भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आमरण अनशन को मिल रहे प्रबल देशव्यापी समर्थन से न तो सरकार की नींद टूटी है और न सत्ता की खुमारी। पहले तो अन्ना की अनदेखी करने की कोशिश की गई और बाद में उन पर आरोपों की झड़ी लगा दी गई। लेकिन, अनशन का तीसरा दिन आते-आते देशभर में उबलते जनसमर्थन को देख कर सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे। तब अन्ना को मनाने के लिए आननफानन में कपिल सिब्बल को मैदान में उतार दिया गया। सिब्बल से अन्ना के सहयोगियों की दो-दो बार बात भी हुई लेकिन नतीजा कुछ नहीं। सरकार इस पर राजी हो गई है कि लोकपाल कानून के गठन में प्रबुद्ध नागरिक वर्ग को भी शामिल किया जाए लेकिन वह इसके लिए अधिसूचना जारी करने को तैयार नहीं। मतलब, कानून बनाने के नाम पर प्रस्तावित यह कमेटी महज औपचारिक भूमिका निभाएगी क्योंकि उसकी ऐसी कानूनी हैसियत ही नहीं होगी कि उसका प्रस्ताव सरकार पर बाध्यकारी हो। तब अगर अन्ना कह रहे हैं कि सरकार देश को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है तो वह क्या गलत कह रहे हैं! साफ है कि सरकार की नजर पांच राज्य विधानसभा चुनावों पर है कि आंदोलन का असर वहां तक न पहुंचे और इसके लिए वह बातचीत के नाम पर समय निकालना चाहती है। प्रस्तावित समिति के अध्यक्ष के रूप में अन्ना के नाम का विरोध भी ऐसी ही चाल है जबकि वह साफ तौर पर ऐसी जिम्मेदारी से इंकार कर चुके हैं। सरकार प्रणब मुखर्जी के रूप में एक राजनेता को यह उत्तरदायित्व देना चाहती है ताकि लोकपाल कानून के स्वरूप का मामला उसके अपने हाथों से नहीं सरके। अन्ना कह रहे हैं कि सुप्रीमकोर्ट के रिटार्यड जज को यह जिम्मेदारी दो। साफ है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के दलदल में फंसी सरकार को ऐसी दुराग्रहपूर्ण राजनीति और मुश्किलों में डालेगी। अन्ना का आंदोलन केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बल्कि लोकतंत्र को रेहन बना कर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाली राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ है। राजनेताओं के खिलाफ देश का बढ़ता अविश्वास और गुस्सा लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। देश की सेवा के नाम पर चुने गए राजनेता आज तानाशाह जमींदार की तरह व्यवहार कर रहे हैं, यह देश की आवाज है जो अन्ना के मुंह से निकल रही है। यह एक तल्ख सच्चाई है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए सरकार जो लोकपाल कानून बनाने जा रही है वह एक मुखौटे से अधिक और कुछ नहीं है। इसका उदाहरण तो राज्यों में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए बैठाए गए लोक आयुक्तों की बदहाली देख कर ही समझ में आ जाता है। इन लोक आयुक्तों के पास न तो प्रशासनिक अधिकार हैं और न वित्तीय। बिना पुलिस और जांच अधिकारों के इनकी हालत विषहीन, दंतहीन बूढ़े शेर जैसी है जो बस दहाड़ भर सकता है। पिछले दिनों सत्रह राज्यों के लोकायुक्तों ने इसके खिलाफ सरकार से गुहार लगाई थी लेकिन बेकार। इन लोकायुक्तों को भी अफसरशाहों के खिलाफ जांच का अधिकार नहीं है। जाहिर है कि इन्होंने भी प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के स्वरूप पर एतराज किया है। सरकार को समझना चाहिए कि देश की आवाज को अनसुनी करना अब उसके लिए संभव नहीं रह गया है।
Friday, April 8, 2011
देश की आवाज
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आमरण अनशन को मिल रहे प्रबल देशव्यापी समर्थन से न तो सरकार की नींद टूटी है और न सत्ता की खुमारी। पहले तो अन्ना की अनदेखी करने की कोशिश की गई और बाद में उन पर आरोपों की झड़ी लगा दी गई। लेकिन, अनशन का तीसरा दिन आते-आते देशभर में उबलते जनसमर्थन को देख कर सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे। तब अन्ना को मनाने के लिए आननफानन में कपिल सिब्बल को मैदान में उतार दिया गया। सिब्बल से अन्ना के सहयोगियों की दो-दो बार बात भी हुई लेकिन नतीजा कुछ नहीं। सरकार इस पर राजी हो गई है कि लोकपाल कानून के गठन में प्रबुद्ध नागरिक वर्ग को भी शामिल किया जाए लेकिन वह इसके लिए अधिसूचना जारी करने को तैयार नहीं। मतलब, कानून बनाने के नाम पर प्रस्तावित यह कमेटी महज औपचारिक भूमिका निभाएगी क्योंकि उसकी ऐसी कानूनी हैसियत ही नहीं होगी कि उसका प्रस्ताव सरकार पर बाध्यकारी हो। तब अगर अन्ना कह रहे हैं कि सरकार देश को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है तो वह क्या गलत कह रहे हैं! साफ है कि सरकार की नजर पांच राज्य विधानसभा चुनावों पर है कि आंदोलन का असर वहां तक न पहुंचे और इसके लिए वह बातचीत के नाम पर समय निकालना चाहती है। प्रस्तावित समिति के अध्यक्ष के रूप में अन्ना के नाम का विरोध भी ऐसी ही चाल है जबकि वह साफ तौर पर ऐसी जिम्मेदारी से इंकार कर चुके हैं। सरकार प्रणब मुखर्जी के रूप में एक राजनेता को यह उत्तरदायित्व देना चाहती है ताकि लोकपाल कानून के स्वरूप का मामला उसके अपने हाथों से नहीं सरके। अन्ना कह रहे हैं कि सुप्रीमकोर्ट के रिटार्यड जज को यह जिम्मेदारी दो। साफ है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के दलदल में फंसी सरकार को ऐसी दुराग्रहपूर्ण राजनीति और मुश्किलों में डालेगी। अन्ना का आंदोलन केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं बल्कि लोकतंत्र को रेहन बना कर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाली राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ है। राजनेताओं के खिलाफ देश का बढ़ता अविश्वास और गुस्सा लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। देश की सेवा के नाम पर चुने गए राजनेता आज तानाशाह जमींदार की तरह व्यवहार कर रहे हैं, यह देश की आवाज है जो अन्ना के मुंह से निकल रही है। यह एक तल्ख सच्चाई है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए सरकार जो लोकपाल कानून बनाने जा रही है वह एक मुखौटे से अधिक और कुछ नहीं है। इसका उदाहरण तो राज्यों में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए बैठाए गए लोक आयुक्तों की बदहाली देख कर ही समझ में आ जाता है। इन लोक आयुक्तों के पास न तो प्रशासनिक अधिकार हैं और न वित्तीय। बिना पुलिस और जांच अधिकारों के इनकी हालत विषहीन, दंतहीन बूढ़े शेर जैसी है जो बस दहाड़ भर सकता है। पिछले दिनों सत्रह राज्यों के लोकायुक्तों ने इसके खिलाफ सरकार से गुहार लगाई थी लेकिन बेकार। इन लोकायुक्तों को भी अफसरशाहों के खिलाफ जांच का अधिकार नहीं है। जाहिर है कि इन्होंने भी प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के स्वरूप पर एतराज किया है। सरकार को समझना चाहिए कि देश की आवाज को अनसुनी करना अब उसके लिए संभव नहीं रह गया है।
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