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Sunday, January 23, 2011

संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के पक्ष में नहीं ज्यादातर लोग


राज्य के अधिकतर लोग कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। वे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक सशक्तीकरण एवं शक्ति का हस्तांतरण चाहते हैं। यह जानकारी केंद्रीय वार्ताकारों के दल का नेतृत्व कर रहे दिलीप पडगांवकर ने शुक्रवार को चौथे दौरे की समाप्ति पर दिल्ली रवाना होने से पहले संवाददाताओं से बातचीत में दी। उन्होंने कहा कि वार्ताकारों के दल से मिलने वाले लोगों में अधिकतर कश्मीर में जनमत संग्रह के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि स्थाई राजनीतिक समाधान के बाबत एक छोटे लेकिन मुखर तबके ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव, जनमत संग्रह और आत्म-निर्णय के अधिकार का पक्ष लिया। ज्यादातर लोगों ने लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, बहुलवाद और सहिष्णुता में विश्वास जताया। मुख्य वार्ताकार ने कहा कि उनके समूह ने हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े सैयद अली शाह गिलानी से सीधे तौर पर तो संपर्क नहीं साधा लेकिन उन्होंने अलगाववादी नेताओं को एक पत्र भेजा है ताकि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वह अपने लिखित प्रस्ताव दें। उन्होंने कहा कि वह फरवरी के अंत तक अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप देंगे। राजनीतिक कैदियों व पत्थरबाजों को रिहा करने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इस सिलसिले में पहले सही आंकड़ों की जानकारी प्राप्त की जाएगी। उसके बाद ही आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होगी। भाजपा द्वारा 26 जनवरी को लाल चौक पर तिरंगा फहराने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भाजपा को अपने फैसले पर एक बार फिर सोचना चाहिए। घाटी के हालात अभी इसकी इजाजत नहीं दे रहे। पूर्व सूचना आयुक्त एमएम अंसारी के साथ आए पडगांवकर गत दिवस हुर्रियत कांफ्रेंस के उदारवादी धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक से हुई बातचीत से जुड़े सवाल पर कन्नी काटते नजर आए। उन्होंने गत दिवस फोन पर मीरवाइज से संपर्क साधकर राज्य के हालात पर चर्चा की थी और मुलाकात के लिए वक्त मांगा था।


भारत में अब भी बंधुआ मजदूरी : बालाकृष्णन


बंधुआ मजदूरी को खत्म करने के लिए विभिन्न कानूनों के बावजूद भारत में अब भी यह प्रथा जारी है। यह जानकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दी है। आयोग ने कहा कि अब तक ऐसे 2000 से ज्यादा मामलों को दर्ज किया गया है। आयोग के अध्यक्ष के जी बालाकृष्णन ने कहा कि बंधुआ मजदूरी के खिलाफ संविधान के अनच्च्छेद 23 और भादंसं की धारा 374 में प्रावधान है। इसके अलावा बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम (बीएएल) 1976 भी प्रभाव में है। उन्होंने कहा कि यह प्रथा आज भी जारी है और मानवाधिकार आयोग ने अब तक 2514 मामले दर्ज किए हैं। बंधुआ और बाल मजदूरी पर आयोजित कार्यशाला में बालाकृष्णन ने कहा कि जिलाधिकारियों को बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है। उन्होंने जिलाधिकारियों एवं पुलिस अधीक्षकों को इस प्रथा से पीडि़त गरीबों का बचाव करने का आह्वान किया। कार्यशाला को संबोधित करने वाले उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी स्वीकार किया कि बरतन और गोती जैसी परंपराओं और रिवाजों के रूप में बंधुआ मजदूरी कायम है। पटनायक ने कहा कि राज्य के कुछ इलाकों में मजदूरों का प्रवास जारी है।