Sunday, April 10, 2011

जनसंख्या का सवाल


2011 की जनगणना का जो विवरण अभी जारी किया गया है उसके कई निष्कर्ष आश्चर्यजनक हैं। इसमें कई नुक्तों की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई है। ऐसा लगता है कि अखबार भी उन्हीं चीजों को चुनते हैं जो उन्हें आकर्षक लगते हैं। इस सिलसिले में मैं दो बातों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। पहली बात 2001 और 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि का प्रतिशत कम होने पर है, जिसे लेकर काफी खुशी व्यक्त की गई है। मेरी समझ में नहीं आया कि इसमें खुश होने की बात क्या है? 2001 में भारत की जनसंख्या एक अरब 2 करोड़ थी और 2011 में यह बढ़कर एक अरब 21 करोड़ हो गई। जनगणना अधिकारियों के अनुसार इन दस वर्षो में भारत की आबादी में कुल 18 करोड़ 14 लाख की वृद्धि हुई, लेकिन इसके पिछले दशक में भी तो लगभग यही हुआ था। उस दशक में देश की आबादी में 18 करोड़ 23 लाख की वृद्धि हुई थी। 2001 और 2011 के बीच वृद्धि में फर्क सिर्फ नौ लाख का है। क्या ऐसी ही स्थितियों का बयान करने के लिए ऊंट के मुंह में जीरा का मुहावरा नहीं बना है। जिस बात पर खुशी जाहिर की जा रही है, वह है दशकीय वृद्धि दर में कमी आना। 1991 और 2001 के दशक में यह वृद्धि दर 21.54 प्रतिशत थी। 2001 और 2011 के दशक में वृद्धि दर गिर कर 17.64 हो गई है। देखने की बात यह है कि आधार वषरें में जनसंख्या का स्तर क्या था। 1991 में देश की जनसंख्या थी 84 करोड़ 24 लाख। इसमें 21.54 प्रतिशत वृद्धि का मतलब हुआ 18 करोड़ 23 लाख लोगों की वृद्धि। 2001 और 2011 के बीच के दशक में 17.64 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यानी वृद्धि का औसत गिरा, लेकिन नागरिकों की वृद्धि संख्या में कोई फर्क नहीं आया। इस दशक में भी भारतीयों की संख्या 18 करोड़ 23 लाख बढ़ गई। आप देख सकते हैं कि प्रतिशत का खेल कैसे धोखा देता है। 1991 के आधार वर्ष में आबादी कम थी। इसलिए उसमें अधिक प्रतिशत की वृद्धि होने पर भी आबादी उतनी ही बढ़ी जितनी इस दशक में यह प्रतिशत कम होने से। अगले दशक में वृद्धि प्रतिशत और कम हो जाएगी, पर हो सकता है वास्तविक आबादी वृद्धि में कुछ खास फर्क न आए। खैर, यह कोई बड़ी आंकड़ेबाजी नहीं है। अंकगणित का कक्षा दस का विद्यार्थी भी इस पेंच को समझ और समझा जा सकता है। असली बात जनगणना आयुक्त की यह टिप्पणी है कि जनसंख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण गरीबी है। अखबारी विद्वानों ने इस पहलू की चर्चा ही नहीं की है। जाहिर है, उच्च या मध्य वर्ग के लोग आबादी नहीं बढ़ा रहे हैं। उनके लिए अब यह संभव ही नहीं है, क्योंकि एक बच्चे के लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई में इतना खर्च हो जाता है कि बहुत से लोग तो दूसरा बच्चा पैदा करने का साहस ही नहीं दिखा पाते। इसलिए मध्य वर्ग में आमतौर पर दो बच्चों का चलन हो गया है। एक पुरुष और एक स्त्री यानी दो व्यक्तियों के दो बच्चे होने से आबादी स्थिर रहती है। यही आदर्श भी है। आदर्श यह भी है कि पूरा देश मध्य वर्ग की श्रेणी में आ जाए। पश्चिमी देशों में आबादी इसलिए नहीं बढ़ रही है, क्योंकि वहां संपूर्ण आबादी का मध्यवर्गीकरण हो चुका है। जो थोड़े-बहुत गरीब लोग हैं, वे ही आबादी बढ़ा रहे हैं या फिर दूसरे देशों से आने वाले लोग। फिर भी इन देशों की जनसंख्या कितनी है। चीन में जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश इसलिए लगा कि वहां तानाशाही है और सरकार ने जोर-जुल्म के बल पर एक संतान का नियम लागू करा लिया। दुनिया के किसी भी देश में यह चमत्कार नहीं हो सका है, क्योंकि दुनिया के किसी भी देश में इतना दमन नहीं रहा है जितना चीन में रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि तिस पर भी भारत के बहुत से लोग जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीनी मॉडल का उदाहरण देते हैं। भारत सरकार आबादी रोकने के लिए प्रचार और प्रोत्साहन का सहारा लेती रही है। हम दो हमारे दो जैसे मुहावरे लोकभाषा का अंग बन चुके हैं। बाकी उपाय रहे हैं निरोध का मुफ्त वितरण। नसबंदी कराने पर दो-चार सौ रुपये दे देना और ऐसी ही कुछ छिटपुट उदारताएं। इनसे भी आबादी वृद्धि को रोकने में कुछ मदद मिली ही होगी, लेकिन आबादी बढ़ने का जो मुख्य कारण है यानी गरीबी उस दिशा में कुछ नहीं किया गया है। विकास के अर्थशास्त्री पता नहीं कब से दोहरा रहे हैं कि सबसे अच्छा गर्भ निरोधक है विकास। डेवलेपमेंट इज द बेस्ट कंट्रासेप्टिव। भारत सरकार इस बात से पूर्णत: अवगत है। फिर भी उसने अभी तक देश की बहुसंख्य आबादी को विकास के दायरे में लाने की कोशिश नहीं की है। इसका तो सीधा मतलब हुआ कि सरकार वास्तव में देश की जनसंख्या कम करना नहीं चाहती। यह कोई रहस्य की बात नहीं है। सरकार के पृष्ठपोषक और उसके समर्थक मध्य वर्गीय शहरों में ही निवास करते हैं। इसके विपरीत अधिकतर गरीब लोग गांवों में रहते हैं। इसलिए गांवों में क्या हो रहा है, इससे शहरों में रह रहे संपन्न और शक्तिशाली लोगों को कोई मतलब नहीं है। बेशक गांवों की आबादी रोजगार की खोज में शहर आती है तो शहर का आधारभूत ढांचा चरमराने लगता है, लेकिन इससे क्या सस्ते नौकर-मजदूर, रिक्शा ड्राइवर, कामवालियां भी तो गांवों से ही आती हैं। यह वर्ग शहर आना छोड़ दे तो शहरी लोगों के हाथ से तोते उड़ जाएंगे|

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