अन्ना हजारे की लड़ाई की शुरुआत में जो आशंकाएं थीं, वह सच साबित हो रही हैं। पहले ड्रॉफ्टिंग समिति के सदस्य शांति भूषण के विरुद्ध संपत्ति की खरीद में कम स्टांप शुल्क का मामला सामने आना और फिर एक सीडी के जरिये चार करोड़ के रिश्वत की लेन-देन की साजिश इसके प्रमाण हैं। आखिर जो लोकतंत्र ताकतवर राजनीतिज्ञों के लिए नाजायज लूट और वंशवाद का हिस्सा बन चुकी है, वह क्यों चाहेंगे कि उनकी पकड़ कमजोर पड़े। नेता, नौकरशाह और कारोबारियों का गठजोड़ आम लोगों पर न केवल भारी रहा है, बल्कि वर्तमान व्यवस्था को जस की तस बनाए रखने की कवायद भी करता रहा है। व्यवस्था में कोई परिर्वतन न हो इसलिए देश के प्रधानमंत्री रह चुके एचडी देवगौड़ा के पुत्र और कर्नाटक के पूर्व मूख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी हद दर्जे की बेशर्मी से कह देते हैं कि आज गांधी होते तो वह भी भ्रष्ट होते अथवा राजनीति से दूर चले गए होते। दूसरी तरफ कपिल सिव्बल जैसे जिम्मेवार नेता कहते हैं कि पाठशाला में प्रवेश और राशन में भ्रष्टाचार का निदान इस विधेयक से होने वाला नहीं है। इसी तर्ज पर सलमान खुर्शीद ने कह दिया कि ईश्वरीय सत्ता के बावजूद अपराध होते ही हैं। कांग्रेस प्रवक्ताओं और कई कथित कानूनविद और बुद्धिजीवी लोकपाल विधेयक के मसौदे को तैयार करने वाली संयुक्त समिति को संवैधानिक व्यवस्था का हनन मानते हुए चुनौती दे रहे हैं। छह दशक से भी ज्यादा लंबे समय से जनता की गाढ़ी कमाई से खाद- पानी लेता रहा भ्रष्ट तंत्र कतई नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार से निपटने की कोई मजबूत और कारगर संस्था वजूद में आए। इसलिए चंद भ्रष्टाचारी यह भ्रम बनाए रखना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार इस देश से कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए कुछ भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार को बंदरिया के उस मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपकाए रखना चाहते हैं जो यह मानने को तैयार नहीं होती की बच्चा मर गया है। इन कथित भ्रष्टाचारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सदियों से भारत पर काबिज रहे राजे-रजवाडे़ और दो सौ साल तक हुकूमत करने वाले अंग्रेजी राज का खात्मा भी जन अंदोलनों की देन है। इसलिए लोकपाल विधेयक आने में कई मुश्किलें आ सकती हंैं। समय लग सकता हैं, लेकिन लोकपाल अब आकर रहेगा। इसे शासन-प्रशासन जैसी कोई ताकत रोक नहीं पाएगी। जन लोकपाल में कठिनाइयां आना इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि केंद्र सरकार के जो मंत्री संयुक्त समिति के सदस्य हैं, वे अमेरिकी पूंजीवाद के हिमायती तो हैं ही औद्योगिक घरानों के निष्ठावान अनुयायी भी हैं। कपिल सिव्बल, पी चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुखर पक्षधर हैं। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली जरूर पृथक जनहितैषी मानसिकता के हैं। इसलिए वह भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने के लिए मौजूदा कानूनों में बदलाव की पैरवी भी करते रहे हैं। नागरिक समाज के पहले विधेयक के रूप में लोकपाल की नियुक्ति प्रकिया में पदेन प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को शामिल नहीं किया गया था, किंतु नए प्रारूप में इन्हें राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष के स्थान पर लिया गया है। प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष नेता पद ठेठ राजनीतिक हैं। इन्हें अपनी स्थिति बहाल रखने के लिए कई तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समझौते करने व संतुलन बिठाने होते हैं। इसलिए इनकी निष्पक्षता प्रभावित हुए बिना नहीं रहती, जबकि राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति होते हैं। जिनकी प्रतिबद्धता, संवैधानिक मान-मर्यादा से जुड़ी होती है। आमतौर से लोकसभा अध्यक्ष विपक्षी दलों में से किसी निर्वाचित संसद सदस्य को ही बनाए जाने की परिपाटी है। हालांकि अपवादस्वरूप ही सत्ता दल के संासद को इस गरिमामय पद से नवाजा जाता है। इसलिए लोकसभा अध्यक्ष से भी निर्लिप्त रहकर काम करने की अपेक्षा की जाती हैं। लोकपाल के चयन में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के हस्तक्षेप से सीवीसी की तर्ज पर किसी भ्रष्ट नौकरशाह को बिठा देने की आशंका हमेशा बनी रहेगाी? लोकपाल विधेयक के ठोस प्रारूप में यह बदलाव इसे सीबीआइ, केंद्रीय सतर्कता आयोग, मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग की तरह नखदंत विहीन बना देने की शुरुआत है। इसे सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और सीएजी की तरह एक मजबूत स्वायत्त संस्था बनाने की जरूरत है। यहां यह गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय और सीएजी पर यदि केंद्र सरकार का नियंत्रण होता तो 2 जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेल घोटालों से पर्दा उठता ही नहीं। हमारे देश में मजबूत संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करते हुए उन्हें राजनैतिक नियंत्रण में लाने की कवायद हर शासन काल में होती रही है।
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