योजना आयोग के प्रस्ताव, नीतियां अक्सर बहस का माहौल तैयार करती हैं। बीते दिनों योजना आयोग ने भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध में ढील देने वाला जो प्रस्ताव रखा, उस पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह नीति में बड़े बदलाव वाला प्रस्ताव है यानी इस मुददे पर अपनी पूर्व राय से हटना। योजना आयोग की एक बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि देश में लड़कियों की संख्या में वृद्धि करने के लिए पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट(प्री कनसीव एंड प्री नेटल डायगोस्टिक टेक्नीक) में संशोधन किया जाए। प्रस्ताव में बेटियों के सुरक्षित जन्म या उनके जन्म को सुनिश्चित करने के लिए सरकार गांवों में भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध हटाने और आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से माताप्िाता को लड़की के सुरक्षित जन्म के लिए प्रेरित करने पर जोर है। यदि अभिभावक उसकी परवरिश करने में सक्षम नहीं है तो उसे गोद लेने का जिम्मा सरकार का होगा।EOFप्ट ए फीमेल फोटस नामक इस अभियान में सरकार आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं को ही नहीं बल्कि गर्भवती मां व उसके परिवार को इंसेंटिव देगी। ये लोग बेटियों की हत्या रोकने के लिए गर्भधारण करने वाली महिलाओं की भ्रूण लिंग जांच कराएंगे, यदि जांच से पता चला कि भ्रूण कन्या का है तो वे माता-पिता से पूछेंगे कि वे उसे जन्म देंगे, यदि उत्तर न में मिला तो आंगनबाड़ी, एएनएम कार्यकर्ता आदि उस अवांछित कन्या भ्रूण को जन्म देने के बावत अभिभावक को प्रेरित करेंगे। योजना आयोग का मानना है कि पीसी व पीएनडीटी एक्ट के लागू होने के इतने साल बाद भी कन्या भ्रूण हत्या के अनुपात में कोई सुधार नहीं दिखाई देता। लिहाजा नीति में बदलाव करके लड़कियों के घटते अनुपात को बढ़ाया जाए। नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक प्रति 1000 बालकों पर 914 बालिकाएं हैं जबकि एक दशक पूर्व प्रति हजार लड़कों पर 927 बालिकाएं थीं। 1971 में यह संख्या 940 थी। अपने मुल्क में कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े भयावह हैं जबकि ऐसा करना कानूनी अपराध है। एक लंबे संघर्ष के बाद 1994 में पीएनडीटी एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत भ्रूण लिंग परीक्षण जांच पर प्रतिबंध लग गया। इस कानून का अल्ट्रासांउड लॉबी ने अपने आर्थिक हितों के मददेनजर कड़ा विरोध किया। कुछ सालों बाद इसे और कड़ा बनाने के लिए इसमें संशोधन किया गया। कानून का उल्लघंन करने वाला यदि दोषी पाया गया तो उसे सजा व जुर्माना देने का प्रावधान भी है। मगर असलियत का खुलासा सरकारी सव्रे ही करते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वाषिर्क सव्रे 2010- 2011 के तहत देश के नौ राज्यों में लिंग परीक्षण जांच की बात सामने आई है। गौरतलब यह भी है कि इस कानून के लागू होने के बाद कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई बहुत कम हुई हैं। अधिकतर मामलों में सजा नहीं हुई। भ्रूण लिंग परीक्षण जांच संबंधी कानून को लागू करने में सरकार ने सुस्ती बरती, इसकी तसदीक 2001 व 2011 जनगणना के आंकड़े करते हैं। अखिल भारतीय जनवादी महिला संस्था की महासचिव सुधा सुंदर रमन का सवाल है कि सरकार को कानून का सख्ती से अमल करने के बावत सुझाव न देकर योजना आयोग का यह प्रस्ताव प्रतिगामी कदम साबित होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि योजना आयोग इस हास्यास्पद प्रस्ताव के जरिए मौजूदा कानून को कम करके आंक रहा है। इससे हालात और जटिल होंगे। पहले एक्ट में सरकार ने जिस काम को अपराध की क्षेणी में रखा, अब उसे अपराध नहीं माना जाएगा, क्या उचित होगा? योजना आयोग के इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जो अभिभावक लड़की को जन्म देने के बाद उसका पालन-पोषण करने में अनिच्छा जाहिर करेंगे, ऐसी लड़कियों को सरकार गोद ले लेगी। उन्हें पालना घर, बालगृह आदि में भेज दिया जाएगा। ऐसे सरकारी व सरकारी अनुदान से संचालित केद्रों में बदइंतजामी, बच्चियों के शारीरिक व यौन शोषण की खबरें आए दिन छपती रहती हैं। सचाई तो यह है कि कानून पर पाबंदी उठाने या प्रतिबंध में ढील दिए जाने के पक्ष में एक मजबूत लॉबी सक्रिय है और यदि ऐसा हुआ तो देश में कन्या भ्रूण हत्याओं की संख्या में बढ़ावा होने की आशंका भी नजर आती है। इस विवादास्पद प्रस्ताव से पैदा होने वाली जटिलताओं व असहमति के स्वरों पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। बेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, मानव संसाधन विकास एवं पंचायती राज मंत्रालयों में मोटे तौर पर इस योजना पर सहमति है मगर अन्य पहलूओं को भी ध्यान में रखना होगा। इसे आखिरी व कारगर हथियार मानने की अपेक्षा बेटी बचाओ संबंधी दूसरे अभियानों पर फोकस करने के बावत भी सोचा जा सकता है। पाबंदी पर ढील देना या आंगनबाड़ी, एएनएम को नकद प्रोत्साहन देना इस सामाजिक बीमारी का शर्तिया और पक्का इलाज नहीं है। इस पर ध्यान रखने की जरूरत है।
Wednesday, November 30, 2011
Tuesday, November 29, 2011
विकास पर भारी भूख और कुपोषण
Saturday, November 26, 2011
प्रति व्यक्ति दाल की उपलब्धता 32 ग्राम
सरकार ने स्वीकार किया कि देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दाल की उपलब्धता महज 32 ग्राम है। सरकार ने दाल की उपलब्धता में कमी के पीछे जनसंख्या वृद्धि को कारण बताया है। कृषि खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री हरीश रावत ने बताया कि वर्ष 1960 में दालों की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता 65.5 ग्राम थी। उस दौरान देश में दालों का एक करोड़ 18 लाख टन उत्पादन होता था। रावत ने बताया कि वर्ष 2010 में यह उपलब्धता महज 31.6 ग्राम रह गई । इस दौरान देश में दालों का एक करोड़ 46 लाख टन उत्पादन हुआ। उन्होंने कहा कि दालों के उत्पादन में वृद्धि होने के बावजूद दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में गिरावट आई है जिसका कारण दालों के उत्पादन में वृद्धि की तुलना में जनसंख्या में अधिक वृद्धिध होना है । उन्होंने वाईएस चौधरी के सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी।
Friday, November 25, 2011
कब बहुरेंगे दिन बुंदेलखंड के
| उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव ने बुंदेलखंड इलाके के लोगों में दशकों पुरानी मांग पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। हालांकि महज छह जिलों, 22 विधानसभा सीटों और एक करोड़ से भी कम आबादी के उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड का अलग राज्य बनना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को भी इसमें मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ न हो। प्राकृतिक संपदा के मामले में संपन्न बुंदेलखंड क्षेत्र में बारिश बहुत कम होती है और यह सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां दो साल में एक बार जब भी सूखा पड़ता है, सरकारें राहत का मलहम लगाने लगती हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों का बड़ा वर्ग मान चुका है कि अलग राज्य के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और उसके बाद उप्र की मुख्यमंत्री मायावती सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दर्द जानने गए और दोनों ने ही अलग राज्य की मांग का समर्थन किया था। इससे पहले गंगाचरण राजपूत, राजा बुंदेला, सत्यव्रत चतुव्रेदी सहित कई कांग्रेसी आंदोलन की अगुवाई करते रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज थी। अपने घोषणा पत्र और जन सभाओं में भाजपा नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे लेकिन सत्ता संभालने के बाद सब भूल गए। बहरहाल इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बावजूद अलग राज्य की मांग में कोई प्रगति न होना स्पष्ट दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों का असल मकसद बुंदेलखंड के नाम पर महज सियासत करना है। अलग राज्य की मांग को लेकर 1942 से चल रहा आंदोलन कुछ साल पहले उग्र हो गया था और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक शंकरलाल मेहरोत्रा और अन्य चार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत महीनों जेल में रहे। मेहरोत्रा के असामयिक निधन के बाद अभिनेता व कांग्रेसी नेता राजा बुंदेला आंदोलन की कमान संभाले हैं। मौदहा के विधायक बादशाह सिंह का संगठन भी अलग राज्य की राजनीति करता है। भारत के नक्शे के ठीक मध्य में स्थित बुंदेलखंड का क्षेत्र यमुना, नर्मदा, चंबल और टौंस नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर पूर्व से पश्चिम और इतना ही उत्तर से दक्षिण वर्गाकार फैला है । लगभग 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस भू-भाग की भाषा, संस्कृति, आचार-विचार में एकरूपता के बावजूद यह दो राज्यों (उप्र और मप्र) में विभाजित हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन 200-500 ईस्वी में इस क्षेत्र की पहचान अलग राज्य के रूप में रही है और यह स्वरूप चंदेलों (सन 831- 1203 ई) और उसके बाद बुंदेलों, व अंग्रेजों के शासनकाल तक बरकरार रहा। बुंदेला शासकों के दौरान यह बुंदेलखंड कहलाया। स्वतंत्रता से पहले बुंदेलखंड राज्य बनाया गया और उसकी राजधानी नौगांव बनी लेकिन दो महीने बाद ही इसका विभाजन विंध्यप्रदेश के रूप में हो गया था । 1942 में प्रसिद्ध साहित्कार व संपादक पं. बनारसीदास चतुव्रेदी ने टीकमगढ़ रियासत के महाराज वीर सिंह देव के सहयोग से पृथक राज्य का आंदोलन शुरू किया था। देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अनेक रियासतें मिला अलग बुंदेलखंड राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार नहीं मानी। 1948 में जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल व पट्टाभि सीतारामैय्या की अगुआई में गठित जेवीपी आयोग ने बुंदेलखंड का पृथक अस्तित्व नहीं स्वीकारा लेकिन 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रमुख केएम पणिक्कर ने इसके औचित्य का समर्थन किया। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट जग विख्यात है। यहां गोरा पत्थर, सीमेंट पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। तालाबों की मछलियां कोलकाता के बाजार में बिकती हैं। जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे स्थल सालभर पर्यटकों को आकषिर्त करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिला कर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसद भी खर्च नहीं होता। सवाल उठ रहा है कि नए राज्यों के गठन का आधार क्या हो? पुरानी मांग या भौगोलिक संरचना या क्षेत्रों का पिछड़ापन या छोटे राज्यों का सिद्धांत। देखा जाए तो इस रूप में बुंदेलखंड राज्य की मांग का आधार सशक्त है। बहरहाल मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी बुंदेलखंड को सुलगा रही है। |
आबादी के संकट का मिथक टूटेगा!
इकतीस अक्टूबर, 2011 को प्रात: सात बजकर बीस मिनट पर लखनऊ में नरगिस नामक बच्ची के जन्म पर परिवार में उत्सव का सा माहौल था। यह उत्सव ऐसे क्षेत्र में मनाया जा रहा था जहां सामान्यत: बच्ची के जन्म लेने पर मातम न भी हो परंतु खुशी का माहौल भी नहीं होता। पर नरगिस के जन्म पर उत्सव इसलिए हो रहा था क्योंकि उसने वि के सात अरबवें इंसान के रूप में जन्म लिया। वि में जनसंख्या के इन आंकड़ों को लेकर अलग तरह की तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है। माना जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि ही, गरीबी, बेरोजगारी, सीमित संसाधनों का संकट और आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। इसके लिए विकासशील व अविकसित देशों को उत्तरदायी ठहराने का प्रयास हो रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वि की सात अरब जनसंख्या के पांच सबसे बड़े भागीदार देश, चीन (19.4 प्रतिशत), भारत (17.5 प्रतिशत), अमेरिका (4.5 प्रतिशत), इंडोनेशिया (3.4 प्रतिशत) और ब्राजील (2.8 प्रतिशत) हैं। केवल भारत और चीन मिलकर दुनिया की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक यह जनसंख्या दस अरब तक पहुंच सकती है। यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो भारत की जनसंख्या 1.21 अरब के आसपास है। यानी दुनिया का प्रत्येक सातवां व्यक्ति भारतीय है। इसमें पांच सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल और आंध्र प्रदेश में भारत की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। वैिक स्तर पर चीन दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश है परंतु उसने अपनी जनसंख्या बढ़ोतरी दर नियंत्रित करने में सफलता पाई है। पश्चिमी देशों का मानना था कि जब तक चीन अपनी जनसंख्या नियंत्रित नहीं करता तब तक वह आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। इस तर्क को मुंह चिढ़ाते हुए माओ ने कहा था कि हर चीनी बालक केवल मुंह ही नहीं बल्कि दो हाथ लेकर भी पैदा होता है। वह चीन पर बोझ नहीं होता, बल्कि चीनी प्रगति में पूरा योगदान देता है। माओ के इस तर्क को चीन ने काफी हद तक सच साबित भी कर दिखाया। उसने सभी मिथकों को तोड़ते हुए विकास के नये कीर्तिमान स्थापित किये। जनसंख्या को लेकर पश्चिमी देश इसलिए दुनिया पर दबाव बनाते रहे हैं क्योंकि उन्होंने वर्ष 1950 तक अपनी जनसंख्या इतनी कर ली थी कि दुनिया में यूरोपीय जाति की प्रधानता हो चुकी थी। 1000 ईस्वी तक यूरोपीय जाति के लोग दुनिया की आबादी का केवल आठवां भाग थे। 1500 ईस्वी के आसपास उन्होंने यूरोप से बाहर निकल कर वि के दूसरे हिस्सों को हथियाना आरंभ किया और अमेरिका तक पर कब्जा कर डाला। 1750 तक दुनिया की आबादी में यूरोपीय लोगों का हिस्सा पांचवां हो चुका था और 1900 तक आते-आते यूरोपीय जनसंख्या दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई भाग हो चुकी थी। गौरतलब है कि इस दौरान यूरोपीय देशों में जनसंख्या वृद्धि और प्रगति साथ-साथ हो रही थी। कालांतर में अपनी प्रधानता स्थापित करने के बाद उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि जनसंख्या बढ़ोतरी पर रोक लगनी चाहिए। साथ ही तर्क दिये जाने लगे कि जनसंख्या में बढ़ोतरी के लिए विकासशील और अविकसित देश जिम्मेदार हैं। यह चिंता भी जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या बढ़ोतरी से संसाधनों का संकट पैदा हो जाएगा परंतु दुनिया में अमेरिका के बाद सबसे अधिक कृषि योग्य भूमि भारत के ही पास है। चीन के पास भी खेती योग्य भूमि हमसे कम है। आज भी 4.5 प्रतिशत जनसंख्या वाला अमेरिका, वि के कुल उपलब्ध संसाधनों का 25 प्रतिशत अकेले दोहन करता है। यानी अमेरिका का एक व्यक्ति भारत के 12 व्यक्तियों के बराबर संसाधनों का उपभोग कर रहा है। वि के उपलब्ध सीमित संसाधनों का 86 प्रतिशत भाग केवल 20 प्रतिशत सर्वाधिक सुविधा संपन्न व अमीर लोगों द्वारा उपभोग हो रहा है। जबकि सर्वाधिक 20 प्रतिशत गरीब केवल 1.3 प्रतिशत ही उपभोग कर पाते हैं। इस प्रकार, संसाधनों का संकट उपभोग से नहीं अपितु अति-उपभोग अथवा दुरुपयोग से पैदा होता है। जनसंख्या वृद्धि बेरोजगारी से भी जोड़ी जा रही है। यूरोप और अमेरिका में जहां एक ओर जनसंख्या में गिरावट दर्ज की गयी, वहीं रोजगार के अवसर बढ़े हों, ऐसा देखने को नहीं मिला। भारतीय जनगणना 2011 के आंकड़ों पर नजर डालें तो केरल सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर वाला राज्य है, लेकिन वहां बेरोजगारी सर्वाधिक है। रोजगार या बेरोजगारी को जनसंख्या घटने या बढ़ने से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि यह सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। चिंता जाहिर की जा रही है कि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। यदि जनसंख्या घटने या बढ़ने का संबंध वास्तव में अमीरी या गरीबी से होता तो अमेरिका में इस समय एक भी व्यक्ति बेरोजगार न होता। भारत से तीन गुना अधिक क्षेत्रफल वाले अमेरिका की (जिसकी आबादी हमसे करीब चार गुना कम है), 12 प्रतिशत कार्यशक्ति बेरोजगार घूम रही है। करोड़ों अमेरिकी बेघर हैं। यही हाल उस रूस का है जो क्षेत्रफल के हिसाब से हमसे पांच गुना अधिक बड़ा और आबादी में आठ गुना कम है। वहां दो करोड़ से अधिक लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। ये दुनिया के औद्योगिक रूप से विकसित वे दो राष्ट्र हैं, जहां न जनसंख्या की समस्या है न संसाधनों की, फिर भी वे बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। भारत को भविष्य की आर्थिक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में जरूरी है यहां मानव संसाधन की कार्यकुशलता व दक्षता बढ़ाने की। जहां तक जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने का प्रश्न है तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार इस वृद्धि दर में कमी आई है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्री जनसंख्या नियंतण्रहेतु कठोर कदम उठाने के पक्ष में नहीं है। उनका मानना है कि शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा जनसंख्या वृद्धि दर पर रोक लग सकती है। शिक्षा से सोचने-समझने का दायरा बढ़ता है और परिवार नियोजन की जानकारी के प्रचार-प्रसार में मदद मिलती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से केरल में जन्मदर में कमी का उदाहरण उल्लेखनीय है। दूसरे, बाल श्रम पर सख्त पाबंदी लगनी चाहिए क्योंकि गरीबों की सोच है कि जितने बच्चे होंगे उतने कुछ कमाकर लाएंगे। वृद्धावस्था व सामाजिक सुरक्षा के उचित प्रबंधन से यह मिथक तोड़ना होगा कि बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है। इन प्रयासों से भी जनसंख्या पर काफी हद तक नियंतण्रकिया जा सकता है। चीन ही नहीं जब जर्मनी जैसा देश शून्य जनसंख्या वृद्धि दर हासिल कर सकता है, ईरान जैसा मजहबी देश जनसंख्या पर नियंतण्रस्थापित करने में सफल हो सकता है तो भारत के लिए यह असंभव चुनौती नहीं होनी चहिए।
समाप्त होता हड़ताल का अधिकार
भूमंडलीकरण के दौर में हड़तालें सुनने में नहीं आ रही हैं। एक समय था जब निजी क्षेत्र हो अथवा सार्वजनिक क्षेत्र, हड़ताल होना अथवा तालाबंदी एक सामान्य सी बात थी। 1989 में कुल 1397 हड़तालें हुई और 389 तालाबंदियां हुई इनमें कुल 1364 हजार मजदूर शामिल थे। वर्ष 2008 तक आते-आते मात्र 250 हड़ताल और 182 तालाबंदी की घटनाएं हुई। हड़ताल और तालाबंदी दोनों श्रम विवाद के सूचक हैं। इस तरह क्या यह समझा जा सकता है कि पहले से श्रम विवाद अब कम हो गए हैं अथवा मजदूरों और प्रबंधन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गया है। शायद ऐसा कुछ नहीं हुआ है, बल्कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में ठेके पर मजदूर रखने की परंपरा शुरू हो गई है। नियमित मजदूर और कामगार अब लगभग नहीं रखे जा रहे। सफाई कर्मचारी हों, गार्ड हों, ड्राईवर अथवा क्लर्क ज्यादातर अब ठेके पर ही रखे जा रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में अब अधिकतर काम सहायक इकाईयों द्वारा करवा लिया जाता है। लघु उद्यमी ठेके के मजदूरों से ही सब काम करवा लेते हैं। नियमित कर्मचारी जैसे-जैसे रिटायर होते जाते हैं नई भर्तियां ठेके के कामगारों की ही हो रही हैं। ये कामगार सामान्यत: किसी भी प्रकार के श्रम कानूनों के अंतर्गत नहीं आते और इस कारण उनका हड़ताल करते हुए कोई लाभ लेना संभव ही नहीं है। प्रबंधन के साथ किसी भी प्रकार का विवाद उनकी नौकरी ही खत्म कर देता है। हालांकि देश में श्रमिकों के हित की रक्षा के लिए कड़े श्रम कानूनों का प्रावधान है, जिनके अनुसार मजदूरों को भविष्य निधि, ईएसआई और अन्य प्रकार की सुविधाएं देने के नियम हैं, लेकिन यह सभी नियम उन्हीं कामगारों पर लागू होते हैं जो किसी फर्म के नियमित कर्मचारी होते हैं। ठेकेदारों के माध्यम से भाड़े पर लिए कामगारों पर यह नियम लागू नहीं होते। ऐसे में जब देश में विनिर्माण, सेवा क्षेत्र इत्यादि में ठेके पर लिए गए कामगारों का अनुपात लगातार बढ़ता जा रहा है तो कामगारों में असुरक्षा बढ़नी स्वाभाविक है। इसका एक और नुकसान उन्हें विभिन्न प्रकार के शोषण का शिकार होना है। हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति में श्रमिकों की हड़ताल खासी चर्चा में रही है। हरियाणा स्थित मारुति के मनेसर संयंत्र में श्रमिकों और प्रबंधन के बीच खासा संघर्ष रहा है। इसके अतिरिक्त मारुति की अन्य इकाईयों में भी श्रमिकों की हड़ताल विशेष रूप से चर्चा में रही। इस हड़ताल के चलते मारुति का उत्पादन और आमदनी तो प्रभावित हो ही रही है, साथ ही साथ मारुति पर बाजार छिनने का भी खतरा मंडरा रहा है। इस हड़ताल की विशेषता यह है कि श्रमिक अधिक मजदूरी के लिए नहीं, बल्कि बर्खास्त श्रमिकों की बहाली और स्वतंत्र श्रमिक संघ को मान्यता देने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। प्रबंधन और श्रमिकों के बीच में हुआ तथाकथित समझौता भी विवाद का विषय बना हुआ है, क्योंकि इसके माध्यम से प्रबंधन द्वारा श्रमिकों से सही आचरण की शर्त मनवाई गई है। अब श्रमिकों पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे समझौते का उल्लंघन कर रहे हैं। मारूति प्रबंधन हड़ताली कर्मचारियों के साथ समझौते की बजाय मनेसर संयंत्र को ही कहीं और स्थानांतरित करने की फिराक में हैं। पूर्व में एयर इंडिया के पायलटों की हड़ताल भी काफी चर्चा में रही। उसकी खास बात यह थी कि उनकी मांगों में से एक मांग यह थी कि एयर इंडिया का प्रबंधन ठीक किया जाए और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो। कुछ समय पहले कैग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर पायलटों का तर्क सही सिद्ध होता है। एयर इंडिया के द्वारा निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु जानबूझकर लाभकारी मार्गो से अपनी सेवाएं समाप्त करने, बिना आवश्यकता के जानबूझकर विमानों को लीज पर लेने और 44 हजार करोड़ रुपये के नए विमानों की खरीद आदि के निर्णय वास्तव में एयर इंडिया को डुबोने के लिए पर्याप्त कारण रहे हैं। आनन-फानन में पायलटों की हड़ताल तो समाप्त हो गई, लेकिन ये प्रश्न अभी भी बरकरार हैं। एयर इंडिया के पायलटों की अधिकतर मांगों को दरकिनार करते हुए बर्खास्तगी का डर दिखाकर पायलटों की हड़ताल समाप्त करवा दी गई। मारूति के हड़ताल के संदर्भ में हरियाणा सरकार श्रमिक हड़ताल को एक राजनीतिक षड्यंत्र बता रही है। यदि मामले की तह तक जाएं तो पाते हैं कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक शोषण और प्रतिकूल कार्य दशाओं के कारण निरंतर कुंठा का शिकार बन रहे हैं। नए प्रकार के क्षेत्रों जैसे बीपीओ, कॉल सेंटर और आईटी के क्षेत्र में कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार भी नहीं है। उसी प्रकार खुदरा क्षेत्र में उतर रही बड़ी कंपनियों वॉलमार्ट आदि में काम करने वाले कर्मचारी यूनियन नहीं बना सकते। देश में किसी भी प्रकार से प्रवेश पाने की इच्छुक दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी, श्रमिकों के शोषण और यूनियन बनाने का प्रयास करने वालों की प्रताड़ना के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा अपने अधिकतम कार्यो की आउटसोर्सिग करवाने के कारण वहां कार्यरत श्रमिकों पर नौकरी छूटने का डर उन्हें अपने हितों के लिए लड़ने से रोकता है। इन सब कारणों से देश में हड़तालें और तालाबंदियां लगभग समाप्ति की ओर है। इस सबसे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में देश में हड़तालों और तालाबंदियों के कम होने का कारण यह नहीं है कि श्रमिकों का शोषण नहीं हो रहा है अथवा प्रबंधन श्रमिकों का पूरा ख्याल रख रहा है या नहीं। यह भी कि कार्य दशाएं पहले से कहीं बेहतर हो गई हैं कि नहीं। सच्चाई तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों तथा उनके द्वारा संचालित संस्थानों में जहां केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होती हैं के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था के तमाम दूसरे क्षेत्रों में श्रमिकों को मंहगाई भत्ता तक नसीब नहीं होता है। समय-समय पर की जाने वाली वेतन वृद्धि तथाकथित रूप से कंपनी के नतीजों पर निर्भर करती है। ऐसे में अधिकतर श्रमिक जो ठेकेदारी प्रथा के अंतर्गत काम करते हैं न्यूनतम वेतन भी नहीं पाते हैं। कुछ विशेष प्रकार के कार्यो को छोड़कर शेष श्रमिक नितांत कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में कंपनियों की जेबें मोटी होती जा रही है और श्रमिकों को जीवन यापन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। निजी क्षेत्र की कंपनियां मोटा लाभ कमा रही हैं। वर्ष 1990-91 में जहां केंद्र सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का कर लाभ मात्र 3820 करोड़ रुपये था वर्ष 2009-10 में वह बढ़कर लगभग 1,24,126 करोड़ रुपये पहुंच गया। ऐसे में श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करते हुए ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से काम करवाने को भी कंपनी का कर्मचारी माना जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ श्रमिकों का कंपनी के प्रति नजरिया बदलेगा, बल्कि वह अपने काम और कंपनी के उत्पादन में अधिक वफादारी सेकाम करेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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