यदि खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पास हो जाता है तो यह एक ऐतिहासिक कदम होगा। इस कानून से गरीब के आंसू पोंछने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। उम्मीद है कि जब यह विधेयक अगले सत्र में सरकार संसद में लाएगी तो उसे सभी दलों का समर्थन प्राप्त होगा। मैं इस विधेयक को नरेगा से भी दो कदम आगे मानता हूं। इसमें इस बात की गारंटी होगी कि भारत में अब कोई भूख से नहीं मरेगा। नरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल दो ऐसे कानून हैं जिन्होंने भारत के गांवों की तरफ ध्यान दिया है। देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहरों में सुविधाएं बढ़ती जाती हैं, लेकिन गांवों में लोग उसी मुसीबत में रहते हैं। इसीलिए गांव से लाखों लोग हर साल शहरों की ओर बसने के लिए भाग रहे हैं। नरेगा ने लोगों को वापस गांव की ओर मोड़ा है। पंजाब के तमाम बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों और धनी किसानों को इस बात की शिकायत है कि उन्हें बिहार से मजदूर नहीं मिल रहे हैं। पिछले दिनों ग्रामीण विकास मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में पंजाब के सांसदों ने नरेगा पर अपना गुस्सा उतारा। उनका कहना था कि पंजाब में विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही है, क्योंकि नरेगा की वजह से बिहार व पूर्वी उत्तरी प्रदेश से मजदूर नहीं मिल रहे हैं, इसलिए इस योजना को खत्म करना चाहिए। मुझे यह बात सुनकर हंसी आ गई। मैंने उनसे कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि लोगों को अपने गांव में रोजगार मिल रहा है और वे आपके यहां नहीं आ रहे हैं। आप के राज्य केलोग अपना काम खुद क्यों नहीं करते हैं? एक बड़े रियल इस्टेट ग्रुप के एक डायरेक्टर ने पिछले दिनों मुझे बताया कि नरेगा की वजह से उनकी तमाम योजनाएं धीमी पड़ी हैं, क्योंकि गांवों से मजदूर नहीं आ रहे हैं। मुझे याद है कि जब सोनिया गांधी नरेगा योजना तैयार करवा रही थीं तो तमाम लोगों ने तरह-तरह की आलोचना की थी। अफसरों का कहना था कि इसमें बहुत पैसा बर्बाद हो जाएगा और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा। मगर उन्होंने कुछ न सुनी और इसे लागू करवाया। हो सकता है तमाम जगह इसे लागू करने में कुछ गड़बडि़यां हो रही हों, लेकिन यदि ज्यादातर जगह इसका फायदा गांव के लोगों को रोजगार के जरिए मिल रहा है तो मैं इसे योजना की सफलता ही मानता हूं। अब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने खाद्य सुरक्षा बिल का प्रस्ताव सरकार को भेजा है, जिसमें देश की 75 प्रतिशत जनता को सस्ता अनाज देने की योजना है। इसका सबसे ज्यादा फायदा गांव के लोगों को होगा और 28 प्रतिशत शहरों में रहने वाले गरीब परिवारों को लाभ मिलेगा। इस प्रस्ताव का सरकारी अफसर विरोध कर रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्री भी इसके पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि इतने कम दामों पर अनाज देने से देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, मगर सोनिया गांधी अड़ी हुई हैं। प्रस्ताव के मुताबिक गांव और शहरों के गरीब परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो गेहूं, 3 रुपये प्रति किलो चावल और एक रुपये प्रति किलो बाजरा देने का प्रस्ताव है। बेसहारा और बेघर लोगों को भी भूखे पेट सोने से बचाने के लिए साथ में एक योजना बनाई गई है। सस्ते अनाज का खर्च सरकार को अपनी जेब से देना पड़ेगा। सरकार जो अनाज ज्यादा दामों पर किसानों से खरीदती है उसे कम दामों पर इन परिवारों को राशन व अन्य सरकारी दुकानों के जरिए देना होगा। हर परिवार को 25 से 35 किलो अनाज हर महीने दिया जाएगा। राशन व सरकारी दुकान वाले घपला न करें, इसका प्रवाधान भी कानून में डाला जा रहा है और ऐसे लोगों को कड़ी सजा देने का इंतजाम किया जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह एक क्रांतिकारी योजना है और एक बार लागू होने के बाद केंद्र में किसी भी पार्टी की सरकार आए, उसे इस पर अमल करना होगा। लागू होने के बाद इसे वापस लेने का साहस कोई सरकार नहीं कर सकती है। इसके साथ ही एक जरूरी काम यह होगा कि खाने-पीने की चीजों की बर्बादी रोकी जाए। एक सर्वे के मुताबिक लाखों टन खाना हर साल इस देश में बर्बाद कर दिया जाता है। देश के हर नागरिक को अब खाना बचाना होगा। उसे अपनी थाली या प्लेट में उतना ही खाना लेना होगा जितना वह खा सके और बरबाद न करे। पार्टियों और दावतों में लोगों को उतना ही खाना बनाना चाहिए जो खत्म हो सके। मैंने तो सरकार से मांग की है कि पार्टियों में अनाप-शनाप चीजें परोसने के बजाय सिर्फ 5 या 6 किस्म के व्यंजन परोसने की इजाजत दी जाए और इसके लिए कानून बनाया जाए। पाकिस्तान में सरकार ने सिर्फ एक व्यंजन परोसने की इजाजत पार्टियों में दे रखी है। शादी-विवाह ही नहीं, होटलों और रेस्टोरेंट में भी बहुत खाना बरबाद हो रहा है। यदि हम इस बर्बादी पर काबू पा लें तो इस देश में न तो खाने का सामान विदेश से मंगाना पड़ेगा और न ही खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी और खाद्य सुरक्षा कानून सफलता से लागू हो जाएगा। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
Wednesday, June 29, 2011
अपारदर्शी प्रणाली का जोखिम
36 वर्ष पूर्व थोपे गए आपातकाल का संबंध आप नई पीढ़ी से कैसे जोड़ते हैं? मुझसे यह सवाल अनेक बार पूछा गया है। जब तक आपातकाल लगाने का दोषी इंदिरा गांधी वंश सत्ता में है, कांग्रेस सरकार इस बारे में बात नहीं करेगी। पूरी कहानी अभी सामने आनी है। दरअसल, उन दिनों के दस्तावेजों को सार्वजनिक किए जाने की मांग बार-बार उठाई जाती है, किंतु उस पर कोई कान नहीं धरता। जून 1975 से जनवरी 1977 तक जारी आपातकाल के दौरान जो कुछ हुआ वह एक प्रधानमंत्री द्वारा अपनी सत्ता और खाल बचाने के लिए अपनाई गई हठधर्मिता की एक लज्जाजनक कहानी है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान को निलंबित कर दिया था, प्रेस का गला घोंट दिया था और संसद की सदस्यता के अयोग्य ठहराए जाने की बाधा पर पार पाने के लिए निजी शासन थोप दिया था। न्यायालय ने उन्हें चुनाव में सरकारी मशीनरी के उपयोग के आरोप में लोकसभा की सदस्यता से वंचित कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के वामपंथी न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने उन्हें उच्च न्यायालय के निर्णय पर स्थगनादेश के माध्यम से राहत उपलब्ध कराई थी। एक बार उन्हें राहत मिली तो उन्होंने अपने हाथ दिखाए और उस लोकतंत्र के प्रकाश को तिरोहित कर दिया जो विकासशील जगत के अन्य देशों से भारत की पृथक पहचान दर्शाता था। इंदिरा गांधी ने संविधानेतर अधिसत्ता के रूप में उभरे अपने पुत्र संजय गांधी की मदद से कानूनों को बदल दिया और उन संस्थानों को नष्ट कर दिया, जिन्हें बनाने में उनके पिता जवाहर लाल नेहरू को वर्षो लग गए थे। वह अपने आप में कानून बन बैठीं। उन्होंने सारी सत्ता को अपने पद में समेट लिया और अपने पुत्र को मनमानी की खुली छूट दी। पहले इंदिरा गांधी ने बिना अभियोग चलाए एक लाख से अधिक लोगों को हिरासत में ले लिया। फिर सिविल सर्विस के ढांचे को ध्वस्त किया। उन्होंने लोगों को इतना भयाक्रांत कर दिया कि सही और गलत तथा नैतिक और अनैतिक के बीच अंतर ही खत्म हो गया। किसी ने जीवन मूल्यों के बारे में चर्चा तक नहीं की। अपने मकसद के लिए इंदिरा गांधी ने तमाम हदों को पार किया। इससे भी बुरा यह हुआ कि उन्होंने राजनीति से नैतिकता का ही सफाया कर दिया। देश भयाक्रांत हो उठा-इतना अधिक कि न्यायपालिका ने भी ऐसा कोई फैसला सुनाने का साहस नहीं किया कि जो सरकार को नहीं सुहाए। आपातकाल के बाद जो शासक आए उन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा की गई गलतियों को सुधारने पर अपना ज्यादा ध्यान केंद्रित करने की अपेक्षा उनके क्रियाकलापों को उजागर करने में ही व्यस्तता दर्शायी। संस्थानों को अपनी पुरानी गरिमा प्राप्त नहीं हो पाई। तबसे अभागी सिविल सर्विस और पिलपिली सी हुई पुलिस ने जो भी सत्ता में आए उसी का हुकुम बजाना सीख लिया। नीचे की न्यायपालिका आपातकाल के उस संताप से अभी भी मुक्त नहीं हो पाई। नई पीढ़ी को यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि आज का कुशासन इंदिरा गांधी ने स्थापित व्यवस्था को विध्वंसित करने का जो कृत्य किया था उसी का यह स्वाभाविक प्रतिफल है। बोफोर्स तोप सौदे में घोटाले से लेकर 2 जी-स्पेक्ट्रम घोटाले तक तो पर्वत की तुलना में राई के समान है। और भी अधिक घोटाले अभी सामने आने वाले हैं। 36 वर्ष बाद वही स्थिति लौट आई है। देश के समक्ष सारी बहस भ्रष्टाचार को लेकर है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार इसके उन्मूलन के लिए कुछ भी करना नहीं चाहती-खास तौर पर तब जब एक के बाद दूसरा मंत्री या तो 2जी-स्पेक्ट्रम घोटाले में संलिप्त प्रतीत होता है अथवा कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस जैसे घोटाले में। कैग ने केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय पर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को उपकृत करने के लिए अनियमितताओं पर उंगली उठाई है, जिसके फलस्वरूप राजकोष को भारी घाटा उठाना पड़ा है। इससे यह जाहिर होता है कि कारपोरेट क्षेत्र राजनीतिक तौर पर कितना सशक्त हो गया है। लोग अधिक से अधिक पारदर्शिता चाहते हैं, जबकि सरकार यह चाहती है कि सार्वजनिक जानकारी के अवसर कम से कम हों। जयप्रकाश को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए मैं पटना गया। पांच जून वह तारीख है, जिस दिन उन्होंने संपूर्ण क्रांति का आ ान किया था। जयप्रकाश के घर पर मुट्ठी भर लोग ही जमा हुए। इसी घर में जय प्रकाश रहे और यहीं उनका निधन हुआ। यह स्थान उजाड़ सा लगा। कभी यह स्थान उन राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रहा था, जिनके फलस्वरूप 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी पराजित हुई थीं। जिस बात ने मुझे निराश किया वह थी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अनुपस्थिति, जो जेपी के आंदोलन से ही उभरे थे। सरकार ने संपूर्ण क्रांति अथवा पारदर्शिता के लिए हुए संघर्ष के बारे में चर्चा करने के लिए एक मीटिंग तक नही बुलाई। कार्ल मार्क्स ने सही ही कहा था- दार्शनिकों ने तो विश्व का विश्लेषण भर किया है, मगर मुद्दा तो उसे बदलने का है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं).
सीबीआइ को अनुचित संरक्षण
सीबीआइ को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर रखने को दुर्भाग्यपूर्ण कदम मान रहे हैं लेखक
केंद्र सरकार द्वारा सीबीआइ को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर निकालना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कदम है। जांच-पड़ताल के क्षेत्र में पहले ही सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8(एच) के तहत इसे संरक्षण हासिल है। इसके अनुसार किसी भी नागरिक को ऐसी सूचनाएं नहीं दी जा सकती जो दोषी की जांच, गिरफ्तारी या इससे संबद्ध अदालती प्रक्रिया को बाधित करे। यह प्रावधान सीबीआइ या अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों पर ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारों की जांच एजेंसियों के लिए भी लागू होता है। प्रकट रूप में यह कदम सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के दृष्टिकोण से उठाया गया है। यह स्पष्ट है कि किसी भी रूप में सीबीआइ न तो खुफिया एजेंसी है और न ही सुरक्षा संगठन। यह एक जांच एजेंसी है, जिसका काम कानूनी रूप से मामलों का खुलासा करना है, न कि उन्हें छुपाना। अपने काम की प्रकृति के कारण सीबीआइ को एक खुला संगठन होना चाहिए, कम से कम उन संवेदनशील मामलों के संबंध में जो इसकी जांच के दायरे में हैं। सीबीआइ के परिप्रेक्ष्य में संवेदनशीलता से तात्पर्य उन मामलों से है जो उच्च तबके के ताकतवर व प्रभावी लोगों से संबद्ध हैं। सीबीआइ की कानूनी और क्रियाशील आवश्यकता का आधार गोपनीयता की अनिवार्यता को बनाया गया है। खुफिया संगठन के विपरीत जिसे पारदर्शिता से पूरी सुरक्षा की आवश्यकता है, जांच में एक निश्चित चरण के बाद समग्र पारदर्शिता की आवश्यकता होती है। जांच की सूचनाओं के समय पूर्व खुलासे से ही आरोपी को अनुचित लाभ मिल सकता है। वह साक्ष्यों को नष्ट करके जांच को भटका सकता है, किंतु एक बार आरोपपत्र दायर होने के बाद उसे किसी तरह के संरक्षण की आवश्यकता नहीं रह जाती है। तब तमाम साक्ष्यों को आरोपी को संप्रेषित कर दिया जाता है ताकि वह अपने बचाव की तैयारी कर सके। एक बार अदालत में जमा करने के बाद आरोपपत्र सार्वजनिक दस्तावेज बन जाता है। जांच के दौरान हासिल की गई कुछ सूचनाओं और केस डायरियों में दर्ज ब्योरे को जांच एजेंसी को आरोपपत्र में शामिल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनका संबंध गवाहों या आरोपियों की सुरक्षा को खतरे से हो सकता है। इसलिए ऐसी सूचनाओं को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। ऐसी सूचनाएं और दस्तावेज जिन पर अभियोजन निर्भर नहीं होता पहले ही भारतीय दंड संहिता और इविडेंस एक्ट के तहत संरक्षित हैं। हालांकि न्याय के लिए जरूरी होने पर अदालत इन तमाम दस्तावेजों का संज्ञान लेने और अपने विवेक से इनका इस्तेमाल करने के लिए अधिकृत होती है। इस संबंध में मौजूदा कानून पर्याप्त हैं। सीबीआइ को और अधिक गोपनीयता की ढाल प्रदान करने, खासतौर पर भ्रष्टाचार के मामलों में, का साफ मतलब है कि इसका उद्देश्य प्रभावशाली लोगों को बचाना है। वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी जांच एजेंसी को सूचना अधिकार अधिनियम के तहत और छूट देने की आवश्यकता नहीं है। एक पूर्व सीबीआइ अधिकारी होने और सरकार के अंदर भ्रष्ट तंत्र से लड़ने का अनुभव रखने के नाते मेरा मानना है कि सरकार के अधीन होने के कारण सीबीआइ तथ्यों के निष्पक्ष संग्रहण में अपनी कानूनी भूमिका के खिलाफ खुलासा करने से अधिक छिपाने का काम करती है। सीबीआइ को जो छूट दी जा रही है वह एक प्रतिगामी कदम है। यह पूरी तरह अवांछित और अनावश्यक प्रावधान है। यह सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देगा। इसके प्रभाव से सीबीआइ भी अछूती नहीं रहेगी। आप चीजों को जितना पर्दे के पीछे रखेंगे, प्रक्रिया के दुरुपयोग की उतनी ही अधिक संभावना होगी। इससे ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की रचना होगी जो कानून के दायरे से बाहर होगा। अन्य देशों के अनुभव पर नजर डालें तो ऐसे किसी भी देश में जांच एजेंसियों को इस प्रकार का संरक्षण नहीं है। इससे सवाल पैदा होता है कि क्या हम असभ्य दिनों की ओर लौट रहे हैं? क्या हम संविधान प्रदत्त कानून के शासन को नकार रहे हैं? हालांकि भारत में ऊंचे तबके के ताकतवर लोगों को बचाने के लिए इस प्रकार के कदम उठाने की बात नई नहीं है। इस संदर्भ में मैं दो उदाहरण देना चाहूंगा। पहला, आठवें दशक में निर्देश दिया गया था कि किसी भी जांच में संयुक्त सचिव से ऊपर के अधिकारियों व राजनेताओं को संरक्षित रखा जाए। जैन हवाला मामले में इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट ने अविवेकपूर्ण और गैरकानूनी करार दिया था। बाद में दिसंबर 1997 में भी इसे संदर्भित किया गया। 1998 में अधिसूचना के माध्यम से इसे फिर से विधायी दर्जा दिया गया और 2003 में इसे सीवीसी एक्ट के माध्यम से लागू किया गया। दूसरा मामला एक अत्यधिक प्रभावशाली आरोपी के खिलाफ विदेश में जांच करने से संबंधित है। इस मामले में जांच के लिए भारतीय अदालत से संबंधित देश की अदालत के लिए एक अनुरोध पत्र की आवश्यकता थी। भारतीय दंड संहिता की धारा 166 के तहत किसी भी थाने का एसएचओ इस प्रकार के पत्र के लिए निवेदन कर सकता है। 1993 में एक वीवीआइपी को बचाना था। इसके लिए सरकार ने एक एग्जिक्यूटिव ऑर्डर के माध्यम से प्रक्रिया में संशोधन कर दिया कि सरकार की अनुमति के बाद ही सीबीआइ अदालत में अनुरोध पत्र के लिए निवेदन कर सकती है। इस प्रकार विदेश में किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ जांच की संभावनाएं एक तरह से खत्म कर दी गईं। इस मामले में मई 1993 में सरकार से अनुमति मांगी गई, जो 1996 में मेरे सीबीआइ छोड़ने तक नहीं दी गई थी। इस प्रकार विदेश में कोई जांच नहीं हो पाई यद्यपि वीवीआइपी दलाली और घूस लेने, विदेशी बैंकों में भारी राशि जमा करने तथा भारत व विदेश में अनेक कंपनियां अधिग्रहित करने का आरोपी था। यहां तक कि भारतीय दंड संहिता के तहत किसी थाने के एसएचओ को भी अनुरोध पत्र के लिए आवेदन करने का अधिकार है, किंतु सीबीआइ के तमाम अधिकारियों को इस अधिकार से वंचित कर दिया गया। कोई मौका न छोड़ते हुए यह अधिकार भारत सरकार और वह भी प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप दिया गया। यद्यपि केंद्र सरकार के पास इस प्रकार के आवेदन सालों साल लंबित पड़े रहते हैं, किंतु सीबीआइ द्वारा ये तथ्य सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। यह सरकार के सेंसर पर निर्भर है, जबकि खुद सीबीआइ के सरकार के अधीन होने के बावजूद वह ऐसा नहीं कर सकती। (लेखक सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं).
Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 15, 2011
लोकतंत्र में सिविल सोसाइटी
लेखक शासन व्यवस्था पर सिविल सोसाइटी यानी नागरिक समाज के नैतिक नियंत्रण के विचार का विश्लेषण कर रहे हैं…
इन दिनों नागरिक समाज की जमकर चर्चा हो रही है। थॉमस हॉब्स ने अपनी अमर पुस्तक लेवियाथन में लिखा सिविल सोसाइटी और सरकार अथवा सार्वभौम के बीच अनुबंध हो जाने के बाद नागरिकों के सारे अधिकार समाप्त हो जाते है। हॉब्स का मानना था कि प्राकृतिक अवस्था को सिविल सोसाइटी में बदलने की जरूरत है। इसमें व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक मजबूत सार्वभौम की जरूरत है। अपनी सुरक्षा के बदले में नागरिक अपने अधिकारों को समर्पित करता है। केवल एक स्थिति में हॉब्स ने किसी व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने की छूट दी है-यदि किसी की जान को राज्य से ही खतरा हो तो वह विद्रोह कर सकता है। जॉन लॉक ने सिविल सोसाइटी की महत्तर भूमिका पर बल देते लिखा है कि सार्वभौम की सत्ता पर नागरिक समाज का नियंत्रण होना चाहिए जो उसे शक्ति प्रदान करता है। हीगेल का मत था कि समाज के विकास में तीन चरण होते हैं-परिवार, सिविल सोसाइटी एवं राज्य। परिवार परमार्थ की भावना पर आधारित संस्था है, जिसमें एक-दूसरे का ख्याल रखा जाता है, परंतु यह परमार्थ बहुत सीमित संदर्भ में होता है। दूसरा चरण है सिविल सोसाइटी जो ज्यादा व्यापक होता है, किंतु इसमें अलग-अलग वर्गो एवं गुटों के हितों का टकराव होता है, जिसे रोकने के लिए राज्य की जरूरत होती है। इसलिए हीगेल की दृष्टि में राज्य आदर्श स्थिति है। मार्क्स ने नागरिक समाज एवं राज्य, दोनों को अपूर्ण माना। आज अपने देश में नागरिक समाज की भूमिका को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि कानून बनाने में उसके प्रतिनिधि की क्या भूमिका हो सकती है, जबकि देश में उसके लिए निर्वाचित विधायिका है। जन लोकपाल विधेयक प्रारूप समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सिविल सोसायटी के कुछ वर्गो ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाया है। यह सही है कि संवैधानिक योजना के तहत कानून बनाने की प्रक्रिया में नागरिक समाज की सीधी भागीदारी नहीं है। यदि जरूरत महसूस हो तो संसदीय समितियां विभिन्न वर्गो के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श कर सकती हैं। कुछ देशों में नागरिक समाज की सीधी सहभागिता का कानूनी प्रावधान है। स्विट्जरलैंड में लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के लिए तीन संस्थाएं हैं-प्रारंभिक प्रयास (इनिशिएटिव), जनमत संग्रह एवं प्रतिनिधि वापस बलाने का अधिकार। प्रारंभिक प्रयास के अंतरगत नागरिक कोई कानून बनाने लिए स्वयं कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। इसके लिए जनसंख्या का एक खास प्रतिशत हस्ताक्षर कर यह प्रक्रिया शुरू कर सकता है। जनमत संग्रह के तहत किसी खास कानून या मुद्दे पर जनता की राय ली जाती है। इसके साथ ही जनता को प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार है। ऐसा कोई प्रावधान भारतीय संविधान में नहीं है, किंतु यहां सिविल सोसाइटी की अहम् भूमिका रही है, हालांकि उसको लेकर विवाद भी शुरू से रहा है। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो रवींद्र नाथ टैगोर ने इसका विरोध किया कि इससे अराजकता फैलेगी। गांधीजी टैगोर को समझाने शांति निकेतन गए, किंतु वह गांधीजी के विचार से सहमत नहीं हो पाए। उनका मानना था कि इसके बजाय शिक्षा का प्रसार होना चाहिए। कांग्रेस के नेता एवं पटना के मशहूर बैरिस्टर हसन इमाम भी असहयोग के विरुद्ध थे। उन्हें समझाने भी गांधीजी पटना गए, किंतु उन्होंने भी गांधीजी के तर्को को नहीं माना। एनी बेसेंट ने तो सविनय अवज्ञा का खुलकर विरोध किया था। गांधीजी नागरिक समाज के बहुत बड़े समर्थक थे और सरकार के ऊपर उसका नैतिक नियंत्रण बनाए रखने के पक्षधर थे। अंबेडकर ने संविधान सभा में असहयोग एवं सविनय अवज्ञा के तरीकों को खारिज कर दिया कि स्वाधीन भारत में अपनी ही सरकार के विरुद्ध इसके इस्तेमाल की जरूरत नहीं है, किंतु इस विचार से सहमत होना मुश्किल है, क्योंकि अपनी सरकार के विरुद्ध भी आंदोलन होते हैं। ह्यूम ने सवाल उठाया था कि किसी लोकतंत्र में कानूनों के पीछे जो बल होता है वह है आम आदमी का मत, परंतु क्या आम आदमी कानून बनाता है? इसलिए किसी ने कहा था कि लोकतंत्र हर मतदाता को अपने ऊपर अत्याचार करने का अवसर देता है। लोकतंत्र में नागरिक समाज की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। जयप्रकाश आंदोलन स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा जनांदोलन था। आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चल रहे हैं और कानून बनाने पर अत्यधिक जोर है, परंतु नागरिक समाज को कानून बनाने के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनचेतना फैलाने का काम करना चाहिए। अमेरिका के प्रसिद्ध जज हैंड ने कहा था, मैं अक्सर हैरान होता हूं कि क्या हम अपनी उम्मीदें बहुत ज्यादा संविधान पर, कानूनों पर एवं अदालतों पर तो नहीं टिकाते? ये झूठी आशाएं हैं। स्वतंत्रता स्ति्रयों एवं पुरुषों के दिलों में निवास करती है, जब यह मर जाती है, कोई संविधान, कानून, अदालत इसे बचा नहीं सकती। जब तक यह वहां रहती है, इसे किसी संविधान, किसी कानून, किसी अदालत की जरूरत नहीं है अपनी रक्षा के लिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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