केंद्र में मजबूत लोकपाल विधेयक का मार्ग प्रशस्त होने के साथ ही राज्यों में लोकायुक्त संस्था को भी ताकतवर बनाने की मुहिम तेज होने लगी है। दंतविहीन लोकायुक्त के बजाय भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए उसे ज्यादा ताकतवर बनाने की नीयत कितनी है, कहना मुश्किल है, लेकिन राज्य सरकारों ने इस विषय पर मंथन तेज कर दिया है। दिल्ली में लोकायुक्त ने खुद ही यह पहल की है तो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछले दिनों विवाद के केंद्र में रही कर्नाटक सरकार भी लोकायुक्त को और ज्यादा अधिकार देने की घोषणा कर रही है। हालांकि, लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया और उसके अधिकारों के दायरे का काफी कुछ भविष्य केंद्र के लोकपाल कानून के प्रारूप पर तय करेगा। सूत्रों के मुताबिक, दो प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा ने अपनी-अपनी राज्य सरकारों को इस मुद्दे की संवेदनशीलता समझते हुए अपने प्रदेश तंत्र को लोकायुक्त संस्था के बारे में सजग कर दिया है। बस सबकी नजरें, इस बात पर लगी हैं कि प्रधानमंत्री लोकपाल कानून के दायरे में आएंगे या नहीं और किसी भी नेता या नौकरशाह के खिलाफ उसे सीधे प्राथमिकी दर्ज करने का अधिकार मिलेगा या नहीं। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त और लोकपाल विधेयक को तैयार करने की साझा कमेटी में सदस्य बनाए गए संतोष हेगड़े साफ कहते हैं कि केंद्र का कानून अगर जरा भी कमजोर हुआ तो राज्य सरकारों को रास्ता मिल जाएगा। वास्तव में आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला भ्रष्टाचार राज्य प्रशासन में ही होता है। इसलिए, केंद्र को मजबूत लोकपाल कानून बना कर राज्यों के सामने बड़ी लाइन खींचनी होगी। जिन राज्यों में लोकायुक्त को थोड़ा प्रभावी बनाया गया है, उनमें कर्नाटक प्रमुख है। अन्ना हजारे की तरफ से अभी सुझाए गए जनलोकपाल विधेयक के कई प्रावधान पहले ही वहां थे। हालांकि, इसका श्रेय वहां की राज्य सरकारों के बजाय हेगड़े को है जिन्होंने लोकायुक्त रहते संस्था को दांत और नाखून दिलाए। मसलन मंत्री और बड़े नौकरशाहों के खिलाफ सीधे एफआइआर दर्ज कराने के लिए लोकायुक्त पुलिस तक कर्नाटक में थी। इसका ही नतीजा था कि हेगड़े ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री को कानून की ताकत का अहसास कराया। हालांकि पूरी तरह से प्रभावी और स्पष्ट कानून के अभाव में लोकायुक्त संस्था को ही अंतत: नीचा देखना पड़ा। ऐसे में अगर केंद्र में लोकपाल को असीमित अधिकार मिले तो जाहिर तौर पर राज्यों को उसका अनुकरण करना होगा। वरना तय तो यह है कि लोकायुक्त संस्था को राजनीतिक दल ज्यादा ताकतवर तो दूर बहुत ज्यादा सक्रिय तक नहीं देखना चाहते। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है राजस्थान। यहां पर लोकायुक्त ने तीन साल तक सरकार के कामकाज की रिपोर्ट राज्यपाल को पेश की, लेकिन उसे विधानसभा में कभी पेश नहीं किया गया। मजे की बात तो है कि कभी विपक्ष ने भी इसको लेकर सवाल नहीं उठाए। इसी तरह कर्नाटक, दिल्ली और मध्य प्रदेश में लोकायुक्त का वहां की राज्य सरकारों के साथ टकराव जगजाहिर ही है। खासतौर से कांग्रेस शासित राज्यों की तुलना में लोकायुक्त को अधिकार देने में अभी भाजपा शासित राज्य ज्यादा आगे हैं। हालांकि उनकी सक्रियता भाजपा को भी रास नहीं आई। दिल्ली के लोकायुक्त जस्टिस मनमोहन सरीन ने भी इन राज्यों के समान आर्थिक व प्रशासनिक स्वायत्तता देने की जरूरत बतायी है। अब चूंकि, केंद्र में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने बिगुल बज गया है तो राज्यों में भी नए सिरे से सोच बन रही है। भाजपा महासचिव रविशंकर प्रसाद तो साफ कहते हैं कि बिहार में हम जैसा कानून बना रहे हैं, वह केंद्र के लिए नजीर हो सकता है। मौजूदा घटनाक्रम बताता है कि जनता भ्रष्टाचार से ऊब चुकी है, लिहाजा इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं कि राज्यों में लोकायुक्त संस्था मजबूत करना वक्त की जरूरत है। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए|
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