Sunday, April 10, 2011

लड़कियों में केंद्रित करने होंगे आर्थिक सत्ता के सूत्र


लड़कियों को मारोगे तो बहू कहां से लाओगे
इस देश की लड़कियों को बचाना प्रशासनिक से कहीं ज्यादा सामाजिक-सां स्कृतिक कार्य है। अगर इसका कोई सरल-सीधा उपाय होता तो किसी न किसी स्तर पर कामयाबी की कोई कहानी सामने होती। लड़कियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देना इसका एक उपाय हो सकता है। तमाम सामाजिक समूहों की संख्या के हिसाब से लड़कियों को क्षैतिज (हॉरिजेंटल) आरक्षण देने से हर समूह के अंदर लड़कियों के हाथ में आर्थिक सत्ता के सूत्र होंगे। लड़कियों को नौकरियां मिलने से परिवार में उनकी हैसियत भी बढ़ेगी और फैसलों में हिस्सेदारी भी। ऐसे और ऐसे कई प्रयोग करने की जरूरत है
यह एक सरकारी विज्ञापन की बहुचर्चित लाइन है, जो 2011 की जनगणना के बाद और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। यह तय है कि इस देश में हर पुरु ष की शादी नहीं हो सकती। एकल विवाह को अगर सामान्य चलन मान लें तो भी ऐसे पुरु षों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिन्हें दुल्हन नहीं मिलेगी। जनगणना-दर-जनगणना भारत में स्त्री-पुरु ष अनुपात चिंताजनक बना हुआ है और छह साल से कम उम्र के बच्चों में तो यह अनुपात खतरनाक स्तर पर पहुंचता जा रहा है। 2011 की जनगणना के हाल में जारी कच्चे आंकड़ों के मुताबिक, देश में छह साल से कम उम्र के 1000 लड़कों पर सिर्फ 914 लड़कियां हैं। 2001 के आंकड़ों में यह संख्या 927 थी। जाहिर है, तेज आर्थिक विकास के इस दौर में भारत में लड़की बनकर पैदा होना खतरनाक है। भारत में अगर कोई लड़की पैदा हो रही है या होने वाली है, तो इस बात की लगभग 09 प्रतिशत आशंका है कि उसे या तो गर्भ में ही या पैदा होने के बाद जीने नहीं दिया जाएगा।
देश की राजधानी का हाल
अगर जागृति, शिक्षा, विज्ञापन, प्रचार आदि से लिंग अनुपात में सुधार मुमकिन होता तो इस मामले में दिल्ली में स्थिति बेहतर होती है। यहां सरकार का प्रचार तंत्र काफी प्रभावी है और साक्षरता दर भी देश के बाकी हिस्सों से बेहतर है। इसके बावजूद दिल्ली में 1000 लड़कों पर सिर्फ 866 लड़कियां हैं। 2001 की जनगणना के मुकाबले शिशु लिंग अनुपात में मामूली (868) गिरावट आई है। दिल्ली शहर में इससे पहले किए गए सर्वे से भी यही पता चला है कि समृद्ध इलाकों में लिंग अनुपात बुरा होता है। समृद्धि का लिंग अनुपात से रिश्ता इस बात से भी जाहिर होता है कि देश में सबसे बुरा हाल हरियाणा का है जहां का आंकड़ा 830 है जबकि पंजाब का आंकड़ा 846 है।
शिशुंिलंगानुपात में गिरावट
हालांकि पूरी आबादी के लिंग अनुपात की बात करें तो देश में प्रति 1000 पुरु षों पर अब 940 महिलाएं हैं जो 2001 में 932 के आंकड़ों से बेहतर है। हरियाणा और पंजाब जैसे निचले पायदान के राज्यों में भी यह आंकड़ा बेहतर हुआ है। इसका कारण यह है कि मेडिकल तथ्यों के मुताबिक, स्त्रियों का औसत जीवन काल पुरु षों से बेहतर होता है। लेकिन शिशु लिंगानुपात (सेक्स रेशियो) में गिरावट का मतलब है कि आने वाले दिनों में हालात बदतर होने वाले हैं।
निष्प्रभावी ही रहे हैं कानून
शिशु लिंग अनुपात में लगातार आ रही गिरावट इस सम्बंध में बनाए गए कानूनों के बावजूद है। प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण को अपराध घोषित किए जाने के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है। अगर किसी को ऐसा लगता है कि जागरूकता अभियान तथा शिक्षा और साक्षरता में प्रसार से अपने आप यह समस्या सुलझ जाएगी तो, वह भी नहीं हो पाया। कुल मिलाकर यह एक जटिल स्थिति है, जिससे निबटने के अब तक के कोई भी उपाय कारगर साबित नहीं हुए हैं।
गहरी हैं समस्या की जडें़
जनगणना ने जिस समस्या की ओर फिर से ध्यान दिलाया है, वह एक बड़ी समस्या का हिस्सा है। भारत में लैंगिक असमानता एक व्यापक समस्या है। लैंगिक समानता सूचकांक (जेंडर इक्वैलिटी इंडेक्स) पर भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में है। राजकाज से लेकर, ज्ञान और आर्थिक- सहित तमाम क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति कम है या कमजोर है। दरअसल इस समस्या की जड़ें भारतीय समाज में गहराई से धंसी हुई हैं। समाज में महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति रही है। उत्पादन के साधनों पर परम्परागत रूप से महिलाओं का अधिकार नहीं रहा है और वे परिवारों में फैसला करने की हैसियत नहीं रखतीं। आधुनिकता की वजह से कुछ कॉस्मेटिक किस्म के दिखावटी बदलाव हुए हैं लेकिन अंतर्वस्तु में भारतीय समाज अपनी पुरानी जकड़न से छूटा नहीं है। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि जो तबके भारतीय समाज की मुख्यधारा से जितने दूर हैं वहां लिंग अनुपात उतना ही बेहतर है।
बेहतर लिंगानुपात आदिवासियों में
भारतीय समाज में सबसे बेहतर लिंग अनुपात आदिवासियों में है। देश के जिन तीन जिलों में सबसे बेहतर लिंग अनुपात है वे आदिवासी बहुल हैं। लाहौल-स्पीति में तो लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है। इसी तरह दलितों में भी लिंग अनुपात अन्य समुदायों से बेहतर है। हालांकि भारत में ओबीसी की अलग से गणना नहीं होती, इसलिए अन्य की श्रेणी में विभिन्न जाति समुदायों में लिंग अनुपात की स्थिति क्या है, इसका आकलन मुमकिन नहीं है। उत्तर भारत के किसी भी राज्य में अब शिशु लिंग अनुपात 900 से ऊपर नहीं है। यानी इस समस्या का एक भौगोलिक पक्ष भी है। पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम, मेघालय और अरु णाचल प्रदेश में लिंग अनुपात देश में सबसे अच्छा है। इसके बाद छत्तीसगढ़ और केरल आते हैं।
समृद्ध तबके में असमानता अधिक
तमाम राज्यों और शहरों तथा गांवों के आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लिंग अनुपात में गिरावट की समस्या शहरों में, समृद्ध और पढ़े-लिखे लोगों में तथा सामाजिक व्यवस्था के क्रम में ऊपर के पायदान पर मौजूद समूहों में ज्यादा है। इसलिए जो लोग शिक्षा के साथ इस समस्या को जोड़कर देख रहे हैं और शिक्षा के प्रसार को समाधान के तौर पर पेश कर रहे हैं वे सचाई से दूर हैं।
लड़कियों को दें क्षैतिज आरक्षण
इस देश की लड़कियों को बचाना प्रशासनिक से कहीं ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य है। अगर इसका कोई सरल-सीधा उपाय होता तो किसी न किसी स्तर पर कामयाबी की कोई कहानी सामने होती। लड़कियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण देना इसका एक उपाय हो सकता है। तमाम सामाजिक समूहों की संख्या के हिसाब से लड़कियों को क्षैतिज (हॉरिजेंटल) आरक्षण देने से हर समूह के अंदर लड़कियों के हाथ में आर्थिक सत्ता के सूत्र होंगे। लड़कियों को नौकरियां मिलने से परिवार में उनकी हैसियत भी बढ़ेगी और फैसलों में हिस्सेदारी भी। ऐसे और ऐसे कई प्रयोग करने की जरूरत है। जिन शहरों में लिंग अनुपात बुरा है, वहां के लोगों पर अलग से टैक्स लगाकर उन्हें सामूहिक रूप से दंडित करने जैसे उपायों को लेकर विवाद तो बहुत होगा, लेकिन इन पर विचार किए जाने की जरूरत है। जिन परिवारों में दो लड़कियां हैं उन्हें अलग से आर्थिक प्रोत्साहन और शिक्षा से लेकर नौकरियों तक में विशेष अवसर भी दिए जा सकते हैं। लेकिन यह सब या और भी बहुत कुछ, जल्द करना होगा। बहुत जल्द, क्योंकि हालात बहुत बुरे हैं और तेजी से बिगड़ रहे हैं।

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