Monday, October 24, 2011

श्रम सुधारों का समय


भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति-सुजुकी इंडिया के मानेसर संयंत्र में 14 दिन से चली आ रही हड़ताल खत्म हो गई है। कंपनी प्रबंधन, कर्मचारी और हरियाणा सरकार के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद यह हड़ताल खत्म हुई। समझौते के तहत प्रबंधन 64 स्थायी कर्मचारियों को वापस लेने पर सहमत हो गया, लेकिन 30 कर्मचारियों का निलंबन जारी रहेगा। तीनों पक्षों में इस बात पर भी सहमति बनी कि 1200 अस्थायी कर्मचारियों को भी बहाल कर दिया जाएगा। शिकायतों के निस्तारण एवं श्रमिकों के कल्याण के लिए दो समितियों के गठन पर भी सहमति बनी ताकि संयंत्र में कार्य के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। मारुति के 30 साल के इतिहास में सात हड़तालें हो चुकी हैं जिनमें से चार हड़तालें इसी साल हुईं। इस साल मई में मारुति के मानेसर प्लांट के संविदा कर्मचारियों ने अलग यूनियन बनाने की मांग को ठुकराए जाने पर हड़ताल की थी। उनका मानना था कि स्थायी कर्मचारियों की यूनियन की प्रबंधन से मिलीभगत है। पहले दौर की हड़ताल खत्म हुई तो कर्मचारियों को अच्छे आचरण के बांड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। मारुति प्रबंधन का कहना है कि ये अनुशासन संबंधी साधारण शर्ते हैं। दरअसल मारुति में हड़ताल भारतीय श्रम बाजार में श्रमिकों और प्रबंधन के बिगड़ते रिश्तों की कहानी है। प्रतिस्पर्धी कंपनियों को सस्ता श्रम चाहिए। वे ठेकेदारों के माध्यम से सस्ते मजदूरों को प्राथमिकता देते हैं। इन्हें चिकित्सा, बीमा, बचत, विकलांगता कवर जैसी सुविधाएं नहीं देनी पड़तीं। वेतन में भी भारी अंतर रहता है। जैसे मारुति में मुट्ठी भर स्थायी कर्मचारियों को 25,000 रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं जबकि ठेके पर रखे कर्मचारियों को समान काम के लिए 4,500 से 12,000 रुपये मिलते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में कामगारों की संख्या लगभग 46 करोड़ है जिसमें 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। अर्थव्यवस्था में अहम योगदान असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा की सुविधाओं से वंचित है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में 90 फीसदी से ज्यादा को आमतौर पर सरकार की ओर से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे मिलते हैं। श्रमिक हितों से संबंधित शायद ही किसी कानून का फायदा इन्हें मिल पाता है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ी है, लेकिन वे मजदूरी में भेदभाव से लेकर कई तरह के शोषण का शिकार हैं। यही कारण है कि असंगठित कामगार औद्योगिक क्षेत्र में काम करने से हिचकते हैं। दरअसल औद्योगिक समूह अभी भी अनुबंधित श्रम कानूनों को पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं। उद्योग जगत कामगारों के प्रति जवाबदेह नहीं लगता। श्रमिकों को केवल ठेकेदार तक ही सीमित कर दिया गया है जो कानूनों और नियंत्रण से परे है। औद्योगिक इकाई इस बात की जिम्मेदारी नहीं लेती कि ठेकेदार मजदूरों को उचित मजदूरी देते भी हैं या नहीं। देश में श्रमिकों के हित में उठाए गए कदमों का दायरा संगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक सीमित रहा है। हालांकि सरकार ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष के गठन को मंजूरी दी है। 1,000 करोड़ रुपये के इस कोष से संचालित योजनाओं का लाभ उन 43.3 करोड़ श्रमिकों को मिलेगा जो बुनकर, रिक्शा चालक या दिहाड़ी श्रमिक के रूप में काम करते हैं। सरकार ने गरीब परिवारों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए वृद्धावस्था पेंशन और स्वावलंबन जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में आज भी बहुत कम श्रमिक परिवार इन कार्यक्रमों के बारे में जानते हैं। जरूरत के अनुसार इन कार्यक्रमों के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। फिर बहुत सारी राशि बिचौलियों और भ्रष्ट कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। जरूरत इस बात की है कि देश के श्रम बाजार की नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण हो और ऐसा रास्ता तैयार किया जाए जिसमें श्रम संसाधनों का एकतरफा दोहन न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

मानव विकास में अभी भी काफी पीछे है बिहार


बिहार में आहिस्ता-आहिस्ता ही सही लोगों का जीवन स्तर सुधरने लगा है। योजना आयोग की इंडिया : ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011 में कहा गया है कि केरल, दिल्ली, हिमाचल, गोवा और पंजाब जैसे विकसित राज्यों की तुलना में बिहार मानव विकास के मामले में अभी भी काफी पीछे है। छत्तीसगढ़ और ओडि़सा ही सिर्फ उससे नीचे है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षो में बिहार में तेजी से आर्थिक विकास हुआ है, लेकिन मानव विकास इंडेक्स में गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता की सुविधाओं की कमी के कारण यह दिखाई नहीं देता। हालांकि राज्य सरकार की ओर से गरीबी को कम करके इंडेक्स में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। जून 2009 तक 40 लाख बीपीएल परिवारों और 24 लाख अंत्योदय परिवारों को राशन कार्ड बांटे गए। 2004 से 2008 के बीच अनुसूचित जाति-जनजाति के कल्याण पर खर्च की राशि दोगुनी हो गई। फिर भी मानव विकास इंडेक्स के मामले में बिहार अन्य राज्यों की तुलना में अभी काफी पीछे है। मानव विकास इंडेक्स के मामले में केरल (0.790) पहले नंबर पर, दिल्ली (0.750) दूसरे नंबर पर और हिमाचल प्रदेश (0.652) तीसरे स्थान पर हैं। सबसे नीचे की पायदान पर छत्तीसगढ़ (0.358) है। उड़ीसा (0.362) के साथ नीचे से दूसरे नंबर पर। बिहार (0.367) का नीचे से तीसरा स्थान है। यह बात जरूर देखने को मिल रही है कि बिहार, ओडि़सा और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों ने मानव विकास इंडेक्स के मामले में राष्ट्रीय औसत से तेजी के साथ विकास किया है। हालांकि अभी भी ये राज्य इस स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं कि इंडेक्स में कोई उलटफेर कर सके। बिहार में मानव विकास की स्थिति पर नजर दौड़ाए तो स्पष्ट है कि आय, शिक्षा और स्वास्थ्य तीनों क्षेत्रों में विकास हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज है। सर्व शिक्षा अभियान, स्कूलों में बड़ी संख्या में अभियान चलाकर बच्चों का नामांकन, मुख्यमंत्री साइकिल योजना और बालिका पोशाक योजना का रंग शिक्षा के इंडेक्स में साफ-साफ झलक रहा है।

तरक्की कर रहे भारत में भूख और कुपोषण चरम पर


भारत में तेज आर्थिक विकास की तमाम कथाओं के मुकाबले यह कहानी बेहद उलटी, अचरज भरी और भयावह है। पिछले दशक की शानदार ग्रोथ के बावजूद भारत के सभी राज्यों में भूख व कुपोषण चरम पर है। एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जो भूख से मुक्त होने के पैमाने के करीब फटकता हो। ऊंची आय वाले गुजरात, पंजाब जैसे राज्य हों अथवा बेहतर सामाजिक विकास वाला केरल, भूख के सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर यह तस्वीर बेहद डरावनी है। भूख-कुपोषण पर मानव विकास रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन सनसनीखेज है। रिपोर्ट बताती है कि भारत भूख खत्म करने की लड़ाई हार गया है। सरकारी पैमाना कहता है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को स्वस्थ ढंग से जीने के लिए कम से 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी चाहिए। योजना आयोग की गरीबी रेखा का बुनियादी पैमाना भी यही है। मगर रिपोर्ट बताती है कि देश के 81 फीसदी ग्रामीण और 57 प्रतिशत शहरी इतना भी नहीं जुटा पाते। कुपोषण की समस्या केवल बच्चों की ही नहीं है, देश के करीब एक तिहाई वयस्क पुरुष व महिलाएं भी कुपोषण का शिकार हैं। इनका वजन (न्यूनतम बॉडी मास इंडेक्स 18.5) निर्धारित पैमाने से कम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में हालत बहुत बुरी है। देश के 46 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। हिमाचल, पंजाब, केरल, सिक्किम, मणिपुर व मिजोरम बच्चों में कुपोषण के मामले में अफ्रीका के निर्धनतम सहारा मरुस्थल के देशों जैसे हैं। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार हंगर इंडेक्स यानी भूख सूचकांक में न्यूनतम स्तर 9.9 का है। भूख सूचकांक कुपोषण के तीन पैमानों पर आधारित है। किसी राज्य में भूख की स्थिति जानने के लिए नागरिकों में औसत कैलोरी (भोजन से मिलने वाली ऊर्जा) खपत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण, और पांच साल छोटे बच्चों की मृत्यु दर को आधार बनाया जाता है। विकास की ताजा चमक वाला गुजरात इस भूख सूचकांक पर 24.70 फीसदी अंकों के साथ 13वें नंबर पर है, यानी भूख से प्रभावित पांच प्रमुख राज्यों में शामिल है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश इससे ज्यादा बुरी हालत में हैं। मध्य प्रदेश भूख सूचकांक में सबसे गंभीर राज्य के तौर पर दर्ज हुआ है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में भी भयानक भूख व कुपोषण है। कर्नाटक व केरल की 28 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर 9 और पंजाब में 5.2 फीसदी है। अनाजों की उपलब्धता में कमी और गैर अनाज की खपत में बढ़ोतरी न होने के रेखांकित करते हुए मानव विकास रिपोर्ट कहती है कि भारत भुखमरी की अपनी बुनियादी चुनौती से अब तक नहीं निबट पाया है।

आपकी सेहत पर सरकार कर रही कंजूसी


स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी ढांचे की लचर स्थिति के बावजूद इस पर सरकारी उपेक्षा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। योजना आयोग ने अपने ताजा आकलन में बताया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत बड़ी रकम इस क्षेत्र पर खर्च होने के बाद भी स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सरकार सिर्फ 1.3 फीसदी ही खर्च कर रही है। योजना आयोग ने अपनी मानव विकास रिपोर्ट- 2011 में स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा पर खास ध्यान दिलाया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1990 में जहां प्रति हजार शिशु में 80 की मौत हो जाती थी, वहीं 2009 में भी यह सिर्फ 50 तक पहुंच सका है। शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) को वर्ष 2015 तक 26.7 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जिस तरह 20 साल में सिर्फ 30 बिंदुओं की कमी आई है, उसे देखते हुए यह लक्ष्य अब काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसी तरह मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) में वर्ष 2003 से लेकर 2009 के दौरान सिर्फ 89 बिंदुओं की कमी आई है। पहले जहां एक लाख जीवित जन्म पर 301 माताओं की मौत हो रही थी, वहीं अब यह घटकर 212 रह गई, लेकिन 2012 तक इसे 100 तक पहुंचाने के लक्ष्य से यह बहुत दूर है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और जननी सुरक्षा योजना की वजह से संस्थागत प्रसव में तो बढ़ोतरी हुई है। 2006 तक जहां सिर्फ 39 फीसदी महिलाएं ही चिकित्सकीय निगरानी में बच्चे को जन्म दे रही थीं, वहीं 2009 तक यह अनुपात बढ़कर 78 फीसदी हो गया, लेकिन अभी इसे शत प्रतिशत तक पहुंचाना है। इसी तरह कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के मामले में नौ राज्यों दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने जरूर वर्ष 2008 तक 2.1 की दर हासिल कर ली है, लेकिन बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में यह दर अब भी तीन से ज्यादा बनी हुई है। अपने देश में अब भी दस हजार की आबादी पर अस्पताल के सिर्फ नौ बिस्तर उपलब्ध हैं। जबकि चीन में यह अनुपात 30 है। इसी तरह भारत में प्रति दस हजार आबादी पर सिर्फ छह डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि चीन में यह संख्या 14 है। नर्स के मामले में तो यह स्थिति बहुत ही खराब है। जहां विकसित देशों में प्रति सौ-डेढ़ सौ लोगों पर एक नर्स उपलब्ध है, भारत में 1205 लोगों पर एक नर्स है।

Saturday, October 15, 2011

भूखे गरीबों का बढ़ता आंकड़ा

सरकार के तथाकथित गंभीर प्रयासों के बावजूद खाद्य पदाथरे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कई महीनों से इसकी महंगाई दर नौ प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। उम्मीद थी कि बढ़िया मानसून और भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक उपायों से कीमतें काबू में आएंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। 24 सितम्बर को खत्म हुए सप्ताह में खाद्यों की मंहगाई दर 9.41 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। हालांकि ताजा आकड़ें मामूली गिरावट दर्शा रहे हैं। इस मुसीबत को बढ़ाने में ज्यादा योगदान सब्जियों और फलों का रहा। जैसे-जैसे खाद्यों की कीमतों में इजाफा होता जाता है, वैसे- वैसे गरीब की थाली सिकुड़ती जाती है। यह सिलसिला बहुत नया और केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। यह आंच पूरी दुनिया में गरीबों को झुलसा रही है। इसीलिए यह मुद्दा वैिक स्तर पर गंभीर चिंता और बहस का विषय बन गया है। इस साल संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की पहल पर दुनिया भर में वि खाद्य दिवस के मौके पर बढ़ती खाद्य कीमतों को मुख्य विषय बनाया गया है। एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि 1975 से 2000 के बीच अनाज की कीमतों में ज्यादा उछाल या उलट-फेर नहीं देखा गया। आबादी बढ़ने के बावजूद गरीबों की अनाज तक पहुंच बनी रही क्योंकि उत्पादन बढ़ता रहा। देश में हरित क्रांति के असर के कारण अनाज के गोदाम भरे रहे और कीमतें स्वाभाविक महंगाई के साथ लगभग अनुकूल स्तर पर बनी रहीं। परंतु, 2004 से खाद्य पदाथरे की कीमतें भारत समेत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ने लगीं। इस दौरान कीमतों में लगभग 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो किसी पैमाने से तर्कसंगत नहीं कही जा सकती। इस उछाल से दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की गिरफ्त में आ गया। लगभग 20 देशों में अनाज की कमी ने कलह की स्थिति बना दी। वि बैंक के अनुसार 2010-11 में खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दुनिया के सात करोड़ से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी का शिकार हो गये। दरअसल, किसी भी देश में अनाज उपलब्ध होना और अनाज तक गरीबों की पहुंच होना, दो अलग-अलग बातें हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुमान है कि अगर किसी व्यक्ति की आय 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) प्रतिदिन से कम हो तो अनाज की कीमतें बढ़ने पर उसे केवल एक समय का भोजन नसीब होगा। एक अनुमान है कि दुनिया के एक अरब से ज्यादा लोगों की आमदनी एक डॉलर प्रतिदिन से कम है और 80 करोड़ लोग भूख का शिकार हैं। दूसरी ओर अपने देश में कुछ दिन पहले ही सरकारी स्तर पर कहा गया कि 32 रुपये हर रोज कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। हालांकि, इसका विरोध होने पर इस परिभाषा को वापस ले लिया गया। बहरहाल, देश में भुखमरी बढ़ती जा रही है। कृषि निवेशों की कीमत बढ़ने के कारण कृषि उत्पादों की लागत अपने-आप बढ़ जाती है। यही वजह है कि सरकार हर साल अनाज के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर देती है। इससे भी अनाज की कीमतें बढ़ती हैं और गरीब की थाली कुछ और सिकुड़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (इफप्री) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में खाद्य सुरक्षा खतरनाक स्तर पर है। संस्थान ने दुनिया के 81 विकासशील और गरीब देशों में अध्ययन कर वैिक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडैक्स) का आकलन किया जिसमें हमारा देश 67वें स्थान पर रहा, दुनिया के केवल 14 देश ही हमसे पीछे हैं। पाकिस्तान, नेपाल, रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस कतार में हमसे आगे नजर आते हैं। रिपोर्ट कहती है कि पिछले दस सालों में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ। देश में गरीबी और अनाज की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा कानून लागू किये जाने की योजना है। इसके तहत प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम अनाज देने का प्रस्ताव है। इस कानून में गरीबी की रेखा से नीचे और ऊपर गुजर करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। सरकार कहती है कि इसे शीत सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। गरीब की भूख से जुड़े मसलों का राजनीतिकरण गंभीर चिंता उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि भूख तुरंत निदान चाहती है। दुनिया में जहां भी सरकार ने गंभीरता से भुखमरी खत्म करना चाही, वहां कामयाबी मिली। मैक्सिको में 2008 में खाद्य कीमतों में उछाल आया तो सरकार ने गरीबों को नकद सहायता देनी शुरू कर दी। लेकिन शर्त थी कि बच्चे स्कूल जाएं और परिवार के सदस्य स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित जांच करायें। इससे खाद्य सुरक्षा के साथ ही पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा भी हुई और शिक्षा का स्तर भी सुधरा। अपने यहां ऐसा कदम उठाने से पहले हमें तमाम मुश्किल और अप्रिय सवालों से जूझना होगा। खाद्य कीमतें बढ़ाने का दोष आमतौर पर बढ़ती आबादी के सिर मढ़ दिया जाता है, परन्तु अपने देश के संदर्भ में इसमें ज्यादा सचाई नहीं दिखाई नहीं देती क्योंकि आबादी के साथ खाद्यान्न उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1950-51 में महज पांच करोड़ टन से शुरू हुई यह यात्रा अब लगभग 24 करोड़ टन का आंकड़ा पार कर चुकी है। 2020 में देश को 28 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी जिसे पूरा करने के लिए देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों, दोनों ने ही पूरी तैयारी कर रखी है। हमारे अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं पर समस्या यह है कि अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए जगह की कमी है। आये दिन अनाज सड़ने की खबरें आती हैं। उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए निर्देश दिया था कि अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने की बजाय गरीबों में बांट दिया जाए। दरअसल समस्या आबादी बढ़ने की नहीं बल्कि अनाज खरीदने की आर्थिक सामथ्र्य न होने की है। गरीबी और भुखमरी के बीच चोली-दामन का रिश्ता है। इस सिलसिले में मनरेगा से काफी आशाएं बंधी हैं क्योंकि इससे ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा हुआ है और शहरी पलायन में कुछ हद तक कमी देखने में आई है। परंतु व्यापक गरीबी और अधिनियम की सीमाओं के मद्देनजर इस कार्यक्रम का अपेक्षित असर कम ही दिखाई दे रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाने के लिए समग्र कार्यक्रम विकसित कर लागू किये जाए। दरअसल, खेती से होने वाली आमदनी में गिरावट आती जा रही है जिससे गांवों में गरीबी और भुखमरी का जोर बढ़ता जा रहा है। जोत का आकार घटने के साथ आमदनी भी घटती गई है। यही वजह है कि खेती में खुद किसानों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर किया गया सव्रेक्षण बताता है कि देश के 40 प्रतिशत किसान खेती का धंधाछोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हाल में गांवों में भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर उठे विवाद में भी ज्यादातर किसानों की दिलचस्पी कृषि भूमि अधिग्रहण से मिलने वाले आकषर्क मुआवजे में थी। कृषि में घटती दिलचस्पी के कारण ही देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटकर लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है, जो 1990-91 में 30 प्रतिशत था। ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाकर गरीबों को भुखमरी से बचाने का एक ही रास्ता है- कृषि के साथ कुछ ऐसे घटकों को भी जोड़ा जाए कि कुल आमदनी में इजाफा हो। अपने देश में गरीबी और भुखमरी पर अंकुश लगाने के लिए हमें कृषि क्षेत्र को और अधिक मजबूत तथा आर्थिक रूप से आकषर्क बनाने की जरूरत है। वि खाद्य दिवस इस संकल्प को दोहराने का अवसर है।

Friday, October 14, 2011

गरीबी ही नहीं गैर-बराबरी भी है मुद्दा

योजना आयोग की शहरों में 32 और गांवों में 26 रुपये प्रतिदिन की गरीबी रेखा ने राष्ट्रीय जनमानस को झकझोर कर रख दिया है। इसके खिलाफ पूरे देश में हैरानी, गुस्से और प्रतिवाद के तीखे सुर सामने आए हैं। यह स्वाभाविक भी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी धनराशि में दो जून का भरपेट भोजन संभव है? खासकर हाल के वर्षो में जिस तरह से खाद्य वस्तुओं और जिंसों के अलावा बुनियादी जरूरत की सभी चीजों और सेवाओं की महंगाई आसमान छू रही है, उसके कारण आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। यही कारण है कि कई विश्लेषक इसे गरीबी नहीं, भुखमरी रेखा कह रहे हैं। इस हवाई गरीबी रेखा ने पूरे देश को इसलिए भी चौंकाया है क्योंकि गरीबी निरंतर असह्य होती जा रही है। इसकी वजह यह है कि देश के तेजी से बदलते आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य में दिनोंदिन गरीबों का जीना मुहाल होता जा रहा है। पिछले डेढ़-दो दशकों में देश में जिस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच खाई तेजी से बढ़ी और चौड़ी हुई है, उसके कारण गरीबी का दंश और गहरा और तीखा हुआ है। यह किसी से छुपा नहीं है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर, गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। असल में, पिछले कुछ दशकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के बाद के दो दशकों में देश में जिस तरह से आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता बढ़ी है, उसके कारण गरीबी अधिक चुभने लगी है। सत्तर और कुछ हद तक अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षो तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा और तीखा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों में पारंपरिक अमीरों के अलावा नई आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर एक नया दौलतिया वर्ग पैदा हुआ है जिसकी अमीरी और उसके खुले प्रदर्शन ने गरीबों और निम्न मध्यम वगरे में गहरी वंचना का अहसास भर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। वह दो से तीन फीसद के हिंदू वृद्धि दर के दौर से बाहर निकलकर सात से नौ फीसद रफ्तार वाले हाई-वे पर पहुंच गई है। इसके साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है। लेकिन यह भी एक कड़वी सचाई है कि यह समृद्धि कु छ हाथों में ही सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों तथा हाशिये पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक में अमीरी अश्लीलता की हद तक और गरीबी अमानवीयता की हद तक पहुंच गई है। इसे देखने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। देश के बड़े महानगरों और शहरों के शापिंग मॉल्स में चले जाइए, वहां देश-दुनिया के बड़े ब्रांडों के उपभोक्ता सामानों की मौजूदगी और उनकी चमक-दमक आंखें चौंधियाने के लिए काफी है। आज देश में दुनिया के सबसे बड़े लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद मौजूद हैं और अच्छा कारोबार भी कर रहे हैं। उनके कारण आज लंदन-पेरिस-न्यूयार्क और दिल्ली-मुंबई-बेंगलूरू में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। दरअसल, भारत के अमीरों तथा उच्च मध्यवर्ग के उपभोग स्तर और दुनिया के अन्य मुल्कों के अमीरों के उपभोग स्तर में खास फर्क नहीं रह गया है। आज देश में बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की लाखों- करोड़ों की घड़ियां, कारें, ज्वेलरी, सूट, फोन सहित भांति-भांति के इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान, यहां तक कि खाने-पीने की चीजें भी उपलब्ध हैं। जाहिर है कि इनके उपभोगकर्ताओं की संख्या और उनके उपभोग की भूख दोनों बढ़ी हैं। सबसे बड़ी बात कि यह सब अब दबे-छिपे नहीं बल्कि खुलकर और सबको दिखाकर हो रहा है। इस वास्तविकता के उल्लेख का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस देश में कोई 78 फीसद से अधिक लोग 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजर-बसर करने के लिए अभिशप्त हों, वहां अमीरी की यह तड़क-भड़क और उसका खुला प्रदर्शन सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता नहीं तो और क्या है? देश में बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी और विषमता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सबसे अमीर दस फीसद लोग देश के कुल उपभोग व्यय का 31 फीसद गड़प कर जाते हैं। सबसे अमीर और उच्च मध्यवर्ग के 20 फीसद लोग कु ल उपभोग व्यय का 45 फीसद चट कर जाते हैं। जबकि सबसे गरीब दस फीसद लोगों के हिस्से कुल उपभोग का मात्र 3.6 फीसद हिस्सा आता है। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री को कुछ साल पहले उद्योगपतियों के सम्मेलन में कहना पड़ा था कि इस तरह के दिखावे का उपभोगसमाज के लिए अच्छा नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए। यह और बात है कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण ही यह सामाजिक-आर्थिक अश्लीलता सफलता का पैमाना बनती जा रही है। यही नहीं, इस दौर में आजादी के आंदोलन के दौर में बने सादगी, संतोष और मितव्ययता जैसे सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार बेमानी होते चले गए हैं। नए मूल्य यह हैं- ग्रीड इज गुडयानी लालच अच्छी बला है, मोक्ष का रास्ता अधिकाधिक उपभोग और कर्ज लेकर घी पीएं। आश्चर्य नहीं कि पिछले डेढ़-दो दशकों में समावेशी विकास के नारों के बीच देश में गैर-बराबरी बेतहाशा बढ़ी है। तथ्य यह है कि अगर आज इस देश में नरेगा के तहत मिलनेवाली न्यूनतम मजदूरी सौ रुपये प्रतिदिन (मासिक तीन हजार रुपये) और कॉरपोरेट क्षेत्र के अधिकांश सीईओ की दस लाख से एक करोड़ रुपये मासिक की तनख्वाह को आधार मानें तो देश में आय के स्तर पर गैर-बराबरी बढ़ते-बढ़ते असह्य स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है। भारत सरकार के सबसे आला अधिकारियों यानी सचिवों की मासिक तनख्वाह और नरेगा की मासिक मजदूरी के बीच 500:1 का अनुपात बढ़ती आर्थिक गैर बराबरी का बड़ा उदाहरण है। देश में योजना की शुरु आत में 10:1 के आर्थिक गैर बराबरी अनुपात को कु छ हद तक बर्दाश्त लायक माना गया था, लेकिन आय और उपभोग के स्तर पर मौजूदा गैर-बराबरी को देख लगता है कि यह किसी सतयुग की बात है। गौरतलब यह भी है कि इस दौर में तेज आर्थिक विकास के बावजूद रोजगार के अवसर तो बढ़े नहीं, अलबत्ता उसकी गुणवत्ता में गिरावट ही आई है। देश में अब भी कुल श्रम शक्ति का 92 फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए बाध्य है। यही नहीं, इस दौर में सीईओ से लेकर सरकारी नौकरशाहों की तनख्वाहों में भारी इजाफा हुआ है लेकिन न्यूनतम मजदूरी गरीबी रेखा की तरह अतीत में अटकी हुई है। निजी क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है लेकिन उसमें रोजगार के संविदाकरण और अस्थाईकरण के अलावा श्रम कानूनों का उल्लंघन बढ़ा है। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र पर आबादी के 60 प्रतिशत की निर्भरता के बावजूद कु ल जीडीपी में उसका हिस्सा मात्र 14 फीसद रह गया है। मतलब 60 फीसद आबादी को देश की कुल आय में सिर्फ 14 फीसद हिस्सा मिल रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस सबके कारण गैर-बराबरी बढ़ती जा रही है और बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है। योजना आयोग की गरीबी (गल्प) रेखा इसीलिए और बेमानी लगने लगी है।