हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों ने सरकार को निर्देश दिए कि एक केस विशेष में अमुक व्यक्ति को ही अपना वकील रखे। अब यह विचार का विषय है कि क्या किसी भी व्यक्ति, संस्था या संवैधानिक व्यवस्था को अपना वकील चुनने का अधिकार होना चाहिए अथवा उस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश तय करेंगे कि मुल्जिम किस व्यक्ति को अपना वकील बनाए? भारत में अभी तक यही व्यवस्था रही है कि जिस व्यक्ति का मुकदमा होता है वह स्वयं अपना वकील चुनता है और उसे भुगतान करता है। सरकार भी अपने वकील स्वयं चुनती है, क्योंकि वकील चुनने का अधिकार उसे होता है जो अपना मुकदमा लड़ रहा है। एक मुकदमे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा दिए गए निर्देश के खिलाफ महाधिवक्ता ने बहुत तर्क दिए कि उक्त वकील हमारे खिलाफ है और उसकी राय हमारी राय से बिल्कुल मेल नहीं खाती है। वकील रखने का अधिकार हमें है और कौन वकील हमारी पैरवी अच्छी तरह करेगा, यह चुनने का अधिकार हमारे पास ही होना चाहिए, लेकिन सारे तर्को को ठुकराकर सुप्रीम कोर्ट के दोनों न्यायाधीशों ने निर्देश दिए कि चूंकि यह संवेदनशील एवं गंभीर मुकदमा है इसलिए जिसे हम कह रहे हैं उसी को आपको अपना वकील रखना होगा। मुकदमे का विषय गंभीर हो सकता है, लेकिन क्या न्याय व्यवस्था में अपना वकील चुनने के अधिकार की परंपरा को बदलना ठीक होगा। हमें इस तर्क का जवाब खोजना होगा। 2जी मामला एक गंभीर एवं संवेदनशील मुद्दा है और इसमें दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सरकार इस मामले में जिसे वकील नहीं बनाना चाह रही है उसे अदालत के निर्देश पर अपना वकील मजबूरी में नियुक्त करना पड़ रहा है। मैं मुकदमे की मेरिट में नहीं जाना चाहता हूं, लेकिन अपनी पैरवी करने अथवा करवाने का अधिकार हर किसी को होता है। भारत में तो ऐसा न्यायतंत्र है कि यह जानते हुए भी कि मुंबई हत्याकांड में अजमल कसाब रंगे हाथों पकड़ा गया फिर भी उसे अपनी पैरवी किसी से भी करवाने का अधिकार दिया गया और सरकारी खर्चे पर उसे वकील उपलब्ध भी कराया गया। वकील सिर्फ वादी का पक्ष कानूनी ढंग से पेश करता है और वादी जो अपना पक्ष उसे देता है उसी आधार पर वकील केस की बहस करता है। 2जी मामले में सरकार अपना पक्ष न्यायाधीशों के सामने जिस ढंग से रखना चाहती है, अब नहीं रख पाएगी। इस पर तमाम विधि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अदालत द्वारा वकील को नियुक्त करवाने का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि सम्माननीय न्यायाधीशों ने यह तय कर लिया है कि आगे उन्हें क्या निर्णय देना है? ये सारी बातें एक बार तय हो जानी चाहिए कि किसके क्या अधिकार हैं और किसे क्या करने का हक हासिल है? किसकी क्या सीमाएं हैं और किसे किस मर्यादा में सीमित रहना है? यही बहस आजकल जन लोकपाल बिल को भी लेकर चल रही है। मुझे नहीं लगता है कि इस देश में कोई भी व्यक्ति ऐसा होगा जो यह कहे कि भ्रष्टाचार को चलने देते रहना चाहिए। अब प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति विशेष को जनलोकपाल बनाकर कितने अधिकार देने चाहिए? यदि उसे न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायी संस्थाओं जैसे संसद व विधानसभाओं के ऊपर नियुक्त किया जाता है और प्रधानमंत्री, मंत्री, अफसरों, जजों आदि की नकेल इसके हाथ में दे दी जाती है तथा उसकी जवाबदेही किसी के भी प्रति नहीं होती है तो क्या होगा? वह व्यक्ति कभी भी किसी को हटा सकता है अथवा उसके पीछे जांच बिठा सकता है? फिर क्या गारंटी है कि वह व्यक्ति स्वयं में तानाशाह नहीं बन जाएगा? इस प्रश्न पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने भी यह सवाल उठाया है और इसका जवाब सभी से मांगा है। अभी जो कमेटी जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए बनाई गई है उसमें सभी जानकार और योग्य लोग हैं। मुझे उम्मीद है कि वे इस पहलू को अवश्य ध्यान में रखेंगे। भ्रष्टाचार को जितना संभव हो सके खत्म किया जाना चाहिए, लेकिन लोकपाल को कितने अधिकार हों और लोकपाल स्वयं किसके प्रति जवाबदेह हो, ये बातें ध्यान में रखनी होंगी। यदि भविष्य में कोई गड़बड़ व्यक्ति लोकपाल नियुक्त हो जाता है और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है तो उसे कैसे हटाया जाएगा? लोकपाल पर अंकुश कैसे लगाया जाएगा और लोकपाल पर अंकुश कौन लगाएगा आदि सभी बातें स्पष्ट रूप से बिल में आनी चाहिए। इस समिति में संजीदा और अनुभवी लोग हैं जो बिल को संसद में भेजने से पहले इन सभी बातों का ध्यान रखेंगे ताकि संसद में बहस के समय इस बिल पर आम सहमति बनाने में मदद मिले। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं).
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