महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त, भारत सरकार (रजिस्ट्रार जनरल एंड सेन्सस कमिश्नर ऑफ इंडिया) डॉ. चन्द्रशेखर चन्द्रमॉली से आशीष कुमार 'अंशु' की बातचीत
वैसे इस विरोधाभास को कैसे समझा जाए कि एक तरफ तो लड़कियों में शिक्षा की दर बढ़ रही है। वे विभिन्न क्षेत्रों में लगातार आगे आ रहीं हैं। वहीं कन्या भ्रूण हत्याओं में बढ़ोतरी हो रही है। हम कहते नहीं थकते कि स्त्री-पुरुष में भेदभाव बीते जमाने की बात हो गई। दूसरी तरफ आंकड़े इन दावों को झुठलाते हैं। आबादी का घनत्व बढ़ना भी एक बड़ी समस्या है। अभी प्रति वर्ग किमी. पर लगभग 57 लोग रहते हैं। हमारे पास संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या घनत्व के बढ़ने से हमारे जीवन स्तर में गिरावट आना तय है
पिछले साल की तुलना में वर्ष 2011 की जनगणना में क्या खास रहा है? पिछली जनगणना के दौरान जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में थोड़ी कठिनाई आई थी, जिसका सामना इस बार हमें नहीं करना पड़ा। इस तरह 2011 की जनगणना से प्राप्त आंकड़े पिछली बार की तुलना में अधिक सटीक हैं। इस बार हमें राज्य सरकारों के साथ स्थानीय जिलाधिकारियों का भी भरपूर सहयोग मिला। प्रत्येक जिलाधिकारी से हमें प्रमाण पत्र मिला कि जनगणना के दौरान सभी क्षेत्रों तक उनकी पहुंच बनी। कोई गांव, कस्बा या बस्ती हमारी पहुंच से इस बार बाहर नहीं रही। यह हमारे काम की एक बड़ी उपलब्धि थी।
इसका मतलब यह निकाला जाए कि इस बार की जनगणना शत-प्रतिशत सफल रही? एक अरब से अधिक की आबादी के बीच किया गया सव्रेक्षण शत-प्रतिशत ठीक होगा; यह दावा करना तो किसी के लिए भी कठिन है। निश्चित तौर पर कुछ लोग छूटे होंगे, अलग-अलग कारणों से। मेरा अनुमान है कि एक से दो प्रतिशत तक लोग छूटे होंगे। पिछली बार यह आंकड़ा लगभग 2.2 प्रतिशत लोगों का था। हम अब एक और सव्रेक्षण करेंगे, जिसके बाद हमारे विशेषज्ञों की टीम बता पाएगी कि इस बार हमारे सव्रेक्षण में हमारी पहुंच से कितने लोग दूर रहे। पहली बार जनगणना
पहली बार जनगणना के दौरान जीआईएस (ज्योग्राफिकल इन्फॉम्रेशन सिस्टम) तकनीक का उपयोग किया गया, किस प्रकार का अनुभव रहा? यह तकनीक बेहद उपयोगी है। इसके माध्यम से मैपिंग और जनगणना कार्यक्रम को लेकर रणनीति बनाने में बहुत मदद मिली। यह गूगल मैप से भी अधिक स्पष्ट तस्वीर उपलब्ध कराती है। इस बार प्रयोग के तौर पर हमने इसका उपयोग राज्यों की राजधानी में जनगणना के लिए किया। कुल 33 राजधानियों में यह उपयोग में लाया गया। महंगा होने के कारण इस तकनीक को पूरे देश में लागू तो नहीं किया जा सकता लेकिन हमारी कोशिश रहेगी कि अगली बार राजधानियों के साथ-साथ कुछ और बड़े शहरों को भी जीआईएस के साथ जोड़ा जाए।
जनगणना के नतीजों में यदि कुछ संतोषजनक और कुछ असंतोषप्रद नतीजों की बात करें तो वे कौन से परिणाम हैं? पहली बात तो यह कि अभी जो परिणाम आया है, वह अंतिम नहीं है। यह प्रोविजनल पोपुलेशन डाटा है। पिछले साल अंतिम रिपोर्ट आने में पांच साल का वक्त लगा था। इस बार हमारी कोशिश है कि इसे दो सालों में 2013 तक आप लोगों के बीच ले आएं। जनगणना के शुरुआती नतीजों पर बात करें तो लिंगानुपात के बीच जो फासला था, उसका कम होना सबसे बड़ी खुशी की बात है। प्रजनन दर में भी कमी आई है। जनसंख्या की बढ़ोत्तरी दर में कमी दिखाई दे रही है। एक खास बात और 2011 की जनगणना- परिणाम में पहली बार राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिसा में जनसंख्या विकास दर में कमी दर्ज की गई है। देश में स्त्री-पुरुष दोनों के बीच साक्षरता का बढ़ना वास्तव में बेहद उत्साह बढ़ाने वाला है। वहीं बच्चों के बीच लिंग अनुपात का बिगड़ना चिंताजनक भी है। वैसे इस विरोधाभास को कैसे समझा जाए कि एक तरफ तो लड़कियों में शिक्षा की दर बढ़ रही है। वे विभिन्न क्षेत्रों में लगातार आगे आ रहीं हैं। सफल हो रहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ कन्या भ्रूण हत्याओं में बढ़ोतरी। एक तरफ हम यह कहते हुए नहीं थकते कि स्त्री-पुरुष में भेदभाव बीते जमाने की बात हो गई। हम बढ़ते भारत में जी रहे हैं; जहां दकियानूसी ख्यालों के लिए जगह नहीं है। दूसरी तरफ हमें जो आंकड़ें प्राप्त हुए हैं, वे इन दावों को झूठलाते हैं। आबादी का घनत्व बढ़ना भी एक बड़ी समस्या है। वर्तमान में प्रति वर्ग किलोमीटर पर लगभग 57 लोग रहते हैं। हमारे पास संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या घनत्व के बढ़ने से हमारे जीवन स्तर में गिरावट आना तय है।
यह अक्सर सुनने में आता है कि जनगणना के दौरान जो व्यक्ति अपना नाम लिख पाता है, उसका नाम साक्षर के तौर पर दर्ज किया जाता है। क्या आप इस तरह की व्यवस्था से सहमत हैं? जो व्यक्ति अपना नाम लिख सकता है, उसे साक्षर मानने की बात से किसी की सहमति नहीं हो सकती है। जनगणना के दौरान भी ऐसे लोगों को साक्षर के तौर पर नहीं जोड़ा जाता। साक्षर को लेकर हमारा स्पष्ट मत है कि राईटिंग-रीडिंग- अंडरस्टैडिंग (लिखना-पढ़ना-समझना) अच्छी हो, उसके बाद ही उसे साक्षर के तौर पर नामित किया जाता है। इसीलिए सात साल से कम के बच्चे को कभी फॉर्म में साक्षर नहीं दिखलाया जाता। भले ही वह लिखना-पढ़ना दोनों जानता हो।
जनगणना के काम में शिक्षकों को लगाए जाने की कोई खास वजह? जनगणना के दौरान गांवों में स्कूल बंद होते हैं और बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है। क्या आपके पास शिक्षकों का कोई विकल्प नहीं है? हम लोगों ने इस विचार किया है। कुछ सुझाव भी आए जैसे एक सुझाव तो यह है कि जिन युवकों के पास काम नहीं है, उन्हें इससे जोड़ा जाए। चूंकि जनगणना के लिए गए युवकों को घर के अंदर प्रवेश मिलता है, इससे विधि-व्यवस्था पर हमेशा खतरा बना रहेगा। यदि इस काम में जनसंख्या नियंतण्रकी टीम को लगाए तो जनसंख्या सम्बन्धी उनके पूर्वाग्रह जनगणना में शामिल हो सकते हैं। यदि जल विभाग के लोगों को जोड़ें तो जल से सम्बन्धी जानकारी हमारे पास पक्की आएगी, इस बात पर विश्वास करना कठिन है। शिक्षकों को अपने साथ जोड़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका समाज में बहुत सम्मान होता है। उनका सभी परिवारों के साथ उठना-बैठना है। उन पर विश्वास किया जा सकता है कि वे पूर्वाग्रह से मुक्त होंगे। जहां तक छूट्टी की बात है तो हमारे तरफ से दिया जाने वाला काम अधिक नहीं होता। हम तो यही चाहते हैं कि शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ ही शाम का थोड़ा वक्त निकाल कर इस फॉर्म को भरें। चूंकि 600 की आबादी पर एक महीने में 125 से 150 फॉर्म भरने होते हैं। जिन शिक्षकों को अपने घर से दूर सव्रेक्षण के लिए जाना होता है, उनकी संख्या कम है।
दुनिया के दूसरे देशों में होने वाली जनगणना के आलोक में यदि हम भारत की बात करें तो इसकी जनगणना की सबसे खास बात क्या है? अपने देश की जनगणना की खासियत यह है कि यहां अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग सवाल नहीं हैं। सभी वगरें के लिए एक सा सवाल है। सारे सवाल सामान्य हैं। गांव से लेकर शहर-महानगर तक सभी लोगों से एक ही सवाल यहां पूछे जाते हैं।
भारत की जनसंख्या-1901-2011 (आंकड़े मिलियन में)
2001-11 पहला दशक है (अपवाद दशक 1911-21) जिसमें पूर्व के दशकों की तुलना में जनसंख्या में वास्तविक गिरावट दर्ज की गई। 2011कीजनगणना जनगणना के इतिहास में वह मील का पत्थर है, जिसमें स्वतंत्रता के बाद पहली बार 2001-11 के दशक में तेजी से आबादी में गिरावट देखी गई। यह दर 2001-11 के दशक के 21.54 प्रतिशत से घटकर 17.64 प्रतिशत हो गई।
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