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Wednesday, June 29, 2011

भुखमरी मिटाने का बड़ा कदम


यदि खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पास हो जाता है तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा। इस कानून से गरीब के आंसू पोंछने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। उम्मीद है कि जब यह विधेयक अगले सत्र में सरकार संसद में लाएगी तो उसे सभी दलों का समर्थन प्राप्त होगा। मैं इस विधेयक को नरेगा से भी दो कदम आगे मानता हूं। इसमें इस बात की गारंटी होगी कि भारत में अब कोई भूख से नहीं मरेगा। नरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल दो ऐसे कानून हैं जिन्होंने भारत के गांवों की तरफ ध्यान दिया है। देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहरों में सुविधाएं बढ़ती जाती हैं, लेकिन गांवों में लोग उसी मुसीबत में रहते हैं। इसीलिए गांव से लाखों लोग हर साल शहरों की ओर बसने के लिए भाग रहे हैं। नरेगा ने लोगों को वापस गांव की ओर मोड़ा है। पंजाब के तमाम बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों और धनी किसानों को इस बात की शिकायत है कि उन्हें बिहार से मजदूर नहीं मिल रहे हैं। पिछले दिनों ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में पंजाब के सांसदों ने नरेगा पर अपना गुस्सा उतारा। उनका कहना था कि पंजाब में विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही है, क्योंकि नरेगा की वजह से बिहार व पूर्वी उत्तरी प्रदेश से मजदूर नहीं मिल रहे हैं, इसलिए इस योजना को खत्म करना चाहिए। मुझे यह बात सुनकर हंसी आ गई। मैंने उनसे कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि लोगों को अपने गांव में रोजगार मिल रहा है और वे आपके यहां नहीं आ रहे हैं। आप के राज्य केलोग अपना काम खुद क्यों नहीं करते हैं? एक बड़े रियल इस्टेट ग्रुप के एक डायरेक्टर ने पिछले दिनों मुझे बताया कि नरेगा की वजह से उनकी तमाम योजनाएं धीमी पड़ी हैं, क्योंकि गांवों से मजदूर नहीं आ रहे हैं। मुझे याद है कि जब सोनिया गांधी नरेगा योजना तैयार करवा रही थीं तो तमाम लोगों ने तरह-तरह की आलोचना की थी। अफसरों का कहना था कि इसमें बहुत पैसा बर्बाद हो जाएगा और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा। मगर उन्होंने कुछ न सुनी और इसे लागू करवाया। हो सकता है तमाम जगह इसे लागू करने में कुछ गड़बडि़यां हो रही हों, लेकिन यदि ज्यादातर जगह इसका फायदा गांव के लोगों को रोजगार के जरिए मिल रहा है तो मैं इसे योजना की सफलता ही मानता हूं। अब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने खाद्य सुरक्षा बिल का प्रस्ताव सरकार को भेजा है, जिसमें देश की 75 प्रतिशत जनता को सस्ता अनाज देने की योजना है। इसका सबसे ज्यादा फायदा गांव के लोगों को होगा और 28 प्रतिशत शहरों में रहने वाले गरीब परिवारों को लाभ मिलेगा। इस प्रस्ताव का सरकारी अफसर विरोध कर रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्री भी इसके पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि इतने कम दामों पर अनाज देने से देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, मगर सोनिया गांधी अड़ी हुई हैं। प्रस्ताव के मुताबिक गांव और शहरों के गरीब परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो गेहूं, 3 रुपये प्रति किलो चावल और एक रुपये प्रति किलो बाजरा देने का प्रस्ताव है। बेसहारा और बेघर लोगों को भी भूखे पेट सोने से बचाने के लिए साथ में एक योजना बनाई गई है। सस्ते अनाज का खर्च सरकार को अपनी जेब से देना पड़ेगा। सरकार जो अनाज ज्यादा दामों पर किसानों से खरीदती है उसे कम दामों पर इन परिवारों को राशन व अन्य सरकारी दुकानों के जरिए देना होगा। हर परिवार को 25 से 35 किलो अनाज हर महीने दिया जाएगा। राशन व सरकारी दुकान वाले घपला न करें, इसका प्रवाधान भी कानून में डाला जा रहा है और ऐसे लोगों को कड़ी सजा देने का इंतजाम किया जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह एक क्रांतिकारी योजना है और एक बार लागू होने के बाद केंद्र में किसी भी पार्टी की सरकार आए, उसे इस पर अमल करना होगा। लागू होने के बाद इसे वापस लेने का साहस कोई सरकार नहीं कर सकती है। इसके साथ ही एक जरूरी काम यह होगा कि खाने-पीने की चीजों की बर्बादी रोकी जाए। एक सर्वे के मुताबिक लाखों टन खाना हर साल इस देश में बर्बाद कर दिया जाता है। देश के हर नागरिक को अब खाना बचाना होगा। उसे अपनी थाली या प्लेट में उतना ही खाना लेना होगा जितना वह खा सके और बरबाद न करे। पार्टियों और दावतों में लोगों को उतना ही खाना बनाना चाहिए जो खत्म हो सके। मैंने तो सरकार से मांग की है कि पार्टियों में अनाप-शनाप चीजें परोसने के बजाय सिर्फ 5 या 6 किस्म के व्यंजन परोसने की इजाजत दी जाए और इसके लिए कानून बनाया जाए। पाकिस्तान में सरकार ने सिर्फ एक व्यंजन परोसने की इजाजत पार्टियों में दे रखी है। शादी-विवाह ही नहीं, होटलों और रेस्टोरेंट में भी बहुत खाना बरबाद हो रहा है। यदि हम इस बर्बादी पर काबू पा लें तो इस देश में न तो खाने का सामान विदेश से मंगाना पड़ेगा और न ही खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी और खाद्य सुरक्षा कानून सफलता से लागू हो जाएगा। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)


Wednesday, June 15, 2011

लोकतंत्र में सिविल सोसाइटी



लेखक  शासन व्यवस्था पर सिविल सोसाइटी यानी नागरिक समाज के नैतिक नियंत्रण के विचार का विश्लेषण कर रहे हैं…
इन दिनों नागरिक समाज की जमकर चर्चा हो रही है। थॉमस हॉब्स ने अपनी अमर पुस्तक लेवियाथन में लिखा सिविल सोसाइटी और सरकार अथवा सार्वभौम के बीच अनुबंध हो जाने के बाद नागरिकों के सारे अधिकार समाप्त हो जाते है। हॉब्स का मानना था कि प्राकृतिक अवस्था को सिविल सोसाइटी में बदलने की जरूरत है। इसमें व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक मजबूत सार्वभौम की जरूरत है। अपनी सुरक्षा के बदले में नागरिक अपने अधिकारों को समर्पित करता है। केवल एक स्थिति में हॉब्स ने किसी व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने की छूट दी है-यदि किसी की जान को राज्य से ही खतरा हो तो वह विद्रोह कर सकता है। जॉन लॉक ने सिविल सोसाइटी की महत्तर भूमिका पर बल देते लिखा है कि सार्वभौम की सत्ता पर नागरिक समाज का नियंत्रण होना चाहिए जो उसे शक्ति प्रदान करता है। हीगेल का मत था कि समाज के विकास में तीन चरण होते हैं-परिवार, सिविल सोसाइटी एवं राज्य। परिवार परमार्थ की भावना पर आधारित संस्था है, जिसमें एक-दूसरे का ख्याल रखा जाता है, परंतु यह परमार्थ बहुत सीमित संदर्भ में होता है। दूसरा चरण है सिविल सोसाइटी जो ज्यादा व्यापक होता है, किंतु इसमें अलग-अलग वर्गो एवं गुटों के हितों का टकराव होता है, जिसे रोकने के लिए राज्य की जरूरत होती है। इसलिए हीगेल की दृष्टि में राज्य आदर्श स्थिति है। मा‌र्क्स ने नागरिक समाज एवं राज्य, दोनों को अपूर्ण माना। आज अपने देश में नागरिक समाज की भूमिका को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि कानून बनाने में उसके प्रतिनिधि की क्या भूमिका हो सकती है, जबकि देश में उसके लिए निर्वाचित विधायिका है। जन लोकपाल विधेयक प्रारूप समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सिविल सोसायटी के कुछ वर्गो ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाया है। यह सही है कि संवैधानिक योजना के तहत कानून बनाने की प्रक्रिया में नागरिक समाज की सीधी भागीदारी नहीं है। यदि जरूरत महसूस हो तो संसदीय समितियां विभिन्न वर्गो के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श कर सकती हैं। कुछ देशों में नागरिक समाज की सीधी सहभागिता का कानूनी प्रावधान है। स्विट्जरलैंड में लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए तीन संस्थाएं हैं-प्रारंभिक प्रयास (इनिशिएटिव), जनमत संग्रह एवं प्रतिनिधि वापस बलाने का अधिकार। प्रारंभिक प्रयास के अंतरगत नागरिक कोई कानून बनाने लिए स्वयं कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। इसके लिए जनसंख्या का एक खास प्रतिशत हस्ताक्षर कर यह प्रक्रिया शुरू कर सकता है। जनमत संग्रह के तहत किसी खास कानून या मुद्दे पर जनता की राय ली जाती है। इसके साथ ही जनता को प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार है। ऐसा कोई प्रावधान भारतीय संविधान में नहीं है, किंतु यहां सिविल सोसाइटी की अहम् भूमिका रही है, हालांकि उसको लेकर विवाद भी शुरू से रहा है। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो रवींद्र नाथ टैगोर ने इसका विरोध किया कि इससे अराजकता फैलेगी। गांधीजी टैगोर को समझाने शांति निकेतन गए, किंतु वह गांधीजी के विचार से सहमत नहीं हो पाए। उनका मानना था कि इसके बजाय शिक्षा का प्रसार होना चाहिए। कांग्रेस के नेता एवं पटना के मशहूर बैरिस्टर हसन इमाम भी असहयोग के विरुद्ध थे। उन्हें समझाने भी गांधीजी पटना गए, किंतु उन्होंने भी गांधीजी के तर्को को नहीं माना। एनी बेसेंट ने तो सविनय अवज्ञा का खुलकर विरोध किया था। गांधीजी नागरिक समाज के बहुत बड़े समर्थक थे और सरकार के ऊपर उसका नैतिक नियंत्रण बनाए रखने के पक्षधर थे। अंबेडकर ने संविधान सभा में असहयोग एवं सविनय अवज्ञा के तरीकों को खारिज कर दिया कि स्वाधीन भारत में अपनी ही सरकार के विरुद्ध इसके इस्तेमाल की जरूरत नहीं है, किंतु इस विचार से सहमत होना मुश्किल है, क्योंकि अपनी सरकार के विरुद्ध भी आंदोलन होते हैं। ह्यूम ने सवाल उठाया था कि किसी लोकतंत्र में कानूनों के पीछे जो बल होता है वह है आम आदमी का मत, परंतु क्या आम आदमी कानून बनाता है? इसलिए किसी ने कहा था कि लोकतंत्र हर मतदाता को अपने ऊपर अत्याचार करने का अवसर देता है। लोकतंत्र में नागरिक समाज की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। जयप्रकाश आंदोलन स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा जनांदोलन था। आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चल रहे हैं और कानून बनाने पर अत्यधिक जोर है, परंतु नागरिक समाज को कानून बनाने के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनचेतना फैलाने का काम करना चाहिए। अमेरिका के प्रसिद्ध जज हैंड ने कहा था, मैं अक्सर हैरान होता हूं कि क्या हम अपनी उम्मीदें बहुत ज्यादा संविधान पर, कानूनों पर एवं अदालतों पर तो नहीं टिकाते? ये झूठी आशाएं हैं। स्वतंत्रता स्ति्रयों एवं पुरुषों के दिलों में निवास करती है, जब यह मर जाती है, कोई संविधान, कानून, अदालत इसे बचा नहीं सकती। जब तक यह वहां रहती है, इसे किसी संविधान, किसी कानून, किसी अदालत की जरूरत नहीं है अपनी रक्षा के लिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



गंगा के लिए 68 दिन अनशन करने वाले संत ने दम तोड़ा


गंगा रक्षा की मांग को लेकर लंबे समय तक अनशन करने वाले संत स्वामी निगमानंद की जीवनलीला समाप्त हो गई। मात्र 34 वर्ष के निगमानंद 19 फरवरी से अनशन पर थे। वह मातृसदन से जुड़े थे। अनशन के 68 वें दिन 27 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़ने पर प्रशासन ने उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया। स्थिति गंभीर होने पर उन्हें दो मई को हिमालयन इंस्टीटयूट जौलीग्रांट अस्पताल रेफर कर दिया गया। यह वही अस्पताल है जहां बाबा रामदेव भर्ती किए गए और उस दौरान देश भर का मीडिया उनकी सेहत का हाल जानने में जुटा रहा, लेकिन कोमा की हालत में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे निगमानंद की किसी ने खबर नहीं ली और रविवार की रात उनकी मौत हो गई। इसके कुछ ही घंटे पहले बाबा रामदेव ने अपना अनशन तोड़ा था। स्वामी निगमानंद का अनशन न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ था, जिसमें एक स्टोन क्रेशर की याचिका का संज्ञान लेते हुए खनन और क्रशिंग कार्य पर स्टे आर्डर दिया गया था। वेद-पुराणों के ज्ञाता निगमानंद ने इसके पहले 2001 में देहरादून के गांधी पार्क में भ्रष्टाचार को लेकर 73 दिन का अनशन किया। उन्होंने 2008 में भी 68 दिन का अनशन किया था। लोहारीनागपाला जल विद्युत परियोजना को रद करने की मांग को लेकर प्रो.जीडी अग्रवाल के अनशन के दौरान भी वह सक्रिय रहे। हरिद्वार के संतों ने निगमानंद के निधन को अपूरणीय क्षति बताया है। निगमानंद का शव तीन दिन तक दर्शनार्थ मातृसदन में रहेगा। निगमानंद के अवसान से व्यथित मातृसदन के अध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती ने तप के बल पर प्राण त्यागने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि सरकार, प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है। गंगा बलिदान मांग रही है और मैं यह बलिदान दूंगा। उन्होंने निगमानंद का पोस्टमार्टम एम्स के डाक्टरों से कराने की मांग की है और आरोप लगाया कि राज्य सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर इस युवा संन्यासी को जहर देकर मारा गया।


59 साल से लड़ रहे मुआवजे की जंग


उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल को 59 साल अपनी जमीन देने वाले हाजी अमीर अहमद और उनके जैसे 35 अन्य किसान जवानी से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए। कुछ तो दुनिया से ही कूच कर गए, लेकिन किसी को भी न तो जमीन का मुआवजा मिला और न जमीन। किसान इस बेहद लंबे संघर्ष में थक चुके हैं,लेकिन हार नहीं मानी है। अपनी मांग के लिए वे आज भी सरकार से लड़ रहे हैं। किसानों के मुआवजे का यह मामला जिले की सबसे पुरानी चीनी मिल से जुड़ा है। 1931 के आसपास स्थापित केसर चीनी मिल का 1952 में विस्तार हुआ। किसानों की 52 बीघे जमीन का अधिग्रहण हुआ। तब अमीर अहमद के वालिद अब्दुल मजीद के समझाने पर किसानों ने जमीन दे दी, क्योंकि उन्हें यहां मिल लगने से कस्बे का हित दिखा। चीनी मिल प्रशासन ने आश्वस्त किया था किसानों से ली गई जमीन पर अस्पताल और स्कूल बनाएंगे। उस समय जमीन का मुआवजा आने के हिसाब मिलता था। 52 बीघा जमीन का एक हजार कुछ रु. का था। तब कलेक्ट्रेट में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी का काम एडीएम देखा करते थे। अमीर अहमद बताते हैं कि मिल ने जमीन लेने के बाद शर्तो का पालन नहीं किया। शोर मचाने पर 10 साल बाद स्कूल और 30 साल बाद अस्पताल बना। दोनों भवन बनने के बाद भी जमीन बची रह गई। शर्त यह थी कि अगर दो साल में दोनों काम नहीं किये गए तो किसानों को जमीन वापस करना पड़ेगी। बाकी सभी किसानों का कहना है कि शर्तो के उल्लंघन पर हमें हमारी जमीन वापस मिले, क्योंकि हमें मुआवजा भी नहीं मिला है। एग्रीमेंट में यह भी कहा गया था कि स्कूल और अस्पताल के बनने पर अगर जमीन बची तो उसे किसानों को वापस कर दिया जाएगा। अपनी मांग लेकर किसान राजभवन पहुंचे तो राज्यपाल ने मामला शासन को भेज दिया। मुख्य सचिव ने डीएम को कार्रवाई के निर्देश दिए। इसे भी 6-7 माह हो गए। अब यह मामला एसडीएम बहेड़ी के पास लंबित है। उनसे पैमाईश कराकर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। किसान बताते हैं कि एसडीएम के पास जाओ तो वह आज या कल पैमाईश कराने की बात कहकर टरका देते हैं.


केंद्रीय सत्ता का छल


रामलीला मैदान में की गई कार्रवाई को दूरगामी परिणाम की दृष्टि से सरकार की हार मान रहे हैं…

स्वामी रामदेव के सत्याग्रह में भाग लेने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में जमा हुए हजारों निहत्थे और सोए हुए लोगों पर पुलिस द्वारा रात के एक बजे अश्रु गैस और डंडों से की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई अंग्रेजों के शासनकाल की याद दिलाती है। इस कार्रवाई को यदि रावणलीला कहा जा रहा है तो यह ठीक ही है, क्योंकि इसमें सरकार ने जितनी चुस्ती दिखाई उससे आधी अगर उसने विदेशों से काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए दिखाई होती तो सत्याग्रह की नौबत ही न आती। सरकार अपनी इस कार्रवाई के साथ विजय भले मना ले, लेकिन इसे लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में काले दिवस से अधिक की संज्ञा नहीं दी जा सकेगी। सरकार द्वारा की गई इस कार्रवाई से पहले न तो सत्याग्रहियों ने कोई उपद्रव किया था और न ही करने वाले थे। सरकार ने इससे पहले उन सत्याग्रहियों को वहां से चले जाने का कोई आदेश भी नहीं दिया था, जिसके उल्लंघन का उन पर आरोप लगाया जाए। सोए हुए बच्चों, औरतों और मर्दो पर पुलिस ने चढ़ाई करके क्या हासिल किया और अगर स्वामी रामदेव का आरोप सही है कि पुलिस उनकी हत्या करना चाहती थी तो सरकार को उन्हें मरवाकर क्या मिल जाता? इस बल प्रयोग से सरकार की क्षणिक विजय भले ही हो गई हो और दिल्ली में उसकी आंखों का कांटा बन रही भीड़ छंट गई, लेकिन दूरगामी परिणाम की दृष्टि से इसे सरकार की हार ही माना जाएगा। इस कार्रवाई से सरकार ने अपने दोमुंहेपन और छल का सुबूत दिया है। कहां तो एक दिन पहले उसके चार-चार मंत्री दिल्ली हवाई अड्डे पर स्वामी रामदेव का स्वागत कर रहे थे और उनसे पांच सितारा होटल में बातचीत कर रहे थे और कहां अब उन्हें वह रावण दिखाई दे रहे हैं। आखिर बाबा रामदेव और सरकार, दोनों क्या चाहते हैं, भ्रष्टाचार का उन्मूलन ही न। तब सरकार को इसमें आपत्ति क्या है, क्या वह भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं चाहती? क्या वह विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश लाने की इच्छुक नहीं है। यदि है तो वह शांतिपूर्वक सत्याग्रह कर रहे साधारण लोगों पर बलप्रयोग क्यों करती है? वह शायद भूल रही है कि दुनिया में विकिलीक्स जैसी संस्थाएं मौजूद हैं जो स्विस बैंकों में खाते रखने वालों का भंडाफोड़ कर सकती हैं। यदि कल को यह सूची प्रकाशित हो जाए तब सरकार क्या करेगी? क्या तब भी सरकार उन संस्थाओं पर डंडे बरसाएगी और प्रतिबंध लगाएगी या उस सूची को ही गलत मानेगी? कई लोग बाबा रामदेव को सलाह दे रहे हैं कि वह योग सिखाने तक सीमित रहें और राजनीति में न कूदें, लेकिन योग क्या है, यह जानना भी जरूरी है। योग शीर्षासन, सर्वागासन, मयूर आसन जैसे आसनों का नाम ही नहीं है और न ही केवल प्राणायाम, नेती और न्योली आदि मात्र क्रियाएं हैं। योग से शरीर के साथ-साथ मन को भी स्वस्थ बनाया जाता है। यह आध्यात्मिक, बौद्धिक और भौतिक यानि सर्वागीण प्रकार की उन्नति के पवित्र दृष्टिकोण का नाम है। योग की एक परिभाषा है-योगश्चित्तवृत्ति निरोध:। यानी योग से चित्तवृत्तियों का निरोध किया जाता है। मन और इंद्रियों को वश में किया जाता है। दूसरी परिभाषा है-योग: कर्म सुकौशलम। कर्म को कौशलपूर्वक करने का नाम योग है। स्वामी रामदेव यही करना तो सिखा रहे हैं। वे लोगों को वास्तविक योग सिखा रहे हैं। उनकी मानसिक और भौतिक उन्नति के उपाय बता रहे हैं। उन्हें सदाचारी और सच्चरित्र बना रहे हैं। जब उन्हें सलाह देने वाले स्वयं ही नहीं जानते कि योग का असली अर्थ क्या है तो स्वामीजी क्या करें? अगर स्वामी रामदेव के राजनीति में पड़ने की बात को देखें तो यह मत भूलिए कि राजनीति में नीति शब्द शामिल है और नीति का अर्थ केवल पॉलिसी और स्कीम ही नहीं है, बल्कि न्याय, नैतिकता और ईमानदारी भी है। समस्या यह है कि पंथनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले राजनीतिज्ञ वोट के लालच में नैतिकता, सदाचार और सच्चरित्रता पर भी धर्म जो आज मजहब का द्योतक है और सांप्रदायिकता का ठप्पा लगा रहे हैं। इस अर्थ में इस पाखंडपूर्ण पंथनिरपेक्षता के कारण भारत में चरित्र का जितना ह्रास हुआ है उतना किसी और के कारण नहीं। इसने लोगों को धर्म यानी कर्तव्यपरायणता, मानवता और नैतिकता के सच्चे अर्थो से ही दूर कर दिया है। बहुत से लोगों का स्वामी रामदेव की कई बातों से मतभेद हो सकता है, लेकिन इससे नहीं हो सकता कि वह देश से भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं। आज जनसामान्य के लिए भ्रष्टाचार एक सर्वग्रासी राक्षस का रूप ले चुका है, जिसका शिकार सभी हो रहे हैं। स्वामी रामदेव के इस लक्ष्य से भी किसी का मतभेद नहीं हो सकता कि वह विदेशी बैंकों में जमा लाखों करोड़ रुपयों के काले धन को देश के विकास के लिए वापस लाना चाहते हैं। आज भारत आर्थिक दृष्टि से प्रशंसनीय और अभूतपूर्व तरक्की कर रहा है, लेकिन फिर भी उसे दुनिया के भ्रष्टतम देशों में शुमार किया जाता है। उसकी इस तरक्की का लाभ देश के सबसे निचले और दीनहीन लोगों को नहीं मिल रहा। अगर विदेशों में छुपाए गए इस काले धन को वापस लाया जाएगा तो उससे क्या इन दीन-हीन और वंचित लोगों का भला नहीं होगा? क्या वह देश में सर्वत्र व्याप्त आर्थिक विषमता को दूर करने में सहायक नहीं होगा और देश की एक तिहाई से भी अधिक उस जनसंख्या का उद्धार नहीं करेगा जो आज भी गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में रह रहे हैं? सरकार असली समस्या को हल करने की बजाय स्वामी रामदेव पर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंट होने का आरोप लगाती है तो कभी भाजपा के एजेंट का। वह उन पर तो अश्रु गैस और डंडे बरसाती है, लेकिन राजधानी आए उन पृथकतावादियों पर नहीं जो देश को खंडित करना चाहते हैं। स्वामी रामदेव संघ के या भाजपा के दूत और राजनीतिज्ञ नहीं हैं। अगर होते तो लाखों की संख्या में विभिन्न धर्मावलंबी और अलग-अलग पार्टियों के लोग उनके समर्थन में न खड़े होते। इसलिए सरकार को उन्हें कुचलने या उनका हौवा खड़ा करने की बजाय जल्दी से जल्दी और पूरी निष्ठा के साथ भ्रष्टाचार की असली समस्या को हल करने के उपाय करने चाहिए। उसे सुशासन देने वाली निष्पक्ष सरकार बनकर दिखाना चाहिए, न कि ऐसी सरकार जो निहत्थे और शांत सत्याग्रहियों पर आंसू गैस और डंडे बरसाने में समस्या का हल देख रही है। (लेखक बीबीसी के पूर्व प्रसारक हैं)