Saturday, April 16, 2011

लोकपाल विधेयक क्या करे गा?


अन्ना जी अब कह रहे हैं कि हम चुनाव सुधार के लिए भी इस तरह का आंदो लन चलाएंगे। वे और कई मुद्दों पर भी संघर्ष की बात कर रहे हैं। किंतु जिस प्रकार सस्ते में उनका आंदोलन खत्म हुआ, उससे लगता है कि यह आंदोलन उन लोगों का रुतबा बढ़ाने को ही समर्पित हो गया जो वीभत्स जन-संहार के दोषी होने पर भी आंदोलन के नेताओं की नजर में उत्तम कोटि के राजनेता बने। वास्तव में उन्होंने हाथ में आया मौका खो दिया। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते। काठ की हांडी एक ही बार चूल्हे पर चढ़ती है
लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर किया गया अन्ना हजारे का सत्याग्रह खूब धूम-धड़ाके के साथ चला और समाप्त हुआ। सरकार ने उनकी मांग मान ली और जनता की जीत का शगल मनाया गया। किंतु यह विधेयक अगर पास हो भी गया; अभी तो उसके मसौदे को लेकर ही जंग छिड़ी है, तो क्या भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान करेगा? आजादी के छह दशकों में इस रोग से निपटने के लिए कई आयोग आदि बने और कई अफसर नियुक्त किए गए किंतु भ्रष्टाचार ने कई हजार गुनी ऊंची छलांग ही लगाई है। लगभग सभी निर्वाचन आयुक्तों ने चुनाव पण्राली के भ्रष्टाचार पर काबू पाने की भरपूर कोशिश की लेकिन हुआ यह कि आज दो-तिहाई जन प्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि से चुन कर आते हैं और मतदाताओं को दो रुपये किलो चावल, रंगीन टीवी, लैपटाप, साड़ियों आदि की घूस दे कर ही नहीं खरीदा जा रहा है, अखबार में लिपटे पांच सौ या हजार रुपये के नोट भी खुलेआम बांटे जा रहे हैं।
सांसदों -विधायकों पर लागू हों मानदंड
अपराधी तत्वों को चुनाव से बाहर रखने के लिए निर्वाचन आयोग ने जो सुझाव सरकार को दिए, उनका संसदीय समिति में जाने के बाद भी यह नतीजा निकला कि जब तक किसी का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी मान कर उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। हाल ही में मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर पी जे थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि यह सिद्धांत किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकारों के मामले में तो लागू हो सकता है किंतु किसी संवैधनिक संस्था में किसी की नियुक्ति के सम्बन्ध में नहीं, जहां संस्थागत निष्कलंकता की शर्त अनिवार्य होती है। यह तर्क सांसदों-विधायकों आदि पर भी लागू हो सकता है क्योंकि संसद और विधानसभाएं भी महत्त्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाएं हैं। किंतु यह होगा नहीं और चुनाव पण्राली सुधार के लिए तरसती रहेगी।
दोषपूर्ण चुनाव पण्राली
हमारी चुनाव पण्राली के दो सबसे बड़े दोष हैं। एक तो अपराधी तत्वों का प्रतिनिधि संस्थाओं में वर्चस्व और दूसरा बेहद खर्चीला चुनाव। दोनों का परस्पर सम्बन्ध भी है। खर्चीले चुनाव का एक कारण अपराधी तत्वों का काला धन और उस पर पनपने वाला भ्रष्टाचार भी है; और यह बड़ा कारण है किंतु इसके अलावा चुनाव पण्राली के अन्य दोषों के कारण भी चुनाव खर्चीला बनता है। संविधान की कल्पना थी कि सभी प्रतिनिधि संस्थाओं के चुनाव पांच साल में एक बार एक साथ करा लिए जाएं। यदि ऐसा होता तो चुनाव खर्च सीधा पांच गुना कम हो जाता। किंतु राजनेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए इस व्यवस्था को बदला।
जनक्रांति से होगा चुनाव सुधार
यदि संविधान की भावना के अनुसार सारे चुनाव एक साथ पांच साल बाद कराए जाते तो सारे चुनाव सरकारी खर्च पर भी हो सकते थे। इससे राजनीतिक पार्टियों के काला धन जमा करने तथा चुनाव पर बेहिसाब खर्च करने पर भी रोक लग सकती थी। सरकार इस खर्च की आपूर्ति के लिए राजनीतिक पार्टियों पर उपकर भी लगा सकती थी। किंतु इस तरह के सुधार के लिए न तो सरकार तैयार होगी और न निर्वाचन आयोग की इसमें रुचि होगी क्योंकि इससे उसका रुआब कम होता है। यह काम जन-क्रांति से ही हो सकता है।
अवसर गंवा दिया अन्ना ने
गांधीवादी अन्ना हजारे के सत्याग्रह से इसकी उम्मीद की जा रही थी क्योंकि जनता से जिस तरह का समर्थन उसे मिल रहा था उससे यह जन-क्रांति का रूप ले सकता था। मैंने यह स्वामी अग्निवेश को दिया था। किंतु यह आंदोलन ढोल की पोल सिद्ध हुआ। अन्ना जी अब कह रहे हैं कि हम चुनाव सुधार के लिए भी इस तरह का आंदोलन चलाएंगे। किंतु जिस प्रकार सस्ते में उनका आंदोलन खत्म हुआ, उससे लगता है कि यह आंदोलन उन लोगों का रुतबा बढ़ाने को ही समर्पित हो गया जो वीभत्स जन-संहार के दोषी होने पर भी आंदोलन के नेताओं की नजर में उत्तम कोटि के राजनेता बने। वास्तव में उन्होंने हाथ में आया मौका खो दिया। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते। काठ की हांडी एक ही बार चूल्हे पर चढ़ती है।
जनक्रांति है उपचार
समूची राजनीति में और भी कुछ असाध्य रोग प्रवेश कर चुके हैं जिनका इलाज अब जन-क्रांति से ही सम्भव है। इन रोगों की पहचान डॉ. राममनोहर लोहिया ने 1950 में लिखे अपने एक लेख में की थी। उन्होंने कहा था, हांगकांग से काहिरा तक एक ही दुनिया है जिसका शासक वर्ग परिवारवाद, भ्रष्टाचार, नवाबी शान-ओ-शौकत और पश्चिमी देशों की नकल, इन चार रोगों से ग्रस्त है। ये सारी बुराइयां अरब देशों में भी है और भारत तथा उसके पड़ोसी देशों में भी। परिवारवाद तो कांग्रेस ने शुरू किया और अब यह सभी पार्टियों में घुस गया है। अन्य तीन बुराइयों को भी शुरू कांग्रेस ने किया और अब ये कैं सर की तरह राजनीति के सारे शरीर में फैल गई हैं। तहरीर चौक की लहर जंतर मंतर या विजय चौक में पहुंचने से ही इन रोगों से छुटकारा मिल सकता है। इसका मौका आया था किंतु वह होली का गुब्बारा सिद्ध हुआ ।
लोकपाल को लेकर आशंका
गैरकांग्रेसी और गैरभाजपाई दलों की यह आशंका जायज है कि लोकपाल पद का इस्तेमाल केंद्रीय जांच ब्यूरो, मुख्य सतर्कता आयोग तथा पुलिस के खुफिया विभागों की तरह उनके खिलाफ किया जा सकता है। यह कांग्रेस और भाजपा के हाथ में;जिनके बीच केंद्रीय सत्ता की अदला-बदली होती रही है। तीसरे मोर्चे के आंदोलन को कुचलने का हथियार बनेगा। यदि यह आशंका सही साबित हुई तो इस विधेयक का भी वही हश्र होगा जो महिला आरक्षण विधेयक का हुआ। इसका सारा दोष अन्ना हजारे और उनके साथियों पर जाएगा । खुद चुनावों से बचने वाले किंतु कुल राजनीति और सब राजनेताओं को भ्रष्ट कहने वाले किसी राजनीतिक बदलाव को प्रेरित नहीं कर सकते। यदि तथाकथित सिविल सोसायटी के साफ-सुथरी छवि वाले नेता पूरे भारत से 50 सांसद भी जिता कर लाएं तो स्वस्थ राजनीति की दिशा में इनका बहुत बड़ा योगदान होगा। जब सिराज ढड्ढा जैसे बड़े नेता इसके लिए प्रयास कर सकते हैं तो अन्ना हजारे और उनके सहयोगी क्यों नहीं कर सकते?

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