Sunday, April 10, 2011

सतर्कता से बढ़ाएं साक्षरता


बालिकाओं की निरक्षरता का सवाल बहुत सीधे-सीधे उनकी जाति और जनजाति पृष्ठभूमि से जुड़ा रहता है। इसलिए हमें ध्यान देकर यह देखना होगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बेटियों की निरक्षरता कहां तक दूर हुई है? सवर्णो और द्विजों के परिवार की लड़कियां आजादी के बाद से ही शिक्षा केंद्रों की तरफ मुड़ चुकी हैं। असली सवाल दलित और आदिवासी लड़कियों की निरक्षरता का है
राष्ट्र के संदर्भ में ताजा जनगणना के आंकड़ों का असली अर्थ औसत के बजाए उसकी राष्ट्रीय विषमता का है। इसकी दो अतियां हैं। जब हम कहते हैं कि साक्षरता की रफ्तार बढ़ी है तो उसमें एक तरफ केरल है, जहां वह 90 प्रतिशत से अब 95 प्रतिशत तक पहुंच गई होगी तो दूसरी तरफ गढ़वाल और झारखंड के गांव होंगे, जहां आदिवासी स्त्रियों की साक्षरता 5 प्रतिशत से बढ़कर 7 प्रतिशत हो गई होगी। इसलिए 2011 की जनगणना के आरम्भिक परिणामों के बारे में जो सरकारी विवरण दिए जा रहे हैं, उसके संदर्भ में तीन सतर्कताएं बहुत जरूरी हैं।
स्त्री शिक्षा में बढ़ रही विषमता
पहली, हमारा कोई भी राष्ट्रीय आंकड़ा इस बात को बताने में असफल रहता है कि भारत के पिछड़े इलाकों का क्या हाल है? महिलाओं की साक्षरता दर में वृद्धि का अगर यह अर्थ हुआ कि केरल से लेकर आंध्र प्रदेश तक का हाल अच्छा है लेकिन हिंदी पट्टी और उड़ीसा और असम में परिस्थितियां चिंताजनक हैं तो औसत में बढ़ोतरी के बावजूद यह समझना होगा कि क्षेत्रीय विषमता, स्त्री साक्षरता के क्षेत्र में न सिर्फ बनी हुई है बल्कि बढ़ रही है। यह स्थिति सरकार और समाज दोनों के लिए चिंताजनक होना चाहिए। आंकड़ों की इस बाजीगरी में देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जारी शिक्षा का अंतर छिप जाता है। नगर सौ साल पहले से ही शिक्षा के मामले में गांव से बहुत आगे चल रहे हैं।
देखिए योजनाओं के फल मिले?
इसलिए निरक्षता की असली चुनौती हमें ग्रामीण भारत से ही मिलती है। आज भी भारत के अधिकतर गांवों में बच्चों में प्रारम्भिक शिक्षा के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए स्कूल काफी नहीं हैं। इसके साथ दोपहर का भोजन, कपड़े, जूते, किताबें जैसी चीजों को भी जोड़ना जरूरी माना गया है। इससे जाहिर होता है कि ग्रामीण भारत के निर्धन वर्ग के लिए हमारी योजनाओं के क्या परिणाम निकले हैं? इसमें बालिकाओं की निरक्षरता का सवाल बहुत सीधे-सीधे उनकी जाति और जनजाति पृष्ठभूमि से जुड़ा रहता है। इसलिए हमें ध्यान देकर यह देखना होगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बेटियों की निरक्षरता कहां तक दूर हुई है? सवर्णो और द्विजों के परिवार की लड़कियां आजादी के बाद से ही शिक्षा केंद्रों की तरफ मुड़ चुकी हैं। असली सवाल दलित और आदिवासी लड़कियों की निरक्षरता का है।
संकल्प और रणनीति
अब यह प्रश्न उठता है कि हमें आगे के लिए क्या करना चाहिए? इसके लिए तो सबसे पहले हमें समयबद्ध तरीके से निरक्षता उन्मूलन के लिए संकल्प और रणनीति अपनानी होगी; क्योंकि उदारीकरण के 20 बरस बाद अब यह प्रक्रिया न तो सरकार की जिम्मेदारी रही और न बाजार की। दोनों एक दूसरे पर दोष लगा चुके हैं। हमने विश्व बैंक से कर्जा लेकर स्त्री शिक्षा अभियान शुरू किया था और इधर, हमने शिक्षा का अधिकार कानून भी पास कर दिया। अब सरकार और बाजार दोनों कह सकते हैं कि हमने अपना जिम्मा पूरा कर दिया। अब निरक्षर बच्चों की जिम्मेदारी उनके मां-बाप की है। जब इसका दोष मां-बाप पर ही है तो अब हम उनको जेल में बंद करेंगे। इस तरह देश का नौकरशाही दिमाग निरक्षरता के सवाल को धुंध में ही रखने की कोशिश करता रहेगा।
शिक्षक को पद्म क्यों नहीं ?
दूसरी सतर्कता साक्षरता अभियान को सफल बनाने के लिए शिक्षा के काम को आकर्षक और सम्मानजनक बनाने की होनी चाहिए। आखिर हम खिलाड़ी, अभिनेता और व्यापारी को 'पद्म' सम्मान दे सकते हैं तो किसी शिक्षक को क्यों नहीं देते? इसलिए हमें आदर्श विद्यालय, आदर्श शिक्षक-शिक्षिका, आदर्श गांव और जिले को भी सम्मानित करने का कार्यक्रम शुरू करना पड़ेगा। अब शिक्षा की जि़म्मेवारी पंचायतों की हो चुकी है लेकिन हमें अपने जिले की पूर्ण सफल पंचायतों के नेताओं बारे में कोई जानकारी नहीं है, जिन्होंने शिक्षा के लिए अपने को समर्पित किया। न ही हम उनके बारे में जानते हैं जिन्होंने शिक्षा के नाम पर खाली धोखा किया है। सहयोग करने वाले का सम्मान और असहयोग करने वालों को दंड देने की तरफ हमको मुड़ना पड़ेगा। तीसरी सतर्कता। देश भर की विद्याशक्ति को निरक्षरता उन्मूलन में लगा देना होगा और हम हर 10 साल पर अपने सीमित सफलताओं के लिए एक-दूसरे को बधाई देंगे। तभी इस दिशा में कुछ हो सकता है लेकिन व्यापक असफलताओं के कारण राष्ट्र निर्माण का काम विशेष तौर पर स्त्री सशक्तीकरण का काम आधा-अधूरा रहेगा। इसलिए निरक्षरता पर किसी भी किस्म की अनदेखी और सहनशीलता की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए। देश के लिए साम्प्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी अविलम्ब समाधान मांगने वाली समस्या हो चुकी है।

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