Friday, April 1, 2011

सवा अरब की आबादी


दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए अपने नागरिकों की गिनती करना यकीनन कठिन कार्य है। भारत के भौगौलिक विस्तार और बनावट को देखते हुए यह काम और भारी हो जाता है। लेकिन, अपने देश में हर दस साल पर इस श्रमसाध्य कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न किया जा रहा है। इस बार भी जनगणना के प्रारंभिक आंकड़े आ गए हैं जो कहीं आश्वस्त करते हैं तो कई जगहों पर चुनौतियों को पार करने की चिंता भी जगाते हैं। पहली बात तो यह कि देश की आबादी सवा अरब के पास पहुंचने वाली है जो दुनिया के छह बड़े देशों अमेरिका, इंडोनेशिया, जापान, ब्राजील, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल आबादी की बराबरी कर रही है और दुनिया की कुल आबादी का साढ़े सत्रह फीसद बनाती है। शुक्र है कि सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश चीन से अभी भी हम दो फीसद पीछे हैं। एक बड़ी बात यह देखने को मिली है कि आबादी विस्तार की दर में नब्बे साल बाद पहली बार कमी देखने को मिली है। यह कमी देश के सबसे अधिक आबादी वाले छह राज्यों में भी दिखी है। लेकिन चिंता बढ़ाने वाली बात यह है कि बेटे की चाह में आज भी बेटियों की बेकद्री हो रही है। जनगणना बताती है कि हर हजार बालकों की तुलना में बालिकाओं की संख्या केवल 914 है। देश के स्वतंत्र होने के बाद से बेटे- बेटी अनुपात की यह विषमता सबसे अधिक है जिसमें पंजाब और हरियाणा में हालात सबसे बदतर हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर पुरुष-महिला अनुपात में वृद्धि दर्ज की गई है जो संतोष की बात है। राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात हजार पुरुषों के लिए 940 महिला का है। लेकिन, बिहार, गुजरात और जम्मू-कश्मीर में महिलाओं का अनुपात घटता दिखा है जो चिंता जगाता है। खुशी की बात है कि साक्षरता दर में वृद्धि देखी गई है लेकिन अब भी आबादी के चौथाई भाग का निरक्षर रहना गंभीर मामला है। पुरुषों में साक्षरता दर की वृद्धि महिलाओं की तुलना में आज भी अधिक है लेकिन जनगणना बताती है कि देश की आधी आबादी शिक्षा की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। केरल आज भी साक्षरता दर में पहले नंबर पर बना हुआ है जबकि बिहार सबसे पिछले पायदान पर है। देश में छह वर्ष तक की आयु के बच्चों की संख्या करीब सोलह करोड़ है और पिछली गणना की तुलना में इसमें करीब पचास लाख की कमी आई है। जनगणना के ये आंकड़े हांलाकि प्रारंभिक हैं लेकिन इनसे आबादी की संख्या के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता का भी मोटा अंदाज मिल जाता है। आर्थिक सुधारों के बाद यह तीसरी जनगणना है जो बताएगा कि सरकारी नियंतण्रघटाने और निजीकरण को बढ़ावा देने के नीतिगत बदलावों का कैसा असर समाज और लोगों पर हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि इन तीन दशकों में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन की दर तेजी से बढ़ी है जिसके मिश्रित नतीजे दिख रहे हैं। शहरों में विकास दर ने तेजी पकड़ी है लेकिन इनके इंफ्रास्ट्रक्चर पर बोझ काफी बढ़ गया है। नतीजे में शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि देखी जा रही है। जाहिर है देश के गरीबों की बड़ी आबादी अवसरों की तलाश में आज भी शहर की ओर भाग रही है।

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