Saturday, July 9, 2011

जनता के प्रतिनिधि नहीं हैं सिविल सोसायटी के पंच प्यारे

जहां तक लोकपाल विधेयक की बात है तो चाहे सरकारी लोकपाल बिल हो या फिर सिविल सोसायटी का जन लोकपाल बिल, इतना तो निश्चित है कि हमारे देश में कानून सिर्फ और सिर्फ संसद ही बना सकती है। फिलहाल, सिविल सोसायटी को देश के मतदाताओं ने अपनी मनमानी करने का कोई जनादेश नहीं 

दिया है..कपाल बिल और जनलोकपाल बिल पर भले ही टीम अन्ना हजारे वाया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बनाम यूपीए-2 सरकार के बीच वाक्युद्ध जारी है, मगर आम आदमी पूछ रहा है कि देश की 121 करोड़ जनता के प्रतिनिधित्व का अधिकार सिविल सोसायटी के पांच सदस्यों को किसने सौंप दिया है। भ्रष्टाचार का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन जिस सतही तरीकेसे इसे दुरुस्त करने का सब्जबाग टीम अन्ना द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए दिखाया जा रहा है, वह उसी तरह फेल होनेवाला है, जैसे गरीबी हटाओका नारा। मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य व राज्यसभा सदस्य सीताराम येचुरी ने सवाल उठाया है कि अन्ना हजारे नीत सिविल सोसायटी कैसे यह दावा कर सकती है कि वह समूचे समाज यानी पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है, क्योंकि तब यह सवाल उठेगा कि हम क्या अनसिविल सोसायटी के हैं। येचुरी का कहना है कि कथित सिविल सोसायटी के कुछ नेताओं की इस तरह की घोर आपत्तिजनक टिप्पणियां भी अब कभी-कभी सुनने को मिल जाती हैं कि विधायकों और सांसदों को ही लाखों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का क्या हक है? यह हमारी संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रति हिमाकत का प्रदर्शन करना ही नहीं है, बल्कि वास्तव में उसे कमजोर करने की कोशिश करना भी है। हमारी संवैधानिक व्यवस्था में जनता की संप्रभुता का व्यवहार राज्य विधायिकाओं और संसद में इसकेचुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से होता है। कार्यपालिका यानी सरकार विधायिका के प्रति और उसके माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह भी है और उसकी इच्छा पर आश्रित भी। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जनता का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार पर ही सवाल खड़े करके तथाकथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि इस समूची संवैधानिक व्यवस्था को ही कमजोर करते नजर आते हैं। आखिर आम मतदाताओं ने ही 1977 में अपने चुनावी फैसले से भारतीय जनतंत्र के तानाशाहीपूर्ण विचलन को शिकस्त दी थी। इन्हीं आम मतदाताओं ने 2004 में सांप्रदायिक ताकतों को हराया था, ताकि गणतंत्र के बुनियादी धर्म निरपेक्ष जनतांत्रिक आधारों की रक्षा हो सके। इन आम मतदाताओं ने ही ऐसे हालात सुनिश्चित किए हैं, जहां सिविल सोसायटी के कथित नेता निश्चिंतता से अपने मोमबत्ती जुलूसोंसे लेकर अनशनतक आयोजित कर सकते हैं।

गुजरात में भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आंदोलन की बागडोर जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने संभाली और उसे पूरे देश में फैला दिया तो उन्होंने भी नए लोग खड़े करने केबजाय विपक्षी दलों के लोगों व उनके छात्र संगठनों पर ही भरोसा किया था। आपातकाल लगा और अगले चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया, मगर जो लोग जेपी आंदोलन की डोर पकड़कर सत्ता में आए थे, उनमें से अधिकतर आज भी कांग्रेस या विपक्षी दलों में हैं। मगर न तो नई क्रांति हुई, न भ्रष्टाचार खत्म हुआ, उलटे भ्रष्टाचार व कदाचार ने अपने पैर और मजबूती से जमा लिए। तब के जेपी आंदोलन में शामिल कई लोगों के विरुद्ध आज आय से अधिक संपत्ति का मामला न्यायालयों में चल रहा है। 

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी सिविल सोसायटी के वर्तमान रवैए से आहत हैं। उन्होंने सिविल सोसायटी पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ये किन लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? इन्हें कौन समर्थन दे रहा है? देश की आबादी 120 करोड़ है। क्या ये सभी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो फिर जो लोग जनता के बीच से चुनकर आए हैं, वे क्या करेंगे? यह संवैधानिक व्यवस्था को अस्थिर करने की साजिश है, जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता। मैं यह नहीं कहता कि लोकपाल न बने, लेकिन यह कानून के माध्यम से ही संभव है। अगर दो पक्षों के बीच सहमति बन जाए और संसद में प्रस्ताव गिर जाए, फिर ये सिविल सोसायटी वाले अनशन पर बैठेंगे, लेकिन उससे होगा क्या? ऐसे देश नहीं चलता है। व्यवस्था में बदलाव एक सतत् प्रक्रिया है। सिविल सोसायटी और राजनीतिक दलों को मालूम होना चाहिए कि लोग अब जागरूक हो गए हैं। आनेवाली पीढ़ी भ्रष्ट नेताओं को बर्दाश्त नहीं करेगी और उन्हें कुर्सी से हटा देगी। सोमनाथ चटर्जी ने फिर कहा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका में दखल देने का कोई हक नहीं है। संसद सर्वोपरि है और यही लोकतांत्रिक व्यवस्था भी है। 

कचहरी, स्थानीय निकाय, प्रशासन, पुलिस, कस्टम-एक्साइज, आबकारी, लोक निर्माण, सिंचाई, व्यापार कर आदि सरकारी विभागों में व्याप्त कदम-कदम पर भ्रष्टाचार तो जगजाहिर है, मगर टीम अन्ना को यह भी जानना चाहिए कि आज अच्छे विालयों, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट व मेडिकल कालेजों में प्रवेश में कैपीटेशन फीस से लेकर न्यायपालिका में तारीख लेने तक में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। आलम यह है कि कतिपय बड़े वकीलों को छोड़कर मुकदमा लेकर आनेवाले जिलों व तहसीलों के वकीलों को 40 प्रतिशत कमीशन व नर्सिग होमों में मरीज ले आनेवाले झोलाछाप डाक्टरों को 30-40 प्रतिशत कमीशन, दिल्ली या महानगरों के बड़े-बड़े डाक्टरों के नाम पर चलने वाले हार्ट क्लीनिकों में मरीज रिफर करने वाले जिलों के डाक्टरों को 40 प्रतिशत कमीशन का भुगतान होता है, जो पूरी तरह कालाधन ही है। दरअसल, हमारे समाज के रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है। 

Wednesday, July 6, 2011

मंत्रियों का लोकपाल मसौदा


भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय लहर स्वाभाविक व जायज है। भ्रष्टाचार की हालिया घटनाओं ने देश के मौजूदा भ्रष्टाचाररोधी तंत्र में जनता का विश्वास डिगा दिया है। भ्रष्टाचार का कैंसर विभिन्न संस्थानों में फैल चुका है। 2008 में संप्रग सरकार के विश्वास मत में घूसखोरी और भ्रष्टाचार की प्रमुख भूमिका थी। संसदीय समिति ने घूस के पुख्ता साक्ष्यों की अनदेखी करते हुए राजनीतिक आधार पर खुद को बांट लिया। लोकतंत्र में घूस के माध्यम से संसदीय विश्वास अर्जित करने से बड़ा कोई अपराध नहीं है। तीन साल से विरोध जताने के बावजूद 2-जी घोटाला होता रहा। संसदीय दबाव, मीडिया बहस और न्यायिक सक्रियता के कारण ही कुछ लोगों पर मामला चलाया जा सका है। राष्ट्रमंडल खेल सरीखी अंतरराष्ट्रीय घटना भ्रष्टाचार में डूब गई। न्यायपालिका पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि समाज के अंदर जवाबदेही तंत्र को मजबूत किया जाए। लोकपाल ऐसा ही एकीकृत संस्थान है, जिसके गठन पर लंबे समय से बहस चल रही है। इससे उम्मीद जग रही है कि जवाबदेही तंत्र में सुधार के कारण भ्रष्टाचार के दोषियों को दंड मिलेगा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। मंत्रियों के लोकपाल बिल के मसौदे की पड़ताल इस आधार पर होनी चाहिए कि क्या यह इस उद्देश्य की पूर्ति में सक्षम है? इस मसौदे के अनुसार लोकपाल में एक अध्यक्ष और दस सदस्य होने चाहिए। इनमें से चार न्यायपालिका के सदस्य हों। लोकपाल की चयन समिति में दो विपक्षी नेताओं के अलावा न्यायिक संस्थान से दो प्रतिनिधि हों। इनके अलावा, प्रधानमंत्री, लोकसभा के स्पीकर, एक नेता उस सदन से जिसके प्रधानमंत्री सदस्य न हों और गृह मंत्री सदस्य के रूप में शामिल हों। कैबिनेट सचिव को समिति का सदस्य सचिव बनाया जाए और नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के अध्यक्ष इसके सदस्य हों। इस चयन समिति में उन लोगों का प्रभुत्व है जो सत्तारूढ़ सरकार का समर्थन करते हैं। सरकारी बहुमत से लैस चुनाव समिति लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन करेगी। गैरन्यायिक सदस्यों को जनकार्यो, प्रशासनिक कानून, नीति, शिक्षा, वाणिज्य, उद्योग, कानून, वित्त या प्रबंधन क्षेत्र का विशिष्ट ज्ञान होना चाहिए। अगर चुना गया व्यक्ति सांसद या विधायक है तो इसे लोकपाल सदस्य बनने से पहले इस्तीफा देना होगा। अगर वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है तो उसे पहले उस दल से संबंध विच्छेद करने होंगे। मंत्रियों के मसौदे के अनुसार ऐसे व्यक्ति भी लोकपाल के सदस्य बन सकते हैं जो स्वतंत्र, उचित और पात्र नहीं हैं। लोकपाल के सदस्यों का चयन सरकार के पक्ष में किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति लोकपाल के दुराचरण से असंतुष्ट है तो उसकी शिकायत पर लोकपाल से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं है। लोकपाल को राष्ट्रपति के संदर्भ पर यानी सरकार की सलाह पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही हटाया जा सकता है। इस प्रकार सरकार ही लोकपाल को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है, कोई असंतुष्ट नागरिक नहीं। यही नहीं, लोकपाल को निलंबित करने की शक्ति सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं, बल्कि सिर्फ सरकार के पास है। इस प्रकार मंत्रियों के लोकपाल मसौदे पर नजर डालने से साफ हो जाता है कि चयन समिति में सरकार का प्रभुत्व होगा। चयन का मापदंड अस्पष्ट है और व्यक्तियों के दोषी या निर्दोष होने का निर्धारण कानूनी साक्ष्यों के आधार पर नहीं है। पूर्व राजनेता भी सदस्य बनाए जा सकते हैं। लोकपाल को हटाने की पहल सरकार ही कर सकती है और इसे निलंबित करने का तो पूरा अधिकार ही सरकार के पास है। मंत्रियों का मसौदा लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री को बाहर रखता है। लोकपाल बिल का प्रारूप जांच की प्रक्रिया निर्धारित करता है और जांच की शक्ति वाली एजेंसी का गठन करता है। इसमें ऐसे लोगों की जांच की जा सकती है जो भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम के तहत आरोपी हो सकते हैं। इस अधिनियम में प्रधानमंत्री को कोई छूट नहीं है। अगर सीबीआइ या पुलिस प्रधानमंत्री से पूछताछ करना चाहती है तो उन्हें इससे बचने का कोई विशेषाधिकार हासिल नहीं है। सीजर की पत्नी के संदेह से परे होने का सिद्धांत प्रधानमंत्री पर लागू नहीं होता। जनहित के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा या जन सुरक्षा के संदर्भ में फैसलों पर ही संरक्षण मिलना चाहिए। इन मुद्दों से संबंधित मामलों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए, किंतु अगर प्रधानमंत्री किसी सौदे में दलाली खाता है या फिर घूस देकर विश्वास मत हासिल करता है तो उसे दंड के प्रावधान से मुक्त क्यों रखा जाना चाहिए? इसी कारण अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह, दोनों ने बार-बार कहा है कि उन्हें लोकपाल के दायरे में रहने पर कोई आपत्ति नहीं है। वर्तमान में, न्यायिक जवाबदेही का तंत्र या तो खुद न्यायपालिका की अंदरूनी व्यवस्था पर निर्भर करता है या फिर इसके लिए महाभियोग की प्रक्रिया अपनाई जाती है। महाभियोग की प्रक्रिया दुरूह, असामान्य रूप से लंबी और अधिकांश मामलों में निष्प्रभावी है। यह ऐसी प्रक्रिया है जो बिरले मामले में ही अपनाई जाती है। अंदरूनी तंत्र की अपनी सीमाएं व कमजोरियां हैं। भारत इस युग में प्रवेश कर चुका है जहां जजों की नियुक्ति जजों द्वारा की जाती है और महाभियोग को छोड़कर अन्य मामलों में केवल जज ही दूसरे जज को खराब आचरण का दोषी ठहरा सकता है। यह व्यवस्था पूरी तरह विफल सिद्ध हो चुकी है, इसलिए हमें नई व्यवस्था तलाशनी है। इस पर बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। हमें वैकल्पिक तंत्र पर संयत बहस के लिए तैयार रहना चाहिए। सिविल सोसाइटी के कुछ सदस्यों का सुझाव है कि न्यायिक संस्थान भी लोकपाल के दायरे में हों। एक वैकल्पिक सुझाव यह भी है कि जजों की नियुक्तियां और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का अधिकार राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को सौंप देना चाहिए। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली न्यायपालिका की जवाबदेही संबंधी कानूनों में सुधार का सुझाव दे रहे हैं। 2003 में राजग सरकार ने 98वें संविधान संशोधन में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के अधीन करने का प्रावधान किया था। इसके सदस्यों में न्यायपालिका से जुड़े लोगों को प्रमुखता देने के साथ-साथ सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर कानून मंत्री और किसी एक प्रबुद्ध नागरिक को निगरानी कर्ता के रूप में शामिल करने का प्रावधान था। राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन या स्वरूप बहस और व्यापक चर्चा का विषय है। अब समय आ गया है कि इस तरह के आयोग का गठन किया जाए। इसके पास जजों की नियुक्ति करने के अधिकार के साथ-साथ उनका आचरण सही रखने की जिम्मेदारी भी हो। यह न्यायिक लोकपाल हो सकता है। (लेखक राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं).

Tuesday, July 5, 2011

किसे चाहिए लोकतंत्र विरोधी लोकपाल


इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी..स बार आजादी की सालगिरह कुछ अलग किस्म की होने की उम्मीद है। कारण है कि महात्मा गांधी के 21वीं सदी के अवतार अन्ना हजारे ऐलान कर चुके हैं कि अगर 15 अगस्त तक जनलोकपाल विधेयक पारित न किया गया तो वे 16 अगस्त से फिर आमरण अनशन करेंगे। अभी तक के सूरत-ए-हाल संकेत दे रहे हैं कि अन्ना को भूखे रहने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि न तो सरकार और सिविल सोसाइटी के सदस्यों में इस बिल को लेकर सहमति बनी है और न ही किसी राजनीतिक दल ने संसद में अपने रुख पर अपने पत्ते खोले हैं। दूसरा, अगर इस माह किसी प्रारूप पर सबकी सहमति मिल भी गई तो संसद का मॉनसून सत्र एक अगस्त से शुरू होगा और 15 अगस्त से पहले तो यह किसी भी हालत में पारित होने से रहा। सो, अन्ना जी का अनशन तो पक्का है।

यहां सवाल यह है कि क्या लोकपाल बहुत जरूरी है और वह भी उसी शक्ल में जैसा कि अन्ना मंडली चाहती है? जाहिर सी बात है कि इस प्रश्न पर देश भर में गंभीर मतभेद हैं। पहला सवाल तो यही है कि अन्ना मंडली को देश के किस वर्ग का समर्थन हासिल है? क्या अन्ना मंडली देश के संविधान और सवा अरब की आबादी से ऊपर कोई दैवी शक्ति है? अभी तक जो इस मंडली की हरकतें सामने आई हैं उससे तो यही लगता है कि यह मंडली देश के संविधान से ऊपर की कोई चीज है। देश को लोकपाल मिले या न मिले, भ्रष्टाचार मिटे या न मिटे लेकिन अगर यह मंडली अपने मकसद में कामयाब हो गई तो देश का लोकतंत्र हार जाएगा। हमारे संविधान में संसद सवरेपरि है और कोई भी कानून बनाने या निरस्त करने का अधिकार उसी के हाथों केंद्रित है। यह पहली बार हो रहा है कि बाहरी असामाजिक तत्व, जो स्वयं को इस देश का आम नागरिक नहीं मान रहे, वे खुद को सिविल सोसाइटी कह रहे हैं, सरकार के साथ मिलकर कोई कानून बनाने जा रहे हैं। अगर यह परिपाटी पड़ गई तो लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा और दस हजार सफेदपोश संसद के बाहर मजमा लगाकर जब चाहेंगे तभी अपनी सुविधा के मुताबिक कोई नया कानून बना लेंगे। यह सभी राजनीतिक दलों का कत्र्तव्य बनता है कि उनके आपस के चाहे जो राजनीतिक विवाद हों उनसे ऊपर उठकर इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकें। जन लोकपाल विधेयक के विरोध में कुछ प्रमुख कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। पहला यह कि अन्ना मंडली का लोकपाल किसके प्रति उत्तरदायी होगा? क्या यह संसद, संविधान, विधायिका या जनता के प्रति उत्तरदायी होगा? अभी तक लोकपाल का जो स्वरूप इस मंडली ने पेश किया है उसके मुताबिक यह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। फिर क्या यह एक निरंकुश व्यवस्था होगी? इसके चयन की प्रक्रिया में आम जनता की कोई भागेदारी नहीं होगी। कुछ तथाकथित सम्मानित और संभ्रांत लोग इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। इस मंडली के एक प्रपत्र के अनुसार, जनलोकपाल के दस सदस्यों और अध्यक्ष के चयन के लिए एक चयन समिति बनाई जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, दो सबसे कम उम्र के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक व मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे। चयन समिति योग्य लोगों का चयन उस सूची से करेगी, जो उसे सर्च कमेटी द्वारा मुहैया कराई जाएगी। अब इस प्रक्रिया पर करीब से गौर किया जाए तो इसमें जनता की भागीदारी कहां नजर आती है? अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को जनता की भागीदारी माना जा रहा है तब दो सवाल उठते हैं। इस समिति में जनता की भागीदारी अल्पमत की है और नौकरशाहों का वर्चस्व है क्योंकि चयन समिति के आठ सदस्यों में से मात्र दो जनता द्वारा निर्वाचित हैं। तो पहला सवाल यह कि क्या भारत की जनता बेवकूफ है? ऐसा माना भी जा सकता है क्योंकि अन्ना जी का पक्का विश्वास है कि वोटर सौ रुपए की शराब की बोतल पर बिक जाता है! दूसरा सवाल यह कि अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो अन्ना मंडली को जनता के द्वारा चुनी जाने वाली किसी प्रक्रिया पर ऐतराज क्यों है?

इससे भी ज्यादा आपत्ति वाली बात यह ड्राफ्ट आगे कहता है, सर्च कमेटी में दस सदस्य होंगे, जिसका गठन इस तरह होगा - सबसे पहले पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी में से पांच सदस्य चुने जाएंगे। इनमें वे पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी शामिल नहीं होंगे जो दागी हों या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हों या अब भी किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हों। ये पांच सदस्य बाकी पांच सदस्यों का चयन देश के सम्मानित लोगों में से करेंगे, और इस तरह दस लोगों की सर्च कमेटी बनेगी। यहीं इस मंडली का लोकतंत्र विरोधी चेहरा बेनकाब हो जाता है और इसकी जनविरोधी सोच को समझा जा सकता है। इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी। अब जरा इन सम्मनित लोगों की परिभाषा पर भी ध्यान दे लिया जाए। सर्च कमेटी देश के विभिन्न सम्मानित लोगों जैसे संपादकों, कुलपतियों या जिनको वे ठीक समझें, उनसे सुझाव मांगेगी। यानी इस मंडली की नजर में 80 रुपए रोज की दिहाड़ी का मजदूर इस देश का सम्मानित नागरिक नहीं है। सम्मानित संपादक जी हैं, कुलपति हैं या वे जिन्हें यह कमेटी कह दे कि वे सम्मानित हैं।

संसद की सर्वोच्चता की आड़ में


 सबसे पहले सर्वदलीय सम्मेलन के बाद सरकार की ओर से जारी एक पंक्ति के वक्तव्य पर नजर डालिए, सर्वदलीय सम्मेलन इस बात पर सहमत हुआ कि सरकार स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संसद के अगले सत्र में एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल विधेयक लाए। इसमें स्थापित प्रक्रियाओं शब्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका सर्वमान्य अर्थ कानून बनाने में संसद की सर्वोच्चता को हर हाल में बनाए रखना है, लेकिन लोकपाल के गठन को लेकर अन्ना हजारे के अनशन तथा उनके समूह के साथ सरकार की बातचीत के आलोक में विचार करें तो यह आगे की प्रक्रिया में उनकी किसी प्रकार की भूमिका के निषेध की मुखर घोषणा है। सरकार की ओर से पिछले कुछ दिनों से यह तर्क दिया जा रहा था कि गैर-निर्वाचित लोगों का कोई समूह विधेयक के मामले में अपना विचाार नहीं थोप सकता। सरकार और विपक्ष के बीच लोकपाल विधेयक पर गहरे मतभेदों के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति कायम हुई। सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर तलवार खींचने वाली भाजपा ने कहा कि विधेयक के कई मुद्दों पर सरकार के साथ उनके मतभेद हैं, पर सरकार मानसून सत्र में विधेयक लाए और इसे संसद की स्थायी समिति को भेजे। संसद की स्थायी समिति को भेजने का अभिप्राय सामान्यत: संसद की सर्वोच्चता की प्रतिष्ठित करना है। जिन अन्य दलों ने सरकार द्वारा तैयार विधेयक के कई प्रावधानों से असहमति व्यक्त की और अन्ना समूह द्वारा प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया, उन सबकी राय भी यही थी कि कोई बाहरी तत्व यह तय नहीं कर सकता कि संसद कैसा कानून बनाए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन इसके प्रावधानों पर विचार कर इसका एक सर्वसम्मत रूप तैयार करने की जगह संसद बनाम तथाकथित नागरिक समाज में संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की सर्वसम्मति वाली बैठक में परिणत हो गई। संसद की सर्वोच्चता वास्तव में राजनीतिक प्रतिष्ठान की ही सर्वोच्चता है। इस परिणति को हम कतई अस्वाभाविक नहीं कह सकते। अन्ना हजारे और उनके साथी इस बैठक के पूर्व जन लोकपाल पर राजनीतिक समर्थन पाने के लिए दलों के नेताओं से अवश्य मिल रहे थे, लेकिन कहीं से इनके समर्थन में कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं पड़ रही थी। वास्तव में राजनीतिक दलों में यह राय बन चुकी थी कि इस कथित नागरिक समाज को ज्यादा महत्व देना राजनीतिक प्रतिष्ठान को नजरअंदाज करने जैसा है। सर्वदलीय बैठक में इसकी प्रतिध्वनि लगातार सुनी गई। राजद अध्यक्ष लालू यादव ने तो यहां तक कह दिया कि हम 121 करोड़ नागरिकों का मत लेकर जीतते हैं, ये सिविल सोसाइटी वालों को कहां से इतना समर्थन है। सपा ने तो अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ बातचीत को ही गैरजरूरी बताया। बैठक में इसके विरुद्ध निर्मित माहौल का ही परिणाम था कि वित्तमंत्री एवं दस्तावेज तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को यह कहना पड़ा कि सरकार कभी भी कानून बनाने की स्थापित प्रक्रिया से छेड़छाड़ नहीं करना चाहती थी। वह बातचीत विमर्श और सुझाव का इससे एक अलग नया प्रयोग था। ध्यान रखने की बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा अपने निवास पर बुलाई गई इस बैठक में सरकार की ओर से अपने मसौदे के साथ अन्ना समूह द्वारा तैयार मसौदा भी रखा गया था। किसी दल ने उस मसौदे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। इसका व्यावहारिक अर्थ यही हुआ कि तथाकथित जनलोकपाल वाला मसौदा राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत हो चुका है। ज्यादातर विपक्षी नेताओं की रणनीति यही थी कि इस बैठक में किसी प्रारूप पर चर्चा की ही न जाए और संसद में विधेयक पेश होने के बाद अपना मत व्यक्त करें। जाहिर है, संसद में सरकार अपना मसौदा पेश करेगी और उसी पर चर्चा होगी। दूसरे शब्दों में जन लोकपाल के नाम से तैयार मसौदे के राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता अब बंद हो चुका है। नेताओं का तेवर देखिए तो अन्ना हजारे चाहें तो अनशन करें, लोकपाल गठन के मामले में केवल और केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण का ही महत्व होगा। बैठक की इस परिणति के आलोक में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसके द्वारा संसद के महत्व के बहाने राजनीतिक प्रतिष्ठान ने अपनी वरीयता बनाए रखना सुनिश्चित किया है। प्रश्न है कि क्या राजनीतिक दलों का यह रवैया उचित है? क्या यह हमारे लोकतंत्र के हित में है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बैठक में कही गई दो बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। एक, लोकपाल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कमतर नहीं कर सकता। दो, हमारा संविधान एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में परस्पर संतुलन की व्यवस्था पर कायम है और लोकपाल को इसी ढांचे में अपनी उचित जगह तलाशनी होगी। निस्संदेह, जन लोकपाल का मसौदा संविधान द्वारा निर्मित कई संस्थाओं की भूमिका को कमजोर करता है और इसमें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच का संतुलन चरमरा देने का अंश भी निहित है। देश को उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल जैसी संस्था चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ऐसी किसी संस्था के सुपर सरकार की हैसियत नहीं होनी चाहिए। किंतु सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के रवैये से लोकपाल का प्रश्न गौण हो गया है। लोकतंत्र का चरित्र और इसकी भूमिका सर्वाधिक अहम प्रश्न बनकर उभरा है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिष्ठान को हाशिए पर धकेलना या उसे महत्वहीन करना कतई उचित नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में लोक हर पहलू का केंद्रबिंदु है और चुनाव द्वारा जिनका निर्वाचन होता है, वे इस प्रणाली में लोक प्रतिनिधि हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निजी या सामूहिक, संसद या संसद के बाहर की अपनी हर भूमिका में लोकेच्छा को ही प्राथमिकता देंगे। संविधान में बेशक कानून बनाने या संविधान में संशोधन आदि की प्रक्रिया को संसद एवं राज्य विधायिकाओं तक सीमित रखा गया है। संसद में विधेयक पेश करने एवं पारित करने की संवैधानिक प्रक्रिया में कहीं पर नागरिक समाज की भूमिका का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसमें कहीं नहीं कहा गया है कि अगर आप देश के नागरिकों के किसी समूह से बातचीत करते हैं, उनसे विधेयक के किसी मसौदे पर चर्चा करते हैं, उनका सुझाव लेते हैं या उनका मसौदा संसद के पटल पर रखते हैं तो वह प्रक्रिया का उल्लंघन हो जाएगा या संविधान विरोधी होगा। हम अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के अपने अभियान एवं विचार-विमर्श से पहले राजनीतिक दलों को बिल्कुल अलग रखने या उनको अस्पृश्य मान लेने के रवैये से कतई सहमत नहीं, उनके कथित जन लोकपाल को भी हम जनता का मसौदा मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन उनके अनशन का सरकार द्वारा संज्ञान लेना या उनसे बातचीत करना तो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक स्पंदनशीलता का परिचायक माना जाना चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि सरकार ने केवल एक रणनीति के तहत उनसे बातचीत की, पर कुछ नेताओं ने इसके प्रति जिस हिकारत भाव का प्रदर्शन किया, वह खतरनाक है। सरकार के निर्णयों से अगर हम असंतुष्ट हैं या हम कोई कानून चाहते हैं तो हमारे सामने पहला रास्ता किसी तरह सरकार तक अपनी मांग पहुंचाना और न मानने पर कानून के दायरे में विरोध करना है। विरोध का सरकार द्वारा संज्ञान एवं बातचीत की निंदा किसी स्वस्थ राजनीतिक प्रतिष्ठान की पहचान नहीं हो सकती। राजनीतिक दलों का यह व्यवहार साबित करता है कि हमारे लोकतंत्र का चरित्र व्यवहार में अलोकतांत्रिक होता जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Saturday, July 2, 2011

उत्तरदायित्वविहीन व्यवस्था


देश में लोकतंत्र को जीवंत रखने के लिए शासन प्रणाली में बदलाव की वकालत कर रहे हैं लेखक
सन 1935 में अंग्रेजों के बनाए ब्रिटिश इंडिया एक्ट पर ही हमारी राजनीतिक व्यवस्था आधारित है। अर्थात जो व्यवस्था एक विदेशी, औपनिवेशिक सत्ता ने मूलत: अपने उद्देश्य से बनाई, वही स्वतंत्र भारत में अपना ली गई। संविधान निर्माताओं ने 1950 में जो राजनीतिक तंत्र अंगीकार किया, वह एक औपचारिकता थी। देश में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद पहले से कार्यरत थे। ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली यहां अपनाने का निर्णय पहले ही हो चुका था। संविधान सभा ने उस पर केवल मुहर लगाई। किंतु हमने इस आयातित संसदीय प्रणाली के शरीर को तो अपनाया, उसकी आत्मा को नहीं। सिद्धांत, व्यवहार का यह दोहरापन स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था की एक बुनियादी दुर्बलता रही है। यह दोहरापन स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से भारतीय नेतृत्व में था। कांग्रेस पार्टी की सांगठिक पद्धति संसदीय या समितिवादी थी, किंतु वास्तविक कार्यसंचालन एक प्रकार की अध्यक्षीय सत्ता करती थी। सभी महत्वपूर्ण निर्णय कोई आलाकमान लेता था। चाहे वह आला व्यक्ति पार्टी के किसी पद पर भी न हो! यह कड़वा सत्य स्वीकार करना होगा कि महात्मा गांधी जिस तरह कांग्रेस पार्टी को चलाते थे, वह ब्रिटिश लेबर या कंजरवेटिव पार्टी में अकल्पनीय था। किंतु यही लाक्षणिक उदाहरण भी है कि यूरोपीय सांगठनिक नियम और भारतीय मिजाज का मेल नहीं बैठता था। यह बेमेल स्थिति आज देश के लिए नई-नई समस्याएं पैदा कर रही है। स्वतंत्रता से पहले भी कांग्रेस के सिद्धांतों और नेताओं के आचरण में विरोधाभास था। कांग्रेस में महात्मा गांधी इस विरोधाभासी व्यवहार का बड़ी कुशलता से दुरुपयोग करते थे। यही दोहरापन और अंतर्विरोध स्वतंत्र भारत में पूरी राजनीतिक प्रणाली में स्थानांतरित हो गया। स्वयं प्रथम प्रधानमंत्री तय किए जाने की प्रक्रिया इसकी गवाह बनी, जब कांग्रेस नेताओं की पहली पसंद न होने के बावजूद गांधीजी ने नेहरू को कांग्रेस और देश पर थोपा। फिर नेहरू ने यही शैली सरकार चलाने में अपनाई। 1950 में ही वल्लभभाई पटेल का निधन हो जाने के बाद उन्हें और आसानी हो गई। सारे महत्वपूर्ण फैसले नेहरू लेते थे। कई बार मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णयों को केवल सूचित भर किया जाता था। इस मनोहर पद्धति से निर्णयों के दुष्परिणामों की सीधी जिम्मेदारी उठाने से भी नेहरू बच जाते थे। चूंकि सभी निर्णय मंत्रिपरिषद के थे, सो पूरी मंत्रिपरिषद उसका बचाव करने को बाध्य हो जाती थी। कश्मीर, तिब्बत, पंचशील, चीन, समाजवाद, अमेरिका आदि मामलों में यह दोहरापन साफ नजर आता है। अत: सिद्धांत-व्यवहार में दोहरेपन ने एक ऐसी विकृति पैदा की, जिसने जल्द ही हमारे पूरे राजनीतिक तंत्र को ग्रस लिया। यदि सर्वोच्च स्तर पर कोई भयंकर भूल करके भी बच सकता था, तो नीचे के लिए भी वही उत्तरदायित्व विहीन अधिकार-भोग की शैली बन जाना स्वभाविक था। ध्यान दें, ऐसा ब्रिटिश संसदीय व्यवहार में नहीं होता था। गलतियां करने वाला वायसराय या कोई भी अधिकारी बिना दंड पाए नहीं रहता था। इस प्रकार, समय के साथ हमारे देश के राजनीतिक तंत्र में संसदीय तंत्र एक मुखौटा सा रहा, जबकि वास्तविक व्यवस्था अघोषित रूप से अध्यक्षीय जैसी रही। न केवल सरकार, बल्कि दलों के कार्यचालन में भी। गांधी, नेहरू से लेकर बीजू, सिद्धार्थ शंकर रे, एनटी रामाराव, जयललिता, लालू, मुलायम, मायावती, करुणानिधि और सोनिया गांधी तक अनेक नेताओं ने उसी शैली को अपनाया। दिखाने के लिए समिति, किंतु वास्तव में एक व्यक्ति सर्वाधिकार रखता रहा। परिणामत: एक अनुत्तरदायी अध्यक्षीय तंत्र बना, जिसमें न संसदीय प्रणाली की आत्मा है, न अध्यक्षीय प्रणाली का लाभ। बल्कि इसमें दोनों की कमियां मौजूद हैं। नतीजे में हमारे यहां ऐसे शासन प्रमुख हो जाते हैं, जो बार-बार कह सकते हैं कि उन्हें निर्णयों के बारे में मालूम नहीं है। जबकि ऐसे स्वच्छंद नेता, मंत्री, अफसर भी होते हैं जो सारे निर्णय लेकर भी उसके दुष्परिणामों के उत्तरदायित्व से बचे रहते हैं। यह सभी स्तरों पर हो रहा है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि सोनिया गांधी और महात्मा गांधी की शासन शैली में समानताएं हैं। इनमें संसदीय और अध्यक्षीय प्रणाली का अघोषित पर खतरनाक घालमेल रहा है। इससे वर्तमान भारतीय संसदीय तंत्र एक अकार्यकुशल, किंतु अत्यंत खर्चीला बोझ हो गया है। अधिकांश सांसद समुचित कानून बनाने तथा सुसंगत नीति-निर्माण के अलावा बाकी सारे काम करते रहते हैं। इसी प्रकार, महंगी चुनाव प्रक्रिया के बाद देश को एक समर्थ, कार्यकुशल शासक के बजाए मात्र एक उच्च वेतन-सुविधा भोगी सामान्य प्रशासक मिलता है। दलीय उठापटक के दौर में सासंदों, मंत्रियों और नेताओं का पूरा ध्यान इसी नाजुक सत्ता-संतुलन को बनाए रखने या बिगाड़ने में रहता है। परिणामत: शासन कार्य उपेक्षित, बाधित रहता है। देश में चल रही खिचड़ी, उत्तरदायित्वहीन व्यवस्था से कई क्षेत्रों में अराजक स्थिति पैदा हो गई है। जिसका लाभ देशी-विदेशी शत्रु उठाते हैं। आंतरिक सुरक्षा, वैदेशिक संबंध, शिक्षा आदि क्षेत्र इससे बहुत प्रभावित हो रहे हैं। इस बीच, भारतीय नौकरशाही का विशाल तंत्र मानो स्वायत्त हो चुका है। वह प्राय: अपनी इच्छा से चलता है, और स्वयं अपना ख्याल रखना ही उसका प्रमुख कार्य है। विशेषकर आईएएस तथा आईएफएस संगठनों का विशिष्ट क्षेत्र है जिन्हें किसी अकर्मण्यता, कमी या गलती का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सांसदों की अयोग्यता, अनिच्छा के कारण नीति-निर्माण प्राय: उच्च नौकरशाह ही करते हैं। नीतियों के प्रारूप वही जैसे-तैसे बनवाते हैं और संसद में बिना वास्तविक छान-बीन के वही निर्णय बन जाते हैं। लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए वर्तमान संसदीय प्रणाली के स्थान पर अध्यक्षीय प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है। अन्यथा उत्तदायित्व-विहीन राजभोग तथा कई मामलों में दिशाहीन शासन का रोग दूर होने वाला नहीं है। वर्तमान संसदीय प्रणाली की तुलना में अध्यक्षीय प्रणाली अधिक पारदर्शी, उत्तरदायित्वपूर्ण और कम खर्चीली है। अध्यक्षीय प्रणाली में अध्यक्ष को निर्णय लेने और उसका पालन करवाने के लिए ही सीधे चुना जाता है। उसी के हाथ सारे अधिकार भी रहते हैं। कार्यकाल नियत रहने, उसकी संख्या भी सीमित रहने से वह अनावश्यक दबावों से मुक्त रहता है। उसे अपने उत्तरदायित्व का भी सीधा भान रहता है क्योंकि संसद ही नहीं, देश के सामने भी वही हर सही-गलत का उत्तरदायी होता है। सासंदों की भूमिका सीमित होने से राज्यतंत्र में बिखराव और भ्रष्टाचार की संभावना भी बहुत घट जाती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Friday, July 1, 2011

क्या बुराई है जनमत संग्रह कराने में


अपनी कालजयी कृति द प्रिंस में मैकियावली लिखते हैं, किसी व्यवस्था में नयापन लाने की तुलना में ऐसा कोई काम नहीं है, जिसकी शुरुआत कठिनाई भरी हो या जिसे लागू करना अत्यंत जोखिम भरा। एक कारगर लोकपाल संस्था के गठन पर चल रही खींचतान से मुक्ति पाने के लिए जनमत संग्रह का सुझाव पहली नजर में कठिनाई और जोखिम भरा प्रतीत हो सकता है, लेकिन यह असंभव एवं अव्यावहारिक नहीं है। क्या भ्रष्टाचार के आरोपी की राजनीतिक हैसियत देखकर उसके खिलाफ जांच की जानी चाहिए? इस प्रश्न पर जनमत संग्रह के सुझाव को संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं के विपरीत और स्वप्नदर्शी करार देकर खारिज कर दिया जाए, इससे पहले कुछ पहलुओं पर गौर करना प्रासंगिक होगा। भले ही ब्रिटेन ने भारत पर दो सौ साल राज किया, अनगिनत अत्याचार किए, बेहिसाब धन-दौलत लूटी। लेकिन आजाद भारत बहुत मायने में ब्रिटेन का ऋणी है। संसदीय लोकतंत्र पर आधारित शासन व्यवस्था, न्याय पद्धति और शिक्षा प्रणाली हमने विरासत में अंग्रेजों से ही ग्रहण की है। इस विरासत के शुभ और अशुभ को देखने का नजरिया क्या हो, बेशक इस पर एक राय नहीं हो सकती। हमारे प्रधानमंत्री तो इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से ही देखते हैं। स्मरण रहे कि 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में मानद उपाधि ग्रहण करते हुए जो भाषण दिया, उसमें ब्रिटिश साम्राज्य के कई लाभकारी परिणामों को उन्होंने सहर्ष और बेहिचक स्वीकार किया था। भारत में विद्यमान विधि का शासन, संवैधानिक सरकार, आजाद प्रेस, पेशेवर सिविल सेवा और आधुनिक विश्वविद्यालयों की तारीफ करते हुए प्रधानमंत्री ने गर्व से कहा था कि हमारी न्यायपालिका, हमारी कानून व्यवस्था, हमारी नौकरशाही और हमारी पुलिस वे महान संस्थाएं हैं, जो ब्रिटिश भारतीय प्रशासन से ली गई हैं। यह बात अलग है कि प्रधानमंत्री के इस भाषण की देशभर में जमकर आलोचना हुई थी। बहरहाल, आज जब संप्रग सरकार, विपक्षी दल, मीडिया, सिविल सोसायटी, बुद्धिजीवियों और मध्यम वर्ग में सशक्त लोकपाल पर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है तो क्या हमें एक बार फिर से ब्रिटेन से मार्गदर्शन नहीं लेना चाहिए? यह दोहराना अप्रासंगिक नहीं है कि लोकतंत्र कोई ऐसा सिद्धांत नहीं है, जिसे किसी जमे हुए स्थायी ढंाचे में रख दिया जाए। यह तो अत्यंत गतिशील एवं निरंतर परिवर्तनशील विचारधारा है। जब यह तथ्य सर्वविदित है कि हमारा लोकतंत्र बहुत हद तक ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है तो वहां हो रहे नए घटनाक्रमों से हम बेखबर नहीं रह सकते। पिछले मई महीने ही ब्रिटेन ने अपने संसदीय इतिहास में उस हथियार का सहारा लिया, जो वहां की शासन परंपरा का स्थापित हिस्सा नहीं है। मई के प्रथम सप्ताह में ब्रिटेन की सरकार ने एक जनमत संग्रह कराया, जिसके जरिए जनता से यह पूछा गया कि वह अपने देश में वैकल्पिक मत की मतदान प्रणाली लागू करना चाहती है या नहीं। जनता ने इसे ठुकरा दिया। गौरतलब है कि भारत की तरह ही ब्रिटेन में सामान्य बहुमत की मतदान प्रणाली प्रचलित है, जिसके तहत किसी चुनाव क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत प्राप्त करने वाला प्रत्याशी विजेता घोषित हो जाता है। इस प्रणाली की यह कहकर आलोचना की जाती है कि इससे बहुमत का अपमान होता है, क्योंकि हारने वाले सभी प्रत्याशियों के कुल मत हमेशा जीतने वाले प्रत्याशी के मतों से बहुत ज्यादा होते हैं। यही नहीं, साधारण बहुमत प्रणाली में समाज के अल्पसंख्यक और शोषित वर्गो को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। मतदान प्रणाली में बदलाव की मांग ब्रिटेन में काफी समय से उठती रही है। पिछले साल गठबंधन सरकार बनाते समय ही दो प्रमुख घटक दलों कंजरवेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेट्स में यह तय हो गया था कि वैकल्पिक मत प्रणाली को लागू करने के संदर्भ में जनमत संग्रह कराया जाएगा। इसके लिए कानूनी प्रावधान होना जरूरी था। लिहाजा, फरवरी 2011 में ब्रिटिश संसद ने जनमत संग्रह कराने के लिए बाकायदा एक कानून पारित कर दिया। मई 2011 में कराए गए हां/ना वाले इस जनमत संग्रह में यह सवाल पूछा गया था कि वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम, हाउस ऑफ कॉमंस के संासदों को चुनने के लिए फ‌र्स्ट पास्ट द पोस्ट (साधारण बहुमत) व्यवस्था का प्रयोग करता है। क्या इसके स्थान पर अल्टरनेटिव वोट (वैकल्पिक मत) प्रणाली अपनाई जानी चाहिए? जनमत संग्रह के लिए चुनाव अभियान में जहां लिबरल डेमोक्रेट्स ने वैकल्पिक मत प्रणाली का समर्थन किया, वहीं कंजरवेटिव पार्टी ने उसका विरोध। यही कारण था कि प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने, जो कि कंजरवेटिव पार्टी के हैं, प्रस्ताव के विपक्ष में और उपप्रधानमंत्री निक क्लेग ने, जो कि लिबरल डेमोक्रेट हैं, प्रस्ताव के पक्ष में प्रचार किया। पिछली लेबर सरकार तो 2010 के आम चुनाव से पहले ही वैकल्पिक मत प्रणाली लागू करना चाहती थी, लेकिन जनमत संग्रह में रखे गए प्रस्ताव पर उसका रवैया काफी हद तक ढुलमुल ही रहा। अन्य छोटे दल इस मुद्दे पर बंटे हुए थे। जबरदस्त अभियान और बहसबाजी के बाद हुए चुनाव में करीब 42 प्रतिशत मतदान हुआ। प्रस्ताव के खिलाफ 68 प्रतिशत मत पड़े। वैसे ब्रिटेन में प्रांतीय एवं स्थानीय स्तर पर जनमत संग्रह कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह ब्रिटेन का केवल दूसरा राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह था। इससे पहले जून 1975 में यूरोपीय समुदाय की सदस्यता के सवाल को लेकर एडवर्ड हीथ की सरकार ने जनमत संग्रह कराया था। दरअसल लेबर पार्टी ने 1974 में अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वादा किया था कि जनता ही बैलेट बॉक्स के जरिये तय करेगी कि उसे यूरोपीय समुदाय में रहना है या नहीं। 67 प्रतिशत मतदाताओं ने प्रस्ताव का समर्थन किया था। केवल आम चुनाव ही लोकमत का प्रतिबिंब नहीं हो सकते। लगभग सभी लोकतांत्रिक देश, खासकर पश्चिमी जगत अनेक महत्वपूर्ण या विवादास्पद मुद्दों पर जनमत संग्रह कराते रहे हैं। दरअसल, जनमत संग्रह लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाते हैं। अगर संसदीय लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन चार दशक के बीच दो बार जनमत संग्रह करा सकता है तो हम छह दशक बाद भी एक बार जनमत संग्रह कराने का साहस क्यों नहीं बटोर पाए हैं। जो जनता चुनावों के जरिये अपनी सरकार को चुनने की परिपक्व क्षमता रखती है, क्या वह जनमत संग्रह के जरिये इस सवाल का जवाब देने की भी सूझबूझ नहीं रखती कि आम आदमी और खास आदमी के खिलाफ भ्रष्ट आचरण की जांच का पैमाना अलग-अलग होना चाहिए या नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).