विधानसभा चुनावों एवं जम्मू-कश्मीर के स्थानीय चुनावों में मतदाताओं की लम्बी कतारों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। तमिलनाडु में 1967 के बाद सबसे ज्यादा करीब 79 प्रतिशत मतदान हुआ है। '67 में 75.67 प्रतिशत मतदान हुआ था। केरल में 75 प्रतिशत से ज्यादा, असम में करीब 76 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 84 प्रतिशत एवं दूसरे चरण में 85 प्रतिशत से भी अधिक तथा पुडुचेरी में करीब 86 प्रतिशत मतदान हुआ है। तमिलनाडु के करूर जिले में 86 प्रतिशत से ज्यादा तो केरल के कोझिकोड में 81.30 प्रतिशत एवं असम के धुबरी में 85.65 प्रतिशत मतदान हुआ। हालांकि इन राज्यों के पिछले विधानसभा चुनाव में भी रिकॉर्ड मतदान हुआ था। असम में 75.72 प्रतिशत, केरल में 72.38 प्रतिशत, तमिलनाडु में 70.82 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल में 81.97 प्रतिशत मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाया था किंतु इस बार मतदाताओं की संख्या उससे ज्यादा होना काफी महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में 10 सालों के बाद हो रहे स्थानीय चुनावों के दो चरणों में क्रमश: 77 एवं 81.2 प्रतिशत मतदान होना असाधारण है। पिछले लोकसभा चुनाव से अगर तुलना करें तो पहली नजर में ये आंकड़े विश्वसनीय ही नहीं लगेंगे। लोकसभा चुनाव में औसत मतदान 58 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा था। यानी 17 से 22 प्रतिशत का अंतर। जम्मू-कश्मीर के 2008 के विधानसभा चुनाव में करीब 50 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो दो चरणों का औसत 29 प्रतिशत ज्यादा है। हिंसाग्रस्त और सीमापार से राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की तमाम कोशिशों के बीच इतना भारी मतदान पूरी दुनिया के लिए आश्र्चयजनक है। तीन प्रश्नों को आधार बनाकर हम इसका निहितार्थ समझ सकते हैं। पहला-ऐसा क्यों हुआ? दूसरा-इसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि क्या है? और तीसरा- संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीति की दृष्टि से यह किस बात का संकेतक है? गहराई से देखें तो ये तीनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हैं, क्यों हुआ-का उत्तर चुनाव आयोग ने एक समान दिया है। मलसन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओें ने अच्छा काम किया, लोगों तक जाकर वे उन्हें मतदान का महत्व समझा पाए, युवाओं ने भारी संख्या में मतदान किया, चुनाव आयोग के लोकजागरण अभियान का असर हुआ एवं उसकी सख्ती, धन जब्त करने आदि से चुनाव का माहौल बना। पहले मतदाताओं को मतदान केंद्र तक आने के लिए प्रेरित करने के पीछे केवल राजनीतिक पार्टियों की भूमिका होती थी; अब चुनाव आयोग के एजेंट भी यह भूमिका निभा रहे हैं और अनेक मीडिया तथा गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठन भी। 2006 के बाद जुड़े युवा मतदाताओं ने जिनकी संख्या 15 से 20 प्रतिशत है, मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह दिखाया है। लगभग 40 प्रतिशत मतदाता 35 वर्ष से कम उम्र के हैं। युवाओं में मतदान के प्रति ज्यादा उत्साह है क्या नई पीढ़ी में संसदीय लोकतंत्र एवं राजनीतिक पण्राली के प्रति गहरी आस्था है जिससे प्रेरित होकर वे मतदान कर रहे हैं? एक निष्कर्ष यह है कि वे शासन को लेकर अपनी पूर्व पीढ़ी से ज्यादा जागरूक हैं। मतदान केंद्रों की कतार पर खड़े युवाओं से प्रश्न करने पर वे यह तो कहते हैं कि 'हम अपने अधिकार का उपयोग करना चाहते हैं और हमारे सामने भाग्य का फैसला करने का यह सबसे बड़ा हथियार है' किंतु इसके बारे में बहुत स्पष्ट राजनीतिक विचार सुनने को नहीं मिलता। सच कहें तो एक सामूहिक कारण या सोच की एक प्रवृत्ति ढूंढनी मुश्किल है। कश्मीर में यह लोकतांत्रिक पण्राली के प्रति विश्वास का संकेत माना जा सकता है, किंतु यह विश्लेषण भी स्थानीय चुनाव की मूल प्रवृत्तियों का सरलीकरण होगा। वास्तव में भारी मतदान भारतीय समाज के ऐसे जटिल सामूहिक मनोविज्ञान की परिणति है, जिसकी हम अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर सकते हैं। चुनाव शास्त्र की सामान्य धारणा के अनुसार मतदाताओं की संख्या बढ़ना सत्तारूढ़ पार्टी को बनाये रखने का संकेत नहीं माना जाता। इस आधार पर चारों राज्यों में राजनीतिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है। लेकिन तमिलनाडु में पिछले पांच विधानसभा चुनावों में हर बार सत्ता बदली है और उसका मतदाताओं की संख्या बढ़ने से कोई लेना-देना नहीं रहा है। हालांकि विडम्बना देखिए कि '67 में जब रिकॉर्ड मतदान हुआ था तो पहली बार द्रमुक कांग्रेस को पराजित कर सत्ता में पहुंची थी। चुनाव में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब मतदान का प्रतिशत बढ़ा एवं सत्तारूढ़ घटक ही शासन में वापस आया। बिहार विधानसभा चुनाव इसका ज्वलंत उदाहरण है। जब मतदान की संख्या में कमी आने की प्रवृत्ति या सामान्यत: कम मतदान की परम्परा का अंत हो जाए तो मतदान प्रतिशत के आधार पर राजनीतिक आकलन कठिन हो जाता है। यही हमारे यहां हो रहा है। बावजूद इसके, इस समय तमिलनाडु से लेकर केरल एवं पश्चिम बंगाल में बदलाव की प्रवृत्ति महसूस की जा रही है। हालांकि असम में बदलाव की ऐसी आक्रामक सामूहिक प्रतिध्वनि नहीं सुनाई पड़ी है, जैसी इन तीन राज्यों में। इसलिए वहां की तस्वीर थोड़ी धुंधली है। भारी मतदान का एक राजनीतिक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि परिणाम निर्णायक आएगा। इस परिणाम का असर संप्रग के आंतरिक समीकरण पर पड़ना निश्चित है। कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु में द्रमुक के तथा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के छोटे साझेदार के तौर पर चुनाव मैदान में है। इन दोनों के कुल 37 सांसद संप्रग सरकार की रीढ़ हैं। तृणमूल कांग्रेस 19 सांसदों के साथ कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी तथा द्रमुक 18 सांसदों के साथ तीसरे स्थान पर है। द्रमुक की पराजय का अर्थ मोलतोल में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना तथा तृणमूल की शक्ति बढ़ने का अर्थ इसके विपरीत है। कुल मिलाकर ऐसा परिणाम केंद्र सरकार की स्थिरता सुनिश्चित करने वाला होगा। केरल में यदि कांग्रेस वाममोर्चा को पराजित कर शासन में वापसी करती है एवं असम में कुर्सी बनाए रखती है तो इससे कांग्रेस के अंदर आत्मविश्वास बढ़ेगा। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही हैं किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता की सोच की अभिव्यक्ति माना जाता है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था कह दिया है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जैसा माहौल कुछ संगठनों, राजनीतिक दलों एवं मीडिया की कृपा से बना है, सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के विरुद्ध जैसी वितृष्णा पैदा करने की कोशिश की गई है, उसका असर मतदाताओं पर पड़ा है। यानी भारी मतदान के पीछे राज्य से असंतोष का भाव भी प्रमुख कारण है। लेकिन किसी एक से नाराजगी के बावजूद समर्थन का विकल्प सीमित है। इसलिए जिस किसी को जीत मिले उसका यह अर्थ नहीं कि जनता की नजर में वह उपयुक्त विकल्प है। मतदान का ऐसा अर्थ व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता को नकारना होगा। शहरी मध्यम वर्ग में मतदान को लेकर अरुचि की प्रवृत्ति के विपरीत अर्धशहरी एवं ग्रामीण इलाकों में मतदान में गहरी रुचि दिखी है। उदाहरण के लिए चेन्नई में 69.02 प्रतिशत, असम के कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले में (जिसमें गुवाहाटी भी है) 64.70 प्रतिशत तथा केरल के तिरुवअनंतपुरम में 68.30 प्रतिशत मतदान हुआ है। 2006 में भी इन जगहों पर क्रमश: 65 प्रतिशत, 56.4 एवं 64 प्रतिशत मतदान हुआ था। यानी असंतोष एवं परिवर्तन की चाहत अर्धशहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है। यह ऐसा गम्भीर पहलू है जिसे गहराई से समझने की जरूरत है। फिर चुनाव आयोग की अत्यधिक भूमिका लोकतंत्र के भविष्य की दृष्टि से अच्छा संकेत नहीं है। आयोग द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने की भूमिका तो समझ में आती है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों का लोगों तक मतदाता पर्ची पहुंचाना स्वस्थ प्रवृत्ति नहीं है। मतदाताओं तक पर्ची लेकर जाना राजनीतिक दलों की भूमिका होनी चाहिए। मतदाताओं की संख्या चाहे जितनी बढ़ जाए लेकिन चुनाव प्रक्रिया से राजनीतिक दलों एवं आम जनता की भूमिका कम होना तथा चुनाव आयोग जैसी नौकरशाही एवं सरकारी कर्मचारियों की वाली संस्था का एकाधिकार लोकतंत्र की मूल भावना के ही विपरीत है। वास्तव में मतदाताओं की लम्बी कतारों की जितनी सरल और सामान्य व्याख्या की जा रही है उससे समग्र वस्तुस्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती। बेशक, मतदान का साकार रूप प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणाम ही है किंतु इसके पीछे के निराकार और महसूस करने वाले पहलुओं को समझना आवश्यक है। अत्यधिक मतदान सामान्यत: उस धारणा के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि आम नागरिकों की रुचि राजनीति से घट रही है। मतदान जनता के सोच की अभिव्यक्ति मानी जाती है और कहा जा सकता है कि जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जो कहना था, कह दिया है.
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