Tuesday, March 29, 2011

लोकतंत्र में तानाशाही क्यों


उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे व्यापारियों पर जो लाठीचार्ज किया गया, वह संवेदनहीनता की एक वीभत्स मिसाल है। इस बात पर तो बहस की गुंजाइश हो सकती है कि व्यापारियों की मांग सही है या गलत। इस बात पर भी मतभेद की पूरी गुंजाइश है कि अपनी मांगें मनवाने के लिए रास्ता जाम करना कितना सही है। कोई यह सवाल उठा सकता है कि सरकार शांतिपूर्ण ढंग से बात उठाए जाने पर कोई मांग मानती ही नहीं, फिर करें क्या? और कोई यह भी कह सकता है कि मांगें मनवाने का यह कौन-सा तरीका है? सरकार भी कह सकती है कि अगर ऐसे दबावों के सामने सरकार झुकती रहे तो व्यवस्था कितने दिन चलेगी? लेकिन तब सवाल यह भी उठता है कि सरकार आसानी से कोई मांग मानती ही कहां है? यह भी कि क्या सरकारें जो काम करती हैं, वे सब सिर्फ जनता के हित के लिए ही होते हैं? आखिर इस बात का ठीक-ठीक आकलन कैसे किया जा सकता है कि कौन से काम जनहित के हैं और कौन से सिर्फ निजी हित के? अगर यह तय करने का कोई ठोस आधार नहीं है तो सरकार को इस बात का क्या अधिकार है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसी भी वर्ग पर लाठीचार्ज करा दे? क्या यह हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? इस बात पर खासतौर से गौर किया जाना चाहिए कि गारमेंट्स उद्योग को उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाने के विरोध में आंदोलन केवल दिल्ली के व्यापारी ही नहीं कर रहे हैं। दिल्ली के साथ-साथ लुधियाना के उद्यमियों ने भी इसके खिलाफ अपने-अपने उद्योगों पर ताले लगाकर काम बंद रखा और रैली निकाल कर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। यह बात भी नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए कि इसके पहले भी उद्यमी इस पर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। यह विरोध दर्ज कराने वालों में केवल दिल्ली और पंजाब के व्यापारी ही शामिल नहीं हैं, देश के दूसरे भागों के व्यापारी और उद्यमी भी उनके साथ हैं। इनमें खासतौर से कर्नाटक और महाराष्ट्र के व्यवसायी शामिल हैं। अपने देश में रेडीमेड गारमेंट्स के व्यवसाय की स्थिति अगर देखी जाए तो इनके बाद किसी और राज्य की कोई खास स्थिति नजर नहीं आती है। सच पूछिए तो गारमेंट व्यवसाय का कुल अर्थ केवल पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और महाराष्ट्र ही है और इन सभी राज्यों के व्यापारी सरकार के फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं। अभी दिल्ली और पंजाब के अलावा अन्य किन प्रदेशों के उद्यमियों तथा व्यापारियों ने दोबारा अपना विरोध दर्ज कराया, इस बारे में कोई सूचना नहीं है, लेकिन दिल्ली में व्यापारियों के साथ जो दु‌र्व्यवहार हुआ है, क्या उसे किसी भी कीमत पर सही कहा जा सकता है? वास्तविक प्रश्न अब व्यापारियों की मांग के सही या गलत होने तथा सरकार के फैसले के भी सही या गलत होने का उतना नहीं रह गया है, जितना कि इस पर नियंत्रण के सरकारी तरीके की शुचिता का है। फिलहाल केंद्र और दिल्ली प्रदेश में भी कांगे्रस के नेतृत्व वाली सरकार है और कांग्रेस की परंपरा में ही गांधीवाद है। गांधीवाद के बगैर कांग्रेस की कोई पहचान होने के बारे में सोचना भी गलत होगा। हैरत होती है कि क्या कांग्रेस के पढ़े-लिखे मंत्रियों को अब यह बताना जरूरी है कि आज के संदर्भ में भारत में गांधीवाद का वास्तविक अर्थ ग्राम स्वराज्य है? यह बताने की जरूरत दुनिया भर में किसी को भी नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समाज की अंतिम पंक्ति में अंतिम व्यक्ति तक के विवेक पर पूरा भरोसा करते थे और न केवल शासन, बल्कि संपूर्ण व्यवस्था के संचालन में उसकी राय की अहमियत में पूरा विश्र्वास करते थे। क्या देश के नागरिकों में विश्वास जताने का नया कांग्रेसी तरीका यही है कि उनकी जुबान काट ली जाए? यह गौर किया जाना चाहिए कि यह तरीका देश के उस वर्ग के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, जिसे सबसे ज्यादा शांतिपूर्ण समझा जाता है। यही नहीं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है। देश की जीडीपी और ग्रोथ रेट चाहे कहीं से कहीं पहुंच जाएं, पर यह सच है कि रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के मामले में सरकार और उसकी एजेंसियों की गति वही नहीं है। इस समस्या के समाधान में अगर कोई वर्ग सबसे बड़ा योगदान कर रहा है तो वह उद्यमी ही है। क्या सरकार ऐसा मानने लगी है कि इस वर्ग की अपनी कोई समस्या नहीं है और अगर है भी तो उसके समाधान की कोई जरूरत तक नहीं है? अगर ऐसा नहीं है तो यह कैसे हुआ कि उनकी बात सुनने से पहले ही उन पर लाठीचार्ज कर दिया गया? सरकार का यह कदम उसके तानाशाही रवैये की ओर इशारा करता है। क्या यह रवैया दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए सही ठहराया जा सकता है? सरकार की यह कार्रवाई केवल व्यापारियों और आम जनता के प्रति उसकी संवेदनहीनता को ही बयान नहीं करती है, बल्कि देश में बढ़ती अराजकता का रहस्य भी खोलती है। सरकार व पुलिस की ऐसी ही कार्रवाइयों से अहिंसा और अपनी वाजिब मांगें मनवाने के लिए शांतिपूर्ण तरीकों से आम जनता अपना विश्वास खोती चली जाती है। नतीजा एक न एक दिन अराजकता और कई बार तो हिंसक कार्रवाइयों तक के रूप में सामने आता है। क्या तब केवल उन लोगों को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही होगा, जो अपनी मांगें मनवाने के लिए हिंसक प्रदर्शनों या माध्यमों का सहारा लेते हैं? अगर जनता को अपनी पीड़ा को स्वर देने का अधिकार भी न रह जाए तो फिर लोकतंत्र का अर्थ क्या रह जाएगा? समझ में नहीं आता कि सरकार यह क्यों भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी हैसियत शासक की नहीं, बल्कि जनता के प्रतिनिधि और इस रूप में वस्तुत: सेवक की होती है? सच तो यह भी है कि किसी भी उद्योग को किसी भी नए या पुराने कर के दायरे में लाए जाने के सरकार के किसी फैसले को पूरी तरह गलत किसी भी तरह नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि सरकार देश की व्यवस्था चलाने के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार होती है और उसके लिए व्यवस्था पर कुल खर्च का मुख्य आधार कर एवं शुल्क ही होते हैं। अगर सरकार को कर और शुल्क ही नहीं मिलेंगे तो फिर देश के तमाम विकास कार्य कैसे होंगे? लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं सीमित नहीं है। भारत की सरकारें यह बात बार-बार क्यों भूल जाती हैं कि जनता की मुश्किलों के प्रति भी वे जवाबदेह हैं। चाहे कुछ भी हो, पर उन्हें उद्यमियों और व्यापारियों की बात सुननी तो चाहिए ही। वह मांग न माने, इसके मूल में तो उसकी मजबूरियां समझी जा सकती हैं, लेकिन सुने ही नहीं इस बात का क्या मतलब है? बेहतर होगा कि सरकार अबसे गारमेंट उद्यमियों और व्यवसायियों से वार्ता करे, उनकी बातें सुने और समस्याएं सुलझाने के प्रयास करे। तानाशाही रवैया किसी भी व्यवस्था के लिए लोकतंत्र में सही नहीं कहा जा सकता है। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)

Monday, March 28, 2011

जाट आंदोलन जन का नहीं जाति का आंदोलन है


अभी जाट आंदोलन की गर्मी दिख रही है। आरक्षण की मांग को लेकर इस महीने की प्राय: शुरुआत से ही जाट समुदाय के लोगों ने कई जगह रेलगाड़ियों का रास्ता रोका। फिर उन्होंने दिल्ली को पानी और दूध की आपूर्ति ठप करने की धमकी दी है। अनेक बार इनका विरोध हिंसक स्वरूप भी ले लेता है। कहा जा रहा है कि अभी इसमें और गर्मी आएगी। इस आंदोलन में शरीक लोग इसे जन आंदोलन बता रहे हैं। पर हकीकत यह है कि यह जन आंदोलन नहीं, जाति का आंदोलन है। जन आंदोलन और जाति आंदोलन में बुनियादी स्तर पर कई फर्क होते हैं। जाति आंदोलन और साम्प्रदायिक आंदोलन का चरित्र संकुचित और स्वार्थपरक होता है और इनमें भीड़ का इस्तेमाल एक निश्चित स्वार्थ के लिए होता है। हमें यह समझना होगा कि यह वास्तविक जन आंदोलन नहीं है। हकीकत तो यह है कि आज देश में कहीं भी वास्तविक जन आंदोलन नहीं हो रहा है। वास्तविक जन आंदोलन तो ट्यूनीशिया में हुआ, मिस्र में हुआ और अब लीबिया में हो रहा है। वहां जन की ताकत बड़े और बुनियादी बदलावों के खिलाफ आंदोलन कर रही है। अपने यहां कहीं-कहीं विरोध-प्रदर्शन कुछ मुद्दों पर हो तो रहे हैं लेकिन इन्हें जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता है। दरअसल, अपने देश में जन आंदोलन राह भटक गए हैं। आजादी के लिए महात्मा गांधी ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उन्होंने इसे समाज और संस्कृति से जोड़ा था। जब देश आजाद हुआ तो 1970 तक देश के जन आंदोलनों ने गांधी जी के रास्ते पर चलते हुए लोगों के हक और हित की बात की। '70 के दशक में युवाशक्ति का उभार दिखा। बिहार आंदोलन से बात शुरू हुई और यह फिर पूरे देश में फैली और सम्पूर्ण क्रांति बन गई। इसने सत्ता भी बदल दी। आंदोलन करने वाले सत्ता में आ गए पर जनता को यह पता चल गया कि समाज परिवर्तन सत्ता परिवर्तन से नहीं होता। इसके बाद कुछ लोग छोटी-छोटी जगहों पर जाकर बदलाव के लिए काम करने लगे तो कुछ नक्सल आंदोलन में शामिल हो गए। '80 के दशक में किसानों, मजदूरों, मछुआरों और अन्य ऐसे वगरें की एकजुटता शुरू हुई। इन्होंने अपने हक और हित की बात एकजुट होकर उठाई और जन आंदोलन को नई परिभाषा देने का काम किया। इसी दौरान कुछ आंदोलनों ने राजनीति का हिस्सा बनने की भी कोशिश की। राममनोहर लोहिया कहते थे कि सत्ता के प्रति आग्रह और सम्पत्ति के प्रति मोह से दिक्कतें पैदा होंगी। जन आंदोलनों के भटकाव की वजह यही बना। '90 के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण भारत पहुंचा। विदेशी पैसा भारत पहुंचा और पूरे देश में एनजीओ संस्कृति का प्रसार होने लगा। इनका चरित्र सामाजिक आंदोलन का कम और संस्था व प्रबंधन का अधिक होता है। इससे जन आंदोलनों की सामाजिक स्वीकार्यता को झटका लगा। पहले ये जनता के प्रति जवाबदेह होते थे लेकिन अब ये अनुदान देने वालों के प्रति हो गए। पश्चिमी तौर-तरीके अपनाए गए और 2000 आते-आते तो पूरी शब्दावली भी पश्चिमी हो गई। कहा जा सकता है कि 2010 से एनजीओ के जरिए जन आंदोलन चलाने वालों का चरित्र अंतरराष्ट्रीय हो गया। वेबसाइट, मीडिया और रिपोर्ट में इनका काम तो ज्यादा दिखता है लेकिन जमीन पर कम। अहम सवाल यह है कि वास्तविक जन आंदोलन और एनजीओ के जन आंदोलन के फर्क से जो सामाजिक स्वीकार्यता घटी है और खाई बढ़ी है, उसे कैसे पाटा जाए? इस बात पर विचार करना होगा कि जिनके लिए आंदोलन चल रहा है, उनका हित कैसे सधे?

Sunday, March 27, 2011

यह कैसी दबंगई है भाई


जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पत्ति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौर-तरीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?
छात्रों को फीस में कटौती चाहिए तो वे अपनी मांग मनवाने के लिए सरकारी बसें जला देते हैं। किसी ग्रुप को किसी खास जगह पर रेलवे स्टेशन बनवाना है तो अपनी मांग बुलंद करने के लिए पुलिस थाने में आग लगा दी जाती है। महंगाई के विरोध में जुलूस निकलते हैं लेकिन अचानक वे हिंसक हो जाते हैं। उद्देश्य होता है, महंगाई का विरोध लेकिन होता यह है कि दुकानें जला दी जाती हैं, बसें जला दी जाती हैं, बस स्टैंड तोड़ दिए जाते हैं, पुलिस वैन को तोड़ा जाता है। दुकानें जलाने से क्या महंगाई कम हो जाएगी? क्या बसें जलाने से कॉलेज की फीस कम हो जाएगी? क्या थाना जलाने से रेलवे स्टेशन बन जाएगा? अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट आंदोलन को ही ले लीजिए। जाट देश के सबसे समृद्ध वगरे में से एक है। 18 वीं सदी में राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इनका राज चलता था। 1752 में तो भरतपुर सल्तनत का क्षेत्रफल पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा था। करीब सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला किया तो जाट समुदाय को इसका खूब फायदा मिला। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों की जमीन की मिल्कियत उन्हीं के पास ही थी। दिल्ली के राजधानी बनने से यहां जमीन की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। आजादी के बाद हरित क्रांति के लिए भी वही इलाके चुने गए जहां जाटों का बोलबाला था। हरित क्रांति से बड़े किसानों को खूब फायदा हुआ और बड़े किसानों में जाट समुदाय के ही ज्यादा लोग थे। बात शिक्षा की हो या फिर सरकारी महकमे में ऊंचे ओहदे की, बात राजनीति की हो या फिर कला और विज्ञान की, जाट समुदाय के लोगों ने हर क्षेत्र में बहुत ही अच्छा काम किया है। लेकिन इस समुदाय को अब सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए। इनको अदर बैकर्वड क्लास यानी ओबीसी का दर्जा चाहिए। ओबीसी में उन्हें रखा गया है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं। जिस कौम ने कभी देश के बड़े इलाके पर राज किया हो, उसके बारे में यह कहना कि वह सामाजिक पिछड़ेपन की शिकार रही है, सही नहीं होगा। आर्थिक पिछड़ेपन के कुछ मामले हो सकते हैं। लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार तो देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है ही। क्या गरीब ब्राह्मण नहीं हैं, क्या आर्थिक रूप से तंग क्षत्रियों की कमी है। वैश्य समुदाय में भी कई ऐसे हैं जिनको दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है। जिस देश की कुल आबादी का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे हो, वहां हर जाति या समुदाय का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक बदहाली में होगा ही। ऐसे में क्या हर जाति और समुदाय को रिजव्रेशन दे दिया जाए। लेकिन अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति को लगता है कि जाट समुदाय के हर मर्ज की दवा रिजव्रेशन ही है। अपनी मांग मनवाने के लिए समिति पिछले तीन हफ्ते से आंदोलन कर रही है। अब आंदोलन का नमूना देखिए। समिति ने ज्योतिबा फुले नगर के काफूरपुर में नेशनल हाईवे नम्बर 24 को लगभग बंद कर दिया गया है। दिल्ली से पूर्व की तरफ जाने वाली ट्रेनों को रोका जा रहा है। इसकी वजह से हर दिन सैकड़ों ट्रेनें रद्द हो रही हैं। अकेले शुक्रवार को 81 ट्रेनें रद्द हुई। रेलवे की तबाही का यह हाल है कि उसे हर दिन करीब 100 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। हरियाणा में हो रहे आंदोलन से पावर प्लांट को कोयला नहीं मिल रहा है। हाल यह है कि जहां राज्य में 3200 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है वहां महज 1800 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। हरियाणा एक समृद्ध और इंडस्ट्रियल राज्य है, जहां हजारों इंडस्ट्रियल यूनिटें लगी हैं। इन यूनिट्स को बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को भी बिजली समय से नहीं मिल पा रही है। अभी तो इन इलाकों में गर्मी का मौसम शुरू ही हुआ है। फर्ज कीजिए कि तापमान बढ़ता गया और बिजली गुल रही तो लोगों को कितनी तकलीफ होगी। साथ ही हजारों करोड़ रुपये का नुकसान तो हो ही रहा है। लेकिन आंदोलन करने वाले इतने से नहीं मानने वाले हैं। उनके निशाने पर हैं राजधानी दिल्ली। अपनी मांग मनवाने के लिए वे दिल्ली में बाहर से आने वाले जरूरी सामानों की सप्लाई को बाधित करना चाहते हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बाद सम्भव है कि ऐसा न हो। लेकिन मेरा सवाल है कि इस तरह के आंदोलन की जरूरत क्या है? जाट संघर्ष समिति के आंदोलन से हम सबका भारी नुकसान हो रहा है। ऐसा आंदोलन क्यों, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही होना है। दरअसल, विरोध के इस तरीके की शुरुआत आजादी से पहले हुई थी। देश में सरकार अंग्रेजों की थी। अंग्रेज हमारे दुश्मन थे तो ऐसे में सरकार भी दुश्मनों की थी। उस समय आंदोलन का मतलब था, दुश्मन का विरोध और दुश्मन को नुकसान पहुंचाना ताकि वह तुरंत हमारी मांगें मान ले। अंग्रेज चले गए लेकिन आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने के तरीके को हमने बदलने की कोशिश नहीं की। अब सरकार हमारी है, सरकारी सम्पति हमारे पैसे से बनी है। लेकिन विरोध करते वक्त यह सब हम भूल जाते हैं। अपने ही भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने से हम बाज नहीं आते हैं। वह भी ऐसी मांगों को लेकर जो दादागीरी के अलावा कुछ नहीं है। जाट देश के सबसे दबंग समुदायों में से एक है। लोकसभा की करीब 90 सीटों पर जाटों के वोट से जीत और हार का फैसला होता है। हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राजनीति में जाटों की दबंगई चलती है। हरियाणा में तो कई सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी इसी कौम के प्रतिनिधि को ही मिलती आ रही है। राजधानी दिल्ली के आसपास के इलाकों में इनका बोलबाला है। इन इलाकों पर कब्जा होने की वजह से इनकी ताकत और भी बढ़ जाती है। कहीं आरक्षण की मांग उसी दबंगई का नतीजा तो नहीं है? राजनीतिक दल तो इस दबंगई को अपने पक्ष में करने में लगे ही हुए हैं। लोकतंत्र में मांगें उठाना जायज है। लेकिन मांगें मनवाने के तौरत रीके बदलने की जरूरत नहीं है क्या?


बोझ बना आरक्षण


लेखक उच्चतम न्यायालय से आरक्षण की व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित करने की अपेक्षा कर रहे हैं

इस माह के प्रारंभ में जाट समुदाय की ओर से दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के इलाकों में रेल ट्रैक बाधित करने का जो आंदोलन छेड़ा गया था वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के उपरांत 17 दिन बाद यूपी में तो खत्म हो गया, लेकिन हरियाणा के जाट नेता करीब 21 दिन बाद तब रेल ट्रैक से हटे जब राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के लिए तैयार हुई। जाटों के इस आंदोलन के दौरान प्रतिदिन दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा और लाखों यात्रियों को तरह-तरह की असुविधा उठानी पड़ी। रेलवे को करोड़ों रुपये की चपत भी लगी। हरियाणा के जाट नेता जिस तरह हुड्डा सरकार को झुकाने में सफल रहे उससे यह साफ हुआ कि उन्होंने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की परवाह नहीं की। जाट नेताओं की दिल्ली को पानी, दूध, सब्जी आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी को देखते हुए जब दिल्ली जल बोर्ड और इंडियन आयल ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली तो उसने कड़ा रुख अपनाते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की ओर से जाट आंदोलन को समर्थन दिए जाने पर न केवल आपत्ति जताई, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि दिल्ली को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई बाधा न पहुंचने पाए। इसी दिन पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को रेल ट्रैक खाली कराने के आदेश दिए थे, लेकिन उसकी अनदेखी हुई। ध्यान रहे कि यूपी के रेल ट्रैक तभी खाली हो पाए थे जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जाट आंदोलनकारियों के प्रति सख्ती दिखाई थी। यह अचरज की बात है कि जाट आंदोलनकारी लगभग एक माह तक रेल यात्रियों को परेशान किए रहे, लेकिन यूपी और हरियाणा की सरकारों ने समय रहते कोई ठोस कदम उठाने से इंकार किया। उल्टे उनकी ओर से जाटों की आरक्षण संबंधी मांग का समर्थन किया गया। यह समझना कठिन है कि जाट आंदोलन के जिन तौर-तरीकों को न्यायपालिका ने गलत माना उन्हें कार्यपालिका क्यों सहन करती रही? अब क्या प्रथम दृष्टया अनुचित नजर आने वाले मामलों में भी उच्चतम न्यायालय को केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराना पड़ेगा? सवाल यह भी उठता है कि क्या कार्यपालिका को हर पेचीदे सामाजिक मामले में न्यायपालिका की आड़ चाहिए? अब यह स्पष्ट है कि न तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल आरक्षण संबंधी मांगों का विरोध करने के लिए तैयार हैं और न ही राज्यों में सत्तारूढ़ दल। दरअसल वे किसी समुदाय को नाराज नहीं करना चाहते, भले ही वे कोई अनुचित मांग गलत तरीके से ही क्यों न कर रहे हों? यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका ने केंद्र अथवा राज्य सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराया हो। ऐसे मामले सामने आते ही रहते हैं जिनमें न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में दखल देने के लिए विवश होना पड़ता है। अब तो यह लगता है कि सत्ता में बैठे लोग इस इंतजार में रहते हैं कि न्यायपालिका का आदेश मिले तो वे अव्यवस्था को दूर करने की पहल करें। अनेक बार न्यायपालिका के दखल के चलते उसमें और कार्यपालिका में टकराव की नौबत आ जाती है। कोई मन-मुताबिक निर्णय न होने पर सरकारें न्यायपालिका पर अपने दायरे से बाहर जाकर काम करने का आरोप लगाने लगती हैं। बावजूद इसके आम आदमी की यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि न्यायपालिका का चाबुक चलने पर ही सरकारें सक्रियता दिखाती हैं। ऐसी धारणा न तो कार्यपालिका के हित में है और न ही लोकतंत्र के, लेकिन समस्या यह है कि सरकारें अपनी वैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं। वे अक्सर समस्याओं के समाधान की पहल तभी करती हैं जब उनसे त्रस्त लोग अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। दरअसल जब राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थो को महत्व देते हैं तब उनके नेतृत्व वाली सरकारें आम आदमी की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहती हैं। ऐसी सरकारें तब और कमजोर साबित होती हैं जब समाज का कोई बड़ा या प्रभावशाली तबका आंदोलनरत होता है। वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों से आरक्षण की मांगें उठ रही हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि आरक्षण से वंचित प्रत्येक समुदाय यह मान बैठा है कि सरकारी नौकरियों में रियायत मिलने पर ही उनके लोगों का भला होगा। कोई भी यह सोचने-समझने के लिए तैयार नहीं कि सक्षम तबकों को आरक्षण देना प्रतिभा एवं दक्षता को नजरंदाज करना और एक प्रकार से अकर्मण्यता को बढ़ावा देना है। समय की मांग है कि आरक्षण के मौजूदा स्वरूप पर नए सिरे से बहस हो, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिए तैयार नहीं। चूंकि आरक्षण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए इस सुविधा से वंचित अनेक समुदाय खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। स्थिति इसलिए और बिगड़ रही हैं, क्योंकि अनेक समुदायों को वोटों के लालच में आरक्षण प्रदान किया जा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार जाट नेताओं के समक्ष हथियार डाल दे। यदि जाटों को केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण दे दिया जाता है तो यह तय है कि कोई अन्य समुदाय आरक्षण की मांग लेकर सामने आ जाएगा। यह भी हो सकता है कि अन्य पिछड़ा वर्गो में से कोई समुदाय खुद को अनुसूचित जाति में शामिल कराने की मांग करने लगे। अनेक समुदाय इस तरह की मांग कर भी रहे हैं। हालांकि देश के नेताओं को यह समझ में आने लगा है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पिछड़ों के उत्थान के बजाय महज वोट बैंक की राजनीति का हथियार बन गई है, लेकिन वे उसकी खामियों पर बोलने के लिए तैयार नहीं। आज इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर संसद में कोई सार्थक बहस हो सकती है। राजनीतिज्ञों के रवैये को देखते हुए न्यायपालिका के दखल से ही आरक्षण की कोई तर्कसंगत व्यवस्था बनने की उम्मीद है। बेहतर हो कि उच्चतम न्यायालय की पूरी पीठ आरक्षण की नई व्यवस्था का निर्धारण करे। वह पहले भी आरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण आदेश जारी कर चुका है। बात चाहे अन्य पिछड़ वर्गो के आरक्षण को मान्यता देने की हो या आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा न होने की या फिर पिछड़े वर्गो में क्रीमी लेयर का निर्धारण करने की-ये सारे काम उच्चतम न्यायालय की ओर से ही किए गए। इसके पहले कि आरक्षण संबंधी मांगें देश को त्रस्त करें और सामाजिकविग्रह बढ़े,उच्चतम न्यायालय को आरक्षण को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए आगे आना चाहिए। मौजूदा स्थितियों में यही एक मात्र उम्मीद की किरण है।



Friday, March 25, 2011

जैतापुर: जमीन दखल की राजनीति


अंशु न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच हुए समझौते से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के चेहरे पर जो खुशी आई, उसकी कीमत भारत के नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था को जैतापुर में चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। डॉ सिंह इस समय फ्रेंच न्यूक्लियर उद्योग को उबारने वाले तारणहार की भूमिका में हैं। हम यहां यदि होने वाले खर्च के मुद्दे पर चुप भी हो जाएं तो भी सुरक्षा का प्रश्न एक बड़ी चिंता का विषय है। जैतापुर में प्रस्तावित 9900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938 हेक्टेयर जमीन ली जानी है, जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं। जब उन्होंने खुद मुंबई में इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाया तो उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया। अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाए जब हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले और मुख्यमंत्रीजी उनकी बात सुनते हैं तो परियोजना कार्य रुक जाएगा यानी माड़वन में संयत्र लगाने का फैसला पहले से सुरक्षित है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी। इस मसले पर पर्यावरणविदों का मानना है कि कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां 275 किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है। उससे साफ है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर है। बेशक माड़वन का मुद्दा हम सभी के लिए गंभीर मुद्दा है। भिड़ कहते हैं, प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार के आसपास नजर आ रही हो, लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों में होगी। जैतापुर परियोजना से पूरा कोंकण प्रभावित होगा जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र के काम को छह चरणों में पूरा किया जाना है। योजना के अनुसार पहले चरण में 1650 मेगावाट की ईकाई का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के माड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बचे चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है। वर्तमान में हमारे कुल बिजली उत्पादन मे परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90 प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए माड़वन जैतापुर की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरूरत होगी। बहरहाल बात जैतापुर की करते हैं। जिसमें पांच गांव माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और निवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है, लेकिन चर्चा में माड़वन गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। माड़वन को रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप में जाना जाता है। इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों का परिवार रहता है। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है। कम से कम अंग्रेजों ने इन्हें अपने घरों से तो बेदखल नहीं किया था। परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाल से अति संवेदनशील है, क्योंकि यहां समुद्र का किनारा होने के साथ-साथ 150 किस्म के पक्षी और 300 किस्म की वनस्पतियां पाई जाती हैं। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियां और पक्षियां दुर्लभ श्रेणी में शुमार है। समुद्र के इस मनोरम तटीय क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संयत्र प्रस्तावित हैं, जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने हार्टीकल्चर जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंध दुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है। बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिंध दुर्ग का रूख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित है कि जिस रत्नागिरी को दुनिया भर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है, उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा करार पर तब हस्ताक्षर होता है जबकि पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष का उत्सव मना रही है। साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष अमजद बोरकर बताते हैं कि समुद्र के साथ हमारा रिश्ता पीढि़यों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह हमें रोटी दे रहा है। सरकार भले ही इस परियोजना को कोंकण और महाराष्ट्र के हित में बता रही है, लेकिन यह विकास का नहीं कोंकण की बर्बादी का समझौता है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईस की एक रिपोर्ट के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। सरकार तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन को बंजर बताया जा रहा है। उस पर किसान धान, फल, सब्जी आदि उगा रहे हैं। वर्ष 2007 में बाढ़ के कारण बर्बाद हुई फसल का सरकार ने एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपये का मुआवजा दिया था, यदि जमीन बंजर थी तो मुआवजा की जरूरत ही क्या थी? भूकंप के लिहाज से भी यह क्षेत्र जोन तीन में आता है, जिसमें परमाणु संयत्र को शुरू करना कम खतरे की बात नहीं है। स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला एक बड़ा मुद्दा है। इस बन रहे परमाणु ऊर्जा संयत्र के आसपास जो लोग रह रहे होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका पड़ने वाला दुष्प्रभाव एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। गांव वाले पूछते हैं, यदि यह परियोजना इतनी ही सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था संयत्र से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित किया गया है? आखिर इस संयत्र में काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के आवास की व्यवस्था परमाणु ऊर्जा संयत्र के परिसर में ही क्यों नहीं किया जा रहा। साफ है कि दाल में कुछ काला है और पूरे तथ्यों को छिपाया जा रहा है, जो जनहित के लिए ठीक नहीं। माड़वन (जैतापुर) में रहने वाले जानना चाहते हैं, यदि फ्रांसीसी कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाज सेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर तकनीक की जांच भी करेगी। इसे अभी तक कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा संयत्र के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)