जन लोकपाल विधेयक के समर्थन में अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिला। अन्ना ने सोई हुई लोकशक्ति को जगाया है। लोकशक्ति की महिमा तो वैसे लोकतंत्र में सभी स्वीकार करते हैं, किंतु भारत एकमात्र अपवाद है पूरे विश्व में जहां लोकसत्ता को राजसत्ता के ऊपर स्थान दिया गया। महात्मा गांधी एवं जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने राजसत्ता को ठुकरा कर लोकसत्ता को मजबूत करने का काम किया। अन्ना के समर्थन में उभरा जनसैलाब भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता का आक्रोश को दिखाता है, किंतु जनता अपने आप को पूरी तरह पाक-साफ नहीं बता सकती है। आज भ्रष्टाचार के दलदल में आम आदमी भी डूबा है, जिसे रिश्वत देकर या अनैतिक तरीके से अपना हित साधने में कोई परहेज नहीं है। जनता को भी अपने गिरेबां में झांककर आत्ममंथन करना चाहिए, किंतु बडे़ पदों पर बैठे व्यक्तियों की जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं और अधिक अधिकार संपन्न होने के कारण कदाचार करने की गुंजाइश उनके पास अधिक होती है। आज हर व्यक्ति धन संचय में लगा है। लोग किसी के एश्वर्य को देखकर चकाचौंध होते हैं, वे यह सवाल नहीं पूछते कि उसके पास इतनी संपदा आई कहां से? अनैतिक तरीकेसे धन संग्रह करने वालों का जहां सामाजिक वहिष्कार होना चाहिए वहीं उन्हें सम्मान मिलता है। फिर भी संतोष की बात यह है कि इस घटना ने इस धारणा को पुनस्र्थापित किया है कि इस देश को हिलाने की ताकत केवल फकीरों में है, थैलीशाहों में नहीं। इस देश को हिलाया गांधी एवं जेपी जैसे फकीरों ने। अन्ना के पास कोई बैंक खाता तक नहीं है और वह अपने गांव रालेगांव सिद्धि में मंदिर के एक छोटे से कमरे में रहते हैं। इसीलिए वह आकृष्ट करते हैं। भारतीय सोच ने जॉन लॉक एवं एडम स्मिथ के पूंजीवाद, मार्क्स के साम्यवाद और फ्रायड के सेक्सवाद को खारिज किया है। यहां संचय की जगह अपरिग्रह तथा भोगवाद की जगह ब्रंाचर्य की अवधारणा है। अपरिग्रह के देश में भ्रष्टाचार का इस कदर बेलौस फैलना पूरे भारतीय चिंतन को नकारना है, लेकिन जब भ्रष्टाचार अपनी जड़ इतनी फैला चुका है तो निश्चित रूप से उस पर लगाम लगाने के लिए एक सख्त कानून की जरूरत है। सूचना के अधिकार ने जनता को भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठाने का तो अधिकार दिया, किंतु उसमें कोई सजा का प्रावधान नहीं है। इसलिए लोकपाल जैसी संस्था की जरूरत है। अभी जो विधेयक सरकारी मसौदा है उसमें लोकपाल से कोई सीधी शिकायत नहीं कर सकता है, बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति जो मामले उन्हें भेजेंगे वह उन्हीं की जांच करेगा। साथ ही उसकी भूमिका केवल अनुशंसा करने की होगी और उसे पुलिस की तरह प्राथमिकी दर्ज करने का भी अधिकार नहीं है। ऐसे कई मसले हैं जिन पर नागरिक समाज का विरोध है। 1969 से लोकपाल विधेयक लंबित है। गत 42 वषरें में कई दलों की सरकारें आईं, किंतु विधेयक पारित नहीं हो पाया। सर्वप्रथम 1809 में स्वीडन में ओम्बुड्समैन नामक संस्था बनी, जिसे बाद में अन्य देशों ने भी अपनाया। कई मुल्कों में यह संस्था आज प्रभावी तरीके से काम कर रही है। कोई कारण नहीं है ऐसा मानने का कि भारत में यह संस्था काम नहीं करेगी। उसे अधिकार संपन्न बनाने की जरूरत है और यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उसकी नियुक्ति प्रक्रिया इतनी पारदर्शी हो कि वह जनता में विश्वास पैदा करे। यह संतोष की बात है सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने पूरे विधेयक पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। इतना तय है कि इस बड़े जनांदोलन के बाद अब यह विधेयक अधिक दिनों तक लंबित नहीं रह पाएगा। उल्लेखनीय यह है कि यह आंदोलन केवल सरकार के विरुद्ध नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। इसलिए उन राजनेताओं को उल्टे पांव लौटना पड़ा जो समर्थन व्यक्त करने जंतर-मंतर पहुंचे। सवाल उठता है कि सिविल सोसाइटी भीड़ कहां से इकट्ठा करेगी। भीड़ों की भी लोकतंत्र में एक महती भूमिका है। भीड़ जमा कर सकते हैं वैसे ही राजनेता जिन्हें उल्टे पांव लौटने को विवश होना पडा। जयप्रकाश नारायण ने भी बिहार आंदोलन में शुरू में राजनेताओं को अलग रखा। 8 अप्रैल को पटना में मौन जुलूस निकालने का प्रस्ताव था। कर्पूरी ठाकुर एवं रामानंद तिवारी भी सत्याग्रही बनना चाहते थे, किंतु उन्हें भी शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई। झल्लाकर वे दोनों जेपी के पास पहुंचे, क्या हम लोग भी हिस्सा नहीं लेंगे? जेपी ने कहा, आज नहीं। बाद में उन्हें राजनीतिक दलों को साथ लेना पड़ा। महात्मा गांधी ने भी कांग्रेस से तमाम मतभेदों के बावजूद उसके संगठन का इस्तेमाल अपने आंदोलनों के लिए किया। (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)
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