Saturday, June 30, 2012

अविरलता का बहाना


उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं को अविरल एवं निर्मल गंगा के मार्ग में बाधक मानते हुए इनका प्रबल विरोध हो रहा है। उत्तराखंड के बाद प्रति दिन गंगा में लाखों टन कचरा उड़ेला जा रहा है। साथ ही गंगा की अविरलता भी बार-बार टूट रही है। गंगा के तिल-तिल मरने के इस पक्ष को दरकिनार कर देना इस आंदोलन के औचित्य और वस्तुनिष्ठा पर सवाल खड़े करता है। यदि मानकों के अनुसार जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण किया जाए तो न तो इससे जल प्रदूषित होता है और न ही जल की मात्रा कम होती है। जहां तक नदी के पर्यावरणीय प्रवाह का सवाल है, उच्च स्तरीय विशेषज्ञ ग्रुप ने नदी की मूल धारा में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा पर अपनी रिपोर्ट दे दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरणीय प्रवाह के लिए नदी की मूल धारा में एक क्यूमेक (35 क्यूसेक) पानी छोड़ा जाना पर्याप्त होगा। गु्रप ने विशेष तौर पर भागीरथी के धार्मिक महत्व को देखते हुए मूल धारा में चार क्यूमेक (140 क्यूसेक) पानी छोड़ने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार ने गु्रप की इस रिपोर्ट पर विचार तक नहीं किया और परियोजना हमेशा के लिए बंद कर दी। उससे पहले भागीरथी पर पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया जा चुका था। दरअसल, गंगा पर परियोजना बनाने का छिटपुट विरोध पहले भी होता रहा है। 2008 के बाद गंगा पर परियोजनाओं का जो विरोध हुआ, वह एक तरह से राजनीति से प्रेरित लगता है। उत्तराखंड के कुछ एनजीओ के आमंत्रण पर प्रो. जीडी अग्रवाल ने जब अनशन शुरू किया तो, भाजपा हाइकमान के निर्देश पर तत्कालीन राज्य सरकार ने भागीरथी में निर्माणाधीन उत्तराखंड जल विद्युत निगम की पाला मनेरी और भैरोघाटी परियोजनाओं को स्थगित कर दिया। 2009 के आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा को गंगा के रूप में एक नया हिंदूवादी मुद्दा मिल गया था। गंगा भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने के लिए अयोध्या की तरह मुद्दा न बन जाए, कांग्रेस की चिंता की यह सबसे बड़ी वजह थी। कांग्रेस की केंद्र सरकार ने बिना अधिक माथापच्ची के उत्तराखंड की दोनों परियोजनाओं को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय ले लिया। इस सफलता के बाद आंदोलन करने वालों का जोर बंध गया और हरिद्वार कुंभ से पहले भागीरथी पर एनटीपीसी की लोहारीनाग पाला परियोजना को भी बंद करने का निर्णय लेना पड़ा। यहां सवाल एक संसाधनहीन राज्य के बड़े संसाधन जल का है, जो जलकर के रूप में उत्तराखंड को सालाना बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की आय दिला सकता है, लेकिन उत्तराखंड तो दिल्ली में बैठे नेताओं और वीआइपी के लिए आज भी एक उपनिवेश है। यही वजह है कि ग्यारह साल बाद भी उत्तराखंड के जल संसाधनों के एक बड़े हिस्से पर आज भी उत्तर प्रदेश काबिज है। उत्तराखंड की एक पूरी घाटी को रौंदकर बनाई गई टिहरी परियोजना के मालिक दिल्ली और लखनऊ हैं। टिहरी परियोजना पर उत्तराखंड का मालिकाना हक शून्य है। कहते हैं पहाड़ की जवानी और पानी कभी उसके काम नहीं आते। अब यदि परियोजनाओं के जरिये पानी उत्तराखंड के लिए एक बेहतर संसाधन बनने जा रहा है तो गंगा की अविरलता के नाम पर उसकी राह रोकी जा रही है। अविरलता सिर्फ बहाना है। गंगा तो हरिद्वार के बाद मर रही है। हरिद्वार में गंग नहर में गंगा का 90 प्रतिशत जल प्रवाहित हो जाता है। हरिद्वार के बाद बची-खुची गंगा में बह रहे कचरे ने गंगा को गंदे नाले में परिवर्तित कर दिया है। हरिद्वार के बाद गंगा की अविरलता बार-बार टूटती है। गंगा से नहरों में लिया गया जल वापस गंगा में नहीं आता। प्रदूषण ने तो गंगा को गंदा नाला बना दिया है। गंगा को बचाने के लिए हाय तौबा मचाने वाले यदि इस वास्तविकता से आंखें मूंदे हुए हैं। उन्हें सिर्फ उत्तराखंड में गंगा की अविरलता चाहिए तो उनकी मंशा पर शक होना लाजिमी है। उत्तराखंड में गंगा आंदोलन पर शंकर सिंह भाटिया की टिप्पणी 

सही उपचार का इंतजार


प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। इस बीच एक और रेटिंग एजेंसी मूडी के सकारात्मक रुख से भी इस बात को बल मिला है, लेकिन यहां विचार करने की आवश्यकता है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसके लिए काम करती हैं-भारत सरकार या फिर अपने ग्राहकों के लिए। निश्चित ही इन्हें भारत सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वे जो भी रिपोर्ट तैयार करती हैं उनका एक निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मानदंड होता है, जो पूरी दुनिया में निवेश करने वाले ऐसे निवेशकों के लिए होता है जो उनके ग्राहक होते हैं। अब यहां सवाल है कि यदि ये गलत रिपोर्ट पेश करेंगी तो इससे नुकसान किसका होगा? नुकसान उन निवेशकों का जो इनके ग्राहक हैं। इसलिए यह कतई संभव नहीं है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर काम करें, क्योंकि ऐसा करने में खुद उसी का नुकसान है। यहां एक और पहलू पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि ये एजेंसियां एक लंबे समय से काम कर रही हैं और इनकी पूरी दुनिया में अपनी एक अलग साख है। इसलिए इन एजेंसियों को गलत बताना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं, क्योंकि इससे तो निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास और बढ़ेगा। यहां हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि यही एजेंसियां अभी तक भारत को निवेशयोग्य बेहतर देशों की सूची में रख रही थीं? आखिर तब उन पर भरोसा क्यों किया जाता था? जाहिर है कि सरकार अपनी कमजोरियों और कमियों को दूर करने के बजाय उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली तर्ज पर चल रही है और स्थिति को संभालने के बजाय अवसरों को गंवा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी अब किसी से छिपी नहीं है। अप्रैल तिमाही में हमारी जीडीपी घटकर 5.3 प्रतिशत पर पहुंच गई तो औद्योगिक विकास दर महज 0.1 प्रतिशत है। डॉलर की तुलना में रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और बीते एक साल में यह तकरीबन 25 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। यदि हालात पर काबू पाने के लिए बड़े आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम नहीं उठाए जाते तो शीघ्र ही डॉलर के सामने रुपये का विनिमय मूल्य 60 तक पहुंच जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। रुपये की गिरती कीमत को रोकने के लिए जो घोषणाएं हुईं वे नाकाफी हैं। समझ में नहीं आता कि जब सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और उसमें ईमानदार इच्छाशक्ति का अभाव है तो उसने ऐसे संकेत देने की कोशिश ही क्यों की कि मानो अब सब कुछ बदल जाएगा? जी-20 से लौटने के बाद प्रधानमंत्री ने भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए, लेकिन अंत में सरकार ने अपनी तरफ से कोई घोषणा करने के बजाय गेंद रिजर्व बैंक के पाले में डाल दी और तमाम उम्मीदों के बावजूद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में न तो कटौती की और न ही इसके कोई संकेत दिए। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वर्तमान में विकास दर की तुलना में महंगाई बढ़ने की दर कहीं ज्यादा है। महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण आपूर्ति पक्ष से जुड़ा हुआ है इसलिए रिजर्व बैंक महज मौद्रिक नीतियों से इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। रिजर्व बैंक आपूर्ति पक्ष में सुधार लाने के साथ-साथ बढ़ते राजकोषीय घाटे को कम करने, सरकारी खचरें में कमी लाने की बात सरकार से कह रहा है और जब तक सरकार ऐसा नहीं करती है तब तक न तो महंगाई कम होगी और न ही रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाने वाला है। अब सरकारी बांड में विदेशी निवेशकों को 20 अरब डॉलर निवेश करने की छूट दी गई है, जो कि पहले से महज 5 अरब डॉलर ज्यादा है। मेरे विचार से इसे कम से कम 30 अरब डॉलर किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत में विकास दर धीमी होने की वजह उपभोक्ताओं की तरफ से मांग में कमी आना नहीं है और न ही ऐसा है कि यहां निवेश की मांग कम है। दरअसल निवेशकों को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि उन्हें पर्याप्त लाभ मिल पाएगा। इसके लिए जरूरी है कि सरकार टैक्स सुधारों समेत लंबित आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम उठाए, देश के प्रति बन रहे नकारात्मक माहौल को दूर करे, विदेशी निवेशकों समेत घरेलू निवेशकों को प्रोत्साहित करने वाले कदम उठाए। यहां यदि वोडाफोन मामले को ही लें तो सरकार इसकी टैक्स देनदारियों को 1962 से तय करने की बात कह रही है। इस तरह की नीतियां प्राकृतिक सिद्धांतों केखिलाफ हैं, जिस कारण विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। इस तरह की नीतियां भारत की विकासपरक छवि को तोड़ती हैं और उसे पुराने समाजवादी प्रतिबंधों वाले युग में ले जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री द्वारा वित्तमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद इस नीति पर पुनर्विचार किया जाएगा। सौभाग्य से इसके संकेत भी नजर आए हैं। यदि यह नीति जारी रहती है तो विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति एक तरह का डर बैठेगा। सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री सरकार के पहले के कामकाज के तरीके में बदलाव लाएंगे या फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा? ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर कुछ मतभेद थे। अब यूरोजोन संकट की बात को भी बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत की समस्या उससे पहले की है। वास्तविकता यही है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार की नीतियों का लाभ संप्रग-1 सरकार को मिला और संप्रग-1 सरकार की सब्सिडी और समावेशी विकास की नीतियों का दुष्परिणाम संप्रग-2 सरकार में ताजा आर्थिक संकट के रूप में दिख रहा है। इसीलिए अभी तक मनमोहन सिंह सरकार की कोई खास उपलब्धि नहीं रही है। (लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

नीति-नियंताओं की नाकामी


इस साल पहली जून तक भारत में 842 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न जमा था। यह इतनी भारी मात्रा है कि अगर एक के ऊपर एक बोरियां लगा दी जाएं तो आप इनसे होकर चांद तक पहुंच जाएंगे। इसके बाद भी 220 लाख टन खाद्यान्न बचा रह जाएगा। तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए। भारत में हर रोज 32 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इस साल खाद्यान्न की बंपर पैदावार से भारत के पास देशवासियों का पेट भरने का ऐतिहासिक अवसर है। इस अतिरिक्त खाद्यान्न को जरूरतमंदों और भुखमरी के शिकार लोगों के घरों तक पहुंचाने के कार्यक्रम के जरिये हम न केवल भारत से भुखमरी का खात्मा कर देंगे, बल्कि विश्व में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या भी एक-तिहाई कम कर देंगे। आखिरकार, भारत में विश्व के कुल भूखे लोगों की एक-तिहाई आबादी रहती है। व‌र्ल्ड हंगर रिपोर्ट के अनुसार भारत 81 देशों की सूची में 67वें स्थान पर है। जहां तक भूख से जंग की बात है तो रवांडा भी भारत से आगे है। एक ऐसे समय भारत के पास खाद्यान्न का विशाल भंडार है और वह यूरोप के बचाव के लिए 57000 करोड़ रुपये की सहायता दे सकता है, तब इसका कोई कारण नजर नहीं आता कि भूख के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। मेरी समझ से भारत में खाद्यान्न का जितना भंडार है, उससे प्रत्येक भारतीय को 2200 कैलोरी प्रतिदिन मिल सकती हैं। दूसरे शब्दों में इतने खाद्यान्न से हर भारतीय का पेट भरा जा सकता है। भारतीयों का पेट भरने के बजाय खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री केवी थॉमस इस खाद्यान्न से छुटकारा पाने के उपाय तलाश रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 50 लाख टन खाद्यान्न आवंटित करने के बाद अब वह गेहूं के निर्यात की संभावना तलाश रहे हैं और वह भी घाटे पर। 778 रुपये प्रति क्विंटल के घाटे पर खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री 20 लाख टन गेहूं ईरान को निर्यात करने जा रहे हैं। निर्यात की दर किसानों को दिए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम रखी गई है। यहां तक कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को जिस दर पर गेहूं बेचा जाता है, यह दर उससे भी कम है। वह और भी गेहूं निर्यात करते, किंतु मंत्रालय के दुर्भाग्य से फिलहाल गेहूं की अंतरराष्ट्रीय मांग ही नहीं है। भंडारण की अपनी अक्षमता को जाहिर करते हुए थॉमस पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि 66 लाख टन गेहूं के लिए कोई सही भंडारण क्षमता नहीं है, इसलिए वह खुले में पड़ा हुआ है और बारिश में सड़ रहा है। मंत्री का यह बयान सही नहीं है। असलियत यह है कि 270 लाख टन गेहूं खुले में पड़ा हुआ है और इसे पालीथीन की पन्नी से ढका हुआ है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस तरीके से गेहूं कितना सुरक्षित बचेगा। बारिश में गेहूं के सड़ने की जितनी भी रिपोर्ट मीडिया में आई हैं उनका इसी पद्धति से भंडारण किया गया था। अगर मंत्री के अनुसार पालीथीन से ढका गेहूं वैज्ञानिक पद्धति से भंडारण है तो इसका उनके पास क्या जवाब है कि शेष बचे हुए 66 लाख टन गेंहू के लिए सरकार पालीथीन का इंतजाम क्यों नहीं कर पाई है? हालात को और बिगाड़ने के लिए थॉमस ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर केंद्रीय पूल के लिए सरकारी खरीद की सीमा तय करने को लिखा है। उनके कहने का मतलब यह है कि सरकार को केवल 240 लाख टन गेहूं और चावल की खरीदारी करनी चाहिए और शेष निजी व्यापारियों के लिए छोड़ देना चाहिए। इससे खतरनाक दलील और हो ही नहीं सकती। गेहूं और चावल दो ही ऐसे खाद्यान्न हैं, जिन्हें सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है। सरकार 25 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है, लेकिन खरीदती है केवल दो। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के कारण ही गेहूं और चावल का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। गेहूं और चावल की सरकारी खरीद भी तभी होती है जब निजी व्यापारी मनमाफिक खरीद कर चुके होते हैं। अगर सरकारी खरीद को आंशिक तौर पर भी कम किया जाता है तो निजी व्यापारी पूल बनाकर किसानों से कौडि़यों के भाव गेहूं-चावल खरीद लेंगे। केवी थॉमस जो सुझाव दे रहे हैं उसमें कुछ नया नहीं है। उद्योग जगत अरसे से यह मांग करता आ रहा है। यह प्रयोजन इसलिए किया जा रहा है ताकि देश की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को खत्म करके विदेश से सस्ता खाद्यान्न आयात किया जा सके, किंतु थॉमस इस पर ध्यान नहीं दे रहे कि नई व्यवस्था के कितने घातक परिणाम होंगे। ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर जिनमें किसान गेहूं-चावल उगाना बंद कर दें, सरकार किसानों की आजीविका पर चोट करने के साथ-साथ विदेशों से भारी मात्रा में खाद्यान्न मंगाने की कोशिश कर रही है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि जब भारत खाद्यान्न का आयात करता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमत आसमान छूने लगती हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि भारत को भारी मात्रा में खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ती है। पेट्रोलियम पदार्थो के भारी आयात में विदेशी मुद्रा भंडार की बड़ी राशि गंवाने वाला भारत अगर खाद्यान्न भी आयात करने लगेगा तो इसकी क्या हालत होगी। ऐसा होने पर भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या और बढ़ जाएगी। खाद्यान्न के बढ़ते दाम गरीबों की ही नहीं, मध्यम वर्ग की भी कमर तोड़ देंगे। जिस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा वह यह है कि खाद्य सुरक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। गरीबों का पेट भरना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है और अब भारी अतिरिक्त खाद्यान्न को देखते हुए इससे मुंह चुराने का हमारे पास कोई बहाना नहीं बचा है। (लेखक कृषि और खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे


पर्यावरण पर खोखली चिंता


हाल ही में ब्राजील के रियो दि जिनेरियो में 20 से 22 जून तक पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन को रियो प्लस 20 नाम दिया गया। सम्मेलन में सौ से ज्यादा देशों के प्रमुख एवं 50 हजार से ज्यादा प्रतिभागियों ने स्थायी विकास, ग्रीन इकोनॉमी और पर्यावरण संबंधी विभिन्न चुनौतियों पर चर्चा की। गौरतलब है कि ग्रीन इकोनॉमी के तहत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना सभी वगरें की तरक्की वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करना शामिल है। सम्मेलन के घोषणा पत्र के मसौदे में भारत की ओर से उठाए गए दो प्रमुख मुद्दों को शामिल कर लिया गया। विश्व के प्रमुख नेता जिन दो प्रमुख मुद्दों पर सहमत हुए हैं उनमें एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण है जबकि दूसरा वित्त से जुड़ा हुआ है। हालांकि सम्मेलन में भारत ने यह भी कहा कि हरित अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों के कार्यान्वयन के लिए विकासशील देशों को बढ़े हुए साधन उपलब्ध कराने में विकसित देशों की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति से वह निराश है और यदि यह लागू नहीं किया गया तो वह आंखों में घूल झोंकने के बराबर होगा। इस सम्मेलन में एक बार फिर विकसित देशों की हठधर्मिता दिखाई दी। विकसित देशों की इसी हठधर्मिता की वजह से पर्यावरण के विभिन्न मुद्दों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पाती है। इस दौर में पर्यावरण की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। हमें यह मानना होगा कि जलवायु परिवर्तन की यह समस्या किसी एक शहर, राज्य या देश के सुधरने से हल होने वाली नहीं है। पर्यावरण की कोई ऐसी परिधि नहीं होती है कि एक जगह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन या प्रदूषण होने से उसका प्रभाव दूसरी जगह न पड़े। इसीलिए इस समय सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण के प्रति चिंता देखी जा रही है। हालांकि इस चिंता में खोखले आदर्शवाद से लिपटे हुए नारे भी शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या खोखले आदर्शवाद से जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हल हो सकता है? यह सही है कि ऐसे सम्मेलनों के माध्यम से विभिन्न बिंदुओं पर सार्थक चर्चा होती है और कई बार कुछ नई बातें भी निकलकर सामने आती हैं, लेकिन यदि विकसित देश एक ही लीक पर चलते हुए केवल अपने स्वाथरें को तरजीह देने लगें तो जलवायु परिवर्तन पर उनकी बड़ी-बड़ी बातें बेमानी लगने लगती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि इसी तरह जारी रही तो दुनिया को लू, सूखे, बाढ़ व तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पडे़गा। तटीय इलाकों पर अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा और अनेक पारिस्थितिक तंत्र, जंतु एवं वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी। वातावरण में कॉर्बन इाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से समुद्र के अम्लीकरण की प्रक्रिया लगातार बढ़ती चली जाएगी, जिससे खोल या कवच का निर्माण करने वाले प्रवाल या मूंगा जैसे समुद्रीय जीवों और इन पर निर्भर रहने वाले अन्य जीवों पर नकारात्मक प्रभाव पडे़गा। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि इस खतरे को कम करने के लिए 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से कम से कम आधे पर लाना होगा। ज्यादातर विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रति सफलतापूर्वक अनुकूलन के लिए आर्थिक एवं प्रोद्यौगिकीय श्चोतों का अभाव है। विकसित देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 22 फीसदी है, जबकि वे 88 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों एवं 73 फीसदी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही विश्र्व की 85 फीसदी आय पर उनका नियंत्रण है। दूसरी ओर विकासशील देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 78 फीसदी है, जबकि वे 12 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों एवं 27 फीसदी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। उनकी आय विश्व की आय की सिर्फ 15 फीसदी ही है। इन सभी आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि विकसित देश कम जनसंख्या होने के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों का अधिक इस्तेमाल कर अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। इसलिए उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) पृथ्वी सम्मेलन में हुए चिंतन पर रोहित कौशिक की टिप्पणी 

नेतृत्व का अभूतपूर्व संकट


भारत में खराब खबरों की बरसात सी हो रही है। अर्थव्यवस्था संकट में है, राजनीतिक निष्कि्रयता टूटने का नाम नहीं ले रही और सरकार में लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है। राष्ट्र चौराहे पर खड़ा है और इसके नेता कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी व राहुल सहित कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जनता से कटा हुआ है। वे फैसलों पर चर्चा नहीं करते, देश के लोगों से सीधे बात नहीं करते और उनका इस बात में यकीन ही नहीं है कि देश के आम लोगों से सीधे जुड़ने की जरूरत भी है। प्रधानमंत्री अपनी नीतियों के समर्थन में जनमत तैयार करने के इच्छुक नहीं हैं। इसीलिए देश के अधिकांश नागरिकों को महसूस होने लगा है कि नई दिल्ली में कोई सरकार काम नहीं कर रही है। भारत के आर्थिक संक्रमण के इस नाजुक मोड़ पर यह घटनाक्रम एक वास्तविक त्रासदी है। यह समय तो भारत का होना चाहिए था। पाश्चात्य विश्व अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यूरोजोन के संकट ने अधिकांश यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास पर ग्रहण लगा दिया है और यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहेगी। अमेरिका भी आर्थिक संकट से निकलने में कठिनाई महसूस कर रहा है। वाशिंगटन में राजनीतिक गतिरोध और नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव ने सरकार को कड़े फैसले लेने से रोक रखा है। परिणामस्वरूप, वैश्विक नेतृत्व में निर्वात पैदा हो गया है। चीन में भी राजनीतिक संक्रमण चल रहा है। जैसे-जैसे नेतृत्व परिवर्तन का वक्त नजदीक आ रहा है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अधिकाधिक सतर्क होती जा रही है। इससे भी महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि चीन का आर्थिक विकास भी कमजोर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों में भारत के लिए आगे बढ़कर विश्व का नेतृत्व करने का सुनहरा मौका था, किंतु भारत की कहानी तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई। रुपये का प्रदर्शन एशिया में सबसे खराब चल रहा है, घाटा बढ़ रहा है, नीति अनिश्चितता के कारण निवेशक भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं और आम आदमी आसमान छूती महंगाई के बोझ तले कराह रहा है। सरकार फैसले नहीं ले पा रही है। सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगियों और विपक्ष ने यह कमजोरी भांप ली है और यह सुनिश्चित करने में जुट गए हैं कि अगले दो सालों तक यह सरकार निरीह-लाचार बनी रहे। बाहरी विश्व के लिए, खासतौर पर भारत के दोस्तों और सहयोगियों के लिए यह निराशाजनक समय है। भारत में सामरिक साझेदारी में उल्लेखनीय निवेश करने वाला अमेरिका अब अपने संबंधों को अतीत के गौरव के अनुरूप लाने में संघर्ष कर रहा है। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के जो सहयोगी यह उम्मीद लगा बैठे थे कि भारत चीन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलनकर्ता के रूप में उभरेगा, अब कहीं और देख रहे हैं। अफगानिस्तान में भारत के मित्र इस डर से अपनी वफादारी बदल रहे हैं कि 2014 में नाटो सेनाओं की वापसी के बाद वहां पाकिस्तान का प्रभुत्व हो जाएगा। इस घटाटोप अंधियारे में उम्मीद की एकमात्र किरण यह है कि घरेलू उथलपुथल के कारण चीन और पाकिस्तान भारत के हालात का फायदा उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इतना सब होने के बावजूद भारत का राजनीतिक तंत्र ऐसे बर्ताव कर रहा है जैसे यहां कुछ भी गलत नहीं है। भारत नेतृत्व के संकट का सामना कर रहा है। सोनिया गांधी के पास शक्तियां हैं, लेकिन कोई सरकारी जवाबदेही नहीं है, मनमोहन सिंह के पास जिम्मेदारी है, किंतु कोई शक्ति नहीं है। जिस पार्टी को 2009 में लगभग निर्णायक जनादेश मिला हो उसकी यह गत समझ से परे है। आर्थिक रूप से कांग्रेस ने सरकार को दूसरी पीढ़ी के सुधारों पर आगे बढ़ने से रोक दिया है। सामाजिक रूप से भ्रष्टाचार अब बर्दाश्त से बाहर हो गया है। शासन के तमाम प्रमुख संस्थानों को अपनी साख बचानी मुश्किल हो रही है। राजनीतिक रूप से सत्तारूढ़ दल ने 2009 में कमाई अपनी सारी पूंजी गंवा दी है। सरकार के विभागों में कोई सामंजस्य नहीं है। लगता है कि वे राष्ट्रीय हितों के बजाय केवल विभागीय हितों के लिए काम कर रहे हैं। समसामयिक भारत का राजनीतिक परिदृश्य प्रभावी कार्यपालिका और कल्पनाशील नेतृत्व, दोनों से वंचित है। अपनी पवित्र नीयत के बावजूद प्रधानमंत्री देश के प्रबंधन में पूरी तरह विफल रहे हैं और न ही उनके पास देश के भविष्य की दृष्टि ही है। हालांकि इसमें उनका दोष नहीं है। पिछले चुनाव में उन्होंने राजनीतिक पूंजी नहीं कमाई। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के सिर चुनाव में जीत का सेहरा बंधा, किंतु बेहद कठिन परिस्थितियों में भी कांग्रेस की नैया पार लगाने वाली सोनिया गांधी भी इस पूंजी का लाभ नहीं उठा पाईं। सोनिया कांग्रेस को वह दृष्टि नहीं दे पाईं जो इस नाजुक दौर में भारत का कुशल नेतृत्व कर सके। खेद की बात यह है कि भारतीयों के पास विकल्प भी नहीं हैं। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। लोकप्रियता हासिल करने के बाद अनेक मुख्यमंत्री प्रदेश को अपनी जागीर समझने लगते हैं। क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों से भी गया-गुजरा है। दरअसल, आज की पूरी राजनीतिक जमात ही देश की समस्याओं का प्रभावी प्रबंधन करने में अक्षम है। भारत में राजनीतिक प्रतिभा का लोप इस बात से सिद्ध हो जाता है कि देश के बड़े राजनेताओं को उनकी वंश परंपरा से जाना जाता है, जैसे गांधी, सिंधिया, पायलट, यादव आदि। इसके अलावा नरेंद्र मोदी, ठाकरे, मुलायम सिंह, मायावती जैसे राजनेता भी मौजूद हैं, जो भय और चिंताओं से खेलते हैं। कोई हैरानी नहीं कि भारत अपने आदर्शो के लिए फिल्म उद्योग और क्रिकेट खिलाडि़यों की ओर देखता है। आज भारत को ऐसे नेताओं की सख्त आवश्यकता है जो भारत के उवल भविष्य का विचार और दृष्टि रखते हों और साथ ही उनमें इन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता भी हो। नि:संदेह दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की तरफ बढ़ रहा भारत ऐसे नेता पैदा कर सकता है जो बड़े सपने देखते हों और उन्हें पूरा करने का दम भी रखते हों। हालांकि, अंतिम जिम्मेदारी आम भारतीयों के ऊपर ही आती है, क्योंकि देश को वैसे ही नेता मिलते हैं जैसा पाने का वह हकदार है। देश के आज के हालात पर इकबाल याद आते हैं-वतन की फिक्र कर नादान, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मशविरे हैं आसमानों में, ना समझोगे तो मिट जाओगे हिंदुस्तान वालो, तेरी दास्तान तक ना रहेगी दास्तानों में। (लेखक किंग्स कॉलेज, लंदन में प्रोफेसर हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

मुसीबतों का पावर हाउस


नियति के देवता ने अमेरिका व यूरोप की किस्मत में शायद जब अमीरी के साथ कर्ज लिखा था या अफ्रीका को खनिजों के खजाने के साथ अराजकता की विपत्ति भी बख्शी थी, तो ठीक उसी समय भारत की किस्मत में भी उद्यमिता केसाथ ऊर्जा संकट दर्ज हो गया था। अचरज है कि पिछले दो दशक में भारत के सभी प्रमुख आर्थिक भूकंपों का केंद्र ईधन और बिजली की कमी में मिलता है। मसलन महंगाई की जड़ में महंगी ऊर्जा (पेट्रो उत्पाद व बिजली)! रुपये की तबाही के पीछे भारी ऊर्जा (पेट्रो कोयला) आयात! बजटों की मुसीबत की वजह बिजली बोर्डो के घाटे!, बैंकों के संकट का कारण बिजली कंपनियों की देनदारी! पर्यावरण के मरण के जिम्मेदार डीजल, बिजली और अंतत: ऊर्जा की किल्लत की वजह से ग्रोथ की कुर्बानी! ..ऊर्जा संकट का बड़ा व खतरनाक भंवर अर्थव्यवस्था की सभी ताकतों को एक-एक कर निगल रहा है। कारणों की छोडि़ए, हम तो अब लक्षणों का इलाज भी नहीं कर पा रहे हैं। कितने शिकार 2016 में कच्चा तेल (क्रूड) ही नहीं, बल्कि कोयले की दुनियावी कीमत बढ़ने पर भी हमारा दिल बैठने लगेगा। बारहवीं पंचवर्षीय योजना का मसौदा व ताजा आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि चार साल बाद भारत (246 अरब टन के घरेलू भंडार के बावजूद) अपनी जरूरत का 90 फीसद कोयला आयात करेगा। तब तक तेल की 80 फीसद और गैस की 28 फीसद जरूरत के लिए भी हम आयात पर निर्भर हो चुके होंगे। इस कदर आयात के बाद रुपये के मजबूत होने का मुगालता पालना बेकार है। महंगाई का ताजा जिद्दी दौर भी बिजली कमी की पीठ पर सवार है। पिछले दो साल की महंगाई में सबसे ज्यादा कीमतें बिजली, पेट्रोल की ही बढ़ी हैं। महंगाई के थोक मूल्य सूचकांक में ईधन का हिस्सा पिछले एक साल में 19 से बढ़कर 23 फीसद हो गया। इसमें पेट्रोल हीं नहीं, कोयला और बिजली की बेतहाशा महंगाई भी शामिल है। आयात पर निर्भरता के कारण ईधन व बिजली की महंगाई पर अब हमारा नियंत्रण नहीं रहा है। राज्यों के बजटों पर भी बिजली गिरी है जो पलटकर बैंकों को मार रही है। बिजली क्षेत्र पर सरकारी रिपोर्टे कहती हैं कि करीब एक लाख करोड़ रुपये के घाटे पर बैठी राज्यों की बिजली कंपनियां (ताजा आंकड़ों में) 80 हजार करोड़ रुपये के बैंक कर्ज में डूबी हैं। बिजली बोर्डो के डिफॉल्ट होने का खतरा पुख्ता है, इसलिए बैंक कर्ज देने से तौबा कर चुके हैं। डीजल से पैदा बिजली (जनरेटर) से आबो हवा को नुकसान आंकड़े का मोहताज नहीं है। एक उदाहरण काफी है कि इसी अप्रैल में तमिलनाडु में जब बिजली की कमी करीब 24 फीसद थी तो वहां डीजल की बिक्री 28 फीसद (पेट्रो प्लांनिंग सेल-पेट्रोलियम मंत्रालय) बढ़ गई। इतना सब गंवाने के बावजूद 15 से 17 हजार मेगावाट बिजली की मासिक किल्लत कायम है जो आर्थिक विकास को खा रही है। नीम अंधेरा सत्रह माह में दूसरा मौका है, जब बिजली घरों के पास चार दिन का कोयला बचा और 5 हजार मेगावाट उत्पादन ठप होने वाला है। पिछले साल फरवरी में भी 18 बिजली घरों का यही हाल था। मगर इस घोर संकट के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय बीते हफ्ते की बैठक में कोल इंडिया को कोयले का उत्पादन बढ़ाने पर राजी नहीं कर पाया। नकदी में देश की सबसे अमीर कंपनी (54,980 करोड़ रुपये) कोल इंडिया 39 करोड़ टन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 36 करोड़ टन कोयला निकाल पाती है। नतीजतन, 42 हजार मेगावाट की तैयार परियोजनाएं कोयले की कमी के कारण उत्पादन शुरू नहीं कर पातीं। कोयले की किल्लत के कारण ताप बिजली घरों की उत्पादन क्षमता (प्लांट लोड फैक्टर) 79 से घटकर 74 फीसद रह गई है। कोयला उत्पादन बढ़ाने की राह में पर्यावरण मंत्रालय तनकर खड़ा हो गया। नतीजतन, छह करोड़ टन कोयला उत्पादन की उम्मीद दफन हो गई। अब अगर कोयला आयात हो तो रुपया भुगतेगा और बिजली न बने तो जनता। इस सबकेबावजूद कोई निजी कंपनी विदेश से कोयला लाकर बिजली बनाना चाहे तो उसे निरंतर घाटे के लिए तैयार रहना होगा। बिजली कीमतें सियासतपरस्त हैं। हर बिजली कंपनी 80 पैसे से 1.93 रुपये प्रति यूनिट का नुकसान उठाती हैं। एनटीपीसी का हाल नहीं सुना आपने! देश की इस सबसे बड़ी बिजली कंपनी का मुनाफा केवल एक फीसद (2010-11) बढ़ा। बिजली क्षेत्र में पहले उत्पादन क्षमताओं में निवेश की कमी थी, कुछ निवेश आया तो कोयले की कमी पड़ गई। इसलिए देश में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने की मंजिल कभी नहीं मिलती। इस मार्च में निपटी ग्याहरवीं योजना में 78,700 मेगावाट की उत्पादन क्षमता जुड़नी थी। बीच योजना में लक्ष्य घटाकर 62,374 मेगावाट किया गया। अंतत: केवल 46 हजार मेगावाट की क्षमता ही तैयार हो सकी। अब जिसे जरूरत होगी वह सस्ते डीजल से जनरेटर दौड़ाएगा। पिछले एक दशक की ग्रोथ का बहुत बड़ा हिस्सा इसी डीजल बिजली से आया है। और डीजल तो सस्ता ही रहेगा क्योंकि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति भवन में विराजने के बाद भी कई चुनाव आने हैं। दरअसल, भारत में पेट्रो उत्पादों की मांग में कमी और बिजली की आपूर्ति बढ़ोतरी की जरूरत है। मगर ऊर्जा क्षेत्र में नीतियों का तमाशा तो देखिए, डीजल व डीजल की कारों की कीमत कम और बिजली की कमी बनाए रख पेट्रो उत्पादों की मांग बढ़ाई जाती है। जबकि बिजली की मांग को घटाने के लिए शाम को बाजार बंद (उत्तर प्रदेश) कराने जैसे अहमक फैसले होते हैं। कुछ नीतियां या क्षेत्र शायद बुनियादी रूप से बदकिस्मत होते हैं। भारत में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र शायद अकेला नमूना है जहां सब्सिडी, सियासतपरस्त नीतियां, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक उपक्रमों का एकाधिकार आदि सभी पुराने आर्थिक धतकरम बेखटके धमाचौकड़ी करते हैं। पेट्रो कीमत और बिजली सुधारों की शुरुआत को दो दशक बीत रहे हैं, मगर सारी समस्याएं जस की तस हैं। भरोसा करना मुश्किल है कि दुनिया की आर्थिक ताकतों में शुमार होने को बेताब एक मुल्क सिर्फ ऊर्जा नीतियों की विफलता के कारण विदेशी मुद्रा की कमी और महंगाई से लेकर बैंकों के कर्ज तक, इतने बहुआयामी संकट पाल रहा है। उद्यमिता केधनी भारत को बड़ा बनने के लिए बहुत बड़े सुधारों की जरूरत नहीं है और डूबने के लिए बहुत जटिल संकट भी नहीं चाहिए। सिर्फ चौबीस घंटे की बिजली हमें तरक्की की रोशनी दे सकती है और ऊर्जा की किल्लत का नीम अंधेरा हमें किसी भी सीमा तक डुबा सकता है। कहीं इतिहास यह न लिखे कि डेढ़ अरब की आबादी के मुल्ककी आर्थिक सुरक्षा सिर्फ इसलिए जोखिम में पड़ गई कि उसके पास बिजली नहीं थी?? ड्डठ्ठह्यद्धह्वद्वड्डठ्ठह्लद्ब2ड्डह्मद्ब@स्त्रद्गद्य.द्भड्डद्दह्मड्डठ्ठ.ष्श्रद्व

मुख्यधारा से भी जोड़ना होगा


अंडमान द्वीप पर बसे दुर्लभ जनजातीय समुदायों में से एक जारवा जनजातियों के संरक्षण के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले दिनों संशोधित विधेयक को मंजूरी दे दी। विधेयक के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किलोमीटर के दायरे में पर्यटन, अनधिकृत प्रवेश, विडियो या फोटोग्राफी, शिकार, शराब सेवन, ज्वलनशील पदार्थ आदि की पहुंच और किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि पर पूरी तरह पाबंदी होगी। विधेयक के अमल में आने के बाद इस कानून के उल्लंघन पर आरोपी को सात साल तक की कैद और दस हजार रुपये का जुर्माना भी भुगतना होगा। यानी विधेयक में जहां जारवा आदिवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति को बचाने और उनकी सुरक्षा पर जोर दिया गया है तो वहीं उनके संरक्षण के लिए कानूनी प्रावधान भी किए गए हैं। दुनिया भर की आदिम जनजातियों और मूल निवासियों की अस्मिता, पहचान, संस्कृति व भाषा वगैरह के संरक्षण और उनके स्वास्थ, शिक्षा व प्राकृतिक संपदाओं की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो घोषणापत्र जारी किया है, उसके पालन के लिए प्रतिबद्ध देशों में भारत भी शामिल है। यही नहीं, भारतीय संविधान भी जनजातियों को यह जमानत देता है कि देश में न सिर्फ उनकी संस्कृति, परंपरा और भाषा सुरक्षित रहेगी, बल्कि उनके अधिकारों की भी रक्षा की जाएगी। इसके लिए सरकार ने बाकायदा कई संवैधानिक प्रावधान भी किए हैं। बावजूद इसके देश में ऐसे कई मामले सामने निकलकर आते रहते हैं, जिसमें सरकार की नाकामी साफ झलकती है। ऐसा ही एक मामला जारवा जनजाति का है। पूरे देश में जारवा आदिवासी उस वक्त चर्चा में आए, जब इस साल जनवरी में इस समुदाय की स्ति्रयों का नग्न और अर्धनग्न अवस्था में नाचते हुए दिखाने वाला एक वीडियो मीडिया में आया। वीडियो उन लोगों ने तैयार किया, जो पर्यटन के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर गए थे। इस वीडियो के सामने आने से पहले भी ऐसी कई शिकायतें आई हैं कि पर्यटक उन्हें खाने-पीने का सामान देकर उनके फोटो खींचते हैं और वीडियो बनाते हैं। इस कृत्य में उनकी मदद स्थानीय टूर ऑपरेटर करते हैं। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ये टूर ऑपरेटर उनके सामने जारवा आदिवासियों को अजूबे की तरह पेश करते हैं। मानो जारवा आदिवासी इंसान नहीं, महज मनोरंजन की कोई वस्तु हों। प्रोटेक्शन ऑफ ऐबओरिजिनल ट्राइब रेगुलेशन-1956 के तहत हालांकि इस तरह की हरकतें पूरी तरह निषिद्ध हैं। यही नहीं, साल 2001 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी अंडमान निकोबार प्रशासन को आदेश दिया था कि इन आदिम जनजातियों को उनके क्षेत्र में अतिक्रमण और अनावश्यक संपर्क से सुरक्षित रखा जाए, लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों में ये गैर कानूनी और गैर इंसानी गतिविधियां बराबर चलती रहीं। क्षेत्र में नियम का उल्लंघन बढ़ता ही गया। प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही से मानव सफारी का यह घृणित कारोबार बिना रोक-टोक जारी रहा। बेयरफुट नामक एक पर्यटक कंपनी ने तो हद ही कर दी। साल 2006 में सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर उसने जारवा जनजाति के सुरक्षित क्षेत्र से महज तीन किलोमीटर दूरी पर एक रिसॉर्ट भी बना लिया। बहरहाल, जब ये सारी खबरें मीडिया में आई तो सरकार को देश-दुनिया में काफी शर्मिदगी झेलनी पड़ी। एक तरफ सरकार पर ये इल्जाम लगे कि आजादी के छह दशक बाद भी वह जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा में नहीं ला पाई है तो दूसरी तरफ कानूनी संरक्षण के बाद भी वह इन जनजातीय समुदायों का शोषण नहीं रोक पा रही है। यही वजह है कि भविष्य में जारवा समुदाय के ऐसे इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने अब सख्ती बरतने का फैसला किया है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन-2012 इसी दिशा में उठाया गया, सरकार का एक छोटा-सा कदम है। देर से ही सही, सरकार ने एक उचित पहल की है, लेकिन सिर्फ कानून बनाने से ही सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जनजातीय समुदाय मुख्यधारा में आएं, इसके लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। प्रयास उनकी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए ही नहीं होने चाहिए, बल्कि आधुनिक विकास का उन्हें फायदा मिले, इसकी भी कोशिशें करनी होगी। तभी जाकर इन जनजातीय समुदायों को सही मायने में इंसाफ मिल पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

एक कानून जारवा के संरक्षण के लिए


लुप्त होने के कगार पर खड़ी जारवा जनजाति को कानूनी संरक्षण मिलने जा रहा है। इस कानून के अमल में आने के बाद जारवा समुदाय नुमाइश और मनोरंजन के जीव नहीं रह जाएंगे। केंद्र सरकार ने इनके लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह (आदिवासियों का संरक्षण) संशोधन नियमन विधेयक-2012 को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद यह कानून प्रभावशील हो जाएगा। कानून के मुताबिक जारवा आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र के आसपास पांच किमी के दायरे में पर्यटन करना अपराध होगा। साथ ही वीडियो या फोटोग्राफी करना भी अनाधिकृत कर दिया गया है। कानून का पालन नहीं करने पर सात साल की सजा और 10 हजार रुपये तक का जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। हालांकि निकोबार प्रशासन ने भी इस जनजाति के लिए सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने वाली एक अधिसूचना जारी की थी, लेकिन कोलकाता हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था, जिसकी अपील सुप्रीमकोर्ट में लंबित है। केंद्रीय कानून बन जाने के बाद इस अधिसूचना का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। जारवा जनजाति के संरक्षण के लिए यह कानून बेहद जरूरी था, क्योंकि हमारे समाज की दशा और दिशा अर्थतंत्र तय करने लगे हैं। इसलिए मापदंड तय करने के तरीके बदल गए हैं। यही कारण है कि हम जिन्हें सभ्य और आधुनिक समाज का हिस्सा मानते हैं, वे लोग प्राकृतिक अवस्था में रह रहे लोगों को इंसान मानने के बजाय जंगली जानवर ही मानते हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में रह रहे लुप्तप्राय जारवा जनजाति की महिलाओं को स्वादिष्ट भोजन का लालच देकर सैलानियों के सामने नचाने के कुछ मामले ब्रिटिश अखबारों में छपे थे। इनके नग्न वीडियो भी इंटरनेट का हिस्सा बनाए गए थे, जिन्हें शासन-प्रशासन ने झुठलाने की कवायद की थी। जबकि हकीकत यह थी कि अभयारण्यों में वन्यजीवों को देखने की मंशा की तरह दुर्लभ मानव प्रजातियों को भी देखने की चाह रसूखदारों में पनप रही है। एक विडंबना यह भी है कि जिस सरकारी तंत्र को आदिवासियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है, वही इन्हें लालच देकर नचवाने का काम कर रहे हैं। इसी कुत्सित मानसिकता के चलते जारवाओं को इंसान की बजाए पर्यटक मनोरंजक खिलौने मानकर चलने लगे थे। एक ओर तो हम दया और करुणा जताते हुए सर्कसों और मदारियों द्वारा वन्यजीवों के करतब दिखाए जाने पर अंकुश लगाने की वकालत करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने में मगन निर्वस्त्र जनजातियों को नचाने के लिए मजबूर करते हैं। लंदन के अखबार ने मोबाइल फोन से फिल्माई गई दो फिल्में जारी की थीं। इनमें से एक फिल्म 3.19 मिनट की थी, जिसमें एक पुलिस अधिकारी के सामने नृत्य करती हुई जारवा जाति की अर्धनग्न लड़कियां दिखाई गई थीं। दूसरे वीडियो में सेना की वर्दी पहने बैठे एक व्यक्ति के सामने अन्य जारवा युवतियां नाच रही थीं। अखबार ने दावा किया था कि ये वीडियो नए हैं और इनकी सुरक्षा में लगे अधिकारियों की मिलीभगत से सामने आए हैं। इसके पहले विदेशी सैलानियों के सामने इन महिलाओं को नचाने के जो वीडियो जारी किए गए थे, उनका फिल्मांकन गोपनीय ढंग से इसी अखबार के पत्रकार ने किया था। इस कारण देश में हल्ला मचा और केंद्र सरकार को मजबूरी में इस समुदाय के संरक्षण के लिए कानून बनाना पड़ा। जंगल में अमंगल आधुनिक विकास और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए वन कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों के चलते अंडमान में ही नहीं, देश भर की जनजातियों की संख्या लगातार घट रही हैं। आहार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी होती जा रही है। इन्हीं वजहों के चलते अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अलग-अलग दुर्गम टापुओं पर जंगलों में समूह बनाकर रहने वाली जनजातियों का अन्य समुदायों और प्रशासन से बहुत सीमित संपर्क है। यही वजह है कि इनकी संख्या घटकर महज 381 रह गई है। एक अन्य टापू पर रहने वाले ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की आबादी लगभग 97 है। इन लोगों में प्रतिरोधात्मक क्षमता इतनी कम होती है कि ये एक बार बीमार हुए तो इनका बचना नमुमकिन हो जाता है। एक तय परिवेश में रहने के कारण इन आदिवासियों की त्वचा बेहद संवेदनशील हो गई है। लिहाजा, अगर ये बाहरी लोगों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो ये रोगी हो जाते हैं और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अब इनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए टीकाकरण और पौष्टिक खुराक देने के उपाय किए जा रहे हैं। करीब एक दशक पहले तक ये लोग पूरी तरह निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन सरकारी कोशिशों और इनकी बोली के जानकार दुभाषियों के माध्यम से समझाने पर इन्होंने थोड़े-बहुत कपडे़ पहनने या पत्ते लपेटने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए ब्रिटिश अखबार के जरिये जिन विडियो की जानकारी सामने आई है, उनमें जारवा महिलाओं को कपड़े पहने नृत्य करते दिखाया गया था। इस कारण तय हुआ था कि ये वीडियो नए हंै। पूछताछ से खुलासा हुआ था कि ब्रिटिश अखबार के द ऑब्जर्वर के पत्रकार को पोर्टब्लेयर के राजेश व्यास और टैक्सी चालक इनके निवास स्थल तक ले गए थे। वहां इन्होंने स्वादिष्ट भोजन के चंद निवाले डालकर इनसे नृत्य कराया और फिल्मांकन किया। जबकि यह क्षेत्र सुप्रीमकोर्ट और स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार पर्यटन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हें संपूर्ण संरक्षण देने की दृष्टि से अंडमान ट्रंक रोड को बंद करके समुद्र से ऐसा मार्ग बनाए जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो जारवा संरक्षित क्षेत्र से होकर न गुजरे। जारवा जनजातियों को मनोरंजन के जीव मानकर चलना एक शर्मनाक पहलू था। यह शोषण और अमानवीयता का चरम है। चंद निवालों के लालच में यदि परदेसियों के सामने अर्धनग्न जारवा महिलाएं नाच रही हैं तो विकास का ढिंढोरा पीट रहे देश के लिए लज्जा में डूब मरने की बात है। क्योंकि ये भोले और मासूम जारवा नहीं जानते कि कथित रूप से सभ्य मानी जाने वाले दुनिया में नग्नता बिकती है, लेकिन इसके ठीक विपरीत जो लोग धन का लालच देकर इनकी नग्नता के दृश्य कैमरे में कैद करते हैं, वे जरूर अच्छी तरह से जानते हैं कि यह नग्नता उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की टीआरपी बढ़ाने की सस्ती और जुगुप्सा जगाने वाली अचरज भरी विडियो क्लीपिंग है। इस लिहाज से जन्मजात अवस्था में रह रहे जारवाओं की मासूमियत को बेचने के गुनाहों पर इस कानून के अमल में आने के बाद अंकुश लगने की उम्मीद है। इसी तरह का एक मामला ओडिशा के प्राचीन आदिवासियों को लेकर भी सामने आया है। इन्हें भी एक सफारी में सैलानियों के सामने नचाया गया था। सभ्यता की परिधि से दूर हम हालांकि हमारे देश के सांस्कृतिक परिवेश में नग्नता कभी अश्लीलता का पर्याय नहीं रही। पाश्चात्य मूल्यों और भौतिकवादी आधुनिकता ने ही प्राकृतिक व स्वाभाविक नग्नता को दमित काम वासना की पृष्ठभूमि में रेखांकित किया। वरना, हमारे यहां तो खजुराहों, कोणार्क और कामसूत्र जैसे नितांत व मौलिक रचनाधर्मिता से स्पष्ट होता है कि एक राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हम कितनी व्यापक मानसिक दृष्टि से परिपक्व लोग थे। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के शासन और उनकी संकीर्ण कार्य-प्रणाली ने हमारी सोच को बदला और नैसर्गिक नग्नता फूहड़ सेक्स का उत्तेजक हिस्सा बन गई। इसीलिए कहना पड़ता है कि कथित रूप से हम आधुनिक भले ही हो गए हों, लेकिन सभ्यता की परिधि में आना अभी बाकी है। वरना, जो आदिम जातियां प्रकृति से संस्कार व आहार ग्रहण कर अपना जीवन-यापन कर रही हैं, उन्हें मानव मानने की बाजाय चिंपाजियों जैसे रसरंजक वन्य प्राणी मानकर नहीं चलते और न ही भोजन के चंद टुकडे़ डालकर उन्हें बंदर या भालुओं की तरह नाचने को बाध्य करते? और न ही इनके जीवन में बाहरी दखल को रोकने के लिए किसी कानून की जरूरत पड़ती? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

जोखिम भरी राह पर नीतीश


राष्ट्रपति चुनावों को लेकर पिछले सप्ताह राजग में मचे घमासान को देखकर निश्चित तौर पर कांग्रेस की बांछे खिल गईं। इस हद तक कि संप्रग-3 की बातें भी होने लगी हैं। कांग्रेस की यह खुशी एक हद तक जायज भी है। कुछ समय पहले राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी और एपीजे कलाम के बीच कांटे की टक्कर की संभावना जताई जा रही थी, जो अब एकतरफा मुकाबले में बदल गई है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने घोषणा कर दी है कि वह राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं। संप्रग को ममता बनर्जी के विद्रोह से जितना नुकसान हुआ है उससे अधिक लाभ समाजवादी पार्टी, शिवसेना, तेलगूदेशम पार्टी, माकपा और इन सबसे बढ़कर जनता दल (यू) के समर्थन से हो गया है। संप्रग उम्मीदवार को अब कितना समर्थन हासिल हो गया है, यह महज अटकलबाजी ही रह गई है। हालांकि हकीकत यह है कि अब कांग्रेस के प्रबंधक नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू और भाजपा में छिड़ने वाली जंग और परिणामस्वरूप नीतीश कुमार के राजग से बाहर आने की संभावनाओं पर उम्मीद लगा बैठे हैं। जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने आर्थिक संकट का सामना करने में संप्रग सरकार की जिस तरह सराहना की उससे इसकी अटकलें अचानक तेज हो गई हैं। नरेंद्र मोदी पर नीतीश कुमार के हमले के बाद अब ऐसी चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री या तो समाजवादी पार्टी की राह पर चलने की सोच रहे हैं और खुद को कांग्रेस के सबसे बड़े सहारे के रूप में तैयार कर रहे हैं। दूसरा विकल्प यह है कि वह नवीन पटनायक का अनुसरण कर रहे हैं और खुद को स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में तैयार कर रहे हैं, जिसका किसी भी राष्ट्रीय गठबंदन से जुड़ाव न हो। यह अनिश्चितता अच्छा संकेत नहीं है। पिछले दिनों नीतीश कुमार ने भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया था कि अगर 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाता है तो वह राजग से बाहर हो जाएंगे। इस मुद्दे को उन्होंने तब उठाया जब पिछले माह बिहार में जातीय राजनीति पर मोदी के मामूली से बयान पर उन्होंने हड़कंप मचा दिया। दरअसल, मोदी के निशाने पर नीतीश नहीं लालू प्रसाद यादव थे। इसके अलावा एक पत्रिका में नीतीश कुमार के खिलाफ लेख छपने पर भी मुद्दे ने तूल पकड़ा। पत्रिका के इस अंक में गुजरात सरकार का विज्ञापन छपा था। संक्षेप में, हमला बोलने में पहल नीतीश कुमार ने ही की। मोदी प्रोजेक्ट पर नीतीश कुमार द्वारा अपनी नाखुशी प्रकट करना अपनी जगह सही हो सकता है, किंतु ऐसा नहीं है कि इस कारण ही नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव पर राजग से अलग राह पकड़ी हो। आखिरकार, पीए संगमा को भाजपा ने एकतरफा उम्मीदवार नहीं चुना। वह अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल की पसंद थे। पिछले सप्ताह नवीन पटनायक ने संगमा को समर्थन देने के मुद्दे पर नीतीश कुमार से बात की थी। खबर है कि नीतीश कुमार ने पटनायक की बात पलटने का कोई ठोस कारण नहीं दिया। यह भी समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर शरद यादव को भी पूरी तरह राजी नहीं कर पाए थे। इस अटकल में भी दम नहीं है कि नीतीश कुमार ने केंद्र को बिहार के लिए विशेष पैकेज देने पर राजी करने के बाद ही प्रणब मुखर्जी के समर्थन की घोषणा की है। बिहार को विशेष पैकेज की अटकलों में इसलिए दम नहीं है क्योंकि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की अनदेखी करते हुए बिहार के लिए पैकेज देने में संप्रग न तो राजनीतिक रूप से सक्षम है और न ही आर्थिक रूप से। जी-20 शिखर सम्मेलन में मनमोहन सिंह के बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि राजकोषीय घाटे को काबू में करने के लिए सरकार अपने खर्चो पर अंकुश लगाना चाहती है। अगर केंद्र ने नीतीश कुमार से विशेष पैकेज का वादा किया भी है तो वह खुद भी जानते हैं कि उसमें कोई वजन नहीं है। इस स्थिति में कांग्रेस की तरफ से वचन दिया जाना ऐसा ही है जैसे एक लड़खड़ाते हुए बैंक के पोस्ट डेटेड चेक दे दिए जाएं। सही सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की योजनाओं पर सहमत नहीं होगा। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बसपा के कुछ नेताओं के खिलाफ सीबीआइ के दबाव की रणनीति नीतीश कुमार के मामले में लागू नहीं हो सकती। वर्तमान हालात में कांग्रेस विरोधी ब्लॉक से नाता तोड़कर प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने में (वह भी तब जब उन पर हार का कोई खतरा नहीं है) कतई राजनीतिक समझदारी नहीं है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ चेतावनी जारी कर नीतीश कुमार उन भाजपा नेताओं को खुश कर रहे थे जिनके साथ उनके बेहतर संबंध हैं। उन नेताओं द्वारा नीतीश कुमार के विचारों पर ध्यान देने से मिलने वाले लाभ पर कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने की वजह से पानी पड़ गया। इससे न केवल नीतीश का बेदाग कांग्रेस विरोध रिकॉर्ड कलंकित हो गया, बल्कि उन्होंने जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और प्रकाश सिंह बादल जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच अपना भरोसा भी गंवा दिया। एक समय था जब नीतीश कुमार को 2014 के आम चुनाव मेंखंडित जनादेश की स्थिति में भारतीय जनता पार्टी और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच प्रधानमंत्री पद के गंभीर दावेदार के रूप में देखा जाता था। इसमें संदेह नहीं कि उन्हें सिद्धांतवादी, भरोसेमंद और स्पष्ट छवि का राजनेता माना जाता है। समझ से परे है कि इस अकेले फैसले से उन्होंने अकारण ही खुद को मुलायम सिंह यादव की श्रेणी में क्यों ला खड़ा किया? वास्तव में राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर शेष राजग से अलग चलने के गंभीर दुष्परिणाम निकलेंगे। आधी रात को रहस्यमयी मुलाकात के बाद मुलायम सिंह की पलटी और नीतीश कुमार के इस फैसले से संघीय मोर्चे की उम्मीदों को झटका लगा है, जिस पर अगले आम चुनाव में बड़ी उम्मीदें बंधी थीं। क्षेत्रीय खिलाडि़यों की प्रासंगिकता बनी होने के बावजूद अब संप्रग और राजग में सीधे टकराव की संभावना बढ़ गई हैं। स्पष्ट जनादेश को तरस रहे भारत के लिए यह इतनी बुरी बात भी नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

कसौटी पर कट्टरता

भाजपा की विचारधारा एक बार फिर निशाने पर है। कट्टर हिंदूवादी छवि के कारण ही वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार समर्थन नहीं जुटा सकी थी और गिर गई थी। उसी के बाद भाजपा ने अपनी उदारवादी छवि बनाने की कवायद शुरू की थी। पार्टी ने राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता तथा कश्मीर में अनुच्छेद-370 के खात्मे की विवादस्पद मांगों को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला किया था। तत्पश्चात, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) बना था। राजनीति में हुए इस अनोखे प्रयोग की बदौलत ही वह वर्ष 1998 में सत्ता में आई थी। यद्यपि 13 महीने में ही सरकार गिर गई लेकिन मध्यावधि चुनाव में वह पुन: सत्ता में आ गई थी। उस समय राजग को भानुमती का कुनबाकहने वाली कांग्रेस को भी करारा जवाब मिला था। गठबंधन राजनीति के इस सफल प्रयोग के लगभग डेढ़ दशक बाद भाजपा की विचारधारा पर पुन: सवाल उठाने लगे हैं। राजग के प्रमुख घटक जदयू के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि राजग के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार धर्मनिरपेक्ष छवि का होना चाहिए। आगामी आम चुनाव को देखते हुए नीतीश के बयान के राजनीतिक निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। क्या भाजपा पर संघ के बढ़ते शिकंजे तथा विचारधारा पर वापसी की कवायद से जदयू असहज है? नीतीश का बयान भाजपा की अंदरूनी राजनीति का नतीजा तो नहीं है? अभी मुंबई में हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह से नरेंद्र मोदी की जिद पर संघ समर्थित संजय जोशी को अधिवेशन और फिर पार्टी से बाहर किया गया; उसके बावजूद संघ जिस तरह मोदी के पीछे खड़ा है, उससे जदयू परेशान है। उसे लगने लगा है कि संघ 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देख रहा है। इसीलिए नीतीश ने यह बयान देकर संघ को चेताने की कोशिश की है कि उन्हें कट्टर हिंदूवादी छवि वाले नेता (मतलब मोदी) मंजूर नहीं हैं। नेता गठबंधन के सभी घटकों को स्वीकार्य होना चाहिए, जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष हो। यह और भी दिलचस्प है कि नीतीश के बयान का तत्पर जवाब भाजपा की ओर से नहीं बल्कि संघ से आया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत का नीतीश से सवाल है कि कोई हिंदूवादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता? इसे मोदी के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे लेकर जदयू आगबबूला है। इसलिए राष्ट्रपति चुनाव में उसने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर अपने इरादे का इजहार कर दिया है। उसने तो धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर राजग से बाहर जाने की बात कही है। ऐसे में क्या संघ मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाकर राजग के बड़े सहयोगी को नाराज करने का खतरा मोल लेगा, जबकि बिहार में इस गठबंधन की सरकार है? वैसे भाजपा के साथ न रहने पर भी जदयू की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मोदी से जदयू की चिढ़ पुरानी है। जदयू का मानना है कि गोधरा कांड के बाद अगर वाजपेयी जी गुजरात में मोदी सरकार को बर्खास्त कर देते तो 2004 में राजग चुनाव नहीं हारता। इतना ही नहीं लगभग दो वर्ष पूर्व पटना में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान मोदी के साथ हाथ मिलाते अपनी तस्वीर छपने से नीतीश इतने नाराज हुए थे कि भाजपा नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज तक रद्द कर दिया था। साथ ही साथ कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात से मिली पांच करोड़ की सहायता राशि तक लौटा दी थी। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ने मोदी को प्रचार के लिए न बुलाने की शर्त रखी थी, जिसे मजबूर होकर भाजपा को मानना पड़ा था। अब जब संघ के इशारे पर भाजपा सत्ता के लिए डग भर रही है तो वह चौकन्ने हो उठे हैं। वह बिहार की सत्ता में बने रहने के लिए अति पिछड़ों, महादलित वोट बैंक के साथ मुसलमानों के गठजोड़ में किसी तरह की दरार नहीं चाहते। इसके इतर, भाजपा जिसका 2009 के लोकसभा चुनाव में भी खराब प्रदर्शन रहा था; उससे सबक लेने की जगह आज आपस में लड़ रही है। उसके घटक दल अपनी अलग पहचान के साथ वृहत्तर स्वीकार्यता बनाने की कोशिश में है। नीतीश के बयान को उसी दिशा में बढ़ा हुआ कदम माना जा रहा है। उन्हें उम्मीद है कि 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व होगा। इसीलिए उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में गठबंधन की परवाह किए बगैर कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने का फैसला किया है। वह 2014 में त्रिशंकु संसद की स्थिति में अपने विकल्प खुले रखने के लिए कांग्रेस से रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहते। इसी तरह, राजग की दूसरी महत्त्वपूर्ण सहयोगी शिवसेना पहले ही प्रणब दा के समर्थन का ऐलान कर चुकी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार नवीन पटनायक की तरह भाजपा को झटका देंगे, जो 2009 चुनाव के ठीक पहले राजग छोड़ गए थे? यह आनेवाला समय ही बताएगा। भाजपा अपनों के बीच विचार युद्ध की लड़ाई लड़ रही है। वर्ष 2004 के चुनाव में हार और जिन्ना प्रकरण के बाद पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी को ज्यादा उदारवादी बनाने की कोशिश की। उस समय भी भाजपा का एक वर्ग पार्टी की मूल विचारधारा में लौटने की वकालत करता था। किंतु 2009 के चुनाव में हार के बाद संघ ने अब भाजपा की कमान अपने हाथ में ले ली है। संघ ने नितिन गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाकर भविष्य का संकेत दे दिया है। ऐसे में पार्टी में उदारवादी चेहरे की वकालत करने वालों को डर सता रहा है कि क्या संघ ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को पेश करने का मन बना लिया है? उन्हें आशंका है कि गुजरात में चंद महीनों के बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में चौथी बार भाजपा की सरकार बनाने के पश्चात मोदी दिल्ली का रुख करेंगे। उनकी नजर 2014 के चुनाव पर है। इसके पीछे संघ का तर्क है कि अकेले मोदी ही भाजपा में जनाधार वाले नेता हैं। उन्हें आगे करने से पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा। आम चुनाव में अधिक सीटें मिलने के बाद गठबंधन तैयार करने में आसानी होगी। क्या यह इतना आसान है? क्या मोदी के सहारे संघ भगवा लहर (हिंदुत्व की लहर) चला सकेगा? यह फिलहाल मुंगेरीलाल के हसीन सपनेजैसा ही लगता है; क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को 2004 में चुनावी हार के बाद यह लगने लगा था कि उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि राजग के सर्वमान्य नेता बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पुरानी छवि तोड़ने और नई उदारवादी इमेज गढ़ने की पूरी कोशिश की। पाकिस्तान जाकर जिन्ना को सेक्युलर होने का प्रमाण इसी के तहत दिया गया था, जिसके चलते उन्हें संघ का कोपभाजन बनना पड़ा था। फिर भी उन्हें 2009 में संघ ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया था किंतु भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली। ऐसे में मोदी पर संघ का दांव लगाना काफी जोखिम भरा लगता है। ऐसे में देखना होगा कि विचारधारा की कशमकश भाजपा को कहां ले जाती है? राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर अनिश्चय के भंवर में फंसी भाजपा की खूब फजीहत हो रही है। पार्टी अपने घटक दलों के साथ मिलकर इस संबंध में पहले कोई आम राय नहीं बना सकी। इसी बीच, कांग्रेस ने प्रणब दा को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर बाजी मार ली; क्योंकि भाजपा इस अहम सवाल पर कांग्रेस की कमजोरी में अपनी सफलता तलाश रही थी। ममता बनर्जी के साथ समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को खड़े देखकर उसे लगा कि उसका काम बन गया। किंतु मुलायम को शीघ्र ही उनका यह खेल समझ में आ गया और सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए उन्हें प्रणब दा का समर्थन करने में तनिक देर नहीं लगी। परिणामस्वरूप भाजपा के मंसूबे पर पानी फिर गया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी भाजपा की दूसरी उम्मीद थी। इसी बहाने, वह राजग का कुनबा बढ़ाने का भी सपना देख रही थी किंतु कलाम के इनकार से भाजपा को और बड़ा झटका लगा है। अब भाजपा पीए संगमा को समर्थन देकर हारी हुई लड़ाई लड़ने जा रही है। तो क्या संघ राष्ट्रपति चुनाव में राजग के सहयोगियों के रुख को देखते हुए अपनी भावी रणनीति (कट्टर हिंदूवादी छवि पर जोर देने वाली) पर पुनर्विचार करेगा?