हमारा प्रजातंत्र प्रतिद्वंद्वात्मक है। संस्थाएं मसलन; संसद, विपक्ष, र्चचा, विश्वासमत, कार्य स्थगन प्रस्ताव, ये सब इसलिए बनाए गए हैं कि प्रजातंत्र में मुद्दों पर जनता को शिक्षित किया जा सके वरना कोई भी सरकार कह सकती है-हम बहुमत लेकर आए हैं। पांच साल बाद जनता को फिर बताएंगे कि हमने क्या अच्छा किया है और क्या बुरा; विपक्ष कौन होता है सवाल पूछने वाला या सदन में अविश्वास-प्रस्ताव लाने वाला
मुझे निराशा हुई कि विपक्ष आज उन घटनाओं को भूल गया जो अमेरिका के साथ परमाणु करार मामले पर 2008 में सरकार के खिलाफ विश्वास मत के बाद हुई। कुछ ही महीने बाद 2009 के आम चुनाव हुए। विपक्षी पार्टियां लगातार यह आरोप लगाती रहीं कि विश्वास मत हासिल करने के लिए (सांसदों को) पैसे दिए गए थे। जनता की प्रतिक्रिया क्या रही? मुख्य विपक्षी दल जिसे 14 वीं लोकसभा में 138 सीटें मिलीं थीं 116 पर सिमट गया। क्या हुआ वाम दलों को जिनकी सीटें 59 से घट कर 24 रह गई?अकेली कांग्रेस थी जिसकी सीटें 145 से बढ़कर 206 हो गई। उसकी सीटों में 61 अंकों की बढ़ोत्तरी हो गई। यह वह कांग्रेस थी जिसकी अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार के खिलाफ अविश्वास मत प्रस्ताव लाया गया था। इसलिए प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय का तर्कशास्त्र कमजोर लगता है। अगर सीटों का घटना या बढ़ना सत्य सिद्ध करने का जरिया होता तो बाबरी ढांचे को गिराया जाना इस आधार पर सही होता कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सीटें जो मंदिर- मस्जिद विवाद के पहले 1984 के आम चुनाव में महज दो थीं, 1996 में हुए चुनाव में (1992 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद) 163 हो गई। यहां तक कि वोट प्रतिशत भी 7.7 से बढ़कर 20.29 हो गया। इसके विपरीत इसी दौरान कांग्रेस की सीटें 416 (इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरी जनभावना से वोट प्रतिशत 49.01) से घट कर 140 (28.80 प्रतिशत वोट के साथ) रह गई। अगर मनमोहन सिंह के तर्क को मान लिया जाए तो जनता ने हिंदूवादी ताकतों व भाजपा का ढांचा गिराना सही ठहराया? साथ ही कांग्रेस की नीति को गलत करार दिया? फिर अदालत में मुकदमे की जरूरत क्यों? फिर हाल ही में सीबीआई ने फिर से आडवाणी के खिलाफ केस खोलने की दरख्वास्त अदालत में क्यों दी? प्रधानमंत्री अपने गलत तर्क के भावी नतीजे भी समझें। संसद में बाहुबलियों या आपराधिक मामलों में संलिप्त या इसकी पृष्ठभूमि वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। हालांकि ऐसे लोगों को टिकट देने में अधिकतर दल जिम्मेदार हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के वक्तव्य से जोड़ कर देखें तो क्या आपराधिक मामलों में संलिप्त, भले ही निर्वाचित, प्रतिनिधियों का अपराध करना सही है। क्या चुनाव में विजयी होना कोई डिटज्रेट है, जिससे दाग घुल जाते हैं। प्रधानमंत्री के तर्क का सहारा लेकर आपराधिक मामलों में आरोपित व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद यह दावा कर सकते हैं कि उन्हें सभी आरोपों से स्वत: मुक्त माना जाए। चुनाव जितना यदि बेगुनाही और सचाई का पैमाना बन जाएगा तो हर अपराधी या बाहुबली चुनाव लड़ेगा, अपराध के जरिए अर्जित धन व अपने 'बल' को लगाकर चुनाव जीत जाएगा। जो यह सब नहीं करेगा, वह चुनाव हार जाएगा। प्रधानमंत्री के तर्क से तो उसे गलत और गुनहगार ठहरा दिया जाएगा। फिर कानून, पुलिस, जांच या अदालत की जरूरत नहीं रहेगी क्योंकि गुनाह और बेगुनाह का फैसला चुनाव के जरिए ही हो जाएगा। दरअसल, पीएम की मानें तो संसद संसद न होकर अपराधियों की शरणस्थली बन जाएगी। यह तथ्य तो प्रधानमंत्री भी जानते हैं कि हर संस्था की अपनी सीमाएं व मर्यादाएं होती हैं। हर तर्क का अपना 'यूनिवर्स ऑफ़ डिस्कोर्स' होता है। हमारा प्रजातंत्र प्रतिद्वंद्वात्मक है। संस्थाएं मसलन; संसद, विपक्ष, र्चचा, विश्वासमत, कार्यस्थगन प्रस्ताव, ये सब इस लिए बनाए गए हैं कि प्रजातंत्र में मुद्दों पर जनता को शिक्षित किया जा सके वरना कोई भी सरकार कह सकती है-हम बहुमत लेकर आए हैं। पांच साल बाद जनता को फिर बताएंगे कि हमने क्या अच्छा किया है और क्या बुरा; विपक्ष कौन होता है सवाल पूछने वाला या सदन में अविश्वास-प्रस्ताव लाने वाला। फिर प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय को यह भी मालूम होना चाहिए कि भारत में प्रचलित चुनाव पद्धति एफपीटीपी (फस्र्ट पास्ट द पोस्ट) में एक जबरदस्त खामी है। पिछले 20 सालों में, जबसे क्षेत्रीय राजनीतिक ताक़तों ने अपनी पकड़ बनाई, यह ज्यादा उजागर हुई है। खामी यह है कि कई बार किसी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ जाता है परंतु सीटें कम हो जाती हैं और कई बार सीटें बढ़जाती हैं जबकि वोट प्रतिशत कम हो जाता है। सबसे ज्यादा इस खामी का असर देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों-कांग्रेस और भाजपा-ने ही पिछले दो दशकों में झेला है। उदाहरण के तौर पर 1989 में कांग्रेस को 39.53 प्रतिशत वोट मिले पर सीटें आई 195 लेकिन 1991 के चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत घट कर 35.66 हो गया लेकिन सीटें 252 हो गई। क्या माना जाए? राजीव गांधी की शहादत भी जनता ने खारिज कर दी? क्या बोफोर्स घोटाला सच साबित हो गया? या मनमोहन सिंह के उथले तर्क के अनुसार चूंकि सीटें बढ़ीं, इसका मतलब जनता ने शहादत के प्रति सम्वेदना दिखाई? आगे देखिए। 1991 से वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में तथाकथित क्रांतिकारी उदारीकरण की नीति आती है। पांच साल बाद चुनाव होता है, 1996 में। कांग्रेस की सीटें 252 से घट कर से 140 हो जाती हैं और वोट भी 28.80 प्रतिशत रह जाता है। क्या माना जाए? जनता ने इस क्रांति को खारिज कर दिया? और फिर भी आप जबरदस्ती इस नीति को जारी रखे हुए हैं? इसी दौरान बाबरी मस्जिद गिराने की दोषी भाजपा के वोट प्रतिशत व सीटें लगातार बढ़ती रहीं। 1984 में राम मंदिर मुद्दे उठाने से पहले, जहां पार्टी के पास महज 7.74 प्रतिशत वोट था और मात्र दो सीटें; वहीं 1989 में 11.36 प्रतिशत वोट और 89 सीटें, 1991 में 20.04 प्रतिशत वोट और 121 सीटें और 1996 में 20.29 प्रतिशत वोट और 163 सीटें मिलीं। तो क्या यह माना जाए कि जहां जनता ने कांग्रेस की पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के समय जारी आर्थिक उदारीकरण की नीति खारिज कर दिया? वहीं बाबरी ढांचा गिराना और उस पर मंदिर बनवाने का भाजपाई संकल्प न्याय-सिद्ध था? एक और उदाहरण हासिल वोट बनाम हासिल सीट का है। 1998 के चुनाव में पुन: कांग्रेस का वोट घट कर 25.82 प्रतिशत रह गया परंतु एक सीट का पार्टी को फायदा हुआ। क्या माना जाए? आगे देखिए! इसी चुनाव में जहां भाजपा को महज 25.59 प्रतिशत यानी कांग्रेस से 0.23 प्रतिशत कम वोट मिले उसकी सीटें बढ़कर 182 हो गई। यानी कांग्रेस से 41 ज्यादा। दरअसल, हमारी एफपीटीपी चुनाव पद्धति दोषपूर्ण है जिसमें सीट जीतने और वोट पाने में कई बार विलोमानुपाती सम्बन्ध दखाई देते हैं। सत्य खासकर अपराध का सत्य और चुनाव परिणाम का कोई सम्बन्ध नहीं होता। जनता की अदालत वाला तर्क हल्की राजनीति करने वाले देते हैं। जन-मत कई अन्य कारकों से प्रभावित होता है। प्रजातंत्र में हर संस्था की अपनी भूमिका होती है और कोई दूसरी संस्था उसका अतिक्रमण तब तक नहीं कर सकती, जब तक वह संस्था पंगु न हो जाए। ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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