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समाज विभांशु दिव्याल
महविश कांड की गर्म हवाएं अभी ठंडी भी नहीं हुई हैं
कि उत्तर प्रदेश से फिर एक ऐसे ही
समाचार की प्रसूति हुई है। यानी मान हत्या के एक और दुखद कांड
की। मीडिया इस
कांड को ज्यादा हवा देने से शायद अपनी इस समझदारी के तहत बचा कि इससे सांप्रदायिक
भावनाएं उत्तेजित हो सकती हैं या महविश कांड की तरह इसमें कोई खबरिया
सनसनी नहीं बची थी क्योंकि दोनों ही पक्ष दृश्य से गायब हो गए- लड़की
को मार दिया गया और लड़के ने आत्महत्या कर ली। इस दर्दनाक कहानी में एक
बड़े अखबार ने जो नाम साया किए हैं,
वे हैं- अंजुम आरा और संजीव कश्यप। सूत्रों के हवाले से जो घटना बताई गई है
वह यह है कि मुरादाबाद के एक गांव
के अंजुम आरा और संजीव कश्यप प्यार में पड़ गए थे, शादी करना चाहते थे। लेकिन
अंजुम के घरवालों ने उसकी शादी अन्यत्र तय कर दी। यह बताने के लिए कि घरवाले
उसकी शादी जबरन कर रहे हैं, अंजुम
संजीव के घर पहुंच गई। उसकी
बदनसीबी कि इसकी भनक उसके घरवालों को लग गई और वे भी पीछे-पीछे
कश्यप के घर पहुंच
गए और अंजुम को सरेआम बुरी तरह मारते-पीटते वापस घसीट ले गए। उसी दिन
उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, यह
कहकर कि उसने जहर खाकर खुदकुशी
करने की कोशिश की है। मगर जब मौत के बाद शव परीक्षा हुई तो
उसकी देह पर चोटों
के 27 निशान
पाए गए और पाया गया कि उसकी मौत भीतर खून के रिसाव से हुई थी,
यानी बेरहम मार के कारण। उसके बाद लड़के का शव भी सड़क किनारे
पाया गया।
शायद उसने अपनी भावी पत्नी के दुखद अंत से दुखी होकर जहर खा लिया था। लड़के
के घरवालों का आरोप लड़की के घरवालों पर है। और अब यह मामला जांच-पड़ताल के लिए पुलिस के पास है। उस
पुलिस के पास जिसने महविश के पति
अब्दुल हाकिम की मान हत्या के सारे चीखते-चिल्लाते साक्ष्यों
के बावजूद उसे आपसी
रंजिश की हत्या ठहराने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। दिल्ली, हरियाणा,
पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से इस तरह की
खबरें आए
दिन आती रहती हैं और प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या करने में न कोई जाति पीछे
है, न
कोई धर्म-मजहब। जो लोग ऐसी घटनाओं को गलत समझते हैं,
ऐसी जघन्यता
पर हैरानी जाहिर करते हैं, इन
पर कड़ी टीका-टिप्पणी करते हैं, उनमें
ज्यादातर लोग इसके कारण का ठीकरा पुलिस-प्रशासन की असफलता पर फोड़ते नजर
आते हैं। यही काम बहुत-से वे सामाजिक संगठन भी करते हैं जो महिला सबलीकरण
के काम में जुटे हैं। वे उस सांस्कारिक मानसिकता को नहीं समझ पाते जो
ऐसी घटनाओं के मूल में होती है और जिसके चलते लड़की या लड़के के परिजन, ज्यादातर लड़की के परिजन, अपने बेटी-बेटे के प्रेम प्रसंग या
स्वेच्छया विवाहेच्छा
को न केवल परिवार की मर्यादा के विरुद्ध अपमानजनक कार्य मानते हैं
बल्कि अपनी जाति या धर्म-मजहब के लिए भी गहरा मानहानिकारक मानते हैं। यह
जाति बोध, धर्म
बोध और औरत के प्रति अधिकार बोध उनके शताब्दियों के संस्कार का हिस्सा है, जिससे उबरने के लिए उनके पास कोई
वास्तविक उत्प्रेरक नहीं
है। जाति और धर्मो के बीच के पारस्परिक रिश्ते,
खासतौर पर सामाजिक
रिश्ते, ऐतिहासिक
तौर अलगाव और वैमनस्य के रहे हैं। यानी एक-दूसरे को हेय मानकर पारस्परिक दूरी बनाए रखने के। और
इस दूरी को प्रतिष्ठा-मर्यादा बनाकर
इसे एक सामाजिक मूल्य की तरह संस्कारबद्ध किया जाता रहा है।
औरत के आचरण को
भी इसी सामाजिक मूल्य का हिस्सा मानकर पोषित किया जाता है। यानी उसे घर के
बड़ों यानी पुरुषों- पिता, भाइयों
के कहे अनुसार सामाजिक व्यवहार करना
है, यही
उसकी मर्यादा है। उसे कैसे कपड़े पहनने हैं,
कैसे नहीं; किससे मिलना
है, किससे
नहीं; कहां
जाना है, कहां
नहीं आदि बातें स्वयं उसे नहीं
बल्कि उसके लिए घर के मदरे को तय करनी होती है। इनका उल्लंघन, मर्यादा का उल्लंघन है। और प्यार की पींगे बढ़ाना
या अपनी मर्जी से शादी करने की बात
सोचना सिर्फ मर्यादा का उल्लंघन नहीं, बल्कि पारिवारिक अपराध है, जिसकी सजा देश के कानून में कुछ भी हो, परंतु परिवार के कानून में घर निकाले से
लेकर मौत
तक कुछ भी हो सकती है। तो यह वह सामाजिक संस्कार है जिसकी व्याप्ति हर समाज-वर्ग
में इतनी अधिक भौतिक- बौद्धिक-लोकतांत्रिक प्रगति के बाद भी बहुत गहरी है। अगर 21वीं सदी और सार्विक मताधिकार वाले
लोकतंत्र के बावजूद भारत
में औरत का प्यार और उसका स्वैच्छिक निर्णयाधिकार आज भी सामाजिक स्वीकृति
का मोहताज है तो इसका एक और बहुत बड़ा कारण यह कथित लोकतंत्र भी है।
इसने अपने विकास के दौरान जो अक्षम्य काम किया है,
वह है वोट की खातिर
हर बेहूदी सांस्कृतिक- सांस्कारिक प्रवृत्ति का तुष्टीकरण और
उसका पोषण। याद
करिए कि जब हरियाणा की एक खाप पंचायत ने 15
वर्ष की आयु में ही लड़की की शादी कर देने का ‘प्रगतिशील’ प्रस्ताव पास किया था तो बहुत-से राजनेताओं
ने उसका समर्थन कर दिया था और ज्यादातर ने जुबान पर ताले डाल लिए थे।
एक ओर तो बेहद लचर सुरक्षा और न्याय तंत्र,
और दूसरी ओर राजनीति के
संरक्षण में जातीय और सांप्रदायिक पहचानों का अपने परंपरागत
अलगाव और वैमनस्य
के साथ लगातार रूढ़ और जड़ होते जाने से किसी भी प्रेमी जोड़े की सांबंधिक
अधिकार की स्थापना असंभव नहीं तो बेहद कठिन अवश्य हो गई है। इस परिदृश्य
को बदलने के लिए सबसे पहले तो इस लोकतंत्र का चरित्र ही बदलना होगा।
Rashtirya Sahara National Edition 9-12-2012 Page 10 लोकतंत्र