Showing posts with label पृष्ठ संख्या ९. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या ९. Show all posts

Tuesday, July 5, 2011

संसद की सर्वोच्चता की आड़ में


 सबसे पहले सर्वदलीय सम्मेलन के बाद सरकार की ओर से जारी एक पंक्ति के वक्तव्य पर नजर डालिए, सर्वदलीय सम्मेलन इस बात पर सहमत हुआ कि सरकार स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संसद के अगले सत्र में एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल विधेयक लाए। इसमें स्थापित प्रक्रियाओं शब्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका सर्वमान्य अर्थ कानून बनाने में संसद की सर्वोच्चता को हर हाल में बनाए रखना है, लेकिन लोकपाल के गठन को लेकर अन्ना हजारे के अनशन तथा उनके समूह के साथ सरकार की बातचीत के आलोक में विचार करें तो यह आगे की प्रक्रिया में उनकी किसी प्रकार की भूमिका के निषेध की मुखर घोषणा है। सरकार की ओर से पिछले कुछ दिनों से यह तर्क दिया जा रहा था कि गैर-निर्वाचित लोगों का कोई समूह विधेयक के मामले में अपना विचाार नहीं थोप सकता। सरकार और विपक्ष के बीच लोकपाल विधेयक पर गहरे मतभेदों के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति कायम हुई। सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर तलवार खींचने वाली भाजपा ने कहा कि विधेयक के कई मुद्दों पर सरकार के साथ उनके मतभेद हैं, पर सरकार मानसून सत्र में विधेयक लाए और इसे संसद की स्थायी समिति को भेजे। संसद की स्थायी समिति को भेजने का अभिप्राय सामान्यत: संसद की सर्वोच्चता की प्रतिष्ठित करना है। जिन अन्य दलों ने सरकार द्वारा तैयार विधेयक के कई प्रावधानों से असहमति व्यक्त की और अन्ना समूह द्वारा प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया, उन सबकी राय भी यही थी कि कोई बाहरी तत्व यह तय नहीं कर सकता कि संसद कैसा कानून बनाए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन इसके प्रावधानों पर विचार कर इसका एक सर्वसम्मत रूप तैयार करने की जगह संसद बनाम तथाकथित नागरिक समाज में संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की सर्वसम्मति वाली बैठक में परिणत हो गई। संसद की सर्वोच्चता वास्तव में राजनीतिक प्रतिष्ठान की ही सर्वोच्चता है। इस परिणति को हम कतई अस्वाभाविक नहीं कह सकते। अन्ना हजारे और उनके साथी इस बैठक के पूर्व जन लोकपाल पर राजनीतिक समर्थन पाने के लिए दलों के नेताओं से अवश्य मिल रहे थे, लेकिन कहीं से इनके समर्थन में कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं पड़ रही थी। वास्तव में राजनीतिक दलों में यह राय बन चुकी थी कि इस कथित नागरिक समाज को ज्यादा महत्व देना राजनीतिक प्रतिष्ठान को नजरअंदाज करने जैसा है। सर्वदलीय बैठक में इसकी प्रतिध्वनि लगातार सुनी गई। राजद अध्यक्ष लालू यादव ने तो यहां तक कह दिया कि हम 121 करोड़ नागरिकों का मत लेकर जीतते हैं, ये सिविल सोसाइटी वालों को कहां से इतना समर्थन है। सपा ने तो अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ बातचीत को ही गैरजरूरी बताया। बैठक में इसके विरुद्ध निर्मित माहौल का ही परिणाम था कि वित्तमंत्री एवं दस्तावेज तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को यह कहना पड़ा कि सरकार कभी भी कानून बनाने की स्थापित प्रक्रिया से छेड़छाड़ नहीं करना चाहती थी। वह बातचीत विमर्श और सुझाव का इससे एक अलग नया प्रयोग था। ध्यान रखने की बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा अपने निवास पर बुलाई गई इस बैठक में सरकार की ओर से अपने मसौदे के साथ अन्ना समूह द्वारा तैयार मसौदा भी रखा गया था। किसी दल ने उस मसौदे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। इसका व्यावहारिक अर्थ यही हुआ कि तथाकथित जनलोकपाल वाला मसौदा राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत हो चुका है। ज्यादातर विपक्षी नेताओं की रणनीति यही थी कि इस बैठक में किसी प्रारूप पर चर्चा की ही न जाए और संसद में विधेयक पेश होने के बाद अपना मत व्यक्त करें। जाहिर है, संसद में सरकार अपना मसौदा पेश करेगी और उसी पर चर्चा होगी। दूसरे शब्दों में जन लोकपाल के नाम से तैयार मसौदे के राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता अब बंद हो चुका है। नेताओं का तेवर देखिए तो अन्ना हजारे चाहें तो अनशन करें, लोकपाल गठन के मामले में केवल और केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण का ही महत्व होगा। बैठक की इस परिणति के आलोक में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसके द्वारा संसद के महत्व के बहाने राजनीतिक प्रतिष्ठान ने अपनी वरीयता बनाए रखना सुनिश्चित किया है। प्रश्न है कि क्या राजनीतिक दलों का यह रवैया उचित है? क्या यह हमारे लोकतंत्र के हित में है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बैठक में कही गई दो बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। एक, लोकपाल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कमतर नहीं कर सकता। दो, हमारा संविधान एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में परस्पर संतुलन की व्यवस्था पर कायम है और लोकपाल को इसी ढांचे में अपनी उचित जगह तलाशनी होगी। निस्संदेह, जन लोकपाल का मसौदा संविधान द्वारा निर्मित कई संस्थाओं की भूमिका को कमजोर करता है और इसमें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच का संतुलन चरमरा देने का अंश भी निहित है। देश को उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल जैसी संस्था चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ऐसी किसी संस्था के सुपर सरकार की हैसियत नहीं होनी चाहिए। किंतु सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के रवैये से लोकपाल का प्रश्न गौण हो गया है। लोकतंत्र का चरित्र और इसकी भूमिका सर्वाधिक अहम प्रश्न बनकर उभरा है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिष्ठान को हाशिए पर धकेलना या उसे महत्वहीन करना कतई उचित नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में लोक हर पहलू का केंद्रबिंदु है और चुनाव द्वारा जिनका निर्वाचन होता है, वे इस प्रणाली में लोक प्रतिनिधि हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निजी या सामूहिक, संसद या संसद के बाहर की अपनी हर भूमिका में लोकेच्छा को ही प्राथमिकता देंगे। संविधान में बेशक कानून बनाने या संविधान में संशोधन आदि की प्रक्रिया को संसद एवं राज्य विधायिकाओं तक सीमित रखा गया है। संसद में विधेयक पेश करने एवं पारित करने की संवैधानिक प्रक्रिया में कहीं पर नागरिक समाज की भूमिका का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसमें कहीं नहीं कहा गया है कि अगर आप देश के नागरिकों के किसी समूह से बातचीत करते हैं, उनसे विधेयक के किसी मसौदे पर चर्चा करते हैं, उनका सुझाव लेते हैं या उनका मसौदा संसद के पटल पर रखते हैं तो वह प्रक्रिया का उल्लंघन हो जाएगा या संविधान विरोधी होगा। हम अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के अपने अभियान एवं विचार-विमर्श से पहले राजनीतिक दलों को बिल्कुल अलग रखने या उनको अस्पृश्य मान लेने के रवैये से कतई सहमत नहीं, उनके कथित जन लोकपाल को भी हम जनता का मसौदा मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन उनके अनशन का सरकार द्वारा संज्ञान लेना या उनसे बातचीत करना तो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक स्पंदनशीलता का परिचायक माना जाना चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि सरकार ने केवल एक रणनीति के तहत उनसे बातचीत की, पर कुछ नेताओं ने इसके प्रति जिस हिकारत भाव का प्रदर्शन किया, वह खतरनाक है। सरकार के निर्णयों से अगर हम असंतुष्ट हैं या हम कोई कानून चाहते हैं तो हमारे सामने पहला रास्ता किसी तरह सरकार तक अपनी मांग पहुंचाना और न मानने पर कानून के दायरे में विरोध करना है। विरोध का सरकार द्वारा संज्ञान एवं बातचीत की निंदा किसी स्वस्थ राजनीतिक प्रतिष्ठान की पहचान नहीं हो सकती। राजनीतिक दलों का यह व्यवहार साबित करता है कि हमारे लोकतंत्र का चरित्र व्यवहार में अलोकतांत्रिक होता जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Friday, July 1, 2011

क्या बुराई है जनमत संग्रह कराने में


अपनी कालजयी कृति द प्रिंस में मैकियावली लिखते हैं, किसी व्यवस्था में नयापन लाने की तुलना में ऐसा कोई काम नहीं है, जिसकी शुरुआत कठिनाई भरी हो या जिसे लागू करना अत्यंत जोखिम भरा। एक कारगर लोकपाल संस्था के गठन पर चल रही खींचतान से मुक्ति पाने के लिए जनमत संग्रह का सुझाव पहली नजर में कठिनाई और जोखिम भरा प्रतीत हो सकता है, लेकिन यह असंभव एवं अव्यावहारिक नहीं है। क्या भ्रष्टाचार के आरोपी की राजनीतिक हैसियत देखकर उसके खिलाफ जांच की जानी चाहिए? इस प्रश्न पर जनमत संग्रह के सुझाव को संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं के विपरीत और स्वप्नदर्शी करार देकर खारिज कर दिया जाए, इससे पहले कुछ पहलुओं पर गौर करना प्रासंगिक होगा। भले ही ब्रिटेन ने भारत पर दो सौ साल राज किया, अनगिनत अत्याचार किए, बेहिसाब धन-दौलत लूटी। लेकिन आजाद भारत बहुत मायने में ब्रिटेन का ऋणी है। संसदीय लोकतंत्र पर आधारित शासन व्यवस्था, न्याय पद्धति और शिक्षा प्रणाली हमने विरासत में अंग्रेजों से ही ग्रहण की है। इस विरासत के शुभ और अशुभ को देखने का नजरिया क्या हो, बेशक इस पर एक राय नहीं हो सकती। हमारे प्रधानमंत्री तो इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से ही देखते हैं। स्मरण रहे कि 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में मानद उपाधि ग्रहण करते हुए जो भाषण दिया, उसमें ब्रिटिश साम्राज्य के कई लाभकारी परिणामों को उन्होंने सहर्ष और बेहिचक स्वीकार किया था। भारत में विद्यमान विधि का शासन, संवैधानिक सरकार, आजाद प्रेस, पेशेवर सिविल सेवा और आधुनिक विश्वविद्यालयों की तारीफ करते हुए प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा था कि हमारी न्यायपालिका, हमारी कानून व्यवस्था, हमारी नौकरशाही और हमारी पुलिस वे महान संस्थाएं हैं, जो ब्रिटिश भारतीय प्रशासन से ली गई हैं। यह बात अलग है कि प्रधानमंत्री के इस भाषण की देशभर में जमकर आलोचना हुई थी। बहरहाल, आज जब संप्रग सरकार, विपक्षी दल, मीडिया, सिविल सोसायटी, बुद्धिजीवियों और मध्यम वर्ग में सशक्त लोकपाल पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है तो क्या हमें एक बार फिर से ब्रिटेन से मार्गदर्शन नहीं लेना चाहिए? यह दोहराना अप्रासंगिक नहीं है कि लोकतंत्र कोई ऐसा सिद्धांत नहीं है, जिसे किसी जमे हुए स्थायी ढंाचे में रख दिया जाए। यह तो अत्यंत गतिशील एवं निरंतर परिवर्तनशील विचारधारा है। जब यह तथ्य सर्वविदित है कि हमारा लोकतंत्र बहुत हद तक ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है तो वहां हो रहे नए घटनाक्रमों से हम बेखबर नहीं रह सकते। पिछले मई महीने ही ब्रिटेन ने अपने संसदीय इतिहास में उस हथियार का सहारा लिया, जो वहां की शासन परंपरा का स्थापित हिस्सा नहीं है। मई के प्रथम सप्ताह में ब्रिटेन की सरकार ने एक जनमत संग्रह कराया, जिसके जरिए जनता से यह पूछा गया कि वह अपने देश में वैकल्पिक मत की मतदान प्रणाली लागू करना चाहती है या नहीं। जनता ने इसे ठुकरा दिया। गौरतलब है कि भारत की तरह ही ब्रिटेन में सामान्य बहुमत की मतदान प्रणाली प्रचलित है, जिसके तहत किसी चुनाव क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत प्राप्त करने वाला प्रत्याशी विजेता घोषित हो जाता है। इस प्रणाली की यह कहकर आलोचना की जाती है कि इससे बहुमत का अपमान होता है, क्योंकि हारने वाले सभी प्रत्याशियों के कुल मत हमेशा जीतने वाले प्रत्याशी के मतों से बहुत ज्यादा होते हैं। यही नहीं, साधारण बहुमत प्रणाली में समाज के अल्पसंख्यक और शोषित वर्गो को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। मतदान प्रणाली में बदलाव की मांग ब्रिटेन में काफी समय से उठती रही है। पिछले साल गठबंधन सरकार बनाते समय ही दो प्रमुख घटक दलों कंजरवेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेट्स में यह तय हो गया था कि वैकल्पिक मत प्रणाली को लागू करने के संदर्भ में जनमत संग्रह कराया जाएगा। इसके लिए कानूनी प्रावधान होना जरूरी था। लिहाजा, फरवरी 2011 में ब्रिटिश संसद ने जनमत संग्रह कराने के लिए बाकायदा एक कानून पारित कर दिया। मई 2011 में कराए गए हां/ना वाले इस जनमत संग्रह में यह सवाल पूछा गया था कि वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम, हाउस ऑफ कॉमंस के संासदों को चुनने के लिए फ‌र्स्ट पास्ट द पोस्ट (साधारण बहुमत) व्यवस्था का प्रयोग करता है। क्या इसके स्थान पर अल्टरनेटिव वोट (वैकल्पिक मत) प्रणाली अपनाई जानी चाहिए? जनमत संग्रह के लिए चुनाव अभियान में जहां लिबरल डेमोक्रेट्स ने वैकल्पिक मत प्रणाली का समर्थन किया, वहीं कंजरवेटिव पार्टी ने उसका विरोध। यही कारण था कि प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने, जो कि कंजरवेटिव पार्टी के हैं, प्रस्ताव के विपक्ष में और उपप्रधानमंत्री निक क्लेग ने, जो कि लिबरल डेमोक्रेट हैं, प्रस्ताव के पक्ष में प्रचार किया। पिछली लेबर सरकार तो 2010 के आम चुनाव से पहले ही वैकल्पिक मत प्रणाली लागू करना चाहती थी, लेकिन जनमत संग्रह में रखे गए प्रस्ताव पर उसका रवैया काफी हद तक ढुलमुल ही रहा। अन्य छोटे दल इस मुद्दे पर बंटे हुए थे। जबरदस्त अभियान और बहसबाजी के बाद हुए चुनाव में करीब 42 प्रतिशत मतदान हुआ। प्रस्ताव के खिलाफ 68 प्रतिशत मत पड़े। वैसे ब्रिटेन में प्रांतीय एवं स्थानीय स्तर पर जनमत संग्रह कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह ब्रिटेन का केवल दूसरा राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह था। इससे पहले जून 1975 में यूरोपीय समुदाय की सदस्यता के सवाल को लेकर एडवर्ड हीथ की सरकार ने जनमत संग्रह कराया था। दरअसल लेबर पार्टी ने 1974 में अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वादा किया था कि जनता ही बैलेट बॉक्स के जरिये तय करेगी कि उसे यूरोपीय समुदाय में रहना है या नहीं। 67 प्रतिशत मतदाताओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया था। केवल आम चुनाव ही लोकमत का प्रतिबिंब नहीं हो सकते। लगभग सभी लोकतांत्रिक देश, खासकर पश्चिमी जगत अनेक महत्वपूर्ण या विवादास्पद मुद्दों पर जनमत संग्रह कराते रहे हैं। दरअसल, जनमत संग्रह लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाते हैं। अगर संसदीय लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन चार दशक के बीच दो बार जनमत संग्रह करा सकता है तो हम छह दशक बाद भी एक बार जनमत संग्रह कराने का साहस क्यों नहीं बटोर पाए हैं। जो जनता चुनावों के जरिये अपनी सरकार को चुनने की परिपक्व क्षमता रखती है, क्या वह जनमत संग्रह के जरिये इस सवाल का जवाब देने की भी सूझबूझ नहीं रखती कि आम आदमी और खास आदमी के खिलाफ भ्रष्ट आचरण की जांच का पैमाना अलग-अलग होना चाहिए या नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Tuesday, June 14, 2011

क्योंकि ये बडे़ वोट बैंक नहीं हैं


आदिवासियों की समस्याएं विस्थापन और पुनर्वास तक ही सीमित नही हैं, बल्कि वे कहीं अधिक पेचीदा और बहुआयामी हैं। ये आदिवासी अपनी जडे़ं त्यागने को तो विवश हैं ही, उन्हें शिक्षा-रोजगार व बिजली-पानी जैसी समस्याओं से भी दो चार होना पड़ता है। इसके अलावा उनका जीवन और अस्तित्व संकट में है। आज एक आम धारणा बन रही है कि आदिवासियों को आधुनिक बनाकर ही उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाया जा सकता है। उनके आधुनिकीकरण की यह प्रक्रिया ही उनकी अवस्था में सुधार लाकर उन्हें विकास की वर्तमान प्रक्रिया के साथ जोड़ सकती है, परंतु विकास का सरल दिखाई पड़ने वाला यह सूत्र इतना आसान नहीं है, क्योंकि उनके विकसित होने के मार्ग में रुकावट उनका कथित पिछड़ापन नहीं, बल्कि विकास के इस आसान दिखने वाले सूत्र की दोमंुही प्रकृति है। आज हालत यह है कि उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बदलाव के कई संस्करण सामने हैं। बदलाव का पहला रूप सरकारी प्रयासों के रूप में है। हमारे देश में लगभग बारह करोड़ आदिवासी हैं। उनके पुनर्वास की समस्या हालांकि किसी राज्य की सरकारें नहीं सुलझा पाई हैं, जबकि भारत सरकार ने अपने खजाने इनके लिए सदैव खुले रखे हैं। आजादी के बाद से ही आदिवासियों की मुश्किलें दूर करने का एकमात्र नारा विकास माना जाता है। सरकार की इनके लिए चिंता उचित ही है और यह सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी भी है। विडंबना यह है कि हमारा शासक वर्ग यह स्वीकार करने में संकोच करता है कि आदिवासी गरीब नहीं, बल्कि प्राकृतिक उपहारों से वंचित हैं। वे क्षेत्रीय अफसरशाही और कर्मचारियों के अनुचित व्यवहार का शिकार हैं। राज्य और केंद्र सरकारों के संरक्षण में कारपोरेट घराने उनसे उनकी प्राकृतिक संपदा छीनने में लगे हैं। हालांकि इसी बदलाव के कारण आदिवासी नेतृत्व एक लंबी यात्रा व कई पड़ावों को पार करते हुए संसदीय लोकतंत्र का सक्रिय हिस्सा बन चुका है और झारखंड व छत्तीसगढ़ दो आदिवासी बहुल इलाके राज्य की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। उत्तर पूर्व में भी स्वायत्तशासी परिषदों को मान्य करार दिया जा चुका है, परंतु त्रासदी यह है कि नष्ट होते जंगल व फैलते शहरीकरण के कारण अनेक जनजातियों का अस्तित्व खतरे में है। दिक्कत यह है कि हमारे राजनेता इन्हें वोट बैंक ही मानते हैं। जड़ी-बूटियां एकत्र करने वाली कोरबा जनजाति समेत छत्तीसगढ़ की पांच संरक्षित जनजातियां नष्ट होने को हैं, परंतु राज्य और केंद्र सरकारें इस सबसे बेफिक्र होकर न जाने किस विकास की बात कर रही हैं। आजादी के छह दशक बाद भी आदिवासियों के जीवन स्तर में कोई विशेष सुधार नहीं आया है। धर्म के सहारे आदिवासियों का धर्मातरण भी एक चर्चित मुद्दा रहा है। पिछले कई दशकों से ईसाई संगठन उन्हें अनेक प्रकार के प्रलोभनों के जरिए अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और समाज के दबे-कुचले व पीडि़त तबकों को कई तरह के लालच देकर उन्हें अपने साथ जोड़ना उनका एक स्वभाव रहा है। वहीं अदिवासियों का ईसाई धर्म के साथ जुड़ना भला हिंदू धर्म के ठेकेदार किस प्रकार बर्दाश्त कर सकते हैं। विश्व हिंदू परिषद का वरदहस्त सिर पर धारण करने वाले वनवासी कल्याण आश्रम राम, हनुमान और यहां तक कि शबरी के नाम पर उन्हें अपना हिस्सा बनाना चाहते हैं। मगर बेचारा आदिवासी इन धर्म के ठेकेदारो के बीच पेंडुलम-सा झूलता नजर आता है। वोट बैंक के लिए दिए जाने वाले प्रलोभन जब इनके विकास के लिए उठाए जाने वाले कदम बताए जाते हैं तो यह एक प्रकार की नशे की गोली चासनी में डुबोकर देने के समान ही है। धर्म के आधार पर टिका यह परिवर्तन उग्र दक्षिणपंथी मानसिकता के एजेंडे को पूरा करने के अलावा कुछ नहीं है। हिसंक नक्सलवादी व माओवादी आंदोलन जो अतिवामपंथी मानसिकता दर्शाते हैं, वे भी बदलाव के नाम पर आदिवासियों को पथभ्रष्ट करने में पीछे नहीं रहे हैं। वन संपदा हथियाने और आदिवासियों के शोषण में जुटे जंगल के ठेकेदारों और सरकारी तंत्र की असफलता का फायदा उठाते हुए माओवादी इन इलाकों में सक्रिय हैं। पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई में एकजुटता प्रदर्शित करने की आड़ में ये आम जनता को ही निशाना बनाते हैं और उन तक पंहुचाने वाले विकास कार्यो में बाधा बनते हैं। यही नहीं, वे विद्यालयों, अस्पतालों व सार्वजनिक यातायात जैसी जगहों पर हमले करते हैं, जहां आम आदमी इनके हमलों का शिकार बनता है। आदिवासी इलाके के पुलिस बलों को मजबूत बनाने में भी नक्सलवादी आंदोलन की अहम भूमिका है। याद रहे कि नक्सलवादी आंदोलन के इन इलाकों में पैर पसारने से पहले तक पुलिस की तस्वीर महज एक डंडा लेकर घूमने वाले सिपाही से अधिक कुछ नहीं थी। आदिवासी क्षेत्र के पुलिस बलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने और यहां अ‌र्द्धसैनिक बलों की तैनाती में नक्सलवादी और माओवादी हिंसक आंदोलन का ही हाथ है। अब इनसे निपटने की सरकारी नीतियां भी सवालों के घेरे में है। सरकार इनसे निपटने के लिए सलवा जुड़ूम जैसे उपाय करती है या फिर अदिवसियों के बीच में ही लोगों को हथियार सौंपकर व इन्हें एसपीओ बनाकर एक प्रकार के आंशिक गृहयुद्ध को हवा दे रही है। दरअसल, यह आदिवासियों को आपस में ही लड़ाकर उनके जंगल और जमीन हड़पने की सरकारी रणनीति का हिस्सा है। माओवादियों और अ‌र्द्धसैनिक बलों की उपस्थिति एवं संघर्ष आदिवासियों के लगातार अपनी जमीन से पलायन का कारण बन रही है। आदिवासी जीवन की परिवर्तन प्रक्रिया में अहिंसक जनवादी आंदोलनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शांतिप्रिय जनवादी समूहों का हस्तक्षेप भी आदिवासियों की समस्याओं, कठिनाइयों और मांगों को रेखांकित करने में कई बार सक्षम रहा है। मनीष कुंजाम, अभय साहू, हिमांशु पांडे और सुनील मिश्रा सरीखे ऐसे कई नाम हैं, जो समय-समय पर अदिवासियों की आवाज बनते रहे हैं और कुछ सीमा तक इन्हें सफलता भी मिली है। हालांकि अक्सर इनका मकसद फौरी राहत पहंुचाने तक सीमित रहता है और इनके काम करने की अपनी सीमाएं होती हैं। जनजातीय मामलों पर बनी विशेष संसदीय समिति द्वारा 2006 में जनजातीय अधिकारों, उनके विस्थापन, पुनर्वास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सहित जनजातीय विकास पर व्यापक चर्चा की गई और अदिवासियो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने संबंधी आवश्यक हिदायतें भी सरकार को दी गई हैं। तमाम विकास प्रक्रियाओं के बावजूद थोड़ा बहुत ही लाभ इन्हें मिला है। आजादी के छह दशक बाद भी उनकी पहुंच बेहद सीमित रही है। देश की शांति और सुरक्षा को प्रभावित कर रहे वनवासी जीवन में शांति एवं स्थिरता लाने के लिए जरूरत इस बात की है कि जनवादी सत्ता का विकेंद्रीकरण हो ताकि जनवादी अधिकारों और सुविधाओं को ईमानदार एवं प्रभावी ढंग से आम आदमी तक पहुंचाया जा सके। इससे अंतिम पायदान पर खडे़ व्यक्ति का विकास होगा और आदिवासियों को बहकाने वाले लोगों को जवाब दिया जा सकता है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Wednesday, June 1, 2011

उद्योगों के लिए जमीन


किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासियों का विस्थापन इस समय देश की एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर रहा है। विस्थापन के दो प्रमुख कारण हैं, शहरीकरण और नए उद्योगों की स्थापना। अगर भारत को तरक्की करनी है तो इनमें से किसी का भी विरोध नहीं किया जा सकता। जो बुद्धिजीवी विस्थापन का विरोध कर रहे हैं, वे बुनियादी रूप से विकास-विरोधी नहीं हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि औद्योगीकरण किसानों के हितों की कीमत पर न हो। औद्योगीकरण का फायदा तो सभी को मिलेगा, पर मारे जाएंगे किसान। जब किसानों को अपनी जमीन से जुदा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, तब स्वाभाविक है कि वे ज्यादा से ज्यादा मुआवजे की मांग करें। जमीन का छिनना उनके लिए सिर्फ जमीन से महरूम होना नहीं है, जीविका एक एकमात्र साधन से वंचित होना भी है। इसीलिए भूमि के प्रति ममता बढ़ी है और लोग नए उद्योगों की स्थापना का विरोध कर रहे हैं। समस्या यह है कि समस्या की जड़ में जाने की कोशिश नहीं हो रही है। औद्योगीकरण का विरोध कहीं-कहीं इस तरह हो रहा है मानो औद्योगिक विकास ही अवांछित हो। कृषि भूमि के औद्योगिक उपयोग की पहलों के विरोध का आधार यह प्रतीत होता है कि किसानों का किसान बने रहना ही श्रेयस्कर है। इससे एक अजीब अंतद्र्वद्व की सृष्टि हो रही है। यह भ्रम पैदा हो रहा है कि सरकार विकास चाहती है और उसके विरोधी यथास्थिति के समर्थक हैं। इस भ्रम को दूर किया जाना चाहिए और सिर्फ विस्थापन का विरोध कर ऐसे तरीकों का प्रचार करना चाहिए, जिनसे औद्योगीकरण भी हो और इसके लिए व्यापक जन संहार भी न करना पड़े। आजादी के बाद से ही औद्योगीकरण का हल्ला शुरू हो गया था, पर वास्तविक औद्योगीकरण बहुत कम हुआ। इसी का नतीजा है कि कृषि पर इतनी बड़ी आबादी की निर्भरता बनी हुई है। किसी देश के लगभग 70 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए किसी न किसी रूप में अगर कृषि क्षेत्र पर निर्भर हों तो वह देश खेतिहर ही कहलाएगा। उसे औद्योगिक दृष्टि से विकसित देश नहीं कहा जा सकता। यही वह मूल गड़बड़ी है, जिसके कारण खेती और उद्योग ही नहीं बिगड़े हुए हैं, बल्कि बेरोजगारी की समस्या भी उग्रतर होती जा रही है। विकास का कोई निश्चित पैमाना नहीं है, क्योंकि हर देश की अपनी परिस्थितियां होती हैं और इन परिस्थितियों के फ्रेम में ही विकास की कार्यनीति बनाई जाती है। हमारे देश के लिए ऐसे उद्योग, जिनमें पूंजी ज्यादा लगती हो और रोजगार कम पैदा होता हो, खतरनाक हैं। इससे आर्थिक शक्ति का भयावह केंद्रीकरण होता है और ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जाती है, जिनकी जेब में पैसा नहीं होता। पैसा न होने से वे उपभोक्ता बाजार में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि खेती और कारखानों से पैदा होने वाली चीजों का बाजार तेजी से नहीं बढ़ता। जनसाधारण की क्रय शक्ति सीमित रहने से किसान को खेती की पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, क्योंकि सरकार कृषि उपज के मूल्यों को, खासतौर से अन्न के मूल्यों को, अनुचित तरीके से दबाकर रखती है। इसका दूसरा नतीजा यह होता है कि सरकार कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देने को बाध्य हो जाती है। न दे तो किसानों में और ज्यादा हाहाकार मच जाए। लोगों की क्रय शक्ति न बढ़ने का एक और नतीजा यह होता है कि औद्योगिक उत्पादन की खपत न बढ़ने से उद्योग-धंधों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाता। कई दशकों से हमारी अर्थव्यवस्था इसी संकट में गिरफ्तार है। फिर भी हममें से कुछ लोग खुश होकर दांत निपोरते रहते हैं कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार बन चुका है। अगर उपभोक्ता समुदाय की संख्या बीस या तीस करोड़ मान ली जाए तो भी सत्तर-अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग अभी भी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के संघर्ष तक ही सीमित है। इसलिए भारत का औद्योगीकरण जरूरी ही नहीं, अनिवार्य है। लेकिन उस ढंग का औद्योगीकरण नहीं, जैसा हो रहा है। हमें तो ऐसे कल-कारखाने चाहिए, जिनमें पूंजी कम लगे और रोजगार ज्यादा पैदा हो। इसके लिए उत्पादकता के स्तर से समझौता किया जा सकता है। जो नई से नई मशीनों का समर्थन कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं। उन्हें एक खास वर्ग की चिंता है, देश के सभी वर्गो की नहीं। अपनी परिस्थितियों के अनुसार टेक्नोलॉजी अगर हम विदेशी बाजार से आयात नहीं कर सकते, क्योंकि सारी दुनिया ही नवीनतम टेक्नोलॉजी के पीछे दीवानी है, तो हमें यह टेक्नोलॉजी खुद पैदा करनी होगी। यह तभी संभव है, जब इस मिशन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। इस टेक्नोलॉजी पर आधारित कारखाने स्थापित करने के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होगी। पूंजी कम लगने से गांव के लोग या ग्राम और जिला पंचायतें भी ऐसी औद्योगिक इकाइयां खड़ी कर सकेंगी। टेक्नोलॉजी सरल होने से गांव के लोग भी उसका संचालन कर सकेंगे। इस औद्योगिक नीति का नतीजा यह होगा कि खेती पर आधारित आबादी धीरे-धीरे उद्योगों की तरफ मुड़ने लगेगी। दुख इस बात का है कि समस्या पर समग्रता से विचार न कर जमीन के मुवावजे के विभिन्न फार्मूलों पर विचार हो रहा है, मानो खेती और उद्योग एक-दूसरे से जुड़े हुए न हों, बल्कि उनकी नियति अलग-अलग हो। कोई भी गंभीर समस्या इस संकुचित दृष्टि से नहीं सुलझाई जा सकती। दोनों ही बुनियादी समस्याएं हैं। अगर हम सिर्फ उनके रोजगार की बात सोचेंगे, जिनकी जमीन हड़पी जा रही है तो उनके लिए कौन सोचेगा, जिनके पास जमीन तो है, पर जो फिर भी गरीबी से घिरे हुए हैं?

बेमानी होती गरीबी रेखा


पिछले दिनों एक जनहित याचिका के संबंध में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि दुनिया की महाशक्ति बन रहे भारत जैसे देश में यह एक विडंबना है कि अब भी देश के कई हिस्सों में भुखमरी से मौतें हो रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सवाल खड़ा किया है कि देश में दो भारत कैसे हो सकते हैं- एक भुखमरी से त्रस्त और दूसरा अमीरी में मस्त। देश में गरीबी के आंकड़ों के बारे में लगातार भिन्न-भिन्न आंकड़े सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में समझ ही नहीं आता कि भारत में कितने लोग गरीब हैं। समय-समय पर गरीबी की रेखा की बदलती परिभाषाएं इस विषय को और अधिक उलझा देती हैं। स्वाभाविक है कि सर्वमान्य आंकड़ों के अभाव में गरीबी उन्मूलन के उपाय सार्थक नहीं हो सकते। पूर्व में सरकार द्वारा गरीबी उन्मूलन के विभिन्न उपाय अपनाए जाते रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सस्ता अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थ व केरोसिन उपलब्ध कराया जाना, ग्रामीण और शहरी रोजगार कार्यक्रम, मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं आदि इस दिशा में कुछ प्रमुख सरकारी कार्यक्रम रहे हैं। सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की बात भी की जा रही है, जिसके अनुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों को आवश्यक खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से यह प्रश्न पूछा है कि योजना आयोग किस प्रकार से आज गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को कुल जनसंख्या का मात्र 36 प्रतिशत ही मानता है। ध्यान देने वाली बात है कि कुछ समय पहले योजना आयोग द्वारा प्रो. सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया गया था, जिसने गरीबी के मापन हेतु एक अलग परिभाषा सुझाई थी, जिसके आधार पर गरीबी की रेखा को पुन: परिभाषित भी किया गया। तेंदुलकर रिपोर्ट से पहले तो सरकार यह कह रही थी कि देश में 2004-05 में केवल 28 प्रतिशत लोग ही गरीब थे और उनका यह प्रतिशत 2007 तक घटकर मात्र 20 प्रतिशत ही रह गया। प्रो. तेंदुलकर ने गरीबी की जो नई परिभाषा सुझाई (जिसे भारत सरकार ने स्वीकार भी किया), उसमें उन्होंने गरीबी का आकलन करते हुए शिक्षा और स्वास्थ्य पर आवश्यक खर्च को शामिल किया है, लेकिन प्रो. तेंदुलकर की परिभाषा के अनुसार भी गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की जांच करने का जो तरीका बनाया गया, उसके अनुसार भी जिस व्यक्ति की मासिक आय ग्रामीण क्षेत्र में 446.68 रुपये और शहरी क्षेत्र में 578.8 रुपये से अधिक है, वह गरीबी की रेखा से ऊपर माना गया। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष योजना आयोग ने ये आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। यदि इसके इतिहास में जाएं तो देखते हैं कि सैद्धांतिक रूप में ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों को गरीबी की रेखा से नीचे माना जाता था, जिनका कैलोरी उपभोग 2400 कैलोरी से कम और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी से कम होता था। उसके अनुसार आवश्यक उपभोग को आधार बनाकर गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या का आकलन होता था। इसके आधार पर योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1973-74 में 56 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे रहते थे। 1973-74 तक आवश्यक खर्च के आंकड़े सही रूप से लागू किए गए और इस प्रकार गरीबी का आकलन भी ठीक होता था, लेकिन 1993-94 और 1990-2000 में इस संबंध में सरकार द्वारा प्रयुक्त उपभोक्ता खर्च के आंकड़े काफी कम दिखाए गए। आलोचकों का कहना है कि सरकार द्वारा प्रयुक्त आंकड़ों के कारण गरीबी रातोंरात कम होती दिखाई दी। यदि सही आंकड़े प्रयुक्त किए जाएं तो 2400 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की संख्या 80 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 2100 से कम कैलोरी प्राप्त करने वालों की संख्या 50 प्रतिशत बैठती है यानी कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा आंकड़ों की बाजीगरी के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या जान-बूझकर कम दिखाई जाती रही है। योजना आयोग की परिभाषा के अनुसार गरीबी का आकलन करें तो देखते हैं कि शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 20 रुपये पाने वाले को भी सरकारी मापदंडों के अनुसार गरीब नहीं माना जाएगा। यहां सवाल यह उठता है कि जब दुनिया भर में गरीबी की जो परिभाषा इस्तेमाल की जाती हैं, उसके अनुसार न्यूनतम 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम आमदनी वाले को गरीब माना जाएगा। रुपयों में यह राशि 58 रुपये बनती है। हालांकि यह राशि भी न्यूनतम गुजारे के लिए आवश्यक आमदनी से कहीं कम है, फिर भी इससे एक तिहाई आमदनी की परिभाषा वास्तव में हास्यास्पद ही मानी जाएगी। योजना आयोग की स्वयं की परिभाषा, जिसके अनुसार शहरी क्षेत्रों में जो 2100 कैलोरी का उपभोग न्यूनतम है, मात्र 19 रुपये में और ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी मात्र 15 रुपये प्रतिदिन, यह कैसे संभव है? वास्तव में यह सरकार की संवेदनहीनता का भी परिचायक कहा जा सकता है, जिसके अनुसार गरीबी की रेखा की परिभाषा न्यूनतम जीवन लागत का भी प्रावधान नहीं कर पाती। कुछ समय पहले असंगठित क्षेत्र के लिए गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति द्वारा यह खुलासा किया गया था कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग प्रतिदिन 20 रुपये या उससे कम पर गुजर करते हैं। एक आदमी की न्यूनतम आवश्यकता भोजन, आवास और कपड़े की होती है। आसानी से समझ में आता है कि इतने कम में इन सभी जरूरतों की पूर्ति करना संभव नहीं होता यानी कह सकते हैं कि देश में 77 प्रतिशत से भी अधिक लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं। यदि हम अर्जुन सेन गुप्ता समिति की रपट मानें तो देश के तीन-चौथाई से भी अधिक लोग गरीब हैं। अगर सरकार द्वारा अंक गणितीय तरीके से मापी गई गरीबी देखें तो मात्र 36 प्रतिशत लोग ही देश में गरीब हैं। अब प्रश्न उठता है कि एक ही सरकार द्वारा गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या में इतना भारी अंतर कैसे हो जाता है? एक ब्रिटिश शोध संस्था ने यह पाया है कि भारत में तीन वर्ष की आयु वर्ग के 3,000 बच्चे प्रतिदिन पोषक आहार की कमी के कारण दम तोड़ देते हैं। ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार ही हैं, जिसके अनुसार भारत में 22 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। चूंकि केवल कैलोरी के आधार पर गरीबी की रेखा का आकलन किया जाता रहा है, वह भी पूरा सही नहीं है, इसलिए यह वास्तव में गरीबी की रेखा नहीं, बल्कि भुखमरी की रेखा है। वास्तव में एक व्यक्ति के जीवन में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास सहित विविध प्रकार के खर्च करने पड़ते हैं। यदि इन सबका हिसाब जोड़ा जाए तो गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कहीं ज्यादा बैठेगी। यदि सरकार नेक-नीयत से खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाना और लागू करना चाहती है तो उसे गरीबी की रेखा की अवधारणा को न्यायोचित बनाना होगा। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

Wednesday, May 25, 2011

जनहित में जातिवार जनगणना!


लंबे समय से सामाजिक न्याय की मुहिम से जुड़े लोगों की यह मांग रही है कि जनगणना में जाति को शामिल किया जाए ताकि भविष्य में किसी भी किस्म के एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम के लिए हमें 1931 की तरफ न लौटना पड़े, जब आखिरी बार इस कारक को शामिल किया गया था। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समूची आबादी के आर्थिक, एवं सामाजिक-जातिगत और धार्मिक आधार पर राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की योजना को हरी झंडी दी। बताया गया कि यह सर्वेक्षण अपने ढंग का पहला अध्ययन होगा, जिसमें अतीत के तौर-तरीकों से परे जाने की कोशिश होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि सामाजिक-आर्थिक वंचना को कम करने व नीति-निर्धारण के सवाल के लिए जरूरी है कि इस वंचना के उद्भव, विस्तार और दीर्घजीविता के बारे में हम विधिवत ज्ञान से लैस हों। खालिस वंचना को जानने के लिए हम पहले गरीबी को नापते हैं, जो आय या उपभोग के स्तर को जानकर तय की जा सकती है। हाल के दिनों में यह कोशिश की जाती रही है कि वंचना के पैमानों का एक आयामी नहीं, बल्कि बहुआयामी मापन किया जाए। निश्चित ही यह बहुत आसान काम नहीं रहा है। कुछ लोगों ने नोबेल पुरस्कार विजेता अम‌र्त्य सेन के विचारों को आधार बनाकर इस दिशा में कोशिश की है, जहां लोगों की क्षमताओं या उनके पास उपलब्ध पसंदगी-नापसंदगी को आधार बनाया गया है। जैसे, स्वच्छ पानी तक पहुंच, सार्वजनिक स्वास्थ्य, ऊर्जा के स्त्रोत, जिंदगी जीने के तरीके आदि। कैबिनेट की इस बैठक में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की सूची को संशोधित करने के लिए सरकार ने गरीबी की परिभाषा पर भी पुनर्विचार किया है। शहरी गरीबों की पड़ताल के लिए समावेशी पैमाने की बात चली है, जिसके तहत रिहाइश, सामाजिक असुरक्षा (निरक्षरता, विकलांगता या महिलाओं की अगुआई में चल रहे घर) और पेशागत असुरक्षा जैसे तीन पैमाने तय किए गए हैं। ग्रामीण इलाकों में गरीबों की पहचान करने के लिए भी वहां की आबादी को तीन श्रेणी में बांटा गया है। सबसे ऊपर ऐसे परिवार जिनके पास फोन, फ्रिज आदि हैं, सबसे नीचे आदिवासी समूह, हाथ से मैला ढोने वाले आदि। इसके अलावा बीच का भी एक तबका तैयार किया गया है, जिनमें से गरीबों की पहचान करने के लिए सात वंचना सूचकांक तय किए गए हैं। अगर वंचना के मापन के अंतर्गत हम दलितों-आदिवासियों के जीवन-विश्व को समझने की कोशिश करें तो नए-नए अध्ययन सामने आते रहे हंै। जो निश्चिम ही प्रस्तावित सर्वेक्षण के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। पिछले साल चंद्रभान प्रसाद, देवेश कपूर आदि द्वारा प्रस्तुत एक अन्य रिसर्च पेपर रिथिंकिंग इनइक्वालिटी: दलित्स इन यूपी इन द मार्केट रिफार्म एरा में 1990 में सामने आई लगभग दलित क्रांति की चर्चा की गई है। आय के पैमानों पर सबसे नीचले पायदान पर स्थित होने के बावजूद अध्ययन इस हकीकत को उजागर करता है कि किस तरह आर्थिक एवं सामाजिक संदर्भो में उनकी जिंदगी में बदलाव आए हैं। उत्तर प्रदेश के सापेक्षत: विकसित इलाके (खुर्जा) और पिछड़े इलाकों में से एक अग्रणी (बिलरियागंज) पर केंद्रित इस अध्ययन में दलितों के जीवनस्तर में आ रहे बदलावों को उपभोग के सामानों के बढ़ते इस्तेमाल, उनकी रिहाइशों में पक्के मकानों, बिजली का बढ़ता इस्तेमाल आदि के जरिए नजर डालने की कोशिश की गई है। अपनी एक किताब दलित्स इन इंडिया: सर्च फॉर ए कॉमन डेस्टिनी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रोफेसर सुखदेव थोराट वर्ष 2007 के आंकड़ों की बुनियाद पर बताते हैं कि किस तरह ग्रामीण इलाके की 17 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी अब जमीन की काश्तकारी में लगी है, ग्रामीण क्षेत्रों के 12 फीसदी एवं शहरी इलाकों के 28 फीसदी लोग व्यापार में हैं, उनमें साक्षरता दर 57 फीसदी तक पहुंची है या सरकारी नौकरियों में उनका अनुपात बढ़ रहा है। बहरहाल, इन नए अध्ययनों के बरअक्स हाल ही में एक अन्य अध्ययन भी सामने आया है, जो दरअसल पुरानी प्रमेयों को ही नए सिरे से स्थापित करता है और बताता है कि किस तरह भारतीय संदर्भ में जाति और वर्ग की पहचानें आज भी परस्पर व्याप्त हैं और दलित या आदिवासी की सामाजिक पहचान ही विभिन्न किस्म की वंचनाओं को जन्म देती है, एक तरह से आर्थिक विवंचना सामाजिक पहचान पर निर्भर होती है। ध्यान देने लायक है कि गरीबी रेखा के नीचे खड़े लोगों को चिह्नित करने के लिए विभिन्न राज्यों में फैले 166 गांवों से प्रातिनिधिक सैंपल हासिल कर इस सर्वेक्षण को अंजाम दिया गया है। इस पायलट सर्वेक्षण के अंतरिम नतीजे बताते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग जो कुल आबादी में भले ही 22 फीसदी हों, मगर ग्रामीण इलाकों में गरीब, वंचित घरों के आधा हैं। सर्वेक्षण बताता है कि गैर-गरीब घरों में अर्थात नॉनपूअर हाउसहोल्ड्स में दलित आदिवासियों का अनुपात महज 25 फीसदी है, जो विभिन्न स्तरों पर यानी उनकी बहुआयामी वंचना को उजागर करता है, चाहे आवास का मामला हो, निरक्षरता का, बेघरों, मुफलिसी आदि का प्रश्न हो। आबादी के 22 फीसदी हिस्से के आधे से अधिक का गरीबी की श्रेणी में आना जहां गरीबी संबंधी पहले से मौजूद आंकड़ों के साथ मेल खाता है, वहीं यह भी आश्चर्यजनक है कि यह स्थिति आज तक बनी हुई है। पता चला है कि योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा विकसित की गई पद्धति के आधार पर इन प्रायोगिक सर्वेक्षण के नतीजों को मद्देनजर रखते हुए एक व्यापक सर्वेक्षण को अंजाम दिया जाएगा। गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चिह्नित करने के लिए किया जाने वाला प्रस्तावित सर्वेक्षण अहम है, क्योंकि इसी आधार पर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभान्वितों की सूची तय की जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)