पिछले एक दशक में देश में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है। जहां दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है वहीं पृथ्वी के कुल धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही उसके पास है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के आर्थिक- सामाजिक विकास के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक है कि इस समय देश की एक तिहाई आबादी भूख के साये में आगे बढ़ रही है। बढ़ती जनसंख्या के कारण गरीबी और भूख की समस्या मिटाने के सारे लक्ष्य फेल हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में जन्मदर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अत: गरीब वर्ग का विस्तार होता जा रहा है। स्पष्ट है कि देश में बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से अनाज की मांग बढ़ रही है। 2010-11 में 23.58 करोड़ टन अनाज उत्पादन हुआ है और 2020 तक देश के लिए 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी जिसे उत्पादित करना चुनौतीपूर्ण होगा। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन के अनुसार भारत में खाद्यान्न उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग, मानसून के धोखे, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त खाद्यान्न के अभाव में भारत में भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। यहां भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक (23 करोड़ 30 लाख) है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विकसित देशों के ऑग्रेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देशों की अपेक्षा भारत जैसे विकासशील देशों में खाद्यान्न परिदृश्य पर चिंता बढ़ गई है। खाद्यान्न के लिए विश्व बाजार पर विकासशील देशों की निर्भरता में वृद्धि होगी और कीमतों में वृद्धि से जन जीवन प्रभावित होने की आशंका है। इसमें दो राय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्य सामग्रियों के दुगुने बढ़े दामों के कारण भूखों तक अनाज नहीं पहुंच रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की मांग पूरा करने के लिए कृषि वृद्धि दर बढ़ाने की जरूरत है। आंकड़े बताते हैं कि पहली पंचवर्षीय योजना यानी 1950-51 से लेकर 2010-11 तक जीडीपी की वृद्धि दर 300 फीसद रही लेकिन कृषि क्षेत्र की सिर्फ 75 फीसद। यानी कृषि क्षेत्र में एक और हरित क्रांति की जरूरत है। इसके तहत कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ खेती में लगे प्रति व्यक्ति की उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए आधारभूत सुविधाएं मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है बिजली और सड़क-व्यवस्था दुरुस्त करना। साथ ही कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन, मार्केटिंग और विपणन आदि को आधुनिक बनाया जाना जरूरी है। बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में हमें आम आदमी के लिए उसकी क्रय शक्ति के अनुरूप रोटी की उपलब्धता संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु आजादी के बाद उत्तरी राज्यों में कृषि संबंधी शोध तथा बेहतर तकनीक के ईजाद के लिए गठित मृतप्राय हो चुकी सरकारी एक्सटेंशन एजेंसियां पुनर्जीवित करनी होंगी। किसानों तक हरित क्रांति विषयक नये शोध, वैज्ञानिक विचार और तकनीक पहुंचानी होंगी। उन तक कृषि शिक्षा, रासायनिक खाद के स्वरूप, गुण-दोष और गलत प्रयोग के खतरों से संबंधित उपयोगी जानकारियां पहुंचानी होंगी। देश की मंडियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खाद्यान्न संबंधी खुली खरीद को नियंत्रित करना होगा। किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु सिंचाई योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए। कुल मिलाकर बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के हरसंभव प्रयासों के साथ जनसंख्या नियंतण्रके बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।
Wednesday, April 20, 2011
बढ़ती आबादी यानी खाद्य संकट
पिछले एक दशक में देश में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है। जहां दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है वहीं पृथ्वी के कुल धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही उसके पास है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के आर्थिक- सामाजिक विकास के लिए खतरे की घंटी है। चिंताजनक है कि इस समय देश की एक तिहाई आबादी भूख के साये में आगे बढ़ रही है। बढ़ती जनसंख्या के कारण गरीबी और भूख की समस्या मिटाने के सारे लक्ष्य फेल हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में जन्मदर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अत: गरीब वर्ग का विस्तार होता जा रहा है। स्पष्ट है कि देश में बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से अनाज की मांग बढ़ रही है। 2010-11 में 23.58 करोड़ टन अनाज उत्पादन हुआ है और 2020 तक देश के लिए 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी जिसे उत्पादित करना चुनौतीपूर्ण होगा। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन के अनुसार भारत में खाद्यान्न उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग, मानसून के धोखे, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त खाद्यान्न के अभाव में भारत में भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। यहां भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक (23 करोड़ 30 लाख) है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विकसित देशों के ऑग्रेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देशों की अपेक्षा भारत जैसे विकासशील देशों में खाद्यान्न परिदृश्य पर चिंता बढ़ गई है। खाद्यान्न के लिए विश्व बाजार पर विकासशील देशों की निर्भरता में वृद्धि होगी और कीमतों में वृद्धि से जन जीवन प्रभावित होने की आशंका है। इसमें दो राय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले तीन सालों में दुनिया में खाद्य सामग्रियों के दुगुने बढ़े दामों के कारण भूखों तक अनाज नहीं पहुंच रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न की मांग पूरा करने के लिए कृषि वृद्धि दर बढ़ाने की जरूरत है। आंकड़े बताते हैं कि पहली पंचवर्षीय योजना यानी 1950-51 से लेकर 2010-11 तक जीडीपी की वृद्धि दर 300 फीसद रही लेकिन कृषि क्षेत्र की सिर्फ 75 फीसद। यानी कृषि क्षेत्र में एक और हरित क्रांति की जरूरत है। इसके तहत कृषि भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के साथ खेती में लगे प्रति व्यक्ति की उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए आधारभूत सुविधाएं मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है बिजली और सड़क-व्यवस्था दुरुस्त करना। साथ ही कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन, मार्केटिंग और विपणन आदि को आधुनिक बनाया जाना जरूरी है। बढ़ती जनसंख्या के परिप्रेक्ष्य में हमें आम आदमी के लिए उसकी क्रय शक्ति के अनुरूप रोटी की उपलब्धता संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु आजादी के बाद उत्तरी राज्यों में कृषि संबंधी शोध तथा बेहतर तकनीक के ईजाद के लिए गठित मृतप्राय हो चुकी सरकारी एक्सटेंशन एजेंसियां पुनर्जीवित करनी होंगी। किसानों तक हरित क्रांति विषयक नये शोध, वैज्ञानिक विचार और तकनीक पहुंचानी होंगी। उन तक कृषि शिक्षा, रासायनिक खाद के स्वरूप, गुण-दोष और गलत प्रयोग के खतरों से संबंधित उपयोगी जानकारियां पहुंचानी होंगी। देश की मंडियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खाद्यान्न संबंधी खुली खरीद को नियंत्रित करना होगा। किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु सिंचाई योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए। कुल मिलाकर बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के हरसंभव प्रयासों के साथ जनसंख्या नियंतण्रके बारे में भी गंभीरता से सोचना होगा।
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