Sunday, April 3, 2011

आबादी दर घटी चुनौती बढ़ी


जनगणना के ताजा आंकड़ों के मुताबिक यूपी में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी भले सुकून देने वाली हो लेकिन आबादी में 3.34 करोड़ की बढ़ोत्तरी का सच भी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के दावों को आईना दिखाता है। संसाधनों की तंगी और इच्छाशक्ति के अभाव में 19.95 करोड़ों लोगों की आम जरूरतें पूरी कर पाना भी एक जटिल चुनौती है। बात, स्वास्थ्य सुविधाओं से ही शुरू करें तो आबादी के लिहाज से विश्व के चार बड़े देशों के बाद पांचवें पायदान पर शुमार होने वाले राज्य में मानकों की पूर्ति दूर की कौड़ी हैं। हेल्थ फॉर आल योजना के तहत एक लाख 2 हजार की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और 30,000 पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) स्थापित किये गए। यानि प्रदेश में कुल 1097 सीएचसी व करीब 3150 पीएचसी स्वीकृत हैं लेकिन जनगणना के ताजा आंकड़ों का सच बताता है कि प्रदेश को अब 1666 सीएचसी व 6667 पीएचसी जरूर की दरकार होगी। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों, चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ व संसाधनों का अभी भी भारी टोटा है। जनसंख्या का सच किल्लत को और अधिक बढ़ाता दिखता है। प्रादेशिक चिकित्सा सेवा संघ के डा.अशोक यादव का कहना है कि ऐसे में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के मानक पूरे करना नामुमकिन है क्योंकि नए आंकड़ों के अनुसार 28 हजार विशेषज्ञ चिकित्सक व दस हजार एमबीबीएसधारक डाक्टर कहां से आयेंगे? छह से 14 आयु वर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था पूरा करने में सरकार की बेबसी किसी से छिपी नहीं। हालिया गणना में 0 से छह वर्ष के बच्चों की संख्या 2.97 करोड़ है जो कुल जनसंख्या का 15 फीसदी होगा। आबादी की नयी तस्वीर के अनुसार सूबे में चार लाख बेसिक शिक्षकों की जरूरत होगी। ऐसे में गली मुहल्लों में निजी स्कूलों की भरमार न हो तो साक्षरता की दर 69.72 प्रतिशत को कायम रखना भी मुश्किल होगा। वित्तविहीन स्कूलों और अंशकालिक शिक्षकों के सहारे चल रही माध्यमिक शिक्षा के लिए भी जनगणना के ताजा आंकड़ें सुखद नहीं है। सरकारी मदद प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 45 सौ है। 1986 के आंकलन से कुल एक लाख 27 हजार सृजित पदों के सापेक्ष वर्तमान में लगभग 60 हजार शिक्षक ही है। माध्यमिक शिक्षक संघ ठकुराई गुट के प्रांतीय उपाध्यक्ष डा. उमेश चंद कहते है कि नयी जनसंख्या के अनुरूप मानक तब ही पूरे होंगे जब दो लाख नए पद सृजित हों। निजी क्षेत्र के भरोसे उच्च, तकनीकी व व्यवसायिक शिक्षा में भी नयी चुनौती जाहिर होंगी। शिक्षा-स्वास्थ्य की बात तो दीगर प्रदेश की जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना भी आसान नहीं। नीर फाउंडेशन की मानें तो आने वाले दिनों में स्वच्छ पेयजल की समस्या अधिक विकट होंगी क्योंकि प्रदेश में 20 से 30 फीसदी भूगर्भीय जल प्रदूषित हो चुका है। नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोक नहीं लग पा रही है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग व औद्योगिक इकाइयों पर लगाम न लग पाने से जल संकट बढ़ता जा रहा है। खासकर ग्रामीण इलाकों की स्थिति दयनीय होंगी। आबादी बढ़ती रही और पानी की समस्या पर ध्यान नहीं दिया तो आने मुश्किलें पैदा होना स्वाभाविक ही है। बढ़ती जनसंख्या के साथ आवास, परिवहन व रोजगार के साधन मुहैया कराने की चुनौती को अनदेखा कर पाना भी संभव नहीं होगा। वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रो.एके सिंह का कहना है कि जनसंख्या के ताजा सरकारी आंकड़ें सुखद भी और चुनौती भरे भी। यूपी में आबादी की दर नियंत्रित हो कम होना अपने आप में एतिहासिक है। सरकार को चाहिए आबादी के नए आंकड़ों के अनुसार ही कल्याणकारी व विकास योजनाओं की फिर से समीक्षा हो ताकि उनसे सही मायनों में लाभ मिल सकें।


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