Monday, February 28, 2011

चाहिए नया लोकतंत्र


पश्चिम ने इस व्यवस्था को जैसे ध्वस्त ही कर दिया है
पहले टूनीशिया, फिर मिस्र और अब लीबिया। तो क्या लोकतंत्र की बयार अरब दुनिया तक पहुंचेगी? लोकतंत्र के ठेकेदार बड़ी मासूमियत से यह सवाल पूछते हैं। सवाल में संदेह का बीज छिपा है : क्या मुसलिम समाज अपने आप को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप ढाल पाएगा? लोकतंत्र के हर पश्चिमी विशेषज्ञ के पास इन दकियानूसी समाजों को लोकतांत्रिक बनाने के नुसखे हैं।
चाहे काशी हो, अजमेर शरीफ या फिर रोम, इस दुनिया का हर पवित्र विचार देर-सबेर एक व्यवसाय बन जाता है। पंडों की फौज के साथ एक प्रतिष्ठान उस पर काबिज हो जाता है। यही लोकतंत्र के साथ हुआ है। गोरी दुनिया ने लोकतंत्र के विशेषज्ञों की एक फौज तैयार कर रखी है। जैसे ही तख्ता पलट की गर्द छंट जाएगी और हवाई अड्डे सुरक्षित हो जाएंगे, वैसे ही ये रायबाज टिड्डियों के दल की तरह उतरने लगेंगे।
जाहिर है, इस धंधे में ज्यादा सोचने की गुंजाइश नहीं रहती। विचार बने-बनाए हैं और दृष्टि सुस्थिर। उत्तर अफ्रीका और पश्चिम एशिया को मध्य-पूर्व कहने की रवायत इसी दृष्टि का परिचायक है। अगर भारत से देखें, तो इस क्षेत्र को मध्य-पश्चिम कहना चाहिए। निगाह दक्षिण अफ्रीकी हो, तो यह उत्तर कहलाएगा और अगर लैटिन अमेरिकी देश चिली में बैठे हों, तो पूर्वोत्तर। सिर्फ यूरोप में बैठकर ही इसे मध्य-पूर्व कहा जा सकता है।
यह दृष्टिदोष लोकतंत्र के स्थापित शास्त्र में घुस गया है। मसला दुनिया भर का है, लेकिन दृष्टि यूरोपीय है। लोकतंत्र के नाम पर अश्वेत दुनिया को यूरोप और उत्तर अमेरिका की जीवन-शैली दिखाई जा रही है, पश्चिमी उदारवाद की घुट्टी पिलाई जा रही है और पूंजीवाद का व्याकरण सिखाया जा रहा है। अगर जनता इस तयशुदा मॉडल के हिसाब से विद्रोह करने को तैयार न हो, तो उसे बंदूक की नोक से तोड़ा जा रहा है। इराक और अफगानिस्तान की तरह दुनिया के कई इलाकों में लोकतंत्र राजनीतिक स्वतंत्रता की जगह गुलामी का पर्याय बन चुका है।
लोकतंत्र का स्थापित शास्त्र मानकर चलता है कि लोकतंत्र का विचार दुनिया को पश्चिमी सभ्यता की सौगात है। दुनिया भर में नागरिक शास्त्र की पुस्तकें प्राचीन एथेंस और अब्राहम लिंकन के हवाले से लिखी जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था का मतलब है कमोबेश वही संस्थागत ढांचा, जिसे यूरोप और अमेरिका के लोकतांत्रिक समाजों ने अपनाया। इस ढांचे में चुनाव है, प्रतिनिधि है, संसद है, उसके प्रति जवाबदेह सरकार है, कोर्ट-कचहरी है और अधिकारों की रक्षा करने वाला लिखित संविधान भी है। लेकिन लोक और तंत्र के बीच की खाई को पाटने की कोई व्यवस्था नहीं है, स्वराज की गारंटी नहीं है।
इस समझ के चलते दुनिया भर में लोकतंत्र के नाम पर खानापूरी वाले निजाम कायम हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय चौकीदारों की उपस्थिति में चुनाव हो जाते हैं। जो तबका कल तक तानाशाही या राजतंत्र के नाम पर राज कर रहा था, उसी तबके के कुछ नए चेहरे अब लोकतंत्र के नाम पर राज करने लगते हैं। अभी से हम नहीं कह सकते कि मिस्र, टूनीशिया और लीबिया में यही होगा। लेकिन अगर पूरी दुनिया में लोकतंत्र विस्तार की कहानी को देखें, तो यही आशंका प्रबल है। लोकतंत्र के इस नाटक में लोगों को न तो स्वराज मिला, न ही सुशासन, बल्कि जो राजकाज और अमन था, वह भी जाता रहा।
नतीजतन लोकतंत्र का परचम अपनी आभा खो बैठता है। लोकतंत्र की हिमायत करने वाला एक छोटा-सा आधुनिकता-पसंद अभिजात्य वर्ग होता है। लेकिन जनता जनार्दन इस विचार से जुड़ नहीं पाती। पाकिस्तान में पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या इस अलगाव की एक नवीनतम मिसाल है। उदारपंथी सलमान तासीर यों तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए शहीद हुए, लेकिन उनके हत्यारे के समर्थन में पाकिस्तान में स्वत:स्फूर्त जुलूस निकले। दूसरे देशों में इस अलगाव का फायदा उठाकर शासक लोग यह दावा करते हैं कि लोकतंत्र एक विदेशी विचार है। सिंगापुर के पूर्व शासक ली-क्वान-यु तो खुल्लमखुल्ला कहते थे कि लोकतंत्र का विचार एशिया की संस्कृति के अनुरूप नहीं है।
लोकतंत्र की पश्चिमी ठेकेदारी इस खूबसूरत सपने का दम घोंट रही है। इसलिए जो लोग लोकतंत्र को सचमुच सार्वभौम विचार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, उन्हें इसका नया शास्त्र गढ़ना होगा। यह शास्त्र प्राचीन यूनान के साथ-साथ उन तमाम धाराओं और उपधाराओं की शिनाख्त करेगा, जो आज लोकतंत्र के विचार का स्रोत हैं। यह भारत में गणतंत्र की संस्था हो सकती है, बुद्ध संघ की परंपरा हो सकती है, इसलाम में उम्मा की परिकल्पना हो सकती है या फिर दुनिया भर में आदिवासी समाज की रीति-नीति हो सकती है। बेशक इनमें से कोई भी परंपरा हूबहू लोकतांत्रिक नहीं होगी, लेकिन उसके कुछ अंश जरूर बहुमूल्य होंगे। साथ ही पश्चिम की लोकतांत्रिक परंपरा की जांच करके उसमें स्थानीय और सार्वभौम हिस्सों को अलग करना होगा।
जिस मिस्र ने दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाया, उसे आज लोकतंत्र निर्माण के लिए नए सिरे से राजनीति का कायदा सीखने की जरूरत नहीं है। बेशक लोकतांत्रिक मिस्र दुनिया भर के लोकतांत्रिक प्रयोग के सबक अपने सामने रखना चाहेगा। वह आधुनिक लोकतंत्र के अनुभव का वारिस है। पर मिस्र के लोकतंत्र में उसकी अपनी सभ्यता का ताना-बाना होगा, उसके अपने अनुभव का रंग होगा, उसके धर्म और मूल्यों की छाप होगी।
लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है, बशर्ते हम लोकतंत्र के भारतीय स्वरूप को चिह्नित कर अपनाने का साहस कर सकें।
जनतंत्र की मौजूदा व्यवस्था में न तो लोक और तंत्र के बीच की खाई को पाटने की कोई व्यवस्था है, न स्वराज की गारंटी।

Thursday, February 24, 2011

दलितों के परिप्रेक्ष्य में विकेंद्रीकरण का महत्व


पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है
हालांकि राज्यों ने पंचायती राज अधिनियम लागू कर दिया है लेकिन शक्ति/सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तथा स्वशासन की संस्थाओं के रूप में पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तीकरण की जि़म्मेदारी अभी पूरी होनी बाक़ी है। लिहाज़ा इस संदर्भ में अब तक असमान विकास ही हुआ है। बहुत से राज्यों में पंचायतें अब तक आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय का प्रभावी औज़ार नहीं बन सकी हैं, क्योंकि कायरें, कोषों तथा पदाधिकारियों का हस्तांतरण महज़ कागज पर ही सीमित है। स्थानीय स्तरों पर कायरे, शक्तियों तथा संसाधनों का समुचित हस्तांतरण न हो पाने के कारण आजीविका के गम्भीर मसले का हल निकालने के प्रति ध्यान नहीं दिया जा सका है और न समुचित संसाधन की व्यवस्था की जा सकी है। सेवाओं के सफलतापूर्ण निष्पादन के लिए विकास के संवाहकके तौर पर उल्लिखित इन संस्थाओं में जाति और राजनीतिक दलों के दबावों के चलते संसाधनों से लेकर विकास के लाभ तक के मामलों में, सभी स्तरों पर वर्चस्वशाली समुदायों का दखल दिखता है। ग्राम सभाओं और पंचायतों में सहभागिता के सवाल पर समुचित ज़ोर नहीं दिया गया है और न ही उन अवरोधों को दूर करने की कोशिशें हुई हैं जो ग्राम सभाओं में वंचित तबक़ों के प्रवेश को अवरुद्ध करती हैं। जबरन थोपे जाने वाले जाति, वर्ग और जेंडर के भेदभावपूर्ण नियम और तौरत रीक़ों के चलते महिलाओं का उनके निर्वाचन-क्षेत्रों में ख़्ाराब प्रदर्शन दिखता है, जिसके चलते उनके लिए ग्राम सभाओं में बराबरी के साथ भागीदारी और विकास कायरें के कार्यान्वयन तथा पंचायत फंड का इस्तेमाल करने में दिक्कत खड़ी होती है। समर्थवान माहौल की कमी और वर्चस्वशाली जाति के सदस्यों द्वारा शक्ति क़ब्ज़ा लेने के चलते दलित महिलाओं और पुरुषों के सामने जाति, वर्ग और जेंडर से जुड़े व्यावहारिक मसलों और ज़रूरतों को उठाने में और उन पर काम करने में अवरोध पैदा होते रहने का सामना करना पड़ता है। पंचायतों में भाग लेने वाली दलित महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों पर होने वाले कुठाराघात से निबटने और जिन अवरोधों का उन्हें सामना करना पड़ता है उनसे उन्हें निजात दिलाने में राज्य मशीनरी लगातार असफल रही है। सूचना के लोकतंत्रीकरण को सुनिश्चित करने में सूचना का अधिकार क़ानून सबसे प्रगतिशीत अधिनियमों में से एक रहा है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने वाले बहुत से अपीलार्थियों को सूचना मांगने के एवज़ में व्यक्तिगत तौर से लक्ष्य बनाया गया, या फिर जानकारी प्रदान करने में भयानक देरी की गई। रिकॉर्ड की कमी और अपीलार्थियों को विभिन्न जनसूचना अधिकारियों द्वारा बार-बार चक्कर कटवाए जाने के कारण सूचना के अधिकार की प्रक्रिया लालफीताशाही के भार के नीचे कराह रही है। कुछ मूलभूत फायदों को समावेशित करने के छोटे-मोटे प्रयास किए गए। हालांकि पंचायतों में स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सेवाओं के मामले में बहिष्करण और भेदभाव की निरंतरता बनी ही हुई है। इतना ही नहीं, सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच के मामले में ग्राम आधारित मॉडल का इस्तेमाल किया जा रहा है न कि टोला आधारित। जब भी इन सेवाओं को प्रदान करने की बात आती है तो आवासीय पृथकत्व के कारण अनुसूचित जाति के बहुत से टोले- मोहल्ले नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। प्रवासी कामगारों की दलित बसावटों में न स्वच्छता की व्यवस्था है, न पेयजल और बिज़ली की। उन बसावटों में खेल का मैदान नहीं है, स्कूल, सामुदायिक केंद्र नहीं हैं और न कोई तालाब वग़ैरह ही है। सूचना के अपर्याप्त प्रवाह तथा एससी/एसटी समुदायों से संबंधित परियोजनाओं वाले विभागों में उत्तरदायित्व तंत्र के ढुलमुल रवैये के चलते अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के मद की एससीपी तथा टीएसपी जैसी योजनाओं का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप दलितों और आदिवासियों के हित में एससीपी/टीएसपी को साकार करने में भारी रुकावटें आएंगी। हालांकि, व्यय देखने पर इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि दलित समुदायों के पक्ष में एससीपी/टीसीपी के फंड का व्यय करने के बजाय उसे अन्य ढांचागत परियोजनाओं पर ख़्ार्च कर दिया गया है। कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान दिल्ली में ही एससीपी के पैसे अन्य मदों में खर्च करने की मिसाल हमारे सामने है। दलितों में विकलांगता की स्थिति काफी ज्यादा है। दलितों की कल्याणकारी सेवाओं तक पहुंच न हो पाने और स्वास्थ्य पण्राली तथा स्कूलों में उनके साथ होने वाले भेदभाव के चलते विकलांग आबादी का एक बड़ा हिस्सा किसी भी प्रकार की मदद या अनुदान से वंचित रह जाता है। आर्थिक संवृद्धि का मतलब यह भी है एक बहुत बड़ी प्रवासी आबादी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करे। जबकि हक़ीक़त यह है कि उनके लिए सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समुचित संरचनाएं और संस्थान न तो उपलब्ध कराए गए हैं और न ही उनका निर्माण किया गया है। पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण की व्याख्या और उसके कार्यान्वयन में अब भी काफी सारी ख़्ामियां हैं। भारतीय समाज में व्यापक रूप से मौज़ूद जाति, वर्ग और जेंडर संबंधी भेदभाव महज़ आरक्षण के बूते दूर नहीं किया सकता है। इसके लिए ठोस रणनीति की दरकार है। लिहाजा यह जरूरी है कि चुनावों में दलितों के भयमुक्त मदतान और उम्मीदवारी के अधिकार को सुनिश्चित करने और आरक्षित सीटों से चुनाव जीत जाने के बाद निर्भय होकर जनादेश पर काम करने के लिए प्रभावपूर्ण ढंग से आरक्षण की नीति लागू की जाए। इसके लिए समुचित नीतियों और आधिकारिक सरकारी निगरानी की ज़रूरत पड़ेगी तथा दलित उम्मीदवारों और प्रतिनिधियों को सुरक्षा भी मुहैया करानी होगी। सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण तभी मुमकि़न हो सकेगा जब बजटीय आवंटन, सम्बंधित कायरे और पदाधिकारियों के अधिकार पंचायतों को दिए जाएंगे ताकि उनके पास प्रभावी राजनीतिक शक्ति आए और वे अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें। यह भी ज़रूरी है कि पंचायत के कार्यक्रमों पर नौकरशाही का नियंतण्रन्यूनतम हो तथा वे पंचायतों के प्रति उत्तरदायी बनें। यह भी ज़रूरी है पंचायत के तीनों स्तरों के बीच तथा पंचायतों और ग्रामीण विकास परियोजनाओं के लिए जि़म्मेदार सरकारी विभागों के बीच संयोजन और समन्वय स्थापित हो और इन सबके बीच नियमित बैठकें हों और उनमें आपसी तालमेल ठीक-ठाक रहे। निचले स्तर की नौकरशाही में एससी/एसटी महिलाओं और पुरुषों के लिए पंचायत के कोटे के अनुरूप कोटा निर्धरित किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीडीओ अपनी आबादी के इस हिस्से के प्रतिनिधि ही हों।


Monday, February 21, 2011

उत्तराखंड के लिए गम्भीर खतरा हैं जल विद्युत परियोजनाएं


देश के पहाड़ी राज्यों, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आजकल जल विद्युत परियोजनाओं की जैसे भरमार हो गई है। इस समय केवल उत्तराखंड में पांच सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की परियोजनाओं पर कार्य चल रहा है। इन सभी परियोजनाओं को उत्तराखंड सरकार की पूर्ण मंजूरी के बाद ही चलाया जा रहा है। पर शायद सरकार अभी तक इन परियोजनाओं से उत्तराखंड के ग्रामीणों के समक्ष होने वाले संकट को नहीं समझ पा रही है। इन सभी परियोजनाओं से सीधे तौर पर यहां की आम गरीब जनता को नुकसान हो रहा है। साथ ही पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वह तो अभी अलग ही है। जबकि इन परियोजनाओं को अंजाम देने वाली कम्पनियों और संस्थाओं को केवल अपने लाभ से मतलब है, चाहे वे इसके लिए किसी का घर उजाड़ दें, या डायनामाइट लगाकर कई गांवों के मकानों में दरारें पैदा कर दें। एक आम इंसान जब घर बनाता है तो उसकी कितनी मेहनत और जीवन भर की कमाई उसमें लग जाती है, इसका अंदाजा उसको ही पूर्ण रूप से होता है। पर यदि उसका बनाया हुआ घर एक साल में ही जगह-जगह दरार प्रभावित हो जाए तो उस पर क्या बीतेगी? इसका अनुमान उत्तराखंड सरकार को नहीं हो पा रहा है। अगर यह किसी की कही बात होती तो शायद हम यकीन नहीं कर पाते, पर हमने खुद जाकर देखा है कि इन इलाकों में कैसे एक साल पुराने मकानों में भी दरारें आ चुकी हैं। कारण सिर्फ और सिर्फ एक है- टनल बनाने के लिए चटटनों में जो डायनामाइट से विस्फोट किया जाता है वही इन मकानों को खतरनाक हालात की तरफ धकेल रहा है। साथ ही इस कार्य से खेती, जंगल, पीने के पानी तथा आम लोगों की आजीविका को जो नुकसान हो रहा है वह तो अलग है। परंतु सरकार है कि चुप्पी तोड़ने को तैयार नहीं। पिछले दिनों मंदाकिनी नदी को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे लगभग 70 ग्रामीणों पर गलत मुकदमें दर्ज करके सरकार ने सभी को जेल में डाल दिया। यह घटना सभी को आश्र्चय में डाल सकती है क्योंकि एक तरफ जहां सरकार पर्यावरण सुरक्षा का राग अलापती है और गंगा को बचाने के लिए उसे राष्ट्रीय नदीघोषित करती है, वहीं दूसरी तरफ उसकी सहायक नदी- मंदाकिनी को बचाने को अपराध मानती है और इस सोच के तहत, नदी बचाव के लिए आंदोलन करने वाली ग्रामीण महिला सुशीला भंडारी एवं जगमोहन सहित 70 ग्रामीणों को अपराधी घोषित करती है। ये वे लोग हैं जो पिछले पांच वर्षों से मंदाकिनी नदी और क्षेत्र में पर्यावरण का स्वास्थ्य बचाने के लिए कार्यरत हैं। आज के समय में उत्तराखंड के अधिकतर गांवों की प्राकृतिक सुंदरता खत्म होती जा रही है। इंसान की हर मूल जरूरत की व्यवस्था जैसे पानी, जंगल, फल, कृषि इत्यादि का लगभग अंत होता जा रहा है। और इन सभी का कारण सरकार द्वारा विकसित की जा रही परियोजनाएं हैं। इस समय उत्तराखंड की कोई भी छोटी या बड़ी नदी ऐसी नहीं है जिस पर कोई परियोजना न चल रही हो। जिस आम इंसान की मदद से नेतागण अपनी सरकार बनाते हैं उसी के लिए सरकारें इतनी लाचार क्यों हो जाती हैं, यह बात उत्तराखंड की आम जनता अभी तक नहीं समझ पा रही है। सरकार बनाते वक्त नेतागण पर्यावरण को बचाने के लिए तमाम तरह की प्रतिबद्धताएं दर्शाते हैं; पर उनको व्यवहार में लाने के समय सारी प्रतिबद्धताएं भूल जाते हैं। अब तो उत्तराखंड की जनता को अपनी कृषि और खेतों को बचाने के लिए भी जबरदस्त मेहनत करनी पड़ रही है, क्योंकि दिन प्रति दिन प्राकृतिक जंगलों में कमी की वजह से जंगली जानवर जैसे- सुअर, बंदर, तथा और भी कई प्रकार के जंगली जानवर अपना पेट भरने के लिए किसानों के खेतों में चले आते हैं। पहले वे प्राकृतिक संसाधनों से अपना काम चला लेते थे पर अब ऐसा नहीं रह गया है। इस समस्या से भी निपटना भी इस समय उत्तराखंड के किसानों के लिए एक चुनौती बन गया है। इन सभी के बीच नुकसान केवल आम इंसान का हो रहा है और अब सरकार को इस पर गम्भीर होने की सख्त आवश्यकता है। (सुश्री भट्ट इस समय गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली की अध्यक्ष हैं)



बांध परियोजनाओं से उपजे सवाल


उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहली नदी घाटी परियोजना से विस्थापित लोगों का अब भी पुनर्वास नहीं हुआ है। पिछले 57 साल से पुनर्वास की आस लगाए लगभग चार हज़ार प्रभावित लोगों ने अब 27 फ़रवरी से आमरण अनशन पर जाने का फ़ैसला किया है। इसमें आंदोलन कर रहे लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भी शामिल हो रही है, जो विस्थापित अवस्था में ही पैदा और जवान हुई। दामोदर घाटी परियोजना के समय, 1954 में जब इनकी ज़मीन अधिग्रहीत की गई थी तो पश्चिम बंगाल और मौजूदा झारखंड के 250 से अधिक गांव इसकी जद में थे। इन गांवों से विस्थापित हुए लोगों में से सिफऱ् 340 लोगों को ही सरकार ने अब तक मुआवजा और नौकरी दी है, जबकि एक हज़ार से अधिक विस्थापित परिवार पिछली आधी सदी से सरकारी दफ्तरों में भटक और सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। इन लोगों ने दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघके बैनर तले इस संघर्ष को तेज करने का फ़ैसला किया है। बीते साल भी इनमें से लगभग तीन हज़ार लोगों ने तीन दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिस पर हुआ समझौता अभी तक अधर में लटका हुआ है। ’50 के दशक में शुरू हुई दामोदर घाटी निगम और हीराकुंड बांध परियोजना देश की सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से थी। विद्युत उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था को लक्ष्य करते हुए 7 जुलाई 1948 को संवैधानिक एक्ट के तहत दामोदर घाटी परियोजना की शुरुआत की गई और 5 सालों के भीतर 1953 में ही तिलैया में दामोदर की एक सहायक नदी बराकर पर पहला बांध बन कर तैयार हो गया। तब से लेकर अब तक इन विस्थापितों के संदर्भ में पुनर्वास की जितनी कवायदें हुई हैं, वे थोथी साबित हुई। दामोदर घाटी निगम का प्रबंधन पुनर्वास की ज़िम्मेदारी से कई दफ़ा इनकार कर चुका है। सम्बंधित राज्यों के राज्यपालों सहित उच्चतम न्यायालय द्वारा विस्थापितों के पक्ष में फ़ैसला सुनाने के बाद भी पीड़ितों को उचित आवास और मुआवजा अब तक नहीं मिला है। देश में बांधों और नदी घाटी परियोजनाओं की ऐतिहासिक समीक्षा करने पर सरकारी नीतियों का लचरपन साफ़ हो जाता है। पर्यावरण क़ानून और ज़मीन अधिग्रहण से लेकर पुनर्वास तक की व्यवस्था के साथ खिलवाड़ हुआ है। 1953 में महानदी पर बने हीराकुंड बांध से विस्थापित हुए लोगों का भी संघर्ष अब तक जारी है। नदी घाटी परियोजनाएं जिन लक्ष्यों को साधने के लिए शुरू हुई थीं, उनके बजाय इन्हें औद्योगिक कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। संभलपुर मेंहीराकुंड नागरिक परिषदने औद्योगिक क्षेत्र के लिए पानी भेजने के विरोध में राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद अक्टूबर 2006 में बांध के एक छोर से दूसरे छोर तक 20 किलोमीटर लम्बी मानव श्रृंखला बनाकर लोगों का ध्यान खींचा था। हीराकुंड बांध की दो ऊंची मीनारों का नामकरण नेहरू और गांधी के नाम पर किया गया है, लेकिन इन दो मीनारों को मानव शरीर से जोड़ देनेके बावज़ूद प्रभावितों को राहत नहीं मिली। बांध के मुद्दे पर देश में ऐसे संघर्ष कई रूपों में और कई मामलों को लेकर चल रहे हैं। रेणुका बांध के विरोध में हिमाचल प्रदेश के लोग पिछले एक साल से सड़क पर हैं। इस बांध के डूब क्षेत्र के अंतर्गत सिरमौर ज़िले के 33 गांव आते हैं। दिल्ली को पानी मुहैया कराने के लिए यह बांध बनाया जा रहा है। ऐसा आकलन है कि अभी दिल्ली में सिफऱ् 60 फीसद पानी का ही सही इस्तेमाल हो पा रहा है। दिल्ली के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को कुछ तरीके सुझाए हैं जिनमें तकनीकी सुधार के जरिये इसे 90 फीसद के स्तर तक बढ़ाया जा सकता है। इस उपक्रम के जरिये रेणुका से बचा जा सकता है। नर्मदा घाटी में जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष को 25 साल हो गए और यहां से विस्थापित हुए 50 हज़ार से अधिक लोग अब भी सही मुआवजे और पुनर्वास के लिए आंदोलनरत हैं। सरदार सरोवर परियोजना के लिए 50 साल से अधिग्रहीत की गई भूमि का 40 फीसद हिस्सा बिना किसी इस्तेमाल के परती पड़ा हुआ है। ज़मीन के कुछ टुकड़े को सरकार ने कम्पनियों और उद्योगों को किराये पर दे रखा है। ज़मीन अधिग्रहण करने के बाद उसके ग़्ौर-परियोजनाकारी इस्तेमाल का प्रचलन देश में एक मामले तक नहीं सिमटा है। लवासा परियोजना को अभी जहां विकसित किया जा रहा है, उसका कुछ हिस्सा 1975 में बने बारसगांव बांध के नाम पर अधिग्रहीत किया गया था और अगले 25-30 सालों तक वह परती पड़ा रहा। अब इसे लवासा पर खरचा जा रहा है। बांध से मार खाई ज़िंदगियों के चलते कई बार लोगों ने आमरण अनशन को विरोध के तरीके के तौर पर चुना है। दामोदर घाटी विस्थापित कल्याण संघउसी परम्परा की अगली कड़ी है। नर्मदा घाटी में जब 7 जनवरी 1991 को सात लोगों के बलिदानी जत्थे ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का ऐलान किया था, तब जाकर सरदार सरोवर परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने की स्थिति बन पाई थी। यह निर्णय भूख हड़ताल के 22वें दिन आया। 1993 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने यह घोषणा की थी कि अगर सरकार इस परियोजना का पुनरीक्षण करने को राजी नहीं हुई तो उनके कुछ कार्यकर्ता नर्मदा में जल समाधि ले लेंगे, लेकिन अपनी ताकत के बल पर राज्य ने इसे टाल दिया। पुनर्वास के अधिकतर मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरकारी पहलक़दमी हुई है। कई बार तो बाध्यकारी उपबंधों के तले ऐसे क़दम उठाए गए। ओंकारेश्वर बांध के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में जब राज्य उच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया तो मध्य प्रदेश सरकार और एनएसडीसी ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। सरकारी पक्ष यह था कि राज्य के पास पुनर्वास के लिए मात्र 5000 हेक्टेयर ज़मीन ही है। तब जाकर उच्चतम न्यायालय में तत्कालीन न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन ने सरकार को लगभग फ़टकार लगाते हुए पीड़ितों को सही व्यवस्था देने को कहा था।


Sunday, February 20, 2011

जन आंदोलन जरूरी


प्राचीन एथेंस के लोकतंत्र की आलोचना करते हुए प्लेटो ने लिखा था कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह एक आम आदमी को विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और इसी तरह के दूसरे गंभीर मुद्दों पर असेंबली में बोलने, अपना मत देने तथा कार्यकारिणी में निर्वाचित होकर कार्यवाही करने की पूरी इजाजत देता है, जबकि ये विषय ऐसे हैं कि केवल विशेषज्ञ ही इनके बारे में सही ढंग से सोच सकते हैं। इसीलिए प्लेटो ने सरकार चलाने वालों में दार्शनिकों और चिंतकों के शामिल किए जाने पर सबसे अधिक जोर देकर एक दार्शनिक राजा की कल्पना की थी। लोकतंत्र का दूसरा बड़ा दोष उन्होंने यह माना कि इस व्यवस्था में नेताओं के चुने जाने में वे कारण प्रभावी हो जाते हैं, जिनका प्रशासन चलाने की कुशलता से कोई लेना-देना नहीं होता, जैसे कि धन का खेल, वंश और परिवार की पृष्ठभूमि तथा जनता को बहकाने वाले लच्छेदार भाषण आदि। तीसरा दोष यह है कि लोकतंत्र अराजकता की दिशा में जा सकता है। जब एथेंस में सुकरात जैसे महान दार्शनिक को मृत्युदंड भुगतना पड़ा, तब प्लेटो निश्चित हो गए कि लोकतंत्र औसत दरजे के लोगों को संरक्षण देता है।
आज प्राचीन एथेंस नहीं है। फिर भी प्लेटो की आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले की गई टिप्पणी, कम से कम भारत के वर्तमान लोकतंत्र के संदर्भ में, बहुत कुछ सच लगती है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम लोकतंत्र को तिलांजलि देकर दूसरा राजनीतिक विकल्प ढूंढें। राजनीति विज्ञान के विचारकों ने तमाम बुराइयों के बावजूद इसे मौजूदा दूसरी व्यवस्थाओं से बेहतर माना है। जहां तक भारत का मामला है, हमने अंगरेजों की गुलामी के कारण जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया, वह ब्रिटेन में जन्मी और विकसित हुई थी। शिक्षा और समृद्धि का जो न्यूनतम स्तर इस व्यवस्था को चलाने के लिए आवश्यक है, उसका यहां अभाव था। जातियों के बीच भेद के कारण जो सामंती समाज यहां पनपा, ब्रिटेन उसे पीछे छोड़ चुका था। यानी हमने जिस लोकतंत्र का ब्रिटेन से आयात किया, वह यहां एक सामंती लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया।
देश आजाद होने पर जो लोग सत्ता में आए, वे एक स्वस्थ लोकतंत्र की नींव डाल सकते थे। गांधी ने एक रास्ता सुझाया भी था। पर सत्ता में विराजमान लोगों ने इसकी परवाह नहीं की। जवाहरलाल नेहरू जब तक जीवित रहे, प्रधानमंत्री बने रहे। इसी परंपरा का निर्वाह इंदिरा गांधी ने भी किया। पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु इन सबसे बढ़कर निकले। दूसरी ओर हमारे सामने नेल्सन मंडेला का उदाहरण है, जिनका त्याग नेहरू से कहीं बढ़कर था। उन्होंने 27-28 वर्षों तक जेल की सजा काटी। वह चाहते, तो आजीवन राष्ट्रपति बने रह सकते थे। मगर लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा स्थापित करने के लिए एक पदावधि के बाद ही उन्होंने पद छोड़ दिया था। ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति लुला डिसिल्वा जनता में अत्यंत लोकप्रिय थे। ओबामा उन्हें विश्व का सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कहते हैं। दो बार वह राष्ट्रपति रहे। जनता उन्हें तीसरी बार भी चाहती थी। पर लुला ने लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए तीसरी बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। नेहरू को भी उनकी जनता लुला की तरह प्यार करती थी। पर नेहरू ने लुला की तरह महानता नहीं दिखाई।
भारतीय लोकतंत्र में अनेक खामियां हैं। 30 प्रतिशत से भी कम मत पानेवाली पार्टी केंद्र में अपनी सत्ता बना लेती है। अपने मंत्रालयों के बारे में अधिकांश मंत्रियों को समझ नहीं होती। क्या अमेरिका के समान भारत में भी विशेषज्ञों की मंत्री पद पर नियुक्ति नहीं की जा सकती? देश में तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। जेलों में 70 प्रतिशत ऐसे कैदी हैं जिनके मामले विचाराधीन हैं। इनमें से तमाम ऐसे हैं, जिन्हें अभियोग साबित होने पर जो सजा मिलेगी, उससे कहीं अधिक सजा अब तक वे काट चुके हैं। जब-जब भ्रष्टाचार की चर्चा होती है, लोकपाल बिल सबको याद आ जाता है। पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण बात बन नहीं पाती।
राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने भी ब्रिटिश मॉडल के लोकतंत्र को अपनाने से पैदा खमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। जयप्रकाश ने जिस संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था, उसमें आमूलचूल परिवर्तन की बात थी। मुख्य प्रहार वर्तमान चुनावी व्यवस्था पर था। विभिन्न बुराइयों की जड़ में उन्होंने उस व्यवस्था को देखा, जो महंगे चुनाव और अयोग्य तथा अपराधी छवि वाले जनप्रतिनिधियों को संरक्षण देती है। जेपी अपने आंदोलन को लंबे समय तक चलाना चाहते थे। किंतु आपातकाल के कारण संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य पीछे रह गया। आंदोलन का एकमात्र लक्ष्य तब केवल इंदिरा हटाओ ही रह गया था। नतीजतन आपातकाल तो समाप्त हुआ, पर व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हुआ।
आज फिर भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आंदोलन का वातावरण बन रहा है। यद्यपि जयप्रकाश नारायण जैसी कोई शख्सीयत नहीं है, जिसके पीछे जनता खड़ी हो सके, फिर भी जन आंदोलन का वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मसलन, विगत 30 जनवरी को दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा रामदेव की अगुआई में जो रैली हुई थी, उसमें लगभग 30,000 लोगों ने भाग लिया था। वर्तमान जन आंदोलन को जेपी आंदोलन से सीख लेनी चाहिए। आंदोलन का लाभ विरोधी राजनीतिक दल ले सकते हैं। लिहाजा आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के लिए होना चाहिए। जेपी ने वास्तविक लोकतंत्र का ब्लू प्रिंट तैयार करने के लिए समाज विज्ञानियों को अपने साथ जोड़ा था। आज भी ऐसा होना चाहिए। जरूरी यह भी है कि जन आंदोलन एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर खड़ा हो। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?