Sunday, April 10, 2011

आबादी को मानव संसाधन में तब्दील करिए


भारी आबादी देश के लिए फायदेमंद होने की बात कोरी बकवास है। पश्चिमी मीडिया और विशेषज्ञों का पहले यह भरोसा था कि भारत की बढ़ती जनसंख्या निराशाजनक है । वहीं उन्होंने अब सुर बदल कर विशाल जनसंख्या वाले भारत को जनसांख्यिकी दृष्टि से लाभप्रद बता रहे हैंं। मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखता। मेरा पक्का भरोसा है कि 'जनसांख्यिकी लाभ' वस्तुत: 'जनसांख्यिकी' घाटा है। भारत में करोड़ों लोग निरक्षर, निम्न उत्पादकता वाले अकुशल और हाशिये के काम-धंधे में लगे हुए हैं। हम किस प्रकार उन्हें मानव सं साधन मान सकते हैं
भारत में जनगणना की शुरु आत 1872 से हुई थी और 2011वीं में 15वीं जनगणना पूरी हो गई है। इसके मुताबिक पिछले एक दशक के दौरान देश की आबादी में 18.1 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई है। यह ब्राजील जितनी आबादी है, जो दुनिया का पांचवां सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस लिहाज से निश्चित तौर पर जनसंख्या वृद्धि एक समस्या बनी हुई है। लेकिन इस बार यानी 2001-2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि की दर 17.64 प्रतिशत दर्ज की गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला मौका है जब जनसंख्या वृद्धि दर में कमी देखने को मिली है। 1961 से 1981 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर 24 फीसद से भी ज्यादा रही है, इस लिहाज से देखें तो कमी एक सकारात्मक संकेत है। अब तक जिन राज्यों को पिछड़ा समझा जाता था, वहां भी जनसंख्या वृद्धि में कमी देखने को मिली है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आबादी की रफ्तार कम हुई है। बिहार में यह कमी 3 फीसद के आसपास हुई है तो उत्तर प्रदेश में यह 5 फीसद के आसपास है।
आबादी की दर में गिरावट सकारात्मक
यह ट्रेंड साल-साल दर साल दशक-दर-दशक चलते रहना चाहिए क्योंकि भारी आबादी देश के लिए फायदेमंद होने की बात कोरी बकवास है। पश्चिमी मीडिया और विशेषज्ञों का पहले यह भरोसा था कि भारत की बढ़ती जनसंख्या निराशाजनक है। वहीं उन्होंने अब सुर बदल कर विशाल जनसंख्या वाले भारत को जनसांख्यिकी दृष्टि से लाभप्रद बता रहे हैंं। मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखता। मेरा पक्का भरोसा है कि 'जनसांख्यिकी लाभ' वस्तुत: 'जनसांख्यिकी' घाटा है। भारत में करोड़ों लोग निरक्षर, निम्न उत्पादकता वाले अकुशल और हाशिये के काम-धंधे में लगे हुए हैं। हम किस प्रकार उन्हें मानव संसाधन मान सकते हैं। '
साक्षरता बढ़ी पर पर्याप्त नहीं
वैसे हमारी इस जनगणना का एक दूसरा अहम सकारात्मक संदेश यह है कि देश में साक्षरता का स्तर बढ़ा है। पहले 2001 में देश में साक्षरता की दर 64 फीसद से ज्यादा थी लेकिन अब यह बढ़कर 74 फीसद हो गई है। बहुतेरे लोग इस बात से आह्लादित हैं लेकिन आप किसी गांव में जाकर किसी लड़के से स्कूल के बारे में पूछें तो आपको पता लगेगा कि वह वहां जाना नहीं चाहता और पढ़ने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। सरकार को भी साक्षरता की दर पर इसलिए भी नहीं इतराना चाहिए कि क्योंकि यह आईआईटी और आईआईएम जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चकाचौंध करने वाली सफलता नहीं हैं। हमें इस पर शर्मिदा होना चाहिए कि हम अब भी विश्व के सबसे निरक्षर देश बने हुए हैं। मेरे लिए मानव संसाधन के शिक्षित होने के सूचकांक में लड़कियों की साक्षरता दर में बढ़ोतरी महत्त्वपूर्ण है। हालांकि लड़कियों की साक्षरता दर में लड़कों के अनुपात में बढ़ोतरी पर प्रसन्नता जताने के बावजूद मुझे कहना है कि यह दर पर्याप्त नहीं है। अगर आज 65.46 प्रतिशत लड़कियां साक्षर हैं तो बाकी 35.54 प्रतिशत तो अपढ़ ही हैं। हमें सौ की सौ प्रतिशत लड़कियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य हासिल करना है। इसलिए कि पढ़ी-लिखी लड़कियों की संख्या बढ़ने से एक बेहतर परिवार के निर्माण की सम्भावना ज्यादा होती है, जिससे निश्चित तौर पर आगे चलकर समाज को भी मजबूती मिलती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए शिक्षा नीति में एक व्यावहारिक बदलाव लाने की आवश्यकता है। सरकार को शिक्षा में ज्यादा धन लगाने की आवश्यकता है। खासकर प्राथमिक स्कूल से लेकर हायर सेकेंडरी तक। निश्चित रूप से इस काम में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वेतन बढ़ाने और शिक्षकों के वेतन को दोगुना करने से अपेक्षित लाभ मिलेगा। वस्तुत: 10वीं और 12वीं कक्षा को पढ़ाने वाले शिक्षकों का वेतन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के बराबर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही युनिर्वसिटी में शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के काम में भी निवेश करना चाहिए।
साक्षर-शिक्षित सुरक्षा के लिए अहम
श्री कपिल सिब्बल एक कुशल विधिवेत्ता हो सकते हैं लेकिन एक अच्छे केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री नहीं। मेरी राय है कि मानव संसाधन मंत्रालय को भी रक्षा मंत्रालय जैसा ही महत्त्व दिया जाना चाहिए। आखिर एक साक्षर और शिक्षित आबादी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है। हमारी चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि आबादी चीन से बढ़ जाएगी,बल्कि हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि हमारी आबादी कैसे कुशल मानव संसाधन के तौर पर विकसित हो। सरकार को इस दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए। मुझे लगता है कि हम बढ़ती आबादी उपयोगी मानव संसाधन में तब्दील नहीं कर पा रहे हैं। यह सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
लिंगानुपात में अंतर से चिंता
लेकिन इस जनगणना में एक बड़ा ही निराशाजनक संकेत सामने आया है, कि देश में लड़कियों का लिंगानुपात कम हो गया है। वैसे अभी प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 940 है, जो 2001 में 933 थी। लेकिन इसमें खुश होने की कोई बात नहीं है क्योंकि 0-6 साल की उम्र के बीच में प्रति हजार लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या महज 914 ही है जबकि 2001 में यह 927 थी और 1991 में यह 945 थी। लड़कियों की संख्या में सबसे ज्यादा कमी हरियाणा और पंजाब में ही है लेकिन देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लड़कियों का अनुपात कम हुआ है।
कन्या भ्रूण हत्या पर सख्ती
यह नतीजा बताता है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या पर अब तक रोक नहीं लगाई जा सकी है जबकि इस पर पाबंदी के कानून मौजूद हैं। साफ है कि इस कानून को कहीं ज्यादा सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। इस दिशा में सरकार को भी जागरूकता अभियान बढ़ाना होगा। आम लोगों को इस समस्या की गम्भीरता को समझना होगा तभी जाकर समाज में उपयुक्त लिंगानुपात कायम हो पाएगा। दरअसल कन्या भ्रूण हत्या की सबसे बड़ी वजह दहेज प्रथा का हमारे समाज में बने रहना है। मिडिल क्लास परिवारों के लिए तमाम आधुनिकताओं के बावजूद लड़कियों की शादी करना आज भी बहुत बड़ी चुनौती है।
ठिकाना बदला, पलायन नहीं रुका
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक शहरों की तरफ होने वाले पलायन में कमी देखने को मिली है लेकिन यह महज दिल्ली के मामले में सटीक जान पड़ता है। ऐसा नहीं है कि शहरों की तरफ पलायन कम हो गया है। इस मामले को समझना होगा कि लोग दिल्ली की ओर कम आ रहे हैं और क्यों नहीं आ रहे हैं। आज दिल्ली में आम लोगों के लिए गुजर-बसर करना खासा मुश्किल साबित हो रहा है। न ही दिहाड़ी मजदूरी करके वे अपना और अपने परिवार के रहने की व्यवस्था और गुजर-बसर कर सकते हैं और न ही उन्हें ढंग का काम मिल पा रहा है। वे अपने गांवों से यहां आकर नोएडा, गाजियाबाद और गुड़गांव में गुजर-बसर कर रहे हैं। उन इलाके में उन्हें काम मिल रहा है। इसलिए दिल्ली में पलायन के कम होने की बात आंकड़ों में भले सही हो लेकिन पलायन की मुश्किल अब भी बनी हुई है। आबादी की वृद्धि दर पर अंकुश लगने से तय है कि समाज में सबको विकास में भागीदार बनाने में मदद मिलेगी। अगर हम अपनी आबादी को बढ़ने से रोक नहीं सकते हैं तो निश्चित तौर पर सबको शिक्षा और रोजगार देना सम्भव नहीं हो पाएगा। वैसे भी, देश के करोड़ों लोगों तक आज भी शिक्षा और रोजगार का जरिया नहीं पहुंच पाया है। (आशीष बोस से प्रदीप कुमार की बातचीत पर आधारित)

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