केरल के मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह चलाए थे। केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूर मंदिर में भी दलितों और गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय तक जनआंदोलन चला था, लेकिन तमाम आंदलनों और समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार ने भी इस सामजिक बुराई को कम किया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि दलितों के साथ भेदभाव सिर्फ केरल में ही हो रहा है। चंद साल पहले उत्तर प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाए थे कि उनके दफ्तर के सहयोगी ने उनके बैठने की जगह का शुद्धीकरण किया था। उस मामले में भी शिकायत हुई थी लेकिन क्या कार्रवाई हुई यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। इससे समझा जा सकता है कि इस तरह के मामलों पर सरकार भी खुद को मजबूर पाती है और ऐसे लोगों के खिलाफ किसी तरह के कदम उठाने से बचना ही ज्यादा बेहतर उपाय मानती है। केरल के अलावा हिमाचल प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अब भी एक बोर्ड ने सार्वजनिक तौर पर मंदिर के बाहर टांग रखा है कि लंगर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है। आखिर यह किस तरह के समाज की तस्वीर है जहां उसके ही लोगों का प्रवेश किसी धार्मिक विशेष स्थान में वर्जित है। देश की आजादी के चौंसठ साल बाद भी सार्वजनिक रूप से इस तरह के बोर्ड मंदिरों में लगे हुए हैं और प्रशासन इनकी तरफ से आंखें मूंदे सो रहा है अथवा निष्कि्रय बना हुआ है। साफ है कि हमारी सरकारों को इसकी ज्यादा फिक्र नहीं है। इससे तो यही प्रतीत होता है कि सरकार की मूक सहमति इस तरह की मान्यताओं के पक्ष में है या फिर वो इस तरह की सामाजिक कुरीतियों को हटाने के प्रति उदासीन है। मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलेगा, मंदिर के गर्भ गृह में महिलाओं को भी प्रवेश नहीं मिलेगा, लेकिन हम प्रगतिशील समाज हैं और हम आधुनिक हैं। इस तरह के दकियानूसी और घटिया विचार के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। आज हमारा देश विश्व में सुपर पॉवर बनने का सपना देख रहा है। विश्व में हम सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का ख्बाब देख रहे हैं, लेकिन समाज में इन विसंगतियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा आंदोलन किया जा रहा है। तथाकथित सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे और सरकार के आला मंत्री भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने में जुटे हैं। कांग्रेस के हाईप्रोफाइल नेता दिग्विजय सिंह लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं, लेकिन किसी के पास यह सोचने की फुरसत नहीं है कि समाज के निचले पायदान पर जीवन जी रहे लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और वो किस तरह जहालत और अपमानजनक जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं। दलितों के घर में रात बिताने और उनके हाथ का खाना खाने वाले कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी को भी देश में दलितों के उत्थान की चिंता हो सकती है, लेकिन उनकी तरफ से दलितों के उत्थान के लिए कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। क्या दलितों के घर में खाना भर खा लेने या उनके घर में रात बिता लेने से समाज में उनको मान्यता या फिर बराबरी का हक मिल पाएगा? दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ कड़े कानून भर बना देने से उनका हित हो जाएगा या फिर उन पर अत्याचार रुक जाएंगे यह सोचना भी गलत है। कानून को सख्ती से लागू करना और समाज में उसका भय होना जरूरी है और यह तभी हो पाएगा जब ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई होगी और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलेगी। समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जारी यह जंग जायज है। इस मुहिम को हर तरह का और हर तबके का समर्थन मिलना चाहिए, लेकिन देश में भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या अब भी दलितों की समाज में दयनीय स्थिति है। इस दिशा में देश के कर्ताधर्ताओं के साथ-साथ सिविल सोसाइटी को भी विचार करना होगा। गांधीजी ने अप्रैल 1921 में अहमदाबाद में सप्रेस्ड क्लास कांफ्रेंस के अपने भाषण में कहा था-जब तक देश का हिंदू समाज छूआछूत को अपने धर्म का हिस्सा मानता रहेगा और जब तक हिंदू समाज अपने समाज के साथ रहने वाले कुछ लोगों को छूना पाप समझता रहेगा तब तक स्वराज हासिल करना मुमकिन नहीं है। गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी बड़ी लड़ाई लड़ लें और उसमें चाहे हमें कितनी भी बड़ी सफलता हासिल हो जाए, लेकिन जब तक हमारे समाज में केरल जैसी घटनाएं घटती रहेंगी, तब तक हमारी जीत का कोई मतलब नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)