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Thursday, April 28, 2011
Monday, April 25, 2011
न्यायपालिका की भी हो सकती है निगरानी
लोकपाल के गठन की कवायद और अन्य मसलों पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी….
पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ न्यायविद राम जेठमलानी अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं। वह अन्ना हजारे के आंदोलन पर उठ रहे सवालों को फिजूल तो बताते ही हैं, मसौदा समिति पर किए जा रहे हमलों से भी नाखुश हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में तो उन्होंने अपनी ही पार्टी भाजपा को गलत ठहरा दिया। पेश हैं दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता मुकेश केजरीवाल से उनकी लंबी बातचीत के प्रमुख अंश- लोकपाल के लिए बनी साझा समिति की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई है। क्या आप ऐसी व्यवस्था से सहमत हैं? इसमें क्या समस्या है? जानकार या ईमानदार व्यक्ति क्या सिर्फ सरकारी तंत्र में ही हो सकते हैं? कानून का साधारण जानकार भी बता सकता है कि इस देश में कितने पुराने और अव्यवहारिक कानून चल रहे हैं? इस देश में 50 फीसदी कानूनी झगड़े का कारण कानून की खराब ड्राफ्टिंग है। जितना मैं समझता हूं, इसमें कोई वैधानिक समस्या नहीं। कुछ लोग अन्ना के तरीके को ब्लैकमेल तक बता रहे हैं? भ्रष्ट सरकार से लड़ने के लिए आम आदमी के पास क्या साधन है? या तो हथियार उठाए या फिर जनता की अदालत में जाए। अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन के जरिए दिखाया है कि देश की आम जनता क्या कर सकती है। क्या आपको लगता है कि न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए? प्रधानमंत्री क्या देवता हैं जो उन्हें किसी भी समीक्षा और निगरानी के तहत नहीं लाया जा सकता? बेहद ईमानदार बताए जाने वाले इन्हीं प्रधानमंत्री के बनाए कैबिनेट मंत्री जेल में तशरीफ फरमा रहे हैं। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है, सैद्धांतिक रूप से मैं इसके खिलाफ नहीं हूं। मगर देखना होगा कि लोकपाल के अंदर इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए क्या व्यवस्था हो? यह तो नहीं हो सकता कि देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ किसी भी आरोप की जांच कोई भी करने लगे, लेकिन अगर ईमानदार और सुविचारित व्यवस्था हो तो लोकपाल के तहत न्यायपालिका को भी लाया जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लोकपाल कितना अहम साबित होगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ हम सभी ने एक व्यापक लड़ाई की बात की है। अन्ना हजारे हों या कोई और, जो भी इस तरह का काम कर रहा है, मेरा समर्थन उसके साथ है। लोकपाल तो इस व्यापक लड़ाई का हिस्सा है। हालांकि यह इस लड़ाई का अंतिम लक्ष्य नहीं। जब तक ईमानदारी से कानूनों का पालन नहीं होता, निष्पक्ष जांच नहीं होती, किसी को सजा कैसे मिलेगी? बहुत से लोगों ने साझा समिति में पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण के होने पर भी एतराज जताया है? ऐसे सवाल उठाना बहुत ओछापन है। ये दोनों बाप-बेटे भले हों, लेकिन दोनों अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं। ये दो अलग-अलग लोग हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि आप जैसे बहुत से दूसरे बड़े कानूनविद भी तो हैं.. तो क्या सभी को इसमें शामिल कर लिया जाना चाहिए? काले धन पर आप सरकार पर जो आरोप लगाते रहे हैं उन्हें साबित करने के लिए आपके पास कोई तथ्य हैं? इन आरोपों से जुड़े तथ्य कहीं खोजने की जरूरत नहीं। मगर बड़े गम के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं। ये न तो काले धन को वापस लाना चाहते हैं और न ही चोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना चाहते हैं। मैं बहुत जवाबदेही के साथ कह रहा हूं कि ऐसी भ्रष्ट सरकार आज तक नहीं देखी। लेकिन भ्रष्टाचारी तो सभी पार्टी में हैं.. तो मैंने कब कहा है कि सिर्फ एक पार्टी के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करो। जो भी दोषी है, उसे सजा मिले। विनायक सेन को आपकी सरकार नक्सली बता जेल में डालती है और आप उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ते हैं? मेरी सरकार क्या गलत काम नहीं करती? आप अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं? जी हां। यह बात मैं अच्छी तरह सोच-समझ कर कह रहा हूं। विनायक सेन जैसे आदमी को पकड़ कर आप समझते हैं कि नक्सली समस्या दूर कर लेंगे तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। नक्सली साहित्य तो मेरे पास भी है, डाल दो मुझे भी जेल में। नक्सली समस्या से लड़ना है तो एक योजना बनाओ। गरीबों और आदिवासियों तक ईमानदारी से विकास योजनाओं को पहुंचाओ। नक्सली विचारधारा गलत नहीं। वहां कुछ लोग गलत हो सकते हैं। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। नक्सली तो बंदूक की नोक पर सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं। यह गलत प्रचार है। मुझे नहीं लगता कि विनायक सेन ने सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की बात की है। जो लोग ऐसा कहते हैं, उनको पकडि़ए, मगर यह क्या बात हुई कि उससे हमदर्दी रखने वाले को जेल में सड़ा दो। क्या आपकी पुलिस लोगों के दिलों पर भी पहरा लगा सकती है? कहा जाता है कि आपको नरेंद्र मोदी का मुकदमा लड़ने के बदले राज्यसभा सीट मिली? मैंने गुजरात से तो राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ा था, राजस्थान से लड़ा था। न ही राजनीति में मैं आज आया हूं। इस राज्यसभा में ही मैं पूरे पांच टर्म तक सदस्य रहा हूं। 1985 से इसका सदस्य हूं। और फिर अगर मान लें कि भाजपा को यह लगता है कि उसकी पार्टी में एक वकील भी होना चाहिए तो इसमें किसी को क्या एतराज है? मैं नरेंद्र मोदी का मुकदमा राज्यसभा पहुंचने से पहले से लड़ रहा हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गुजरात के बारे में कांग्रेस ने जानबूझकर एक दुष्प्रचार किया है। गुजरात में दंगे कब भड़के? जब वहां 58 निर्दोष लोगों को आग में जला दिया गया और कांग्रेस ने इसे भी एक दुर्घटना करार देने की कोशिश की। आज सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एसआईटी ने साफ कहा है कि यह एक साजिश थी, जो बड़ी तादाद में निर्दोष लोगों को मारने के लिए रची गई थी। लेकिन आप गोधरा बाद की घटनाओं को कैसे जायज ठहरा सकते हैं? मैं मानता हूं कि जनता ने बहुत जबर्दस्त प्रतिक्रिया की, कुछ अफसरों ने अपना फर्ज पूरा नहीं किया होगा, लेकिन उनके मन में भी गुस्सा था। इसके लिए नरेंद्र मोदी को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मैंने बेस्ट बेकरी के हत्यारों की वकालत नहीं की। मैं इस मामले में तब आया, जब सीधे मुख्यमंत्री को घसीटा जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि गुजरात पुलिस ने हर मामले में चार्जशीट दाखिल की है|
लोकपाल दायरे से बड़ी अदालतों को अलग रखने पर सहमति
लोकपाल बिल पर रविवार को हुई एक कांफ्रेंस में इस बात पर सहमति बनी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बनने वाले कानून से उच्च न्यायपालिका को बाहर रखा जाना चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने पर अलग-अलग राय हैं। सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व प्रधान न्यायाधीश और लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 4 सदस्यों की उपस्थिति में हुई राउंड टेबल बैठक में यह सहमति बनी कि उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के किसी भी मामले से निपटने के लिए एक अलग तंत्र होना चाहिए। सिटिजंस फॉर पब्लिक अकाउंटेबिल्टी (सीपीए) के बैनर तले दिन भर चली कांफ्रेंस के बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया और न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने संवाददाताओं को बताया, न्यायिक जवाबदेही होनी चाहिए, लेकिन यह लोकपाल का एक हिस्सा नहीं होना चाहिए। उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एक बेहतर तंत्र की आवश्यकता है। उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के मामले में आम सहमति होने का दावा करते हुए सेवानिवृत्त न्यायधीशों ने कहा कि लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में नागरिक समाज के प्रतिनिधि भी ऐसा ही महसूस करते हैं। इस बीच प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखे जाने पर उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लोगों की अलग-अलग राय है। उन्होंने कहा, हमें विश्वास है कि वह (प्रधानमंत्री) सिर्फ राज्य में अस्थिरता के लिए और इसके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के लिए जवाबदेह हैं। इस मुद्दे पर विभिन्न राय आईं और हम किसी हल पर नहीं पहुंच सके तथा इस मामले पर संसद को ही निर्णय लेने के लिए छोड़ देना चाहिए। राउंड टेबल कांफ्रेंस में भ्रष्टाचार विरोधी कानून और देश में उसको अमल में लाने के मामले के अलावा सीवीसी, सीबीआइ और लोकपाल के सहज एकीकरण और राज्यों में मजबूत और स्वतंत्र लोकायुक्त के निर्माण पर भी चर्चा हुई। कांफ्रेंस में जस्टिस वेंकटचलैया और जस्टिस जेएस वर्मा के अतिरिक्त सरकार की मसौदा समिति के सदस्य, कर्नाटक लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रख्यात वकील शांति भूषण, उनके बेटे प्रशांत भूषण, आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति, पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा और कुछ प्रख्यात न्यायविद भी मौजूद थे।
मतदाताओं की लम्बी कतारों के संकेत
विधानसभा चुनावों एवं जम्मू-कश्मीर के स्थानीय चुनावों में मतदाताओं की लम्बी कतारों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। तमिलनाडु में 1967 के बाद सबसे ज्यादा करीब 79 प्रतिशत मतदान हुआ है। '67 में 75.67 प्रतिशत मतदान हुआ था। केरल में 75 प्रतिशत से ज्यादा, असम में करीब 76 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 84 प्रतिशत एवं दूसरे चरण में 85 प्रतिशत से भी अधिक तथा पुडुचेरी में करीब 86 प्रतिशत मतदान हुआ है। तमिलनाडु के करूर जिले में 86 प्रतिशत से ज्यादा तो केरल के कोझिकोड में 81.30 प्रतिशत एवं असम के धुबरी में 85.65 प्रतिशत मतदान हुआ। हालांकि इन राज्यों के पिछले विधानसभा चुनाव में भी रिकॉर्ड मतदान हुआ था। असम में 75.72 प्रतिशत, केरल में 72.38 प्रतिशत, तमिलनाडु में 70.82 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल में 81.97 प्रतिशत मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाया था किंतु इस बार मतदाताओं की संख्या उससे ज्यादा होना काफी महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में 10 सालों के बाद हो रहे स्थानीय चुनावों के दो चरणों में क्रमश: 77 एवं 81.2 प्रतिशत मतदान होना असाधारण है। पिछले लोकसभा चुनाव से अगर तुलना करें तो पहली नजर में ये आंकड़े विश्वसनीय ही नहीं लगेंगे। लोकसभा चुनाव में औसत मतदान 58 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा था। यानी 17 से 22 प्रतिशत का अंतर। जम्मू-कश्मीर के 2008 के विधानसभा चुनाव में करीब 50 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो दो चरणों का औसत 29 प्रतिशत ज्यादा है। हिंसाग्रस्त और सीमापार से राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की तमाम कोशिशों के बीच इतना भारी मतदान पूरी दुनिया के लिए आश्र्चयजनक है। तीन प्रश्नों को आधार बनाकर हम इसका निहितार्थ समझ सकते हैं। पहला-ऐसा क्यों हुआ? दूसरा-इसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि क्या है? और तीसरा- संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीति की दृष्टि से यह किस बात का संकेतक है? गहराई से देखें तो ये तीनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हैं, क्यों हुआ-का उत्तर चुनाव आयोग ने एक समान दिया है। मलसन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओें ने अच्छा काम किया, लोगों तक जाकर वे उन्हें मतदान का महत्व समझा पाए, युवाओं ने भारी संख्या में मतदान किया, चुनाव आयोग के लोकजागरण अभियान का असर हुआ एवं उसकी सख्ती, धन जब्त करने आदि से चुनाव का माहौल बना। पहले मतदाताओं को मतदान केंद्र तक आने के लिए प्रेरित करने के पीछे केवल राजनीतिक पार्टियों की भूमिका होती थी; अब चुनाव आयोग के एजेंट भी यह भूमिका निभा रहे हैं और अनेक मीडिया तथा गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठन भी। 2006 के बाद जुड़े युवा मतदाताओं ने जिनकी संख्या 15 से 20 प्रतिशत है, मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह दिखाया है। लगभग 40 प्रतिशत मतदाता 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। युवाओं में मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह है क्या नई पीढ़ी में संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीतिक पण्राली के प्रति गहरी आस्था है जिससे प्रेरित होकर वे मतदान कर रहे हैं? एक निष्कर्ष यह है कि वे शासन को लेकर अपनी पूर्व पीढ़ी से ज्यादा जागरूक हैं। मतदान केंद्रों की कतार पर खड़े युवाओं से प्रश्न करने पर वे यह तो कहते हैं कि 'हम अपने अधिकार का उपयोग करना चाहते हैं और हमारे सामने भाग्य का फैसला करने का यह सबसे बड़ा हथियार है' किंतु इसके बारे में बहुत स्पष्ट राजनीतिक विचार सुनने को नहीं मिलता। सच कहें तो एक सामूहिक कारण या सोच की एक प्रवृत्ति ढूंढनी मुश्किल है। कश्मीर में यह लोकतांत्रिक पण्राली के प्रति विश्वास का संकेत माना जा सकता है, किंतु यह विश्लेषण भी स्थानीय चुनाव की मूल प्रवृत्तियों का सरलीकरण होगा। वास्तव में भारी मतदान भारतीय समाज के ऐसे जटिल सामूहिक मनोविज्ञान की परिणति है, जिसकी हम अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर सकते हैं। चुनाव शास्त्र की सामान्य धारणा के अनुसार मतदाताओं की संख्या बढ़ना सत्तारूढ़ पार्टी को बनाये रखने का संकेत नहीं माना जाता। इस आधार पर चारों राज्यों में राजनीतिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में पिछले पांच विधानसभा चुनावों में हर बार सत्ता बदली है और उसका मतदाताओं की संख्या बढ़ने से कोई लेना-देना नहीं रहा है। हालांकि विडम्बना देखिए कि '67 में जब रिकॉर्ड मतदान हुआ था तो पहली बार द्रमुक कांग्रेस को पराजित कर सत्ता में पहुंची थी। चुनाव में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब मतदान का प्रतिशत बढ़ा एवं सत्तारूढ़ घटक ही शासन में वापस आया। बिहार विधानसभा चुनाव इसका ज्वलंत उदाहरण है। जब मतदान की संख्या में कमी आने की प्रवृत्ति या सामान्यत: कम मतदान की परम्परा का अंत हो जाए तो मतदान प्रतिशत के आधार पर राजनीतिक आकलन कठिन हो जाता है। यही हमारे यहां हो रहा है। बावजूद इसके, इस समय तमिलनाडु से लेकर केरल एवं पश्चिम बंगाल में बदलाव की प्रवृत्ति महसूस की जा रही है। हालांकि असम में बदलाव की ऐसी आक्रामक सामूहिक प्रतिध्वनि नहीं सुनाई पड़ी है, जैसी इन तीन राज्यों में। इसलिए वहां की तस्वीर थोड़ी धुंधली है। भारी मतदान का एक राजनीतिक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि परिणाम निर्णायक आएगा। इस परिणाम का असर संप्रग के आंतरिक समीकरण पर पड़ना निश्चित है। कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु में द्रमुक के तथा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के छोटे साझेदार के तौर पर चुनाव मैदान में है। इन दोनों के कुल 37 सांसद संप्रग सरकार की रीढ़ हैं। तृणमूल कांग्रेस 19 सांसदों के साथ कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी तथा द्रमुक 18 सांसदों के साथ तीसरे स्थान पर है। द्रमुक की पराजय का अर्थ मोलतोल में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना तथा तृणमूल की शक्ति बढ़ने का अर्थ इसके विपरीत है। कुल मिलाकर ऐसा परिणाम केंद्र सरकार की स्थिरता सुनिश्चित करने वाला होगा। केरल में यदि कांग्रेस वाममोर्चा को पराजित कर शासन में वापसी करती है एवं असम में कुर्सी बनाए रखती है तो इससे कांग्रेस के अंदर आत्मविश्वास बढ़ेगा। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही हैं किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता की सोच की अभिव्यक्ति माना जाता है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था कह दिया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जैसा माहौल कुछ संगठनों, राजनीतिक दलों एवं मीडिया की कृपा से बना है, सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के विरुद्ध जैसी वितृष्णा पैदा करने की कोशिश की गई है, उसका असर मतदाताओं पर पड़ा है। यानी भारी मतदान के पीछे राज्य से असंतोष का भाव भी प्रमुख कारण है। लेकिन किसी एक से नाराजगी के बावजूद समर्थन का विकल्प सीमित है। इसलिए जिस किसी को जीत मिले उसका यह अर्थ नहीं कि जनता की नजर में वह उपयुक्त विकल्प है। मतदान का ऐसा अर्थ व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता को नकारना होगा। शहरी मध्यम वर्ग में मतदान को लेकर अरुचि की प्रवृत्ति के विपरीत अर्धशहरी एवं ग्रामीण इलाकों में मतदान में गहरी रुचि दिखी है। उदाहरण के लिए चेन्नई में 69.02 प्रतिशत, असम के कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले में (जिसमें गुवाहाटी भी है) 64.70 प्रतिशत तथा केरल के तिरुवअनंतपुरम में 68.30 प्रतिशत मतदान हुआ है। 2006 में भी इन जगहों पर क्रमश: 65 प्रतिशत, 56.4 एवं 64 प्रतिशत मतदान हुआ था। यानी असंतोष एवं परिवर्तन की चाहत अर्धशहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है। यह ऐसा गम्भीर पहलू है जिसे गहराई से समझने की जरूरत है। फिर चुनाव आयोग की अत्यधिक भूमिका लोकतंत्र के भविष्य की दृष्टि से अच्छा संकेत नहीं है। आयोग द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने की भूमिका तो समझ में आती है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों का लोगों तक मतदाता पर्ची पहुंचाना स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। मतदाताओं तक पर्ची लेकर जाना राजनीतिक दलों की भूमिका होनी चाहिए। मतदाताओं की संख्या चाहे जितनी बढ़ जाए लेकिन चुनाव प्रक्रिया से राजनीतिक दलों एवं आम जनता की भूमिका कम होना तथा चुनाव आयोग जैसी नौकरशाही एवं सरकारी कर्मचारियों की वाली संस्था का एकाधिकार लोकतंत्र की मूल भावना के ही विपरीत है। वास्तव में मतदाताओं की लम्बी कतारों की जितनी सरल और सामान्य व्याख्या की जा रही है उससे समग्र वस्तुस्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही है किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता के सोच की अभिव्यक्ति मानी जाती है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था, कह दिया है.
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