पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में मतदाताओं की भीड़ उसी तर्ज पर उमड़ती दिखी जैसी कि अन्य चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दिखी थी। आरंभिक अनुमान बता रहे हैं कि अस्सी फीसद से अधिक मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने पहुंचे। सुबह मतदान शुरू होने के समय से ही वोटरों की लंबी लाइनें लग गई और भीड़ की वजह से कई जगहों पर देर तक मतदान का काम जारी रखना पड़ा। ऐसा सिर्फ बंगाल में ही नहीं हुआ। तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में भी मतदाताओं का उत्साह देखने लायक था। और तो और, जम्मू-कश्मीर में जहां लंबे अरसे बाद पंचायत चुनाव हुए हैं वहां भी मतदाताओं की ऐसी ही भीड़ उमड़ती देखी गई। यहां तो आतंकियों और अलगाववादियों के मतदान से दूर रहने के फरमान भी धरे के धरे रह गए। मतदाताओं की ऐसी उमड़ती भीड़ लोकतंत्र के भविष्य के लिए उज्ज्वल संकेत है जो बताती है कि भ्रष्टाचार और कुशासन के तमाम किस्सों के बावजूद अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू इनका हिंसामुक्त रहना भी है। राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात बंगाल का पहला चरण भी शांतिपूर्ण ही रहा और कमोबेश यही स्थिति अन्य जगहों की भी रही। बेशक इस सफलता का बड़ा श्रेय चुनाव आयोग के अचूक और निष्पक्ष इंतजाम को दिया जाना चाहिए लेकिन असल बधाई के पात्र तो वे करोड़ों मतदाता हैं जिन्होंने शांत मन से सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में अपने लोकतांत्रिक हथियार का उत्साहपूर्वक इस्तेमाल किया। अब आप समझ सकते हैं कि क्यों सारी दुनिया आश्र्चयमिश्रित प्रशंसा से भारत के लोकतंत्र की तारीफ करती है। ऐसा भी नहीं कि हमारा लोकतंत्र एक आदर्शवादी व्यवस्था का रूप धारण कर चुका हो। अभी इसमें कमियों की भरमार है। इस व्यवस्था के तहत सत्ता चलाने का अधिकार पाने वाले राजनीति तंत्र पर आज भी भ्रष्टाचार और जिम्मेदारी से भागने के कलंक लग रहे हैं। राजनेताओं, अफसरशाहों और आर्थिक अपराधियों का भ्रष्ट त्रिकोण देश को लूटने और काली कमाई को विदेश भेजने के आरोपों से दागदार हो रहा है। लेकिन, इसके साथ ही हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं भी धीरे-धीरे ताकतवर होती जा रही हैं। आम लोगों में अधिकारों के प्रति जागृति और भविष्य को लेकर सतर्कता बढ़ रही है। इसका साफ संकेत पिछले दिनों अन्ना हजारे के अभियान में दिखा जिसमें सारा देश आहुति देने उठ खड़ा हुआ था। इन चुनावों में मतदाताओं के ऐसे जगे उत्साह के पीछे भी इस अभियान की भूमिका निश्चित रूप से रही होगी। अब समय आ गया है कि लोकतंत्र को और परिपक्व बनाने के लिए तत्काल चुनाव सुधारों पर काम शुरू हो जाए। पहली जरूरत है कि आपराधिक तत्वों को सत्ता की सीढ़ियों के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाए और धनबल के बूते चुनाव जीतने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जाए। चुनाव जीत कर जिम्मेदारी से भागने वालों को उनके पद से हटाने का कानून बने। व्यापक चुनाव सुधारों पर ही देश के लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है। इसमें देरी खतरनाक होगी।
Wednesday, April 20, 2011
परिपक्व होता लोकतंत्र
पश्चिम बंगाल में पहले चरण के चुनाव में मतदाताओं की भीड़ उसी तर्ज पर उमड़ती दिखी जैसी कि अन्य चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दिखी थी। आरंभिक अनुमान बता रहे हैं कि अस्सी फीसद से अधिक मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने पहुंचे। सुबह मतदान शुरू होने के समय से ही वोटरों की लंबी लाइनें लग गई और भीड़ की वजह से कई जगहों पर देर तक मतदान का काम जारी रखना पड़ा। ऐसा सिर्फ बंगाल में ही नहीं हुआ। तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में भी मतदाताओं का उत्साह देखने लायक था। और तो और, जम्मू-कश्मीर में जहां लंबे अरसे बाद पंचायत चुनाव हुए हैं वहां भी मतदाताओं की ऐसी ही भीड़ उमड़ती देखी गई। यहां तो आतंकियों और अलगाववादियों के मतदान से दूर रहने के फरमान भी धरे के धरे रह गए। मतदाताओं की ऐसी उमड़ती भीड़ लोकतंत्र के भविष्य के लिए उज्ज्वल संकेत है जो बताती है कि भ्रष्टाचार और कुशासन के तमाम किस्सों के बावजूद अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू इनका हिंसामुक्त रहना भी है। राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात बंगाल का पहला चरण भी शांतिपूर्ण ही रहा और कमोबेश यही स्थिति अन्य जगहों की भी रही। बेशक इस सफलता का बड़ा श्रेय चुनाव आयोग के अचूक और निष्पक्ष इंतजाम को दिया जाना चाहिए लेकिन असल बधाई के पात्र तो वे करोड़ों मतदाता हैं जिन्होंने शांत मन से सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में अपने लोकतांत्रिक हथियार का उत्साहपूर्वक इस्तेमाल किया। अब आप समझ सकते हैं कि क्यों सारी दुनिया आश्र्चयमिश्रित प्रशंसा से भारत के लोकतंत्र की तारीफ करती है। ऐसा भी नहीं कि हमारा लोकतंत्र एक आदर्शवादी व्यवस्था का रूप धारण कर चुका हो। अभी इसमें कमियों की भरमार है। इस व्यवस्था के तहत सत्ता चलाने का अधिकार पाने वाले राजनीति तंत्र पर आज भी भ्रष्टाचार और जिम्मेदारी से भागने के कलंक लग रहे हैं। राजनेताओं, अफसरशाहों और आर्थिक अपराधियों का भ्रष्ट त्रिकोण देश को लूटने और काली कमाई को विदेश भेजने के आरोपों से दागदार हो रहा है। लेकिन, इसके साथ ही हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं भी धीरे-धीरे ताकतवर होती जा रही हैं। आम लोगों में अधिकारों के प्रति जागृति और भविष्य को लेकर सतर्कता बढ़ रही है। इसका साफ संकेत पिछले दिनों अन्ना हजारे के अभियान में दिखा जिसमें सारा देश आहुति देने उठ खड़ा हुआ था। इन चुनावों में मतदाताओं के ऐसे जगे उत्साह के पीछे भी इस अभियान की भूमिका निश्चित रूप से रही होगी। अब समय आ गया है कि लोकतंत्र को और परिपक्व बनाने के लिए तत्काल चुनाव सुधारों पर काम शुरू हो जाए। पहली जरूरत है कि आपराधिक तत्वों को सत्ता की सीढ़ियों के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाए और धनबल के बूते चुनाव जीतने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाई जाए। चुनाव जीत कर जिम्मेदारी से भागने वालों को उनके पद से हटाने का कानून बने। व्यापक चुनाव सुधारों पर ही देश के लोकतंत्र का भविष्य निर्भर है। इसमें देरी खतरनाक होगी।
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