जब से आपने कहा है कि लोकपाल से देश का नब्बे फीसद भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा तमाम लोगों को आपकी बात पर भरोसा ही नहीं हो रहा है। कृपया बताएं भी तो लोकपाल को ऐसी कौन सी जादू की छड़ी मिलने जा रही है ?
भ्रष्टाचार हमेशा ऊपर से शुरू होकर नीचे की तरफ बढ़ता है। अगर हमारे राजनेता और आला अफसर भ्रष्ट न हों तो क्या मजाल है कि निचले स्तर पर जिम्मेदारी सम्भाल रहा व्यक्ति किसी से घूस खा सके। जब लोकपाल के जरिए कार्रवाई करकेभ्रष्टाचारियों की सम्पत्ति छीन ली जाएगी और उन्हें साल दो साल में सजा मिल जाएगी तो भ्रष्टाचार अपने आप काबू में आने लगेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि मजबूत लोकपाल भ्रष्टाचार रूपी दानव का सिर कुचलकर रख देगा। अगर भ्रष्टाचार पर काबू पाने में लोकपाल की इतनी बड़ी भूमिका नहीं होती तो मैं हरगिज इसके लिए सरकार पर इतना दबाव नहीं बनाता और अनशन पर नहीं बैठता। लोकपाल जांच के बाद बमुश्किल दस से पंद्रह फीसद ही भ्रष्टाचार बचेगा, उसे हम युवाओं की मदद से चुनाव सुधार और जन प्रतिनिधियों को वापिस घर भेजने जैसे कदम उठाकर समाप्त कर देंगे।
मजबूत लोकपाल के बाद जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिलाने की लड़ाई कब शुरू करेंगे?
यह विषय भी मेरी प्राथमिकताओं में है। मैं इससे वाकिफ हूं कि नकारा और भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिलाने की लड़ाई भी कोई आसान नहीं रहने वाली। इससे पहले मैं पूरे देश में साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्तियों और विशेषकर नौजवानों का एक गैर राजनीतिक संगठन खड़ा करना चाहता हूं ताकि इस विषय पर जनता को अपने साथ खड़ा कर सकूं।
आज का सुविधाभोगी नौजवान देश के लिए कोई लड़ाई लड़ना भी चाहता है?
नौजवान देश के लिए अवश्य लड़ेगा। बस उसे प्रेरित करने की जरूरत है। मैंने महाराष्ट्र के अपने< आंदोलनों में हमेशा नौजवानों को केंद्र में रखा और उनक जरिए लड़ाइयां जीती हैं। नौजवान देशभक्त है उसे यह स्मरण कराते रहना होगा कि उसे जो आजादी की सांस लेने का अवसर हासिल है, उसके लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे असंख्य नौजवानों ने अपने जीवन की हंसते-हंसते कुर्बानी दी है। जनलोकपाल की लड़ाई में यों तो पूरे देश ने मेरा साथ दिया लेकिन नौजवानों का मैं खासतौर पर शुक्रगुजार हूं।
जिस जनता को आप मालिक बताते हैं जो आपके मुताबिक सौ रुपए में अपना वोट बेच आती है और कानून बनाने वाले मंत्रियों-नेताओं को आप जनता की तिजोरी का सेवक बताते हैं?
यह बयान किसी राजनीतिक दल को हजम नहीं हो रहा है? नहीं, यह बयान कतई विरोधाभासी नहीं है। हमारे वोट से चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों को सेवक नहीं मानने की वजह से ही नेताओं के दिमाग खराब हो गए हैं। राजनीतिक दल इसलिए बुरा मान रहे हैं क्योंकि मैंने जनता को यह अहसास कराने का प्रयास किया है कि वह मालिक है और उसे अपने सेवक से मालिक वाला ही व्यवहार करना चाहिए। मेरी नजर में अच्छा जनप्रतिनिधि वही होता है जो अपने को सही मायने में जनता का सेवक समझता हो।
लोकपाल का सर्वमान्य मसौदा कैसे बनेगा?
हम सबके सहयोग से ही मजबूत लोकपाल की स्थापना कराना चाहते हैं। आगे हम चाहते हैं कि गांव के लोग भी जानें कि आखिर लोकपाल क्या चीज है? इसका उनके साथ क्या वास्ता है? इसलिए जब संयुक्त समिति की बैठक में लोकपाल विधेयक के मसौदे को अंतिम रूप दे दिया जाएगा तो उसे हम सभी ग्राम सभाओं तक पहुंचाएंगे। सभी प्रांतों की भाषा अलग-अलग है। इसलिए लोकपाल का मसौदा स्थानीय भाषा में भेजा जाएगा। यह मेरी जवाबदेही है कि कैसा लोकपाल बन रहा है, इसके बारे में भी उन्हें खुलकर बताऊं।
सीबीआई के एक पूर्व निदेशक ने कहा है कि पुराने और लचर कानूनों को बदले बिना भ्रष्टाचार के मोर्चे पर कुछ हासिल नहीं होगा?
मैंने पुराने और लचर कानूनों को बदलने की कब मनाही की है? मैं हमेशा से इस बात का पक्षधर रहा हूं कि जनता के हित में जो भी बदलना हो वह बदला जाए और जल्दी बदला जाए।
अगर सरकार ने जन लोकपाल के मसौदे को स्वीकार नहीं किया, सीबीआई-सीवीसी और जजों को इसके दायरे में लाने की बात नहीं मानी तो क्या करेंगे?
अभी मैं ऐसा कुछ नहीं सोचता। समिति में साथ बैठेंगे तो हम सरकार के प्रतिनिधियों को समझाएंगे कि हम इसके लिए क्यों जोर दे रहे हैं? हमारा सीधा कहना है कि सीबीआई जैसी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाना चाहिए और सीवीसी की सिफारिशों पर अमल करने की सरकार की बाध्यता हो। अगर सरकार का रुख प्रतिकूल रहा तो फिर से अनशन का विकल्प तो खुला ही है। तब मैं अकेला नहीं पूरा देश अनशन करेगा।
(सुप्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे से अजय तिवारी की बातचीत)
No comments:
Post a Comment