Monday, April 25, 2011

न्यायपालिका की भी हो सकती है निगरानी


लोकपाल के गठन की कवायद और अन्य मसलों पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी….
पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ न्यायविद राम जेठमलानी अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं। वह अन्ना हजारे के आंदोलन पर उठ रहे सवालों को फिजूल तो बताते ही हैं, मसौदा समिति पर किए जा रहे हमलों से भी नाखुश हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में तो उन्होंने अपनी ही पार्टी भाजपा को गलत ठहरा दिया। पेश हैं दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता मुकेश केजरीवाल से उनकी लंबी बातचीत के प्रमुख अंश- लोकपाल के लिए बनी साझा समिति की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई है। क्या आप ऐसी व्यवस्था से सहमत हैं? इसमें क्या समस्या है? जानकार या ईमानदार व्यक्ति क्या सिर्फ सरकारी तंत्र में ही हो सकते हैं? कानून का साधारण जानकार भी बता सकता है कि इस देश में कितने पुराने और अव्यवहारिक कानून चल रहे हैं? इस देश में 50 फीसदी कानूनी झगड़े का कारण कानून की खराब ड्राफ्टिंग है। जितना मैं समझता हूं, इसमें कोई वैधानिक समस्या नहीं। कुछ लोग अन्ना के तरीके को ब्लैकमेल तक बता रहे हैं? भ्रष्ट सरकार से लड़ने के लिए आम आदमी के पास क्या साधन है? या तो हथियार उठाए या फिर जनता की अदालत में जाए। अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन के जरिए दिखाया है कि देश की आम जनता क्या कर सकती है। क्या आपको लगता है कि न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए? प्रधानमंत्री क्या देवता हैं जो उन्हें किसी भी समीक्षा और निगरानी के तहत नहीं लाया जा सकता? बेहद ईमानदार बताए जाने वाले इन्हीं प्रधानमंत्री के बनाए कैबिनेट मंत्री जेल में तशरीफ फरमा रहे हैं। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है, सैद्धांतिक रूप से मैं इसके खिलाफ नहीं हूं। मगर देखना होगा कि लोकपाल के अंदर इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए क्या व्यवस्था हो? यह तो नहीं हो सकता कि देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ किसी भी आरोप की जांच कोई भी करने लगे, लेकिन अगर ईमानदार और सुविचारित व्यवस्था हो तो लोकपाल के तहत न्यायपालिका को भी लाया जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लोकपाल कितना अहम साबित होगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ हम सभी ने एक व्यापक लड़ाई की बात की है। अन्ना हजारे हों या कोई और, जो भी इस तरह का काम कर रहा है, मेरा समर्थन उसके साथ है। लोकपाल तो इस व्यापक लड़ाई का हिस्सा है। हालांकि यह इस लड़ाई का अंतिम लक्ष्य नहीं। जब तक ईमानदारी से कानूनों का पालन नहीं होता, निष्पक्ष जांच नहीं होती, किसी को सजा कैसे मिलेगी? बहुत से लोगों ने साझा समिति में पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण के होने पर भी एतराज जताया है? ऐसे सवाल उठाना बहुत ओछापन है। ये दोनों बाप-बेटे भले हों, लेकिन दोनों अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं। ये दो अलग-अलग लोग हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि आप जैसे बहुत से दूसरे बड़े कानूनविद भी तो हैं.. तो क्या सभी को इसमें शामिल कर लिया जाना चाहिए? काले धन पर आप सरकार पर जो आरोप लगाते रहे हैं उन्हें साबित करने के लिए आपके पास कोई तथ्य हैं? इन आरोपों से जुड़े तथ्य कहीं खोजने की जरूरत नहीं। मगर बड़े गम के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं। ये न तो काले धन को वापस लाना चाहते हैं और न ही चोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना चाहते हैं। मैं बहुत जवाबदेही के साथ कह रहा हूं कि ऐसी भ्रष्ट सरकार आज तक नहीं देखी। लेकिन भ्रष्टाचारी तो सभी पार्टी में हैं.. तो मैंने कब कहा है कि सिर्फ एक पार्टी के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करो। जो भी दोषी है, उसे सजा मिले। विनायक सेन को आपकी सरकार नक्सली बता जेल में डालती है और आप उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ते हैं? मेरी सरकार क्या गलत काम नहीं करती? आप अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं? जी हां। यह बात मैं अच्छी तरह सोच-समझ कर कह रहा हूं। विनायक सेन जैसे आदमी को पकड़ कर आप समझते हैं कि नक्सली समस्या दूर कर लेंगे तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। नक्सली साहित्य तो मेरे पास भी है, डाल दो मुझे भी जेल में। नक्सली समस्या से लड़ना है तो एक योजना बनाओ। गरीबों और आदिवासियों तक ईमानदारी से विकास योजनाओं को पहुंचाओ। नक्सली विचारधारा गलत नहीं। वहां कुछ लोग गलत हो सकते हैं। आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। नक्सली तो बंदूक की नोक पर सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं। यह गलत प्रचार है। मुझे नहीं लगता कि विनायक सेन ने सरकार के खिलाफ हथियार उठाने की बात की है। जो लोग ऐसा कहते हैं, उनको पकडि़ए, मगर यह क्या बात हुई कि उससे हमदर्दी रखने वाले को जेल में सड़ा दो। क्या आपकी पुलिस लोगों के दिलों पर भी पहरा लगा सकती है? कहा जाता है कि आपको नरेंद्र मोदी का मुकदमा लड़ने के बदले राज्यसभा सीट मिली? मैंने गुजरात से तो राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ा था, राजस्थान से लड़ा था। न ही राजनीति में मैं आज आया हूं। इस राज्यसभा में ही मैं पूरे पांच टर्म तक सदस्य रहा हूं। 1985 से इसका सदस्य हूं। और फिर अगर मान लें कि भाजपा को यह लगता है कि उसकी पार्टी में एक वकील भी होना चाहिए तो इसमें किसी को क्या एतराज है? मैं नरेंद्र मोदी का मुकदमा राज्यसभा पहुंचने से पहले से लड़ रहा हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि गुजरात के बारे में कांग्रेस ने जानबूझकर एक दुष्प्रचार किया है। गुजरात में दंगे कब भड़के? जब वहां 58 निर्दोष लोगों को आग में जला दिया गया और कांग्रेस ने इसे भी एक दुर्घटना करार देने की कोशिश की। आज सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एसआईटी ने साफ कहा है कि यह एक साजिश थी, जो बड़ी तादाद में निर्दोष लोगों को मारने के लिए रची गई थी। लेकिन आप गोधरा बाद की घटनाओं को कैसे जायज ठहरा सकते हैं? मैं मानता हूं कि जनता ने बहुत जबर्दस्त प्रतिक्रिया की, कुछ अफसरों ने अपना फर्ज पूरा नहीं किया होगा, लेकिन उनके मन में भी गुस्सा था। इसके लिए नरेंद्र मोदी को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मैंने बेस्ट बेकरी के हत्यारों की वकालत नहीं की। मैं इस मामले में तब आया, जब सीधे मुख्यमंत्री को घसीटा जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि गुजरात पुलिस ने हर मामले में चार्जशीट दाखिल की है|

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