Monday, December 10, 2012

लोकतंत्र पोषित नृशंसता






समाज विभांशु दिव्याल
महविश कांड की गर्म हवाएं अभी ठंडी भी नहीं हुई हैं कि उत्तर प्रदेश से फिर एक ऐसे ही समाचार की प्रसूति हुई है। यानी मान हत्या के एक और दुखद कांड की। मीडिया इस कांड को ज्यादा हवा देने से शायद अपनी इस समझदारी के तहत बचा कि इससे सांप्रदायिक भावनाएं उत्तेजित हो सकती हैं या महविश कांड की तरह इसमें कोई खबरिया सनसनी नहीं बची थी क्योंकि दोनों ही पक्ष दृश्य से गायब हो गए- लड़की को मार दिया गया और लड़के ने आत्महत्या कर ली। इस दर्दनाक कहानी में एक बड़े अखबार ने जो नाम साया किए हैं, वे हैं- अंजुम आरा और संजीव कश्यप। सूत्रों के हवाले से जो घटना बताई गई है वह यह है कि मुरादाबाद के एक गांव के अंजुम आरा और संजीव कश्यप प्यार में पड़ गए थे, शादी करना चाहते थे। लेकिन अंजुम के घरवालों ने उसकी शादी अन्यत्र तय कर दी। यह बताने के लिए कि घरवाले उसकी शादी जबरन कर रहे हैं, अंजुम संजीव के घर पहुंच गई। उसकी बदनसीबी कि इसकी भनक उसके घरवालों को लग गई और वे भी पीछे-पीछे कश्यप के घर पहुंच गए और अंजुम को सरेआम बुरी तरह मारते-पीटते वापस घसीट ले गए। उसी दिन उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, यह कहकर कि उसने जहर खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की है। मगर जब मौत के बाद शव परीक्षा हुई तो उसकी देह पर चोटों के 27 निशान पाए गए और पाया गया कि उसकी मौत भीतर खून के रिसाव से हुई थी, यानी बेरहम मार के कारण। उसके बाद लड़के का शव भी सड़क किनारे पाया गया। शायद उसने अपनी भावी पत्नी के दुखद अंत से दुखी होकर जहर खा लिया था। लड़के के घरवालों का आरोप लड़की के घरवालों पर है। और अब यह मामला जांच-पड़ताल के लिए पुलिस के पास है। उस पुलिस के पास जिसने महविश के पति अब्दुल हाकिम की मान हत्या के सारे चीखते-चिल्लाते साक्ष्यों के बावजूद उसे आपसी रंजिश की हत्या ठहराने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से इस तरह की खबरें आए दिन आती रहती हैं और प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्या करने में न कोई जाति पीछे है, न कोई धर्म-मजहब। जो लोग ऐसी घटनाओं को गलत समझते हैं, ऐसी जघन्यता पर हैरानी जाहिर करते हैं, इन पर कड़ी टीका-टिप्पणी करते हैं, उनमें ज्यादातर लोग इसके कारण का ठीकरा पुलिस-प्रशासन की असफलता पर फोड़ते नजर आते हैं। यही काम बहुत-से वे सामाजिक संगठन भी करते हैं जो महिला सबलीकरण के काम में जुटे हैं। वे उस सांस्कारिक मानसिकता को नहीं समझ पाते जो ऐसी घटनाओं के मूल में होती है और जिसके चलते लड़की या लड़के के परिजन, ज्यादातर लड़की के परिजन, अपने बेटी-बेटे के प्रेम प्रसंग या स्वेच्छया विवाहेच्छा को न केवल परिवार की मर्यादा के विरुद्ध अपमानजनक कार्य मानते हैं बल्कि अपनी जाति या धर्म-मजहब के लिए भी गहरा मानहानिकारक मानते हैं। यह जाति बोध, धर्म बोध और औरत के प्रति अधिकार बोध उनके शताब्दियों के संस्कार का हिस्सा है, जिससे उबरने के लिए उनके पास कोई वास्तविक उत्प्रेरक नहीं है। जाति और धर्मो के बीच के पारस्परिक रिश्ते, खासतौर पर सामाजिक रिश्ते, ऐतिहासिक तौर अलगाव और वैमनस्य के रहे हैं। यानी एक-दूसरे को हेय मानकर पारस्परिक दूरी बनाए रखने के। और इस दूरी को प्रतिष्ठा-मर्यादा बनाकर इसे एक सामाजिक मूल्य की तरह संस्कारबद्ध किया जाता रहा है। औरत के आचरण को भी इसी सामाजिक मूल्य का हिस्सा मानकर पोषित किया जाता है। यानी उसे घर के बड़ों यानी पुरुषों- पिता, भाइयों के कहे अनुसार सामाजिक व्यवहार करना है, यही उसकी मर्यादा है। उसे कैसे कपड़े पहनने हैं, कैसे नहीं; किससे मिलना है, किससे नहीं; कहां जाना है, कहां नहीं आदि बातें स्वयं उसे नहीं बल्कि उसके लिए घर के मदरे को तय करनी होती है। इनका उल्लंघन, मर्यादा का उल्लंघन है। और प्यार की पींगे बढ़ाना या अपनी मर्जी से शादी करने की बात सोचना सिर्फ मर्यादा का उल्लंघन नहीं, बल्कि पारिवारिक अपराध है, जिसकी सजा देश के कानून में कुछ भी हो, परंतु परिवार के कानून में घर निकाले से लेकर मौत तक कुछ भी हो सकती है। तो यह वह सामाजिक संस्कार है जिसकी व्याप्ति हर समाज-वर्ग में इतनी अधिक भौतिक- बौद्धिक-लोकतांत्रिक प्रगति के बाद भी बहुत गहरी है। अगर 21वीं सदी और सार्विक मताधिकार वाले लोकतंत्र के बावजूद भारत में औरत का प्यार और उसका स्वैच्छिक निर्णयाधिकार आज भी सामाजिक स्वीकृति का मोहताज है तो इसका एक और बहुत बड़ा कारण यह कथित लोकतंत्र भी है। इसने अपने विकास के दौरान जो अक्षम्य काम किया है, वह है वोट की खातिर हर बेहूदी सांस्कृतिक- सांस्कारिक प्रवृत्ति का तुष्टीकरण और उसका पोषण। याद करिए कि जब हरियाणा की एक खाप पंचायत ने 15 वर्ष की आयु में ही लड़की की शादी कर देने का ‘प्रगतिशील’ प्रस्ताव पास किया था तो बहुत-से राजनेताओं ने उसका समर्थन कर दिया था और ज्यादातर ने जुबान पर ताले डाल लिए थे। एक ओर तो बेहद लचर सुरक्षा और न्याय तंत्र, और दूसरी ओर राजनीति के संरक्षण में जातीय और सांप्रदायिक पहचानों का अपने परंपरागत अलगाव और वैमनस्य के साथ लगातार रूढ़ और जड़ होते जाने से किसी भी प्रेमी जोड़े की सांबंधिक अधिकार की स्थापना असंभव नहीं तो बेहद कठिन अवश्य हो गई है। इस परिदृश्य को बदलने के लिए सबसे पहले तो इस लोकतंत्र का चरित्र ही बदलना होगा।
Rashtirya Sahara National Edition 9-12-2012 Page 10 लोकतंत्र

Thursday, November 1, 2012

खास लोग चुनते हैं सबसे बडे़ लोकतंत्र का मुखिया



ठ्ठ विशेष संवाददाता, डेटन (ओहायो) किसी को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि दुनिया केसबसे सशक्त लोकतंत्र के मुखिया का चुनाव वहां केलाखों मतदाताओं के सीधे वोट से होता है। अमेरिका केलोग छह नवंबर को वोट जरूर डालेंगे, लेकिन राष्ट्रपति का औपचारिक चुनाव 17 दिसंबर को होगा जब 538 इलेक्टर्स यानी चयनकर्ता औपचारिक तौर पर बताएंगे कि रोमनी जीते या ओबामा। यही इलेक्टोरल कॉलेज है जिसमें राष्ट्रपति के लिए 270 वोट जरूरी हैं। इस व्यवस्था को पुराना व गैर जरूरी मान कर खत्म करने की मांग बढ़ रही है। 1787 में अमेरिका संविधान बनने के साथ ही इस व्यवस्था की शुरुआत हुई थी। अमेरिका दुनिया का पहला देश था जहां राष्ट्राध्यक्ष का सीधा चुनाव प्रारंभ हुआ। संविधान निर्माताओं ने यह महसूस किया था कि अगर केवल सीधे वोट से राष्ट्रपति चुना गया तो बड़े राज्यों का ही दबदबा रहेगा। इसलिए दो स्तरों वाली व्यवस्था तय हुई जिसमें लोग राष्ट्रपति का सीधा चुनाव भी करते और चयनकर्ता (इलेक्टर) भी चुनते हैं। आमतौर पर इस इलेक्टर का नाम मतपत्र पर नहीं होता। यह व्यक्ति चुनाव लड़ने वाले दल की तरफ से तय किया जाता है। चुनाव की प्रक्रिया में चार साल बाद नवंबर के दूसरे मंगलवार को वोट पड़ते हैं और लोकप्रिय वोट के आधार पर नतीजे घोषित किये जाते हैं, लेकिन निर्णय एक माह बाद इलेक्टर्स वोट के आधार पर होता है। यदि दोनों प्रत्याशियों को बराबर यानी प्रत्येक को 270 वोट मिलते हैं तो फिर हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव राष्ट्रपति का चुनाव करता है। इलेक्टोरल कॉलेज अमेरिकी संसद के उच्चसदन यानी सीनेट में छोटे बडे़ हर राज्य से दो सदस्य आते हैं। जबकि निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में सदस्य संख्या राज्य की आबादी के आधार पर तय होती है। किसी राज्य में सीनेट और हाउस के सदस्यों की संख्या का जोड़ उसका इलेक्टोरल कॉलेज है। मसलन यदि किसी राज्य में दो सीनेट और पांच हाउस सदस्य हैं तो वहां इलेक्टोरल कॉलेज मतों की संख्यासात होगी। इस हिसाब से कैलिफोर्निया में इलेक्टोरल मतों की संख्या 55 है और वायोमिंग में तीन। लोकप्रियता बनाम गणित 1824 : एंड्यू जैक्सन ने लोकप्रियता का वोट भी जीता और इलेक्टोरल भी, लेकिन चुनाव की दौड़ में मौजूद किसी प्रत्याशी को इलेक्टोरल कॉलेज के आधे से अधिक वोट नहीं मिले। अंतत: हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव ने जॉन क्विंसी एडम्स को राष्ट्रपति चुना। 1876 : सैमुएल जे टिल्डेन को पापुलर वोट मिला मगर इलेक्टोरल वोट में रदरफोर्ड हेस एक मत से आगे रहे और राष्ट्रपति घोषित किये गए। 1888 : बेंजामिन हैरिसन इलेक्टोरल वोट से जीते। ग्रोवर क्लीवलैंड पापुलर मतों में जीत कर भी हार गए। 2000 : लोकप्रियता का वोट डेमोक्रेट अल गोर के पक्ष में गया था, लेकिन राष्ट्रपति चुनने वाले इलेक्टोरल कॉलेज की गणित में बाजी रिपब्लिकन जॉर्ज बुश के हाथ रही। तूफान की सियासत डेटन में मंगलवार शाम हल्की बर्फ गिर रही थी जब रिपब्लिकन मिट रोमनी सैंडी तूफान के पीडि़तों के लिए राहत जुटाने पहुंचे। छोटा सा भाषण देने के बाद राहत सामग्री की पैकिंग में लग गए। यह राहत की सियासत थी। रोमनी ने चुनाव की बात नहीं की, लेकिन उनकी टीम काम में लगी थी। कार्यक्रम स्थल के बाहर वोटरों को मनाया जा रहा था। इधर बराक ओबामा सैंडी से राहत की देखरेख में लगे हैं। उन्होंने बिजली की आपूर्ति बहाल करने को सबसे पहली वरीयता पर रखा है। मिशेल ओबामा प्रचार संभाल रही है और लोगों को पहले वोट डालने को कह रही है। ओबामा शुक्रवार को डेटन के करीब स्पि्रंगफील्ड में सभा के साथ प्रचार में वापस लौटेंगे। 2000 की याद ओबामा समर्थकों ने ओहायो सहित प्रमुख राज्यों में एक नया विज्ञापन जारी किया है, जिसमें 537 का नंबर दिखाया जाता है। यह उस वक्त का इलेक्टोरल कॉलेज है जिसे लेकर अल गोर ओर जॉर्ज बुश के बीच कानूनी लड़ाई चली थी। ओबामा का विज्ञापन कहता है कि वोटों की इस संख्या ने अमेरिका का इतिहास बदला था और जो नहीं होना चाहिए था वह हो गया था। तूफान और राष्ट्रपति अमेरिका के राष्ट्रपतियों का तूफानों से बड़ा दिलचस्प रिश्ता रहा है। 2005 के कैटरीना हरीकेन के दौरान राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की सुस्ती आलोचनाओं का सबब बनी थी। जबकि 1999 में हरीकेन फ्लायड के दौरान राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को न्यूजीलैंड का दौरा बीच में छोड़ कर वापस आना पड़ा था। 1992 में हरीकेन एंड्रयू के दौरान जॉर्ज बुश सीनियर की सुस्ती विवाद का विषय रही थी। कसीनो का चंदा राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट को चंदा देने वाले शीर्ष पांच लोगों की सूची बड़ी दिलचस्प है। यूएसए टुडे का एक विश्लेषण बताता है कि लॉस वेगास के प्रमुख कसीनो के मालिक शेडन एडलसन रिपब्लिकन के प्रमुख आर्थिक मददगार रहे। एडलसन दुनिया की प्रमुख कसीनो कंपनी लॉस वेगास सैंड्स के मालिक है और अमेरिका के 12 वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। डेमोक्रेट की सूची में शिकागो कीप्रमुख मीडिया कंपनी न्यूज वेब के मालिक फ्रेड आयचेनर सबसे ऊपर हैं। ह्यूस्टशन के वकील स्टीव मोस्टीन ने जहां ओबामा के लिए थैली खोली है वही दुनिया की सबसे बड़ी ऑनलाइन डिस्काउंट फर्म टीडी अमेरीट्रेड केमालिक जो रिकेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा चंदा दिया है।


Dainik Jagran National Edition 01-11-2012 लोकतंत्र Paje -7

Sunday, October 14, 2012

देश का सुसमृद्ध राज्य हरियाणा शर्मिदा नहीं










समाज विभांशु दिव्याल
, आहत है। इसलिए नहीं है कि राज्य में आये दिन बलात्कार हो रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि लगातार हो रहे बलात्कारों की घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बना रही हैं। मीडिया में हल्ला होता है और हरियाणा स्वयं को अपमानित-आहत महसूस करता है। वह कभी उपचार खोजता है, कभी सफाई देता है और कभी गुस्से में पलटवार करता है। उसकी एक खाप पंचायत फरमान जारी करती है कि लड़कियों की शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में कर दी जाए, जैसे कि मुगलकाल में हिंदू परिवार लड़कियों को अपहरण आदि से बचाने के लिए उनकी शादी बचपन में ही कर दिया करते थे। हरियाणा के एक पूर्व मुख्यमंत्री पंचायत के इस फरमान पर अपने समर्थन की मुहर लगा देते हैं। एक आहत सरकारी प्रवक्ता बाकायदा मीडिया के सामने अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं कि नब्बे प्रतिशत मामलों में लड़कियां बलात्कार स्थल या स्थिति तक अपनी सहमति से ही पहुंचती हैं और गुंडों की गिरफ्त में फंस जाती हैं। एक और महिला मंत्री कहती हैं कि बलात्कार हर जगह हो रहे हैं, फिर हरियाणा को ही क्यों बदनाम किया जा रहा है। मतलब, हरियाणा में हो रहे बलात्कार कोई ऐसी परिघटना नहीं हैं कि इन्हें बेवजह तूल दिया जाए। एक तेजतर्रार महिला कांग्रेस प्रवक्ता बयान देती हैं कि बलात्कार की घटनाएं कानून- व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि किसी और वजह से हैं। किस वजह से है, इसकी व्याख्या नहीं दी गई। बलात्कार की घटनाओं पर भद्रजनों की ऐसी असंवेदनशील प्रतिक्रियाएं देश के साठोत्तरी संविधान के मुंह पर तमाचा प्रतीत हो सकती हैं; प्रगतिकामी चेतना के लोगों को सोलहवीं सदी की मानसिकता की उपज लग सकती हैं; औरतों की बराबरी और उनके संवैधानिक अधिकारों के पैरोकारों को गुस्से से भर सकती हैं; मीडिया के विचारवानों को उत्तेजित कर सकती हैं और स्वयं आधुनिकतावादी महिलाओं को गुस्से से भर सकती हैं। मगर खाप पंचायतों के फैसले और स्वयं संवैधानिक व्यवस्थाओं का बलात्कार करने वाली प्रतिक्रियाएं इस समय के एक बेहद अभद्र सामाजिक सच को भी उजागर कर रहे हैं। यह वह सच है जो महिलाओं को सुरक्षा देने में कानून-व्यवस्था की असफलता, राजनीतिक जमात की असंवेदनशीलता और सत्ता की चाह में किसी भी दुष्प्रवृत्ति के आगे घुटने टेक देने की लोकतांत्रिक प्रवृत्ति, खाप पंचायतों की जैसी कुलक जाहिल मानसिकता, सामाजिक-आर्थिक निर्णायक ताकतों की पुरुषवादी और रुढ़िवादी वैचारिकता और आधुनिक विचारवाहकों के आम जनता के दिमाग तक पहुंचने के प्रयासों की विफलता जैसे तत्वों से तैयार हुआ है। इस सच से आंखें तो चुराई जा सकती हैं, इसकी बयानी निंदा भी की जा सकती है; लेकिन इससे बचकर नहीं भागा जा सकता। किसी भी सामाजिक दुष्प्रवृत्ति पर चंद पढ़े-लिखे लोगों द्वारा विचार किया जाना और उसके विरुद्ध कानून बना दिया जाना एक बात है, लेकिन उस कानून के प्रति लोगों में आस्था जगाना, ऐसा वातावरण निर्मित करना जिससे लोग उस कानून का पालन कर सकें और कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध सामाजिक तौर पर सक्रिय हो सकें, एकदम दूसरी बात। अगर एक खाप पंचायत और एक पूर्व मुख्यमंत्री लड़की की शादी बचपन में ही करने की बात करते हैं, तो समझना चाहिए कि सामाजिक स्थिति कितनी गंभीर है। खाप पंचायत यह फरमान भी जारी कर सकती थी कि जो भी व्यक्ति किसी लड़की की इज्जत पर हाथ डालेगा उसे समूचा समाज मिलकर कानून के कटघरे में पहुंचाएगा और जो भी लोग उसका बचाव करेंगे उनका बहिष्कार किया जाएगा। अगर यह फरमान जारी होता तो स्थिति एकदम अलग होती और बेधड़क विचरण करने वाली बलात्कारी मानसिकता भयभीत होती। मगर ऐसा फरमान जारी करने के लिए एक खाप पंचायत का पुरुषवादी सोच से बाहर निकलकर आधुनिकतावादी सोच में दीक्षित होना जरूरी है। यही वह काम है जो हमारा लोकतंत्र साठ-सत्तर वर्षो में भी नहीं कर पाया है। उल्टे सारी चुनावी राजनीति ने, सिर्फ हरियाणा में ही नहीं बल्कि समूचे देश में, वोट की खातिर खाप मानसिकता के आगे सिर झुका दिया है, उससे समझौता कर लिया है। खाप मानसिकता और चुनावी राजनीति के घालमेल ने जो वातावरण तैयार किया है वह उसी तरह से एक बलात्कारी के पक्ष में जाता है, जिस तरह से एक भ्रष्टाचारी के पक्ष में। अगर कोई सर्वाधिक असुरक्षित है तो वह है अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ जीने की चाह रखने वाली औरत और अपनी मेहनत के साथ ईमानदारी से जीने की चाह रखने वाला आदमी। चुनावी राजनीति और खाप मानसिकता के घालमेल ने उस समूची मूल्यव्यवस्था को भी ढहा दिया है जो कभी प्रगतिगामी, अग्रगामी प्रतीत होती थी। अब लगता है जैसे समाज पुन: आदिम युग की ओर लौट चला है, जिसमें नैतिकता नहीं बल्कि पशुबल वर्चस्व स्थापित रहता था। एक बर्बर आदिम समाज ही औरतों, लड़कियों, बच्चियों के नाम यह फरमान जारी करता है कि तुम्हें बलात्कार से बचाने की जिम्मेदारी राज्य की नहीं है, महावीर पंचायत पुरुषों की नहीं है, बल्कि तुम्हारी अपनी है। अगर बलात्कार से बचना है तो खेलने-पढ़ने की उम्र में शादी कर लो, घर से बाहर मत निकलो, मोबाइल हाथ में मत लो और लड़कों से दोस्ती तो हरगिज मत रखो। परदे में रहो और अपने विरुद्ध हो रहे हर अपराध पर पर्दा डालती रहो। सुनो लड़कियों, इस लोकतंत्र की यही नसीहत है तुम्हें।

Rashtirya Sahara National Edition 14-10-2012 PeJ -10 लोकतंत्र