भारत की अभी तक की सबसे बड़ी जनगणना के प्रारंभिक परिणाम सामने आए हैं। इसके अनुसार, भारत की जनसंख्या 121 करोड़ आंकी गई है, जिसमें से 51.5 प्रतिशत पुरुष और 48.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। पिछली शताब्दी में 1911 से 1921 के कालखंड को यदि छोड़ दिया जाए तो जनसंख्या की बढ़ने की दर लगातार पहले से अधिक ही होती रही है, लेकिन इस बार के जनगणना के परिणाम यह बताते हैं कि अब यह पहले से काफी कम हुई है। 1991 से 2001 के कालखंड में जहां जनसंख्या वृद्धि दर 21.5 प्रतिशत थी, वह घटकर अब 17.6 प्रतिशत रह गई है। पुरुषों में यह वृद्धि महिलाओं की अपेक्षा कम है। वास्तव में पिछले दशक में जनसंख्या में 18.1 करोड़ लोग ही शामिल हुए, जबकि पिछले दशक में यह वृद्धि 18.3 करोड़ की रही थी यानी प्रतिशत ही नहीं, संख्यात्मक रूप से भी जनसंख्या में वृद्धि कम रही। अधिकतर ऐसे प्रांत जहां ज्यादा जनसंख्या बसती है, वहां जनसंख्या वृद्धि दर पहले से कम हुई है। इससे पूर्व के दर्शक में केवल 15 राज्यों में ही जनसंख्या वृद्धि दो प्रतिशत से कम थी। अब 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह दो प्रतिशत से कम है। 15 राज्यों में तो जनसंख्या वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत से भी कम है। चिंता का विषय स्वाभाविक ही है कि जनसंख्या वृद्धि दर के कारण छह वर्ष से कम आयु के बच्चे 2001 की तुलना में 50 लाख कम हैं और इस कारण से छह वर्ष से कम आयु के बच्चों की जनसंख्या में वृद्धि दर ऋणात्मक रही। लेकिन इस आयु वर्ग में चिंता का विषय यह है कि पूर्व में जहां 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में प्रति हजार लड़कों की तुलना में 927 लड़कियां होती थीं, वह घटकर अब 914 रह गई हैं, लेकिन साथ ही साथ यह भी देखने में आया है कि कुल जनसंख्या में स्त्री-पुरुष अनुपात 2001 में 933 से बढ़कर 2011 में 940 तक पहुंच गया है। उधर जनसंख्या की गुणवत्ता में खासी वृद्धि देखने को मिल रही है। जहां 2001 में साक्षरता अनुपात 65 प्रतिशत ही था, 2011 में वह बढ़कर 74 प्रतिशत पहुंच चुका है और खास बात यह है कि साक्षरता दर में वृद्धि पुरुषों में मात्र 32 प्रतिशत और महिलाओं में 49 प्रतिशत है। बेहतर हुआ है स्त्री-पुरुष अनुपात 2011 में हुई जनगणना का यह परिणाम मात्र कुछ आंकड़े नहीं हैं। यह उभरते भारत का एक चित्र भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हालांकि 0-6 आयु वर्ग में लड़कियों का अनुपात पहले से घटा है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि कुल मिलाकर जनसंख्या वृद्धि दर में भी खासी कमी आई है। ऐसे में लड़कियों के अनुपात में कमी देश में लड़कों के जन्म और लालन-पालन के प्रति अधिक झुकाव तो प्रदर्शित करता है, लेकिन साथ ही साथ कुल स्त्री-पुरुष अनुपात में वृद्धि महिलाओं पहले से बेहतर स्थिति की ओर भी इंगित करता है। आज स्त्री-पुरुष अनुपात 1971 की जनगणना से लेकर अधिकतम आंका गया है। एक समय था जब कई राज्यों में स्त्री-पुरुष अनुपात लगातार घट रहा था, लेकिन अब ऐसा देखने को मिल रहा है कि यह अनुपात उनमें से कई राज्यों में बढ़ा है। इस प्रकार से स्त्री-पुरुष अनुपात के बदलते परिदृश्य के मदद्ेनजर ऐसा माना जा सकता है कि इस हेतु सरकार द्वारा पिछले तीन-चार वर्षो में उठाए गए कदमों और सामाजिक जागरूकता का लाभ अब दिखने लगा है। कुछ और समय के बाद हम पुन: स्त्री-पुरुष अनुपात में संतुलन प्राप्त कर लेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। अधिक साक्षर हुआ भारत हालांकि ये परिणाम अत्यंत प्रारंभिक परिणाम हैं, लेकिन साक्षरता दर में भारी वृद्धि का संकेत उत्साहवर्द्धक है। यह तो सभी जानते ही हैं कि भारत में किसी भी देश की तुलना में 15-35 वर्ष की आयु के अधिकतम लोग रहते हैं यानी भारत दुनिया का सबसे युवा देश माना जाता है। ऐसे में जनसंख्या की गुणवत्ता देश के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आज भारत आर्थिक शक्ति के संदर्भ में दुनिया का तीसरा सर्वाधिक ताकतवर देश बन चुका है। भारत को और अधिक शक्तिशाली बनाने में देश की जनसंख्या की बेहतर गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। ऐसे में साक्षरता दर में 9 प्रतिशत बिंदु की वृद्धि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाएगी। ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले एक दशक से चल रहे सर्वशिक्षा अभियान के लाभ साक्षरता दर में वृद्धि के रूप में अब प्राप्त हो रहे हैं। पिछले वर्ष से लागू शिक्षा के अधिकार कानून के माध्यम से यह साक्षरता और अधिक बढ़ेगी और उसके माध्यम से देश की आर्थिक विकास में भारी वृद्धि अपेक्षित की जा सकती है। महिलाओं की साक्षरता हुई बेहतर दूसरी ओर यह बात भी महत्वपूर्ण है कि हमारे देश में साक्षरता की दृष्टि से महिलाएं पुरुषों से पिछड़ती रही हैं। यही नहीं, हालांकि महिलाओं की साक्षरता दर पहले से बेहतर होती रही है, लेकिन इस वर्ष की जनगणना के परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि अब महिलाओं और पुरुषों की साक्षरता दर में अंतर पहले से काफी कम हुआ है, क्योंकि महिलाओं की साक्षरता दर में वृद्धि पुरुषों की तुलना में खासी अधिक रही है। वर्ष 2011 में पुरुषों में साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत है तो महिलाओं में यह 65.5 प्रतिशत है, जबकि 2001 में यह प्रतिशत पुरुषों और महिलाओं में क्रमश: 75.3 और 53.7 प्रतिशत था यानी पूर्व में जो अंतर लगभग 22.6 प्रतिशत का था, अब घटकर 17.6 प्रतिशत ही रह गया है। महिलाओं की स्थिति में बेहतरी का यह एक अन्य प्रमाण है। क्षेत्रीय असमानता भी हुई कम जनगणना के यह परिणाम अत्यंत प्रारंभिक ही हैं, लेकिन मानव विकास के संबंध में क्षेत्रीय असमानताओं में कमी और पिछड़े राज्यों के बेहतर परिणामों की ओर भी कुछ हद तक इंगित करते हैं। उदाहरण के लिए 2001 में केवल 15 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में जनसंख्या वृद्धि दर 2 प्रतिशत से कम थी, जबकि अब यह 25 प्रांतों में 2 प्रतिशत से कम है यानी पूर्व में बड़ी संख्या में प्रांत जनसंख्या वृद्धि दर के हिसाब से पिछड़े थे, अब ऐसा कम प्रांतों में रह गया है। 6 प्रमुख राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को छोड़कर शेष 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में स्त्री-पुरुष अनुपात बढ़ा है। पूर्व में बदनाम राज्यों जैसे पंजाब और हरियाणा सहित सात राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में छह वर्ष से कम आयु के बच्चों में लड़कियों का अनुपात पहले से बेहतर हुआ है। यही नहीं, साक्षरता की दृष्टि से भी पूर्व में अच्छा प्रदर्शन न करने वाले राज्यों जैसे- बिहार, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा इत्यादि के परिणाम भी पहले से बेहतर हैं। उदाहरण के लिए बिहार में जहां 2001 में साक्षरता दर मात्र 47 प्रतिशत थी, वहीं 2011 में बढ़कर 64 प्रतिशत हो गई है। झारखंड में यह 53.6 प्रतिशत से बढ़कर 67.6 प्रतिशत हो गई है। अन्य प्रांत भी- जिनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम है- में छह प्रतिशत से 24 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस प्रकार वर्तमान जनसंख्या के परिणाम उत्साहवर्द्धक हैं, क्योंकि वे हमारी महिला जनसंख्या जो शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से वंचित मानी जाती रही है, उसमें बेहतरी की ओर इंगित कर रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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