भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी आर-पार की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अन्ना हजारे के आमरण अनशन के पहले दिन हालांकि सरकार थोड़ी झुकी, थोड़ी अकड़ी मुद्रा में जरूर दिख रही थी लेकिन उसके होश उड़े हुए हैं यह तो साफ दिख ही रहा था। सोनिया गांधी की समर्थन मुद्रा के बाद तो अब सरकार में मानो हलचलों का तूफान उठ गया हो। मनमोहन सिंह की अपने सहयोगियों से लगातार मंतण्रा, राष्ट्रपति से उनका मिलना और हजारे के पास समाधान का फामरूला भेजना बता रहा था कि सरकार अंदर से हिल गई है। अफसोस इस बात का है कि देश को विचलित करने वाले इस अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर भी सरकार 'देखो और इंतजार करो' वाली टालू नीति पर ही चल रही है। सरकार यहां भी वही रवैया अपनाती दिख रही है जो उसने टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करवाने की मांग को लेकर किया था। महीनों तक टालमटोल करने और संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बरबाद होने के बाद अंतत: सरकार बीजेपी के आगे झुक गई थी। लेकिन, इस बार मामला राजनीति की आपसी रस्साकशी का नहीं है और सरकार के आगे कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि पूरा देश खड़ा है। अन्ना हजारे के आंदोलन के पीछे न तो कोई सुनियोजित तैयारी है और न किसी कैडर आधारित संगठन की ताकत। इसके बावजूद एक अन्ना खड़े हो गए तो लोग जुड़ने लगे और कारवां बनता गया। मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं है, राजनेताओं और अफसरशाही की स्वेच्छाचारिता और गैरजिम्मेदाराना रवैये ने पूरे देश के दिल में आग जला दी है। लोग स्तब्ध हैं कि जिन हाथों को व्यवस्था चलाने की कमान सौंपी जाती है वे किस बेशर्मी से लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे हैं। सत्ता में बैठ कर वे माफिया से भी हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करते। सत्ता के बूते देश को लूटते हैं और चुनाव के वक्त उसी काले पैसे से देश को रिश्वत बांट कर फिर कुर्सी पाने का इंतजाम करते हैं। जनप्रतिनिधि के ओहदे को कैसे निजी मिल्कियत में बदल कर अपनों के लिए सत्ता का इंतजाम करते हैं। सालों साल उनकी संपत्ति दोगुनी, चौगुनी होती जाती है लेकिन कोई पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता। हर दिशा में देश की प्रगति के बावजूद अगर देश में गरीबों की संख्या बढ़ रही है, आर्थिक विषमता की खाई चौड़ी होती जा रही है तो इसके पीछे देश के यही नव जमींदार जिम्मेदार हैं। देश ने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति जरूर पाई लेकिन हमारी स्वतंत्रता लोकतंत्र के इन तथाकथित लंबरदारों के पास रेहन रख दी गई है। देश का यही दर्द आज अन्ना हजारे के रूप में प्रतिबिंबित हो रहा है और समाज के तमाम वर्ग एक-एक कर इस गांधीवादी नेता के साथ एकाकार होते जाएंगे इसमें शक नहीं होना चाहिए। आंदोलन की ऊष्मा बता रही है कि देश में आज भी गांधी के विचार और उनका सत्याग्रह संघर्ष का हथियार उतना ही प्रासंगिक और बलशाली है। संवैधानिक व्यवस्था और तकनीकी पहलुओं के नाम पर अन्ना की मांगों को खारिज करने की कोशिशों पर हंसी आती है। अन्ना के साथ आज पूरा देश इसीलिए तो खड़ा हो गया है कि लोकतंत्र के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था के चीथड़े उड़ाने वालों का हिसाब किताब हो। इसमें रोड़ा अटकाने वालों को जनता दंडित करेगी।
Saturday, April 9, 2011
रंग लाया जन आंदोलन
भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी आर-पार की लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अन्ना हजारे के आमरण अनशन के पहले दिन हालांकि सरकार थोड़ी झुकी, थोड़ी अकड़ी मुद्रा में जरूर दिख रही थी लेकिन उसके होश उड़े हुए हैं यह तो साफ दिख ही रहा था। सोनिया गांधी की समर्थन मुद्रा के बाद तो अब सरकार में मानो हलचलों का तूफान उठ गया हो। मनमोहन सिंह की अपने सहयोगियों से लगातार मंतण्रा, राष्ट्रपति से उनका मिलना और हजारे के पास समाधान का फामरूला भेजना बता रहा था कि सरकार अंदर से हिल गई है। अफसोस इस बात का है कि देश को विचलित करने वाले इस अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर भी सरकार 'देखो और इंतजार करो' वाली टालू नीति पर ही चल रही है। सरकार यहां भी वही रवैया अपनाती दिख रही है जो उसने टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करवाने की मांग को लेकर किया था। महीनों तक टालमटोल करने और संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बरबाद होने के बाद अंतत: सरकार बीजेपी के आगे झुक गई थी। लेकिन, इस बार मामला राजनीति की आपसी रस्साकशी का नहीं है और सरकार के आगे कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि पूरा देश खड़ा है। अन्ना हजारे के आंदोलन के पीछे न तो कोई सुनियोजित तैयारी है और न किसी कैडर आधारित संगठन की ताकत। इसके बावजूद एक अन्ना खड़े हो गए तो लोग जुड़ने लगे और कारवां बनता गया। मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं है, राजनेताओं और अफसरशाही की स्वेच्छाचारिता और गैरजिम्मेदाराना रवैये ने पूरे देश के दिल में आग जला दी है। लोग स्तब्ध हैं कि जिन हाथों को व्यवस्था चलाने की कमान सौंपी जाती है वे किस बेशर्मी से लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे हैं। सत्ता में बैठ कर वे माफिया से भी हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करते। सत्ता के बूते देश को लूटते हैं और चुनाव के वक्त उसी काले पैसे से देश को रिश्वत बांट कर फिर कुर्सी पाने का इंतजाम करते हैं। जनप्रतिनिधि के ओहदे को कैसे निजी मिल्कियत में बदल कर अपनों के लिए सत्ता का इंतजाम करते हैं। सालों साल उनकी संपत्ति दोगुनी, चौगुनी होती जाती है लेकिन कोई पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता। हर दिशा में देश की प्रगति के बावजूद अगर देश में गरीबों की संख्या बढ़ रही है, आर्थिक विषमता की खाई चौड़ी होती जा रही है तो इसके पीछे देश के यही नव जमींदार जिम्मेदार हैं। देश ने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति जरूर पाई लेकिन हमारी स्वतंत्रता लोकतंत्र के इन तथाकथित लंबरदारों के पास रेहन रख दी गई है। देश का यही दर्द आज अन्ना हजारे के रूप में प्रतिबिंबित हो रहा है और समाज के तमाम वर्ग एक-एक कर इस गांधीवादी नेता के साथ एकाकार होते जाएंगे इसमें शक नहीं होना चाहिए। आंदोलन की ऊष्मा बता रही है कि देश में आज भी गांधी के विचार और उनका सत्याग्रह संघर्ष का हथियार उतना ही प्रासंगिक और बलशाली है। संवैधानिक व्यवस्था और तकनीकी पहलुओं के नाम पर अन्ना की मांगों को खारिज करने की कोशिशों पर हंसी आती है। अन्ना के साथ आज पूरा देश इसीलिए तो खड़ा हो गया है कि लोकतंत्र के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था के चीथड़े उड़ाने वालों का हिसाब किताब हो। इसमें रोड़ा अटकाने वालों को जनता दंडित करेगी।
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