लोकपाल विधेयक मसौदे को बनाने में पहली बार गैर सरकारी सदस्यों की भी भागीदारी सुनिश्चित कराने में सरकार को झुका चुके अन्ना हजारे अब इस लड़ाई को विस्तार देने में जुट गए हैं। अब उनका अगला एजेंडा चुनाव सुधार और सत्ता का विकेंद्रीकरण है। अब मतदाताओं को चुनाव में लड़ने वाले सभी प्रत्याशियों को नापसंद (रिजेक्ट) करने या फिर चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने (रिकॉल) का अधिकार दिलाना उनका मकसद है। साथ ही उन्होंने हर कानून बनाने में जन भागीदारी की पैरवी की है। लोकपाल विधेयक के मसौदे के लिए सरकारी और गैर सरकारी दस सदस्यों की संयुक्त समिति गठन के साथ ही उठे तमाम सवालों के बाद रविवार को अन्ना फिर मीडिया से रुबरू हुए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा वोटर जागरूक नहीं है। वह अपने वोट की कीमत नहीं जानता। मैं चुनाव लड़ा तो मेरी जमानत जब्त हो जाएगी, लेकिन अब हम चाहते हैं कि मतपत्र में प्रत्याशियों के नाम के बाद अंत में नापसंद का चिन्ह होना चाहिए। मतदाता सभी प्रत्याशियों को खारिज कर दें तो फिर से चुनाव होना चाहिए। इसी तरह मतदाताओं को चुने हुए प्रत्याशियों को वापस बुलाने का भी अधिकार मिलना चाहिए। यह हमारे एजेंडे पर है। लोकपाल के बाद इस पर काम शुरू करेंगे। अन्ना यह भी चाहते हैं चुनाव में मतदान न करने वाले मतदाताओं की सारी सुविधाएं पांच साल तक बंद कर देनी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि क्या वे अब चाहते हैं कि सभी कानूनों के विधेयकों का मसौदा सामाजिक सहभागिता से ही बनें? उन्होंने कहा कि हर कानून में जन भागीदारी होनी ही चाहिए। अन्ना के आंदोलन से जुड़े आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने कहा, अगला एजेंडा राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण का है, जिसमें मोहल्ला व ग्रामसभाओं को स्थानीय स्तर पर कानून बनाने को अधिकार मिल सके। अन्ना सिर्फ भ्रष्टाचार को रोकने लिए जनलोकपाल जैसा कानून बनाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहते। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए एक संगठन भी बनाएंगे, लेकिन अभी उसमें समय लगेगा। जबकि इस बीच वे सभी राज्यों में जाकर अभियान को गति देंगे। राजनीतिक दलों के युवा संगठनों का समर्थन मिलने के सवाल पर अन्ना ने कहा किसी से उन्हें समर्थन नहीं मिला और उनके इस आंदोलन का किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है|
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