जैतापुर न्यूक्लियर प्लांट को लेकर चल रहे आंदोलन की कई वजहें हैं। ये पूरी तरह जायज हैं। कारण, कई हालिया अध्ययन परमाणु ऊर्जा को लेकर नकारात्मक राय रखते हैं। जापान में फुकुशिमा में हुए हादसे के बाद तो जैतापुर में आंदोलन के तेवर और तीखे हो गए हैं। प्लांट को लेकर राजनीति भी हो रही है लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आंदोलन स्वत:स्फरू त है। यह प्लांट 233 एकड़ में बन रहा है और ज्यादातर लोगों की जमीनों का अधिग्रहण भी उनकी मर्जी के खिलाफ किया गया है। रेडिएशन ही नहीं, लोगों की चिंता अपनी रोजी-रोटी को भी लेकर है। यह पूरा इलाका आम के लिए मशहूर है। लोगों को आशंका है कि प्लांट बनने के बाद आम के व्यापार पर असर पड़ेगा। फिर न्यूक्लियर प्लांट समुद्र के किनारे बनाया जा रहा है। इलाके में मछुआरों की आबादी काफी अधिक है। लोगों को डर है कि प्लांट बनने के बाद समुद्र का पानी जहरीला हो सकता है और इससे मछलियों से जुड़ा उनका रोजगार भी चौपट हो जाएगा। जाहिर है स्थानीय लोगों की चिंता जायज है और उन्हें विरोध करने का भी हक है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवा कर साबित किया है कि वह परमाणु ऊर्जा को लेकर किसी भी स्तर तक जा सकती है, भले ही इसमें कितने भी खतरे हों। एक और बात गौर करने वाली है कि यहां जो परमाणु रिएक्टर बनना है उसे रिक्टर स्केल पर 6.5 तीव्रता तक भूकंप झेलने के लिए डिजाइन किया गया है, जबकि यहां 6.2 तीव्रता का भूकंप 1993 में आ चुका है। ऐसे में खतरा कितना बड़ा है, यह सहज ही समझा जा सकता है। परमाणु ऊर्जा का महत्व सरकार द्वारा हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है जबकि ऊर्जा का यह माध्यम न सिर्फ खर्चीला है बल्कि इसमें खतरे ही खतरे हैं। विकिरण के खतरे और परमाणु कचरे के निस्तारण से जुड़े खतरे तो इतने गंभीर हैं कि हमें इसके बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। यकीनन हमें पवन, सौर और जल ऊर्जा जैसे विकल्पों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। ये माध्यम एक तो अक्षय हैं, दूसरे सस्ते और सर्वसुलभ। साथ ही हमें इनके विकास के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भरता की जरूरत नहीं है। विकिरण जैसे खतरे का कोई सवाल ही नहीं है। गौर करने वाली बात है कि इस बात को ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने, जहां यूरेनियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, मान लिया है और वे परमाणु ऊर्जा पर अधिक ध्यान नहीं दे रहे हैं। 1970 के बाद अमेरिका में भी कोई नया रिएक्टर नहीं बनाया गया है। जापान में आई सुनामी के बाद शायद ही वहां कोई नया न्यूक्लियर प्लांट बने। भारत अभी परमाणु ऊर्जा के उत्पादन पर सालाना 20 अरब डॉलर खर्च करता है। इसके बावजूद परमाणु रिएक्टरों से हमारी केवल तीन फीसद बिजली ही पैदा होती है। फिर परमाणु बिजलीघर की शुरुआत करने में ही दो तिहाई से अधिक पूंजी खर्च हो जाती है। अगर किसी वजह से ईधन की सप्लाई रुक जाए तो यह कितने नुकसान वाली बात है इसे समझा जाना चाहिए। परमाणु रिएक्टरों से उत्पन्न खतरे की आशंका पर भी विचार होना चाहिए। 1986 में सोवियत संघ में चैरनोबिल दुर्घटना ने विकिरण की कैसी समस्या खड़ी कर दी थी। हमारे नरोरा परमाणु संयंत्र में भी आग लगने की घटना हो चुकी है। इसी तरह कुछ ही दिन पूर्व भारी जल के दुरुपयोग की घटना भी हो चुकी है। फिर रिएक्टर में कूलैंट के रूप में एक तो काफी जल चाहिए और दूसरा इसके समुद्र में छोड़े जाने से जैव विविधता पर हानिकारक प्रभाव होना तय होता है। ऐसे में अगर जैतापुर के लोग सड़कों पर उतरे हैं तो हमें उनका दर्द समझना चाहिए।
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