फरवरी 2011 में पूरी हुई जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं, लेकिन 19 मई को केन्द्र सरकार ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों (बीपीएल) और देश में किस जाति तथा धर्म के कितने लोग हैं, इसकी गणना कराने का भी निर्णय लिया है। यह गणना जून से शुरू होकर दिसम्बर 2011 तक संपन्न हो जाएगी। गौरतलब है कि देश में जाति आधारित अंतिम जनगणना 1931 में हुई थी। कई राजनीतिक दल जाति आधारित गणना कराने की मांग कर रहे थे। शहरी बीपीएल आबादी की गणना भी पहली बार हो रही है। इस तरह की जनगणना के बाद तस्वीर साफ हो जाएगी कि देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। बीपीएल लोगों के साथ जाति और धर्म के आधार पर गणना कराने से यह भी स्पष्ट होगा कि देश मे किस जाति और धर्म में गरीब लोगों का अनुपात क्या है। इससे उनके कल्याण की योजनाएं बनाने में आसानी होगी। उल्लेखनीय है कि देश की जनसंख्या 121 करोड़ हो गई है जो अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। देश में पिछले एक दशक में 18.1 करोड़ नई आबादी जुड़ गई है और दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसद है। जबकि पृथ्वी के धरातल का मात्र 2.4 फीसद हिस्सा ही भारत के पास है। जनसंख्या के मामले में भारत 134 करोड़ की सर्वाधिक जनसंख्या वाले चीन के करीब पहुंचता जा रहा है। अमेरिकी एजेंसी पॉपुलेशन रेफरेंस ब्यूरो के अनुसार 2050 में भारत की जनसंख्या चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व में सर्वाधिक 162.8 करोड़ के आसपास हो जाएगी। यद्यपि नई जनगणना में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में कमी देखी गई है फिर भी तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की जननी बन विकास के लिए खतरे की घंटी बन गई है। बढ़ती जनसंख्या देश में गरीबी, कुपोषण, शहरीकरण, मलिन बस्ती फैलाव जैसी कई चुनौतियां बढ़ा रही है । बढ़ती हुई जनसंख्या से देश में गरीबी और बेरोजगारी में बहुत बढ़ोतरी हो रही है। गरीबी घटाने के सारे लक्ष्य बार-बार चौपट हो रहे हैं। चूंकि गरीब परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों की जन्म दर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं अतएव गरीब वर्ग का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। विश्व बैंक ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि भारत में 42 फीसद जनसंख्या गरीबी-रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रही है। यह भी स्पष्ट है कि बढ़ती आबादी का सीधा संबंध देश में बेरोजगारी बढ़ने से है। बेशक देश में आर्थिक विकास दर नौ फीसद है, लेकिन रोजगार के अवसर उतने चमकीले नहीं हैं। यहां बेरोजगारी की दर 7.8 फीसद है। यद्यपि देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हर उत्पादन वृद्धि आवश्यकता से कम दिखाई पड़ती है। 2000 तक हम 20 करोड़ टन अनाज का उत्पादन करते थे और 2020 तक हमें 36 करोड़ टन अनाज की आवश्यकता पड़ेगी। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल रिलेशन का कहना है कि भारत में खाद्यान्न की उत्पादकता घटने, ग्लोबल वार्मिग बढ़ने से मानसून के धोखे की आशंका, बायोडीजल के लिए अनाज का उपयोग और मोटे अनाज के इस्तेमाल को बढ़ावा न देने के कारण 2011 के बाद देश में सभी के लिए भोजन जुटाना और कठिन हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (यूएनएफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आम आदमी के पास पर्याप्त खाद्यान्न न होने के कारण भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ती जा रही है भारत में भूख और कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक 23 करोड़ 30 लाख है। बढ़ती जनसंख्या देश की आवास समस्या को बढ़ा रही है। आवास की कमी देश के करोड़ों लोगों को दिन- प्रतिदिन के जीवन में तनावग्रस्त करते हुए दिखाई दे रही है। आवास एवं शहरी गरीबी निवारण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 2.47 करोड़ मकानों की कमी पाई गई है। राष्ट्रीय नमूना सव्रेक्षण संगठन का निष्कर्ष है कि देश की अधिकांश रिहायशी इकाइयों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण आराम व सुख की जगह परेशानी एवं तनाव की स्थितियां दिखाई देती हैं। स्थिति यह है कि शहरों में मकानों की कमी के कारण साल-दर-साल मलिन बस्तियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं। दुनिया की सबसे अधिक मलिन बस्तियां भारत में ही हैं। शहरी भारत के लगभग चार फीसद हिस्से पर मलिन बस्तियां बनी हुई हैं। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में देश के कोई 400 छोटे-बड़े शहरों में रहने वाले 30 करोड़ लोगों में से छह करोड़ से अधिक लोग 52 हजार मलिन बस्तियों में रहते हैं। निसंदेह भारतीय मलिन बस्तियों में जीवन की स्थितियां बहुत विकट हैं। यहां रहने वाले लोग कदम-कदम पर अनेकानेक कठिनाइयों और बदतर हालातों के बीच नारकीय जीवनयापन के लिए विवश हैं। नई जनगणना में एक चुनौतीपूर्ण परिदृश्य यह भी उभरकर सामने आया है कि देश में लड़कियां कम पैदा हो रही हैं या वे पैदा नहीं होने दी जा रही हैं। इसी कारण स्त्री- पुरुष अनुपात गड़बड़ा रहा है। यह अनुपात 2011 की जनगणना में 914/1000 का है, जो कि 1947 के बाद से सबसे कम है। यानी महिला भ्रूण हत्या के खिलाफ जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे कुछ हद तक ही कारगर सिद्ध हो रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि देश की बेलगाम जनसंख्या वृद्धि नित नई समस्याओं को जन्म दे रही है । लेकिन देश की युवा जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में बदलकर आर्थिक विकास का घटक भी बनाया जा सकता है। भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में हमारे लिए आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक भारत की श्रम शक्ति नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक तैयार हो जाए तो वह भविष्य में एक ऐसी पूंजी साबित होगी, जिसकी मांग दुनिया के हर देश में होगी। विकसित देशों और कई विकासशील देशों में 2020 तक कामकाजी जनसंख्या की भारी कमी होगी, जबकि भारत में साढ़े चार करोड़ कामकाजी जनसंख्या अतिरिक्त होगी। ऐसे में 2020 तक अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और रूस सहित अनेक देशों में कार्यशील लोगों की कमी के कारण लाखों रोजगार के अवसर भारतीय युवाओं की मुट्ठी में होंगे। चाहे युवा जनसंख्या का विकास संबंधी चमकीला पक्ष सामने है, लेकिन युवा आबादी को मानव संसाधन के रूप में परिवर्तित करना कोई सरल काम नहीं है। देश में युवा भरपूर हैं, लेकिन साक्षर कम हैं। जो साक्षर हैं, उनमें से भी अधिकांश नई रोजगार शिक्षा से बहुत दूर हैं। भारत की ख्याति दुनिया में भले ही एक ज्ञानवान अर्थव्यवस्था जैसी बन रही हो, लेकिन असलियत में यहां शिक्षा की दशा काफी बुरी है। बढ़ती हुई जनसंख्या की दृष्टि से हम शैक्षणिक संसधानों की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक संकुल की एडवांस रिपोर्ट 2011 में कहा गया है कि अभी 81 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं और 5.6 करोड़ स्कूल छोड़ चुके हैं। ऐसे में हमें जनसंख्या नियंतण्रके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। यद्यपि भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने अपनी जनसंख्या नीति बनाई थी, लेकिन देश की जनसंख्या वृद्धि दर आशा के अनुरूप नियंत्रित नहीं हुई है। इस समय देश के कुछ लोग राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उस कथन को आवश्यक मान रहे हैं जिसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंतण्रका मामला सिर्फ लोगों की इच्छा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यद्यपि हम चीन की तरह एक दम्पत्ति एक बच्चे की नीति को कठोरता से न अपनाएं, किन्तु एक बार फिर से ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे को मूर्तरूप दिया जा सकता है। जरूरी है कि भारत में जन-जागरूकता के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर नियंत्रित आबादी और छोटे परिवार के फायदे समझाए जाएं। जरूरी है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण देश के आर्थिक-सामाजिक, परिदृश्य पर भयावह होती जा रही चुनौतियों का सामना करने के लिए हम बढ़ती हुई जनसंख्या को उपयुक्त रूप से नियंत्रित करें तथा देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए देश की नई आबादी को मानव संसाधन के रूप में विकसित करें।
Wednesday, May 25, 2011
राजनीतिक हथियार बनने की आशंका
आखिरकार केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जाति आधारित जनगणना को मंज़ूरी दे ही दी। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका होगा, जब भारत में जाति आधारित जनगणना होगी। इससे पहले 1931 में जाति आधारित जनगणना हुई थी। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की गणना भी कराई जाएगी। 3,500 करोड़ की लागत से जून में जनगणना शुरू होगी और दिसंबर में पूरी होगी। इसके आंकड़े भी मार्च 2012 तक प्राप्त हो जाएंगे। यह पहली बार है, जब गरीबों की उनके धर्म और उनकी जाति के आधार पर पहचान की जा रही है। पिछली बीपीएल जनगणना वर्ष 2002 में हुई थी। इससे यह पता चल सकेगा कि मुसलामानों, ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं में कितने प्रतिशत लोग बीपीएल की श्रेणी में आते हैं। वैसे जाति आधारित जनगणना में जाति और धर्म से संबंधित आंकड़े समूह के रूप में विभिन्न एजेंसियों को उपलब्ध कराए जाएंगे और इनकी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। कई लोगों और समाज सुधारकों को लगता है कि जातिगत जनगणना के कारण समाज में विघटन आएगा और लोगों में दूरियां बढेंगी। चूंकि भारत में जातिवाद को नाकारा नहीं जा सकता, इसलिए कई राजनीतिक संगठनों ने जाति आधारित जनगणना की पुरजोर वकालत की है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव आदि ने जाति आधारित जनगणना को उचित ठहराते हुए कहा है कि इससे देश में जातियों की स्थिति के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध होगी। इससे सरकारी योजनाओं में उचित वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल पाएगा। वैसे देखा जाए तो भारत की बड़ी आबादी इस बात से सहमत है कि जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए ताकि जाति और धर्म को लेकर होने वाली वैमनस्य की राजनीति का अंत हो सके। इसके पीछे भी कई तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन, जाति आधारित जनगणना होने से सभी जातियों और वर्गो की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, जिससे वास्तव में शोषित और पिछड़ी जातियों को सही प्रतिनिधित्व मिल पाएगा तथा इससे राजनीतिक दलों के उन दावों की पोल भी खुल जाएगी, जिसमें वे दावा करते हैं कि फलां जाति का प्रतिशत इतना है और यह हमारा परंपरागत वोट बैंक है। जाति आधारित जनगणना का एक फायदा यह भी होगा कि धर्म के आधार पर देश को बांटने का कार्य करने वाले कथित सेक्युलर दलों की राजनीति ही खतरे में पड़ जाएगी। यदि धर्म के आधार पर देखा जाए तो 2001 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की संख्या 80.5 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम 13.4 प्रतिशत थे। वहीं ईसाइयों का प्रतिशत 2.3 था तो सिख 1.9 प्रतिशत थे। बाकी अन्य धर्मो को मानने वाले थे। 9 साल बाद यकीनन इनके प्रतिशत में अंतर आना चाहिए। जाति आधारित जनगणना से राजनीतिक और सामाजिक बदलाव आना निश्चित है। राजनीतिक दल इस संभावना पर गौर करेंगे कि उनके लिए किस प्रदेश में क्या समीकरण बन रहे हैं। जातियों की वास्तविक स्थिति का पता लगने से नए सामजिक न्याय का उपयुक्त सामजिक आधार बनेगा। मिटने की कगार पर खड़ी जातियों के लिए विकासोन्मुख योजनाएं चला कर उनका पुनरुत्थान किया जा सकेगा। इसी तरह अति गरीब एवं पिछड़ी जातियों के उठान हेतु प्रयास किया जा सकता है। जाति आधारित जनगणना होने से आम व्यक्ति को यह पता चल सकता है कि अमुक जाति की सरकारी एवं निजी क्षेत्र में कितनी भागीदारी है? इससे जाति और धर्म के आधार पर धमकी भरे अंदाज में आरक्षण मांगने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा। जाति आधारित जनगणना की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी और तीन प्रमुख केंद्रीय एजेंसियां इस जनगणना की निगरानी करेंगी। यदि गणना निष्पक्ष और सटीक हुई तो निश्चित ही यह भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक परिवेश के लिए बदलाव का सूचक होगी। जाति और धर्म के नाम पर देश को दिग्भ्रमित करने की प्रवृत्ति पर भी इससे रोक लगेगी और पिछड़े वर्ग का सही अर्थो में पुनरुत्थान होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
जनहित में जातिवार जनगणना!
लंबे समय से सामाजिक न्याय की मुहिम से जुड़े लोगों की यह मांग रही है कि जनगणना में जाति को शामिल किया जाए ताकि भविष्य में किसी भी किस्म के एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम के लिए हमें 1931 की तरफ न लौटना पड़े, जब आखिरी बार इस कारक को शामिल किया गया था। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समूची आबादी के आर्थिक, एवं सामाजिक-जातिगत और धार्मिक आधार पर राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की योजना को हरी झंडी दी। बताया गया कि यह सर्वेक्षण अपने ढंग का पहला अध्ययन होगा, जिसमें अतीत के तौर-तरीकों से परे जाने की कोशिश होगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि सामाजिक-आर्थिक वंचना को कम करने व नीति-निर्धारण के सवाल के लिए जरूरी है कि इस वंचना के उद्भव, विस्तार और दीर्घजीविता के बारे में हम विधिवत ज्ञान से लैस हों। खालिस वंचना को जानने के लिए हम पहले गरीबी को नापते हैं, जो आय या उपभोग के स्तर को जानकर तय की जा सकती है। हाल के दिनों में यह कोशिश की जाती रही है कि वंचना के पैमानों का एक आयामी नहीं, बल्कि बहुआयामी मापन किया जाए। निश्चित ही यह बहुत आसान काम नहीं रहा है। कुछ लोगों ने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के विचारों को आधार बनाकर इस दिशा में कोशिश की है, जहां लोगों की क्षमताओं या उनके पास उपलब्ध पसंदगी-नापसंदगी को आधार बनाया गया है। जैसे, स्वच्छ पानी तक पहुंच, सार्वजनिक स्वास्थ्य, ऊर्जा के स्त्रोत, जिंदगी जीने के तरीके आदि। कैबिनेट की इस बैठक में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की सूची को संशोधित करने के लिए सरकार ने गरीबी की परिभाषा पर भी पुनर्विचार किया है। शहरी गरीबों की पड़ताल के लिए समावेशी पैमाने की बात चली है, जिसके तहत रिहाइश, सामाजिक असुरक्षा (निरक्षरता, विकलांगता या महिलाओं की अगुआई में चल रहे घर) और पेशागत असुरक्षा जैसे तीन पैमाने तय किए गए हैं। ग्रामीण इलाकों में गरीबों की पहचान करने के लिए भी वहां की आबादी को तीन श्रेणी में बांटा गया है। सबसे ऊपर ऐसे परिवार जिनके पास फोन, फ्रिज आदि हैं, सबसे नीचे आदिवासी समूह, हाथ से मैला ढोने वाले आदि। इसके अलावा बीच का भी एक तबका तैयार किया गया है, जिनमें से गरीबों की पहचान करने के लिए सात वंचना सूचकांक तय किए गए हैं। अगर वंचना के मापन के अंतर्गत हम दलितों-आदिवासियों के जीवन-विश्व को समझने की कोशिश करें तो नए-नए अध्ययन सामने आते रहे हंै। जो निश्चिम ही प्रस्तावित सर्वेक्षण के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। पिछले साल चंद्रभान प्रसाद, देवेश कपूर आदि द्वारा प्रस्तुत एक अन्य रिसर्च पेपर रिथिंकिंग इनइक्वालिटी: दलित्स इन यूपी इन द मार्केट रिफार्म एरा में 1990 में सामने आई लगभग दलित क्रांति की चर्चा की गई है। आय के पैमानों पर सबसे नीचले पायदान पर स्थित होने के बावजूद अध्ययन इस हकीकत को उजागर करता है कि किस तरह आर्थिक एवं सामाजिक संदर्भो में उनकी जिंदगी में बदलाव आए हैं। उत्तर प्रदेश के सापेक्षत: विकसित इलाके (खुर्जा) और पिछड़े इलाकों में से एक अग्रणी (बिलरियागंज) पर केंद्रित इस अध्ययन में दलितों के जीवनस्तर में आ रहे बदलावों को उपभोग के सामानों के बढ़ते इस्तेमाल, उनकी रिहाइशों में पक्के मकानों, बिजली का बढ़ता इस्तेमाल आदि के जरिए नजर डालने की कोशिश की गई है। अपनी एक किताब दलित्स इन इंडिया: सर्च फॉर ए कॉमन डेस्टिनी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रोफेसर सुखदेव थोराट वर्ष 2007 के आंकड़ों की बुनियाद पर बताते हैं कि किस तरह ग्रामीण इलाके की 17 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी अब जमीन की काश्तकारी में लगी है, ग्रामीण क्षेत्रों के 12 फीसदी एवं शहरी इलाकों के 28 फीसदी लोग व्यापार में हैं, उनमें साक्षरता दर 57 फीसदी तक पहुंची है या सरकारी नौकरियों में उनका अनुपात बढ़ रहा है। बहरहाल, इन नए अध्ययनों के बरअक्स हाल ही में एक अन्य अध्ययन भी सामने आया है, जो दरअसल पुरानी प्रमेयों को ही नए सिरे से स्थापित करता है और बताता है कि किस तरह भारतीय संदर्भ में जाति और वर्ग की पहचानें आज भी परस्पर व्याप्त हैं और दलित या आदिवासी की सामाजिक पहचान ही विभिन्न किस्म की वंचनाओं को जन्म देती है, एक तरह से आर्थिक विवंचना सामाजिक पहचान पर निर्भर होती है। ध्यान देने लायक है कि गरीबी रेखा के नीचे खड़े लोगों को चिह्नित करने के लिए विभिन्न राज्यों में फैले 166 गांवों से प्रातिनिधिक सैंपल हासिल कर इस सर्वेक्षण को अंजाम दिया गया है। इस पायलट सर्वेक्षण के अंतरिम नतीजे बताते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग जो कुल आबादी में भले ही 22 फीसदी हों, मगर ग्रामीण इलाकों में गरीब, वंचित घरों के आधा हैं। सर्वेक्षण बताता है कि गैर-गरीब घरों में अर्थात नॉनपूअर हाउसहोल्ड्स में दलित आदिवासियों का अनुपात महज 25 फीसदी है, जो विभिन्न स्तरों पर यानी उनकी बहुआयामी वंचना को उजागर करता है, चाहे आवास का मामला हो, निरक्षरता का, बेघरों, मुफलिसी आदि का प्रश्न हो। आबादी के 22 फीसदी हिस्से के आधे से अधिक का गरीबी की श्रेणी में आना जहां गरीबी संबंधी पहले से मौजूद आंकड़ों के साथ मेल खाता है, वहीं यह भी आश्चर्यजनक है कि यह स्थिति आज तक बनी हुई है। पता चला है कि योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा विकसित की गई पद्धति के आधार पर इन प्रायोगिक सर्वेक्षण के नतीजों को मद्देनजर रखते हुए एक व्यापक सर्वेक्षण को अंजाम दिया जाएगा। गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चिह्नित करने के लिए किया जाने वाला प्रस्तावित सर्वेक्षण अहम है, क्योंकि इसी आधार पर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभान्वितों की सूची तय की जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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