मैं आशावादी हूं और महात्मा गांधी की तरह मुझे पूरा भरोसा है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। 30 के दशक में राष्ट्रपिता ने कहा था कि जब देश की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगने लगे तो समझिए करप्शन कम हो जाएगा। अन्ना हजारे के अनशन के बाद लोगों के जेहन में यह तो होने ही लगा है कि अपने नेताओं और प्रशासकों से हिसाब मांगने का समय आ गया है। मेरे खयाल से पिछले चार-पांच दिनों की सबसे बड़ी यही सीख है
चार दिन के अनशन के बाद सरकार ने गांधीवादी समाजसेवक अन्ना हजारे की सारी मांगे मान ली हैं। और लोकपाल कानून का मसौदा तैयार करने के लिए दस सदस्यों वाली कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी में 5 नुमाइंदे सरकार की तरफ से हैं और पांच सदस्य सिविल सोसाइटी के दिग्गजों के बीच से लिये गए हैं। शनिवार को इस आशय की सरकारी अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इस अधिसूचना के साथ ही लोकपाल बिल का ड्राफ्ट तैयार करने का काम शुरू हो गया और 30 जून तक बिल का ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की मुहिम को कुछ तो सफलता मिली। अब सवाल यह है कि क्या लोकपाल के आने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। मेरे खयाल से ऐसा सोचना बड़ी जल्दबाजी होगी। लोकपाल कानून का बनना एक अहम पड़ाव होगा लेकिन इसके बनने से सब कुछ बदल जाएगा ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। कानून व्यवस्था बहाल करने और भ्रष्टाचार रोकने के लिए कई एजेंसियां पहले से ही काम कर रही हैं। सीवीसी है, सीबीआई है, इनकम टैक्स विभाग है, इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट हैं, राज्य सरकारों की कई एजेंसियां हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भ्रष्टाचार तो हो ही रहा है। मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार दरअसल मन का खेल है। मन में उठे लालच को पूरा करने के लिए उठाए गए सारे कदम भ्रष्टाचार की तरफ ही जाते हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी सरकारी अधिकारी से बात कीजिए, उसे गलत काम करने का मलाल नहीं होता है। उल्टे गलत काम को सही ठहराने के लिए उसके पास कई सटीक तर्क होते हैं। सबसे बड़ा तर्क यह होता है कि काफी पढ़ाई करने के बाद बड़ा ओहदा मिला, लेकिन ठीक से गुजारा फिर भी नहीं हो पा रहा है। उसकी तनख्वाह इतनी कम होती है कि वह ठीक से जिंदगी नहीं जी पाता है। अपने बच्चों को ठीक से पढ़ा नहीं पाता है, ईमानदारी से की गई कमाई में इतना नहीं बचता है कि जरूरत पड़ने पर मां-बाप का इलाज हो सके। इस तरह के तर्क बेबुनियाद नहीं हैं। सरकारी अफसर की इतनी कमाई नहीं होती है कि वह फाइव स्टार हॉस्पिटल में मां-बाप का इलाज करा सके या फिर अमेरिका के बड़े स्कूल में बच्चों को पढ़ा सके। अरमानी के कपड़े ईमानदारी के पैसे से नहीं खरीदे जा सकते हैं और न ही सरकारी मुलाजिम एक नंबर की कमाई से मर्सिडीज खरीद सकता है। अगर इस तरह की लग्जरी सुविधाएं वाकई सबकी जरूरत हैं तो सरकारी अफसर या नेताओं की एक नंबर की इतनी कमाई नहीं होती है कि वे इन जरूरतों को पूरा कर पाएं। लेकिन क्या इस तरह की जरूरतों को पूरा करने के लिए भ्रष्टाचार में लिप्त होना जायज है। जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूं मन की लालच ही सबकी जड़ है। लालच बढ़ेगी तो मर्सिडीज भी जरूरी लगेगी वरना मर्सिडीज तो विलासिता का सामान है ही। तो क्या यह मान लिया जाए कि लोकपाल बने या न बने, भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं है। मेरा मानना है कि करप्शन को खत्म करने के लिए किसी एजेंसी को बना भर देने से काम नहीं चलेगा। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह जानना होगा कि पब्लिक लाइफ में करप्शन की वजह क्या है। मेरा मानना है कि हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों की सबसे बड़ी वजह यह है कि हमने आर्थिक उदारीकरण को तो लागू करने में तत्परता दिखाई लेकिन उसी से मिलते-जुलते प्रशासनिक उदारीकरण की कभी बात ही नहीं की। किसी मंत्री के एक फैसले से या किसी सचिव के एक हस्ताक्षर से अगर किसी कंपनी को या किसी एनजीओ को हजारों करोड़ रुपये का फायदा हो जाए तो समझ लीजिए कि हम ऐसे सिस्टम में काम कर रहे हैं जहां घूसखोरी नहीं होना अचरज की बात है। समाज का एक हिस्सा बदल जाए और दूसरे हिस्से पुराने र्ढे पर चलें तो तनाव तो होता ही है। भ्रष्टाचार के बढ़ते मामले उसी तनाव का परिणाम हैं। जांच करने वाली एजेंसियों को चुस्त-दुरुस्त कीजिए, न्यायपालिका को इतना सक्षम बनाइए कि न्याय मिलने में देरी नहीं हो। कानून तोड़ने वालों को कानून से डरना सिखाइए। लेकिन इस सबसे करप्शन में कमीं नहीं आएगी। इस सबसे करप्ट लोगों को तो सजा मिल जाएगी लेकिन करप्शन नहीं रुकेगा। करप्शन रोकने के लिए आर्थिक उदारीकरण से सबक लेते हुए प्रशासनिक उदारीकरण का ऐसा मॉडल बनाइए, जहां कोई एक आदमी चाहकर भी मनमानी न कर पाए। मैं आशावादी हूं और महात्मा गांधी की तरह मुझे पूरा भरोसा है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। 30 के दशक में राष्ट्रपिता ने कहा था कि जब देश की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगने लगे तो समझिए करप्शन कम हो जाएगा। अन्ना हजारे के अनशन के बाद लोगों के जेहन में यह तो होने ही लगा है कि अपने नेताओं और प्रशासकों से हिसाब मांगने का समय आ गया है। मेरे खयाल से पिछले चार-पांच दिनों की सबसे बड़ी यही सीख है। अब मुझे पूरी तरह से यह भरोसा हो गया है कि यह पब्लिक है और यह सब जानती है। पब्लिक सब जानने लगे तो समझिए कि सुशासन के दिन आने वाले हैं। अन्ना हजारे देश की जनता को जगाया। उनका आंदोलन किसी सरकार या किसी पार्टी के खिलाफ नहीं था। उनके निशाने पर सिर्फ भ्रष्टाचार था जो अच्छी बात थी। लेकिन इस तरह के आंदोलन के भटकने का खतरा होता है। भ्रष्टाचार जैसी अमूर्त चीज के खिलाफ लड़ने वाली भीड़ अगर भटक जाए तो मुश्किल हो सकती है। यहां मैं सरकार को इस बात के लिए साधुवाद दूंगा कि लोकपाल से जुड़ी जरूरी मांगो को तत्काल मानकर उसने आंदोलन को भटकने से बचा लिया। हम सबको यह मानना चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लोकतंत्र से बड़ा कोई और हथियार हो नहीं सकता है। इसीलिए हमें इस बात का खयाल रखना चाहिए कि हमारे किसी काम से लोकतंत्र कमजोर न हो। मुझे इस बात से खुशी हुई कि अन्ना हजारे के आंदोलन और इस पर सरकार के रुख से लोकतंत्र मजबूत हुआ है। और हमें इस बात की खुशी मनानी चाहिए।
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