Monday, May 28, 2012

सरकार के लिए भरी होंगे अगले दो साल


यूपीए के लिए खुशी मनाने को कुछ ज्यादा नहीं है कि उसकी सरकार को सत्ता में बने रहते हुए तीन साल हो गए हैं। यूपीए-2 ने जनता से किसी प्रयोजन और उत्तरोत्तर आंतरिक सद्भाव तक के प्रति कोई वास्तविक सरोकार प्रदर्शित नहीं किया है। राष्ट्रपति चुनाव के मसले पर जैसा कि विभिन्न घटक दलों के परस्पर विरोधी संकेतों से अंदाजा होता है वे अलग-अलग दिशाओं में जोर लगा रहे हैं। यूपीए का नेतृत्व दिशाहीन और विचारों से खाली है। ऐसा कोई संकेत नहीं कि वह 2014 से पहले अपनी गिरावट को रोक सकता हो और यह चुनाव वह हारने के लिए तैयार बैठा लगता है। यूपीए ने उन वादों को पूरा करने के अवसरों को बर्बाद किया है, जिनका लाभ उठाकर वह 2009 में किए गए अपने उन वादों को पूरा कर सकता था, जिनके कारण वह सत्ता में लौटा था। सबसे महत्वपूर्ण वादा तो समावेशी भारत निर्माण का था, जिसमें वृद्धि और आय का विभाजन कम होता और सामाजिक मेल-मिलाप अधिक होता। आम आदमी केंद्रित नीतियों को लागू करने के स्थान पर यूपीए-2 नवउदारवाद का गुलाम बन गया है। उसने बड़े व्यवसाय को सारी सुविधाएं मुहैया कराई और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की खुली छूट दी। कृषि की इस हद तक उपेक्षा की कि दसियों लाख किसानों के लिए यह अलाभकारी हो गया, जिससे आत्महत्याओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई। भारत के सकल घरेलू उत्पाद के फल मुख्यतया आबादी के सबसे ऊपरी पायदान के 10-15 फीसद लोगों को मिले हैं। देश के अनेक भागों में गरीबी, खासतौर पर संसाधन गरीबी बढ़ी है, कुपोषण तथा शिशु मौतों का आंकड़ा और भारी ही होता जा रहा है। भोजन की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में कमी आई है। रोजगार में बढ़ोतरी एक फीसद प्रति वर्ष से भी कम हुई है, श्रमशक्ति में वाषिर्क वृद्धि आधा फीसद भी नहीं रही है। सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच अधिक असमान हो गई है। आय की असमानताएं चौड़ी और गहरी हो गई हैं। संगठित व्यवसाय और धीरे-धीरे विदेशी निवेश के लिए खुदरा व्यापार को खोलने से लाखों छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के सामने रोजी-रोटी कमाने का संकट पैदा हो गया है, जो वैसे भी जैसे-तैसे गुजर-बसर कर पाते हैं। 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इजाजत देने के सवाल पर लोकसभा में बुरी तरह मार खाने के बावजूद यूपीए-2 सरकार ने अपना एजेंडा छोड़ा नहीं है। प्रधानमंत्री अब भी पोस्को समझौते को आगे बढ़ाने का ख्याल पाले हुए हैं, जो न केवल पर्यावरण और वन कानूनों का उल्लंघन करता है बल्कि इस परियोजना को तीन सरकारी कमेटियों द्वारा पहले ही अस्वीकार किया जा चुका है। वास्तव में ऊपरी ढांचे, खनन और उद्योंगों से जुड़ी अनगिनत परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय एक विशेष उद्देश्य प्रकोष्ठ का गठन करने जा रहा है। भारतीय नीति निर्माता और खासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय किसी भी कीमत पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकषिर्त करने के लिए इंडिया ब्रांड इक्यूटी कंसेप्टको आगे बढ़ाने में लगे हैं। जो भी चीज इससे अलग ले जाती है, उसे अवरोधक के रूप में देखा जाता है, जिसका अर्थ है- लाइसेंस परमिट राज में वापस लौटना। उद्योग जगत के ढिंढ़ोरचियों ने नीति पक्षाघातकी समाप्ति औरदूसरी पीढ़ी के सुधारोंकी संस्था की मांग करने के लिए जोरदार अभियान शुरू किया है, जिसका आशय अधिक विनियमीकरण, सार्वजनिक क्षेत्रों का अधिक निजीकरण, तथाकथित सार्वजनिकनिजी ाजनिकनिजी भागीदारी के माध्यम से सार्वजनिक सेवाएं, अधिक उदार निवेश और व्यापार का दौर और थोड़ी-बहुत श्रम सुरक्षा के मौजूदा कानूनों का भी खात्मा करना है। वास्तविकता यह है कि नीति पक्षाघातकहीं नहीं है। पश्चिम की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां राजनीति से प्रेरित दोहरे मापदंड अपनाती हैं। कर्ज के मामले में उनको अगर मापदंड अमेरिका के लिए अपनाना हो तो, उदाहरण के लिए वे स्पेन का सहारा लेती हैं। स्पेन में सार्वजनिक कर्ज- जीडीपी अनुपात 69 प्रतिशत है जबकि अमेरिका के लए यह आंकड़ा 103 प्रतिशत है। भारत का यह अनुपात 60 फीसद से कम है। यदि निजी सहित कुल कर्ज को देखा जाए तो अमेरिका उन देशों में निकलेगा, जिन पर सबसे ज्यादा कर्ज लदा है। उस पर दुनिया का कर्ज उसके वाषिर्क उत्पादन से तीन गुना ज्यादा है। जर्मनी का कुल कर्ज अनुपात 385 है और जापान का 470 जबकि भारत का यह अनुपात मात्र 129 है। यूपीए-2 की सरकार के तीन साल के अंत पर भारत अधिक असंतुलित, लड़ाई- झगड़ों में फंसा एक दुखी समाज है। नीतियां सही करने के स्थान पर सरकार इनसे पैदा असंतोष से निपटने के लिए निर्मम ताकत का इस्तेमाल करने पर उतारू रहती है। यह नंगे और दर्दनाक ढंग से भारत की प्रमुख आदिवासी पट्टी में दिखाई पड़ता है, जहां लाखों लोगों को वनों, चारागाहों और जलाशयों आदि जैसे साझे संपत्ति-संसाधनों से वंचित किए जाने के चलते सामाजिक असंतोष से जन्मा नक्सलवाद फल- फूल रहा है। इस पट्टी में सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध में ताकत के इस्तेमाल में इजाफा कर रही है। सरकार के वे प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो विनाशकारी परियोजनाओं के विरोध में जमीनी स्तर पर चल रहे प्रदर्शनों को कुचलने के लिए चल रहे हैं। इनमें से कुछ ये हैं- ओडिशा में पास्को और टाटा स्टील, छत्तीसगढ, झारखंड और गोआ में खनन, उत्तराखंड, हिमाचल और उत्तरपूर्व में अंधाधुध बन रहे बांध तथा कोडनकुलम (तमिलनाडु), जैतापुर (महाराष्ट्र), मीठीविर्दी (गुजरात), फतेहाबाद (हरियाणा), कोवादा (आंध्र प्रदेश) और चुर्का ( मध्य प्रदेश ) आदि। इसके अलावा यूपीए-2 सरकार की एक अन्य विफलता मुस्लिमों की स्थिति पर सच्चर कमेटी रिपोर्ट को पर कार्यवाई न करने और जिन जिलों में अलपसंख्यक समुदाय की अच्छी-खासी संख्या है, उनमें कार्यक्रमों को ठीक से लागू न किए जाने में निहित है। यूपीए-2 ने 2004 का चुनाव आंशिक तौर पर सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में जनआक्रोश के चलते जीता था। पर वह 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों और गुजरात में 2002 के मुस्लिम विरोधी हत्याकांड के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के अपने वादे पर अमल नहीं कर पाई है। विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर भी सरकार का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में जबकि एक बहुध्रुवीय वि-व्यवस्था उभर रही है, उसने भारत को अमेरिका के साथ करीब से जोड़ कर दुनिया के मामलों में एक स्वतंत्र मार्ग अपनाने के विकल्प को कम कर दिया है। अमेरिकी-भारतीय परमाणु सहयोग समझौते के कारण भारत ने अपने आप को , परमाणु ऊर्जा पर आधारित एक अनुचित, अत्यंत जोखिमपूर्ण और महंगे रास्ते पर डाल दिया और परमाणु- अस्त्र मुक्त वि के लिए संघर्ष के एजेंडा को छोड़ दिया है। भारत ने अनगिनत द्विपक्षीय समझौते किए हैं, जो विदेशी कॉरपोरेशनों के लिए एक समान राष्ट्रीय व्यवहार की मांग करते हैं। ईरान, फिलिस्तीन, लीबिया और सीरिया जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर यूपीए-2 का रवैया असंतुलित रहा है। इसके चलते अरब जगत में भारत के प्रति सद्भाव में कमी आई है। इस दौरान भारत ने अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को सुधारने के काम को अनदेखा किया है। सियाचीन और सर क्रीक विवादों को निपटा कर, व्यापारिक उदारीकरण करके तथा वीसा अवरोधों को खत्म करके वह पाकिस्तान के साथ संबंधों के नए अध्याय को शुरू करने के की बड़ी पहल करने से वह बचता रहा है। नई दिल्ली ने तीस्ता जल विवाद पर बांग्लादेश के साथ समझौता करने के बहुमूल्य अवसर को गंवा दिया है। लिट्टे विरोधी सैनिक कार्रवाई के अंतिम दौर में श्रीलंका में तमिल नागरिकों की सामूहिक हत्याओं पर भारत की भूमिका पूरी तरह से निंदनीय रही है।

श्वेत पत्र में कुछ भी नया नहीं


इसमें कोई दो राय नहीं कि काले धन को लेकर हम लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं। शायद यह निर्धन समाजों की अपनी ग्रंथि होती है कि वह आमतौर पर धन से चिढ़ते हैं। हमारे यहां जब भी ईमानदारी की बात होती है, सच्चाई की बात होती है तो लोग कुछ ज्यादा ही संवेदनशीलता दिखाने की कोशिश करते हैं, जबकि हद यह है कि हम दुनिया के सर्वाधिक, भ्रष्ट, गैर-ईमानदार और बेहद संवेदनहीन समाज हैं। लेकिन काले धन को लेकर हम संवेदनशील हैं। पिछले तीन सालों से देश में बना काले धन के विरुद्ध माहौल भी इसकी वजह है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे जैसे आंदोलनकारियों ने पूरे देश को काले धन के संबंध में इतना जागरूक तो बनाया ही है कि जिनके पास ठोस, वास्तविक जानकारियां नहीं होती हैं, वह भी इस मुद्दे पर तमाम तरह की कल्पनाएं कर लेता है। जाहिर है, जब वित्तमंत्री ने 21 मई को काले धन पर श्वेत पत्र जारी किया तो देश को उम्मीद थी कि वह धमाका करेंगे। देश को बताएंगे कि भारतीयों का कुल कितना धन काले धन के रूप में विदेशों में जमा है और ऐसे काले धन के स्वामी कौन हैं? लोगों को यह भी उम्मीद थी कि शायद वित्तमंत्री काले धन को विदेश से वापस लाने की ठोस तरकीब बताएंगे। किस देश से क्या बातचीत हुई है, क्या समझौता होना है, यह भी बताएंगे और आश्वस्त करेंगे कि कब तक देश में यह काला धन वापस आ पाएगा। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ। वित्तमंत्री के पास बताने के लिए कुछ भी नहीं था। उन्होंने वाकई कुछ बताया भी नहीं। 97 पेज का दस्तावेज जरूर उन्होंने पेश किया, लेकिन सच बात तो यह है कि इस दस्तावेज में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे सुनकर या जानकर लोग चौकें या महसूस करें कि उनकी जानकारी में यह नया इजाफा हुआ है। सच्चाई तो यह है कि वित्तमंत्री ने एक तरह से काले धन को सफेद लिबास पहना दिया है। आप इस श्वेत पत्र के जरिये इसमें झांक नहीं सकते कि यह कितना है और कैसा है? वित्तमंत्री ने उल्टे लोगों की जानकारियों को ही हतोत्साहित करने की कोशिश की है। एक तरफ वित्तमंत्री को यह पता नहीं है कि देश का काला धन विदेश में जमा है। दूसरी तरफ वह यह बता रहे हैं कि पिछले पांच सालों में लगातार यह धन कम हो रहा है। श्वेत पत्र के मुताबिक 2010 में कोई 9,295 करोड़ रुपये विदेशों में होने का अनुमान है, जबकि 2006 में यह तकरीबन 23,373 करोड़ रुपये था। मजेदार सरकार है, जिसे यह तो पता नहीं है कि हमारा कुल कितना धन विदेशों में जमा है, लेकिन यह पता है कि वह कम हो रहा है। वित्तमंत्री के पास कोई अनुमान भी नहीं है कि आखिर कितना धन हो सकता है। हां, वह यह जरूर बता रहे हैं कि सरकार प्रतिबद्धता के साथ विदेशों से काला धन लाने का प्रयास कर रही है। सवाल है कि क्या ऐसी खानापूर्ति को भी श्वेत पत्र कहा जा सकता है या कहा जाना चाहिए? वाकई श्वेत पत्र एक किस्म से उन करोड़ों भारतीयों के साथ मजाक है, जो पूरी गंभीरता और जीवंतता के साथ पिछले कई सालों से काले धन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वैसे जो विभिन्न वैश्विक एजेंसियों और अध्ययनों का निष्कर्ष है, उसके मुताबिक विदेशों में जमा भारतीयों का अवैध धन, जिसे हम काला धन कह सकते हैं, वह इतनी बड़ी रकम है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद के करीब आधी बैठती है। काला धन सिर्फ इस मायने में ही खतरनाक नहीं होता कि वह देश के मेहनतकशों द्वारा कमाया जाता है और किसी तरह चालबाजों के हाथ में पहुंचकर विदेश पहुंच जाता है और फिर विदेशों में स्थित उनके अकाउंट को हर गुजरते दिन के साथ बड़ा बनाता रहता है। काला धन सिर्फ अपनी तादाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि वह एक काली अर्थव्यवस्था को भी जन्म देता है, जिसमें नशीली दवाओं का अवैध कारोबार और आतंकवाद जैसी समाज विरोधी गतिविधियां फलती-फूलती हैं। काला धन जिस काली अर्थव्यवस्था को जन्म देता है, उसके चलते वैध अर्थव्यवस्था कमजोर होती है। उदाहरण के लिए फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स इंडस्ट्री का सालाना टर्नओवर 1 लाख करोड़ रुपये का है, जिसे काली अर्थव्यवस्था के चलते 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है और अगर इसके दूसरे क्रियाकलापों से होने वाले नुकसानों को भी इसमें जोड़ लें तो तकरीबन 8,000 करोड़ रुपये का सालाना घाटा बैठता है, लेकिन जिस तरह काले धन को लेकर मौजूदा सरकार ने अपने श्वेत पत्र में लीपापोती की है, उससे न तो यह साफ हुआ है कि सरकार की काले धन को खत्म करने के लिए वास्तव में मंशा क्या है और न ही देश को इसकी सच्चाई के बारे में ही पता चला है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

काले धन के खिलाफ खोखली पहल


अपने वादे के मुताबिक सरकार ने काले धन पर संसद में श्वेत पत्र पेश तो कर दिया है, लेकिन यह कदम महज औपचारिकता भरा लग रहा है। इसमें काले धन की आधी हकीकत भी सामने नहीं आ पाई। कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में न तो यह बताया गया है कि भारतीयों का कितना काला धन देश या विदेश में जमा है और न ही जमाकर्ताओं के नाम का खुलासा है। हां, इसमें काले धन की समस्या से निजात पाने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त के गठन की पुरजोर पैरवी जरूर की गई है। यह दावा भी किया गया है कि स्विस बैंकों में जमा काले धन में कमी आई है। हालांकि श्वेत पत्र में धन का ब्यौरा न देने की वजह इसका कोई एक आंकड़ा और इसके बारे में पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि का नहीं होना बताया गया है। श्वेत पत्र में कहा गया है कि काले धन को लेकर कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है और न ही इसका पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि है। अब तक जो भी आकलन आए हैं, सभी अलग-अलग तरह के हैं। ऐसे में अगर इसे केंद्र सरकार की एक पहल मानी जाए तो भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विदेशों में जमा काला धन कब वापस आ पाएगा? क्या श्वेत पत्र से आगे भी सरकार कार्रवाई कर पाएगी और अगर सरकार ऐसी कोई कार्रवाई करेगी भी तो देश को इसके लिए और कितना इंतजार करना होगा। श्वेत पत्र का स्याह पहलू श्वेत पत्र में वित्तीय अपराध से तेजी से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का जिक्र है और अपराधियों को कडे़ दंड देने की बात कही गई है। कुल 97 पेज के इस दस्तावेज में इस धारणा को गलत साबित करने की कोशिश की गई है कि सरकार काले धन की समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। काले धन की समस्या से निपटने के लिए श्वेत पत्र की प्रस्तावना में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि उनकी सरकार ने पांच विधेयक पेश किए, जो लोकपाल विधेयक, न्यायिक जवाबदेही विधेयक, व्हिसल ब्लोअर विधेयक, शिकायत निपटान विधेयक और सार्वजनिक खरीद विधेयक हैं। ये विधेयक संसद में विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन हैं। श्वेत पत्र में यह जरूर बताया गया है कि रियल एस्टेट, शेयर बाजार, सर्राफा, सार्वजनिक खरीदारी, एनजीओ आदि क्षेत्रों में सबसे ज्यादा काला धन बनाया जाता है। मगर विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने की कोई स्पष्ट नीति सरकार ने नहीं बताई है। भाजपा ने भी इस श्वेत पत्र को निराशा करने वाला बताते हुए खारिज किया, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेता जसंवत सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि यह श्वेत पत्र बिकनी के जैसा है, जो आवश्यक चीजों को ढक लेती है। श्वेत पत्र में बताया गया है कि काले धन के मामले में दुनिया भर में भारत 15वें स्थान पर है। इस सूची के आधार पर पहले नंबर पर चीन है, जबकि दूसरे स्थान पर रूस। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष की अगुवाई में आठ सदस्य वाली टीम ने यह रिपोर्ट पेश की है। पर अहम सवाल यह है कि सरकार काले धन को लेकर वास्तव में सक्रिय है या फिर सक्रिय होने का स्वांग कर रही है। यह सवाल आए दिन सुर्खियां बटोर रहा है। पर काले धन को लेकर सरकार का रवैया क्या है, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है। ऐसे में लोगों में यह धारणा बन रही है कि सरकार जान-बूझकर लोगों का नाम छुपा रही है। भले सरकार यह कहे कि वह काले धन की समस्या को गंभीरता से ले रही है, लेकिन ताज्जुब होता है कि इस समय देश जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें भ्रष्टाचार और काले धन से जुड़े मामले सबसे अहम हैं। फिर भी सरकार इन मामलों पर आक्रामक रुख अपनाने के बजाय बचाव की मुद्रा अपना रही है और कर क्षमादान जैसे नब्बे के दशक में अपनाए जा चुके घिसे-पिटे टोटकों को फिर से आजमाने का इरादा जता रही है। कब खुलेगी कलई सरकार ने काले धन का आकलन करने के लिए तीन अलग-अलग संस्थाओं को जिम्मेदारी दी है। इन संस्थाओं के नाम हैं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड मैनेजमेंट और नेशनल काउंसिल फॉर अप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च। उम्मीद है कि ये तीनों संस्थाएं सितंबर 2012 तक अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। यह सच है कि भारत में काले धन के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं और अलग आंकड़े दिए जा रहे हैं। बाबा रामदेव से लेकर सीबीआइ के निदेशक तक अपने-अपने आंकड़े दे चुके हैं, लेकिन उनके सत्यापन का कोई तरीका नहीं है। बता दें कि श्वेत पत्र में सरकार ने भी अपना अनुमान नहीं दिया है, पर सीबीआइ निदेशक के मुताबिक यह राशि करीब 500 अरब अमेरिकी डॉलर है, जबकि भाजपा टास्क फोर्स के मुताबिक यह राशि 500 अरब से 14 खरब अमेरिकी डॉलर है। दूसरी ओर अमेरिका की ग्लोबल फाइनेंशियल स्टडी के अर्थशास्त्री देवकार द्वारा किए गए एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि 1948 से 2008 के बीच भारत से करीब 20 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे गए हैं। इसमें करीब 50 प्रतिशत काला धन 1991 के बाद देश से बाहर गया है, जबकि 2000 से 2008 के बीच इसमें से करीब एक तिहाई राशि देश से बाहर भेजी गई है। यही नहीं, अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक 2002 से 2006 के दौरान भारत में हर साल करीब 22.7 अरब डॉलर धनराशि बाहर गई है। फिलहाल इन पैसों के खातेदारों के नाम अज्ञात हैं, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि देर-सबेर इनके नामों का खुलासा हो जाएगा। यह कालाधन सिर्फ स्विट्जरलैंड, लिंचेस्टाइन में ही नहीं, बल्कि कैरेबियाई द्वीप केमैन आइलैंड, जिब्राल्टर, मोनाको, लक्जमबर्ग से लेकर दुबई तक के बैकों में जमा है। सवाल यह है कि काले धन के अंकाउट धारक डीटीए (डबल टैक्सेशन एवॉयडेंस एग्रीमेंट) की जद में आते हैं या नहीं? डीटीए इसलिए बना है कि अप्रवासी टैक्स की दोहरी मार से बचें या देश से धन लूटकर ले जाने वालों के लिए? भारत सरकार डीटीए के अनुच्छेद 26 के हवाले से यह तर्क देती है कि हम काले धन के खाताधारकों के नाम बता नहीं सकते। इससे सूचना देने वाली सरकारों से वादा खिलाफी होती है। दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता तो विदेशी बैंकों में गया काला धन वापस आते हुए देखना चाहती है, क्योंकि देश का पैसा विदेशों में जमा रखने वाले देश के गुनहगार है और देश की जनता को उन गुनहगारों के नाम जानने का हक है। इसके अलावा यह देश की अर्थव्यवस्था और सरकार की साख से जुड़ा मामला भी है। तो मिल जाती राहत जनवरी, 2011 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आइएमएफ की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि एशिया की उभरती आर्थिक ताकतों में भारत प्रमुख है, लेकिन मनी लॉन्डरिंग ओर चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुंचने का खतरा उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। बात सिर्फ यही नहीं है, विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर देश की आर्थिक रफ्तार के आड़े आ रही अंतराष्ट्रीय बाजार की मंदी को निष्प्रभावी किया जा सकता है। दूसरी तरफ देश के राजकोषीय घाटे को कम करने में भी इससे मदद मिल सकती है। काले धन और घोटालों का आकार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि काले धन की जड़ पर प्रहार करने का हौसला कोई नहीं जुटा पा रहा। समाधान चाहिए तो बड़ी मछलियों को साफ करना होगा। महज दिखावा करने के बजाय दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। अन्यथा, संसद में यों ही श्वेत पत्र पेश होते रहेंगे। बहस भी होगी, लेकिन समस्या खत्म नहीं होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)