Friday, April 22, 2011

चुनाव सुधार की राष्ट्रीय आकांक्षा


चुनाव सुधार में मतदाताओं की जागरूकता की अहम भूमिका देख रहे हैं लेखक
रोगी गर्भ से स्वस्थ शिशु पैदा नहीं होते। भ्रष्ट चुनाव स्वस्थ सरकार और ईमानदार जनप्रतिनिधि नहीं देते। संविधान सभा में चुनाव आयोग पर हुई बहस में हृदयनाथ कुंजरू ने आशंका व्यक्त की थी, दोषपूर्ण निर्वाचन व्यवस्था से लोकतंत्र विषाक्त होगा। संविधान निर्माताओं की आशंका सच निकली। समूची चुनाव प्रणाली भ्रष्टाचार की शिकार है। संप्रग सरकार ने भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाया है। अन्ना हजारे के आंदोलन ने भ्रष्टाचार को केंद्रीय मुद्दा बनाया है। लोकपाल पर बहस जारी है लेकिन इसकी सीमाएं हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएम कुरैशी ने ठीक कहा है कि लोकपाल भ्रष्ट नेताओं को दंडित कर सकता है, लेकिन आज की परिस्थिति में अपराधी, बलात्कारी, हत्यारे और डकैत विधायिका में जा रहे हैं, मंत्री बन रहे हैं, कानूनतोड़क कानून निर्माता हो रहे हैं, इनका प्रवेश रोका जाना चाहिए। चुनाव प्रणाली भ्रष्टाचार की जननी है। केंद्र ने चुनाव सुधारों पर 11 सूत्रीय आधार-पत्र तैयार किया है। केंद्र चुनाव सुधारों पर गंभीर नहीं है। विधि मंत्रालय द्वारा तैयार आधार-पत्र में संकल्प का अभाव है। कहा गया है कि इस आधार-पत्र का उद्देश्य चुनाव सुधारों पर अब तक हुए विचार-विमर्श का ब्यौरा देकर राष्ट्रीय बहस के लिए एक मंच तैयार करना है। चुनाव सुधारों वाली सरकारी समिति ने कोई सुझाव नहीं दिया है। वोहरा समिति (1993) ने संसदीय संस्थाओं में अपराधियों के प्रवेश पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। चुनाव सुधारों पर बनी गोस्वामी समिति (1990) ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। सरकार द्वारा प्रत्याशियों का चुनाव खर्च उठाने के सुझाव इंद्रजीत गुप्त समिति (1998) ने दिए थे। चुनाव कानूनों में सुधार के लिए विधि आयोग की संस्तुति (1999) भी बेकार गई। संविधान की कार्यपद्धति पर बने राष्ट्रीय आयोग (2001) ने भी चुनाव सुधारों पर जोर दिया था। चुनाव आयोग ने भी चुनाव सुधारों पर बहुमूल्य प्रस्ताव (2004) पेश किए थे। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2008) ने भी चुनाव सुधारों की जरूरत बताई थी। लेकिन सारी कसरत व्यर्थ रही। चुनाव में बाहुबल, धनबल, सत्ताबल, जातिवाद और सांप्रदायिक उन्माद है। सत्तातंत्र का खुला दुरुपयोग है। भारत में सरकार का मतलब बहुमत से बनी मंत्रिपरिषद है। संविधान की दृष्टि से मंत्रिपरिषद संसद व विधानमंडल के प्रति जवाबदेह है, लेकिन वस्तुत: वह अपने दलीय हाईकमानों के प्रति ही उत्तरदायी है। राजनीतिक दल चुनावों में प्रत्याशी उतारते हैं। सांसद, विधायक आम जनता चुनती है, लेकिन उसके विकल्प सीमित हैं। राजनीतिक दल ही जनप्रतिनिधि और मंत्री गढ़ने के कारखाने हैं। हरेक पार्टी का संविधान है लेकिन भारतीय राजनीति का सर्वोपरि विधान यह है कि यहां कोई विधान नहीं है। दल संचालन, आंदोलन और चुनाव अभियान में अरबों-खरबों खर्च होते हैं। इस खर्च के श्चोत अज्ञात हैं। दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। ज्यादातर दलों में आजीवन राष्ट्रीय अध्यक्ष है, सभी स्तरों पर मनोनयन है, संगठन चुनाव होते नहीं। बावजूद इसके इसी दल प्रणाली से लोकतंत्र के संव‌र्द्धन और भ्रष्टाचार मुक्त सरकारों की अपेक्षाएं हैं। दलतंत्र को लोकतंत्री बनाने के लिए संगठन चुनाव भी चुनाव आयोग की देखरेख में कराए जाने चाहिए। संविधान के कार्यकरण पर गठित आयोग (2001) ने राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर पार्टियों की संख्या सीमित करने का सुझाव दिया था, लेकिन यहां आबादी के साथ ही दलों की संख्या भी बढ़ती है। घरेलू झगड़ों से नई पार्टियां बनती हैं। आयोग में लगभग डेढ़ हजार दल पंजीकृत हैं। इनमें एक-तिहाई से कम ही चुनाव लड़ते हैं। चुनाव आयोग चुनाव कानून की धारा 29ए में संशोधन चाहता है कि उसे दलतंत्र व्यवस्थित करने का अधिकार मिलना चाहिए। संविधान समीक्षा आयोग ने पार्टियों के रजिस्ट्रेशन के समय पार्टियों से लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध रहने, जातिवाद, संप्रदायवाद से मुक्त रहने व कमजोर वगरें को संगठन, पदों व चुनाव में उम्मीदवार बनाने पर सुस्पष्ट घोषणा और तद्नुसार आचरण की भी अपेक्षा की थी। राजनीतिक दलों को आदर्श मूलक होना चाहिए। आखिरकार वे ही सत्ता के दावेदार हैं। मूलभूत प्रश्न यह है कि अरबों का खर्च वे कहां से करते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में उम्मीदवारों के लिए अपनी संपत्ति की घोषणा करने के निर्देश दिए थे। यह प्रावधान लागू है, लेकिन राजनीतिक दल इस प्रतिबंध से बाहर हैं। चुनाव आयोग ने 2004 में सभी राजनीतिक दलों के खातों को सार्वजनिक करने की अपेक्षा की थी। अपेक्षा है कि भारत के महालेखाकार से अनुमोदित संस्थाओं व व्यक्तियों द्वारा दलीय खातों का ऑडिट होना चाहिए। चुनाव आयोग का सुझाव उचित ही है कि पार्टी या पार्टी पदाधिकारी द्वारा प्राप्त समस्त धन पार्टी खाते में ही जमा किया जाना चाहिए। पार्टी को अपने खर्च के लिए चेकों द्वारा ही भुगतान करना चाहिए। औद्योगिक घरानों द्वारा पार्टियों को दिए गए धन से सरकारी नीतियां प्रभावित होती हैं। नीरा राडिया के जरिए मंत्री बनाने में भी प्रभाव डालने की घटना से विश्व में भारत की छवि खराब हुई है। मनमोहन सरकार औद्योगिक घरानों के प्रभाव में काम करने की आरोपी बनी है। दलतंत्र लोकतंत्र का उपकरण हैं और चुनाव तंत्र इस उपकरण का कुरुक्षेत्र। सभी दल जिताऊ प्रत्याशी चाहते हैं। माफिया जिताऊ हैं, मतदाता उनसे डरते हैं। पूंजीपति जिताऊ हैं, वे थैली, दारू और साड़ी वगैरह का प्रबंध करते हैं। जातियां जिताऊ हैं, वे जातीय उन्माद बढ़ाती हैं। अल्पसंख्यक थोक वोट बैंक हैं। वे संविधान विरोधी मजहबी आरक्षण व आरोपी आतंकियों के भी पैरोकार बनते हैं। सत्तादल पुलिस को भी एजेंट की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस घमासान में ईमानदार, चरित्रवान और विचारनिष्ठ उम्मीदवार की कोई जगह नहीं। पूरे देश में लोकप्रिय अन्ना हजारे का बयान ताजा है कि चुनाव में रुपया और दारू का प्रभाव है। अपराधियों को चुनाव से रोकने पर चुनाव आयोग का सुझाव है कि सात वर्ष या ज्यादा की सजा वाले मुकदमों के आरोपी चुनाव लड़ने से वंचित किए जाएं। सुझाव अच्छा है लेकिन राज्य सरकारें किसी भी निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा मुकदमा लिखवा सकती हैं। धन प्रभाव को रोकने के लिए स्टेट फंडिंग की भी बात चली है, लेकिन इसका व्यावहारिक प्रयोग सुनिश्चित करना जरूरी है। असल बात है जनजागरण और लोकशिक्षण। जागरूक मतदाता ही नेताओं को खारिज कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है निष्पक्ष निर्भीक चुनाव का वातावरण। व्यापक चुनाव सुधार इसीलिए राष्ट्रीय आकांक्षा है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं).

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