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Thursday, May 5, 2011

लोकतंत्र को एक मौका और


पंचायतों के लिए चुनाव तो देश के कई राज्यों में हुए लेकिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों और आतंकवादग्रस्त राज्य कश्मीर में ग्राम पंचायतों का लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव होना और लोगों का उनमें बड़ी संख्या में शामिल होना अपने आप एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। दोनों क्षेत्रों में लोगों का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिक व्यवस्था से घोर असंतुष्ट दिखाई देता है। वे कहते रहे हैं कि भारतीय संविधान, शासन व्यवस्था और राजनीतिक तंत्र के तहत चुनाव प्रक्रिया में शामिल होना उसी तंत्र का समर्थन करना है जिसके खिलाफ वे हथियार उठाए हैं और आतंकवादी कहलाने का जोखिम भी ले रहे हैं। कहीं से उन्हें उम्मीद दिलाई गई है कि तंत्र को उखाड़ने से ही उन की दृष्टि का लोकतंत्र स्थापित होगा। पूर्वी भारत के वन्य राज्यों में आदिवासियों को विश्वास दिला दिया गया है कि आधुनिक नागर संस्कृति और शहरी तौरत रीकों के कारण उन की लौकिक संस्कृति नष्ट की जा रही है।
संवाद ही सहमति का एकमात्र रास्ता
दरअसल, आदिवासियोें की जीवनशैली आधुनिकता की विरोधी है और जब तक लोगों को इससे हटाकर कथित आधुनिकता की ओर नहीं लाया जाता,आदिवासियों का कल्याण सम्भव नहीं है। साफ है कि किसी भी अतिवाद में अतिरंजना की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जो चित्र उन्हें दिखाया गया है वह अतिरंजित तो है ही। ऐसी स्थिति में राजनीतिक गरीब और कम जानकार लोगों को इस तरह की बातों से लुभाते हैं और एक जुनून की स्थिति पैदा कर दी जाती है। इस जुनून का जवाब सरकारों के पास हथियार ही होता है। आतंकवाद या कथित माओवाद- समाज के ऐसे दो गुटों के बीच वर्चस्व की जंग होती है। स्पष्ट है कि हथियारों की इस होड़ में कोई हल तो नहीं निकल सकता है। हथियार छोड़कर संवाद ही सहमति का एकमात्र रास्ता है। यह संवाद कैसे स्थापित किया जाए? हम ने जिस लोकतंत्र को अपना लिया है, उस में चुनाव एक महत्वपूर्ण साधन है लेकिन चुनावों ने जो रूप ले लिया है वह तो एक शोषणयुक्त व्यवस्था को ही जन्म देता है। पैसा और रसूख ही तो उम्मीदवार को जितवा सकते हैं। फिर जो प्रतिनिधि जीत कर आते हैं वे तुरंत अपने मतदाताओं से किनारा कर लेते हैं। वही मंत्री बनते हैं, वही सरकारी पैसे की बंदरबांट में लग जाते हैं। ऐसे में जो चुनाव हाल ही में हो गए, उन में बड़ी संख्या में मतदाता शामिल क्यों हुए?
‘अतिवादियों’ का लोकतांत्रिक तरीका
दरअसल, आतंकवाद और नक्सलवाद की हिंसक धाराओं के साथ-साथ बागियों का ऐसा वर्ग भी होता है जो लोकतांत्रिक तरीके से उस सत्ता से लड़ने में विश्वास करता है जिसे वह उखाड़ना चाहता है। अतिवादी अपनी लड़ाई गांवों के स्तर पर लड़ता है। वह विधानसभा या लोकसभा के स्तर पर न तो लड़ सकता है और न ही इससे उस का उद्देश्य पूरा होने की उम्मीद होती है। राज्य प्रशासन और केंद्रीय राजनीति में पड़कर अधिक खतरा तो इसी बात का है कि उस के चुने हुए नेता उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएं जिससे वे बगावत करना चाहते थे और जिस के लिए लोगों ने उन्हें चुना था।
पंचायत लोकतंत्र का अच्छा प्लेटफार्म
झारखंड में शिबू सोरेन कभी वास्तविक लोकनायक के रूप में सामने आए थे जिन्होंने अनपढ़ आदिवासियों को लौकिक परम्पराओं के आधार पर व्यवस्था के खिलाफ एक सशक्त ताकत के रूप में खड़ा किया था। शिबू ने उन दिनों मुझे कहा था, ‘तुम नगरवासी रूस-अमेरिका की किताब पढ़ते हो लेकिन मैं तो माटी की किताब पढ़कर ही लोगों को समझाता हूं।’ लेकिन सत्ता के निकट आते-आते गुरुजी एक सत्तालोभी राजनीतिक ही बन गए थे। जो चुनाव आम जनता के सब से करीब होता है वह पंचायतों का चुनाव ही होता है। उसे आम जनता आसानी से नियंत्रित कर सकती है और उससे विधायकों और सांसदों को प्रभावित करना सम्भव है। जो आंदोलन लोकतंत्र के माध्यम से अपने एजेंडे को आगे ले जाना चाहते हैं, उनके लिए पंचायत ही एक अच्छा प्लेटफार्म बन जाता है।
टकराव और मध्यमार्ग का संयुक्त पथ
इसलिए जब घाटी में भारी मतदान हो जाए और लोग उत्साह से वोट डालने बाहर आएं तो यह पूछा जा सकता है कि क्या घाटी हिंसा से मुंह मोड़ रही है? कश्मीर घाटी में सईद अलीशाह गिलानी ने चुनावों का बहिष्कार करने का ऐलान किया था। लेकिन पहले चरण में तो उन के ऐलान की पूरी तरह अनदेखी की गई। गिलानी और उन के हिमायतियों के लिए यह सिद्धांत का प्रश्न है। लेकिन लगता है कि पिछले कुछ सालों में कश्मीर में भी एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है कि जो अहिंसक तरीकों से ही अपने उद्देश्य तक पहुंचना चाहता है। इसके लिए उन्हें किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाने की आवश्यकता ही नहीं और न पार्टियों के झंडे तले काम करना होगा। कश्मीर में टकराव और मध्यमार्गियों का भी यह चुनाव हो रहा है। पहले चरण में दक्षिण कश्मीर यानी अनंतनाग मंडल में कुछ गांवों में तो मतदान प्रतिशत 84 प्रतिशत हो गया था। लेकिन इस से यह अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि जो हथियार का रास्ता अपनाना चाहते हैं, उन्होंने हथियार डाल दिए हैं। आरम्भ में ही एक महिला उम्मीदवार हसीना बेगम को आतंकवादियों ने गोली से उड़ा दिया। हालांकि ऐसी बहुत सी घटनाएं नहीं हुई लेकिन इस का असर महिला उम्मीदवारों पर तो पड़ा ही है। हालांकि कोई नहीं जानता कि नतीजों के बाद पंचायतों का स्वरूप क्या होगा लेकिन एहतियात के तौर पर जहां उमर अब्दुल्ला यह कहते हैं कि यह जनमतसंग्रह नहीं है और वहीं महबूबा का कहना है कि लोगों ने उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक और मौका दिया है जिसका अवमूल्यन स्वयं सरकार ने किया है ।