जीवन के हर पक्ष में नैतिकता को सर्वोपरि माना जाता रहा है। देश आज एक अप्रत्याशित स्थिति से गुजर रहा है। नैतिकता काOास और मानव मूल्यों के प्रति उदासीनता लगभग हर तरफ दिखाई देती है। पिछले कुछ महीनों में घटी घटनाओं ने लोगों की आंखें खोली हैं। कॉमनवेल्थ खेल, आदर्श सोसाइटी, 2जी तथा इसरो स्पेक्ट्रम, पीजी थॉमस जैसे प्रकरण पर चर्चा अब गांवों की चौपाल तक पहुंच चुकी है। न्यायपालिका तथा सेना के उच्च स्तरों तक आरोपों के छींटे पहुंचे हैं। इन दोनों पर तो हर नागरिक गर्व करना चाहता है। जिस भारत ने अपरिग्रह की संकल्पना को न केवल साकार स्वरूप दिया, वरन उसे व्यवहार में उतारा वहीं आज थोड़े से संपन्न लोग आंख मूंदकर संग्रह में लगे हैं। भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक तथा नैतिक पहचान कुछ गिने-चुने लोगों के कारण पश्चिम की भोंडी नकल करने वाले देशके रूप में परिवर्तित हो रही है। जहां करोड़ों लोग भूखे सोते हों वहां कुछ भारतीयों के नाम धनी लोगों में आ जाने पर हम गद्गद हो रहे हैं। भारत की संस्कृति धनार्जन पर प्रतिबंध नहीं लगाती है, परंतु यह धनार्जन दूसरों के शोषण के आधार पर अमान्य है। मध्यपूर्व के अरब देशों में जो कुछ हुआ उससे सत्तासीनों को सबसे बड़ा सबक यही लेना होगा कि अब वे जनता को मूर्ख नहीं बना सकते हैं। वहां की घटनाए यह भी बताती हैं कि शासकों को पदच्युत करने में पुत्र-पुत्री मोह भी बड़ा योगदान करता है। भारत में भी वंशवाद का विरोध बढ़ रहा है। कुल मिलाकर भारत की जनता तथा उसकी सरकार और राजनेताओं के बीच अलगाव की दीवार खड़ी हो गई है। प्रबुद्ध समाज से इस समय जिस पहल की आशा की जाती है उसके पूरे होने के आसार नहीं हैं। जो सत्ता के निकट हैं उनके वह कृपापात्र हैं और बाकी लोग संगठित नहीं हैं। वामपंथ तथा पंथनिरेपक्षता का राजनीतिक उपयोग करने वाले भविष्यदृष्टि से विश्लेषण करने की तकलीफ नहीं उठाना चाहते। यह वर्ग आज भी सत्ता पक्ष को उसके उत्तरदायित्व का भान कराने की स्थिति में है। वह स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले दल से लोगों के नैतिक पक्ष पर बची-खुची अपेक्षाओं को स्पष्ट कर सकता है। कोई भी देश तथा उसके नागरिक तभी प्रगति तथा विकास की राह पर चल सकते है जब नेतृत्व सिद्धांतों तथा नैतिकता को आधार बनाकर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर रहा हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के पास ऐसा नेतृत्व था। जो पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आज आलोचना करते हैं वे भी मानते हैं कि केशवदेव मालवीय, टीटी कृष्णामाचारी, लालबहादुर शास्त्री तथा ऐसे ही अन्य लोगों के इस्तीफे नैतिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने की परंपरा स्थापित करने के प्रयास का हिस्सा थे। आज उनकी विरासत का दम भरने वाले उन्हीं के प्रयासों को धूल-धूसरित कर रहे हैं। पूर्व दूरसंचार मंत्री सभी जनतांत्रिक मान्यताओं की धच्जियां वर्षो तक उड़ाते रहे। जो इसे रोक सकते थे वह भी सारे तथ्य जनता तक पहुंचनेके बाद भी उनका भरपूर समर्थन करते रहे। मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति प्रकरण पर भी ठीक ऐसा ही हुआ। इस समय जन-जन तक यह पहुंचाया गया कि यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि सरकार बाहरी समर्थन की बैसाखी पर चल रही है। क्या सत्ता में बने रहना इतना आवश्यक है कि उसके लिए सारे सिद्धांतों की बलि दे दी जाए? भारत की आर्थिक विकास दर 10 प्रतिशत तक पहुंच रही है और सरकार चाहती है कि सारा देश प्रसन्न होकर उसे शाबासी दे। लोग महंगाई से आक्रांत हैं, ऐसे में उत्तरदायी लोगों को न केवल उसके अधिकार प्रदान करने का हरसंभव प्रयास प्राथमिकता से करना चाहिए, वरन उन्हें प्राप्त करने के लिए अतिरिक्तसहायता भी देनी चाहिए। नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक रोलेक्जेंडर सोलमहेनित्सिन ने लिखा था कि लोगों पर सत्ता का प्रभाव तभी तक रहता है जब तक वह उनका सब कुछ नहीं ले लेती है, लेकिन जब व्यक्ति का सब कुछ लूट लिया जाता है तब सत्ता का उस पर कोई प्रभाव नहीं रह जाता है। यदि आदिवासियों का हर तरफ से शोषण तथा लूटखसोट न की गई होती तथा उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित न किया गया होता तो भारत में आज नक्सलवाद तथा माओवाद उन्हें आकर्षित नहीं करते। निरंकुश सत्ता ऐसे लोगों पर बल प्रयोग कर कभी उन्हें बदल नहीं सकती है। उन्हें वहीं सत्ता बदल सकती है जिसकी अपनी साख पर कोई दाग न हो और जिसे आम जनता का पूर्ण विश्वास भी प्राप्त हो। पिछले चार-पांच महीनों में देश एक संत्रास से गुजरा है। उसका सकारात्मक पक्ष यह है इन घटनाओं से देश का सम्मान घटा है। भारत के नागरिकों का मनोबल भी गिरा है। इस बात के कोई आसार नहीं है कि सरकार नागरिकों की भावनाओं को ठीक से समझ सकेगी। (लेखक एनसीइआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
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