Monday, April 18, 2011

विस्थापितों की रोजी रोटी की भी फिक्र हो


यह शायद पहला अवसर है जब छ: आदिवासियों की रहस्यमय ढंग से हुर्ह मौतों की जांच सीधे सर्वोच्च न्यायालय की देख रेख में होगी। आरोप है कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के मोरपल्ली गांव में माडिया जनजाति के छ: लोगों की मौत भूख से हुर्ह है लेकिन जिला प्रशासन मौतों की वजह भूख नहीं मान रहा है। वह यह तो मानता है कि मौतें हुई हैं लेकिन कितनी हुईं और किन कारणों से हुईं, इसका कोई स्पष्ट जवाब प्रशासन के पास नहीं हैं। यहां इस हकीकत का उल्लेख करना जरूरी है कि सरकार जिस दरियादिली से प्राकृतिक सम्पदा के उत्खनन को औद्योगिक घरानों को सौंपती जा रही है उस अनुपात में अरबपतियों की तादाद तो बढ़ रही है लेकिन जनजातियां निरंतर रोजी-रोटी के संकट से जूझती हुर्ह नजर आ रही हैं। माडिया जनजाति भी भारत की ही नहीं, विश्व की आदिम जनजातियों में से एक है। भूख से मौतों की जानकारी ठीक उस वक्त मिली जब 90 साल पुराने शोषणकारी भारतीय वन अधिनियम 1927 में फेरबदल को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी। इन मौतों से जाहिर होता है कि मौजूदा वन कानून और खनिजों पर कारपोरेट जगत द्वारा कब्जा जमाते चले जाने से जंगलों पर निर्भर मासूम जनजातियां किस बदहाली में हैं। आदिवासियों के कल्याण के प्रति केंद्र व राज्य सरकारें कितनी चिंतित हैं इस बात की तस्दीक तो भूख से हुर्ह इन मौतों से हो ही जाती है। परियोजनाओं के लिए विस्थापित किए गए आदिवासियों के पुनर्वास के प्रति राज्य सरकारें कितनी जवाबदेह हैं, इसका पता 58 साल पहले दामोदर घाटी बिजली परियोजना के लिए किए गए विस्थापितों के आज तक जारी आंदोलन से चलता है। इस परियोजना हेतु 1953 में 41 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहीत करते हुए 70 हजार लोगों को विस्थापित कर भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। नौकरी और मुआवजा मिला महज 340 लोगों को। यह विस्थापन पश्चिम बंगाल और झारखंड के 4 जिलों में किया गया था। इनके पुनर्वास की लड़ाई आज भी जारी है। इस तथ्य से यह उजागर होता है कि विस्थापितों के साथ न्याय नहीं होता। इन वजहों से भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के सवाल लगातार पेचीदा होते जा रहे हैं। आदिवासी और किसान अपनी पुश्तैनी जमीनें सार्वजानिक हितों के लिए भी देने को तैयार नहीं हैं। रोजी-रोटी की अनिश्चितता उन्हें उग्र रूप धारण करने के लिए मजबूर करने लगी है। नंदीगाम और सिंगूर इसके उदाहरण हैं। हालांकि सरकारें जमीनों का अधिग्रहण कर सकती हैं लेकिन ऐसा वे सार्वजानिक लक्ष्यों की पूर्ति के बजाय मुट्ठीभर औद्योगिक घरानों के व्यक्तिगत हित साधने में कर रही हैं। बीते साल जुलाई-अगस्त में उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ और मथुरा की भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसान-मजदूर गुस्से में उठ खड़े हुए थे। तब इस विद्रोह को पुलिस ने गोली चलाकर कुचल दिया था। इस घटना में 7 किसान हताहत हुए थे। इस विद्रोह की आग भड़कते देख मायावती सरकार ने अधिग्रहण का काम तत्काल तो रोक दिया था लेकिन किसानों पर भूमि हथियाने का आतंक का साया फिर से मंडराने लगा है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय पक्ष को बल देते हुए प्रदेश सरकार के उन फैसलों और अधिसूचनाओं को खारिज कर दिया जिनमें आपातकालीन प्रावधानों को आधार बनाकर किसानों की जमीनें हथियाने का प्रपंच किया था। किसान आदिवासियों से जमीनें हथियाने के उपाय तो सख्त कानून बनाकर सरल कर दिए जाते हैं और उनकी भूमि को आनन-फानन में कम्पनियों को सौंप दिया जाता है लेकिन कम्पनियां निर्धारित शत्रे पूरी करती हैं अथवा नहीं, इसका खयाल नहीं रखा जाता। लिहाजा वेदांता समूह जब नियामगिरि परियोजना के लिए स्थानीय आदिवासियों की सहमति का दावा कुछ सहमति पत्र दिखाकर करता है, तब जांच में ग्राम सभाओं के ये सभी प्रस्ताव फर्जी पाए जाते हैं। इसके बावजूद कम्पनी के एक भी अधिकारी के विरुद्ध धारा 420 के तहत और दस्तावेजों की कूट रचना का मामला दर्ज नहीं होता। किसान आदिवासियों को बदतर बनाए जाने की ये ऐसी कहानियां जिनमें उनके रोजी-रोटी के हक को छीनकर उन्हें भूखों मरने के लिए भगवान के हवाले किया जा रहा है। विस्थापितों को ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े, इस दृष्टि से केंद्र सरकार ने खनन परियोजनाओं के लाभ में विस्थापितों को 26 प्रतिशत का भागीदार बनाने का भरोसा जताया है। इस सम्बंध में विधेयक यदि सही प्रारूप में लाया जाकर कानूनी रूप ले लेता है तो निश्चित रूप से विस्थापितों के दीर्घकालिक हित सधेंगे। विधेयक में प्रस्तुत प्रावधानों के अनुसार परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों को सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी अथवा कम्पनी को हासिल होने वाले शुद्ध मुनाफे में 26 फीसद हिस्सा मिलेगा। ये कम्पनियां बही खातों में हेराफेरी नहीं करती हैं तो यह व्यवस्था निश्चित रूप से विस्थापितों को स्थायी राहत देने वाली होगी लेकिन कम्पनियां इस प्रावधान पर ईमानदारी से अमल करें, इस हेतु क्या कार्यपालिका निष्पक्ष निगरानी रख पाएगी, यह सवाल यहां जरूर खड़ा होता हैं? हालांकि एक बार मुआवजे की रकम दे देने की तुलना में तो यह व्यवस्था कहीं बेहतर है लेकिन खनन कम्पनियों की असहमति के चलते यह विधेयक पारित नहीं हो पा रहा है। इधर केंद्रीय योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी इस विधेयक के पुरजोर विरोध में आ गए हैं। उनका कहना है यदि यह विधेयक कानूनी रूप ले लेता है तो इससे पूंजी निवेश प्रभावित होगा। मसलन, हमारे योजनाकारों को कम्पनियों की चिंता तो है लेकिन विकास के बहाने खेती की जमीन हथिया लेने और जन-जातियों को जंगलों से बेदखल कर देने पर उनकी रोजी-रोटी का इंतजाम कैसे हो, इसकी चिंता नहीं है।


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