सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और मनमोहन सिंह की सरकार अभी तक इसी बात पर उलझी हुई है कि गरीबों को राशन की बजाए नकद राशि दी जाए या नहीं। या दी जाए तो कैसे दी जाए। लेकिन तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने इन विधानसभा चुनावों में यह करके भी दिखा दिया। चुनाव आयोग की टीम ने बीती 3 अप्रैल को मदुरै के समीप तिरूवन्नमलाई गांव में एक सरपंच के घर छापा मारा तो पाया कि किस तरह हरेक वोटर के नाम पर रुपयों के बंडल ब्लॉक और मोहल्लेवार बंधे हुए थे। ये पैसे वोटर तक कैसे, कौन और कब पहुंचाएगा यह भी तय था। अखबारों के साथ नोटों के बंडल वोटरों के घर फेंकने के अलावा वोटरों को तीन अलग-अलग रंगों के प्लास्टिक के गोल कूपन भी दिए गए। जो उन्हें क्षेत्र की एक विशेष दुकान में दिखाने थे और बदले में उन्हें राशि उपलब्ध कराई जानी थी। क्या शानदार व्यवस्था है। इसके अलावा त्रिची में एक बस की छत से 5 करोड़ रुपये मिले। वोटरों के मोबाइल बिल और बिजली के बिल भरने के आश्र्वासन के साथ यहां तक की गाडि़यों की टंकी फुल कराने तक के प्रलोभन मतदाताओं को दिए जा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी ने बताया कि तमिलनाडु चुनाव में 50 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और सामान जब्त किया गया, जो वोटरों को लुभाने के लिए उपयोग में लिया जाना था। विपक्षी दल अन्नाद्रमुक ने आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ दल डीएमके ने सत्ता में बने रहने के लिए इन चुनावों में करीब पांच हजार करोड़ रुपये वोटरों में वितरित किए हैं। वोटरों को पैसा बांटने के आरोप अन्नाद्रमुक पर भी हैं लेकिन जैसा सत्तारूढ़ पार्टी ने शासन व्यवस्था का दुरुपयोग किया है ऐसा आजाद भारत के इतिहास मे उदाहरण मिलना मुश्किल है। तमिलनाडु में जो कुछ इन विधानसभा चुनावों के दौरान हुआ वह लोकतंत्र के चेहरे पर कालिख पोत देता है। उत्तर-भारत में तो फिर भी वोटरों को एक या दो बोतल शराब या कंबल देकर लुभाया जाता है लेकिन तमिलनाडु में पैसे का जो नंगा नाच हुआ है वह इस व्यवस्था के समर्थकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि जनप्रतिनिधि चुनने की यह सही प्रक्रिया है या नहीं। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी का कहना है कि उनकी सख्ती की वजह से ही राज्य में 33 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी और 12 करोड़ रुपये से अधिक का सामान और जेवरात पकड़े गए जो वोटरों को दिए जाने थे। बात कुछ हद तक सही भी है। यह सख्ती का ही नतीजा था कि वोटरों को पर्ची, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों ने उपलब्ध कराई। चुनाव आयोग की सख्ती ही थी कि लोगों को नोट के बदले प्लास्टिक के कूपन बांटे गए और आश्र्वासन दिया गया कि चुनाव के बाद वे इन कूपन के बदले फलां दुकान से पैसे ले सकेंगे। बीते डेढ़ दशक में तमिलनाडु के चुनावों में पैसे और प्रलोभनों का जबरदस्त चलन हुआ है। पिछले चुनाव में द्रमुक ने गरीब मतदाताओं को कलर टीवी और एक रुपये किलो चावल देने का वायदा किया था। द्रमुक ने इस वायदे को निभाया भी। राज्य में एक करोड़ तीस लाख घरों में कलर टीवी बांटे जाने का लक्ष्य रखा गया और करीब 70 फीसदी घरों में टीवी पहुंचा भी। चावल भी गरीबों को एक रुपये किलो में मिला, भले ही उसकी गुणवत्ता कैसी भी रही हो। जयललिता ने इन वायदों को पिछली बार हवाई किले करार दिए था। लेकिन इस बार वह नहीं चूकना चाहती थी इसलिए उन्होंने भी लैपटॉप, मिक्सी, ग्राइंडर की झड़ी लगा दी। एक बात तय है कि दिल्ली से देखें तो लोकतंत्र और कन्याकुमारी से देखें तो नोटतंत्र वाले तमिलनाडु में 13 मई को कोई भी पार्टी काबिज हो लेकिन लोगों को 2015 तक खूब माल मिलेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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