भारतीय समाज में विषमताएं तेजी से बढ़ रही हैं और इस बात से सरकार भी इनकार नहीं कर सकती। इस संकट के समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। पिछड़े हुए तबकों को उनका हक दिलाने के लिए सरकार को आगे आना ही होगा, पर फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि वह अंतर्विरोधों को कम करना चाहती है। वह विकास के एक प्रतिगामी रास्ते पर आगे बढ़ रही है और सब कुछ बाजार के हवाले करती जा रही है। यह स्थिति काफी संकटपूर्ण है
जनसंख्या की वृद्धि-दर में चार प्रतिशत की जो कमी आई है उसे सामाजिक सम्पन्नता से या नवउदारवादी नीतियों की सफलता से जोड़ कर देखना तर्कसंगत नहीं है। यह कमी 1981 से ही आ रही है जब नवउदारवादी नीतियां शुरू नहीं हुई थीं। यह जो कमी आ रही है वह मृत्यु-दर में कमी के चलते आई है और इसकी शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी। यह एक सामान्य बात है कि जब तक मृत्यु-दर में कमी नहीं आती है, जन्म-दर में भी कमी नहीं आ सकती। सामाजिक सुरक्षा की भावना भी इससे जुड़ी है। आज बच्चों की देखभाल पहले की अपेक्षा अधिक खर्चीली हो गई है। पहले ऐसा नहीं था और बच्चा बचपन से ही कमाना शुरू कर देता था। जनसंख्या में कमी आने से सम्पन्नता बढ़ती है और सम्पन्नता में वृद्धि होने से जनसंख्या में कमी आती है।
डेमो ग्राफिक ट्रांजिशन
हाथ से काम करने वाले लोगों में जन्म-दर अक्सर अधिक रहता है। आज औरतें जैसे-जैसे काम के लिए बाहर निकल रही हैं, अपने शरीर पर उनका अधिकार भी बढ़ रहा है। घर की अर्थव्यवस्था में योगदान करने की वजह से उनमें निर्णय क्षमता बढ़ी है। इसे एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन (डेमोग्राफिक ट्रांजिशन) की प्रक्रिया कहते हैं। 0 से 6 वर्ष की आयुवर्ग में यदि समानुपात में वृद्धि होती है तो इससे प्रजनन का अनुमान लगाया जा सकता है। केरल में हम सबसे पहले यह देखते हैं। पिछड़े प्रदेश जैसे कि उत्तर प्रदेश, बिहार आदि आज भी पीछे हैं। नए आंकड़े दर्शाते हैं कि उत्तर प्रदेश को छोड़ कर बिहार, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में प्रजनन में वृद्धि हुई है। 0 से 6 वर्ष आयुवर्ग में लिंगानुपात बढ़ा है। हालांकि पूरी आबादी में यह काफी पहले से है पर बच्चों के मामले में हरियाणा, पंजाब आदि में लिंगानुपात बढ़ा है। हरियाणा और पंजाब तो सम्पन्नता के मामले में काफी आगे हैं, पर बच्चों के लिंगानुपात में आई कमी को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसका सम्बंध केवल सम्पन्नता से नहीं हो सकता। इसका सम्बंध मूलत: सामाजिक प्रवृत्तियों एवं सामाजिक-सांस्कृतिक विकास से है।
पर चेतना का स्तर अब भी वही
लिंगानुपात में आई कमी को देखते हुए यह बात कुछ हद तक सही लगती है कि समाज में औरतों की स्थिति बेहतर हुई है। पर यहां भी हमें कुछ राज्यों को अपवादस्वरूप रखना होगा। औरतों की वास्तविक स्थिति को हमें 0-6 आयुवर्ग के लिंगानुपात के साथ ही रख कर समझना होगा। अगर पैदा होने वाली लड़कियों की संख्या में कमी आ रही है तो यह स्थिति संदेह पैदा करती है। तमिलनाडु के कुछ इलाकों में पहले से शिशु-हत्या और भ्रूण-हत्या के प्रमाण मिलते थे। वहां तो आज इसमें कमी आई है पर अन्य कई राज्यों में यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है। आर्थिक समृद्धि चेतना में भी बदलाव ले आए यह जरूरी नहीं होता। पंजाब और हरियाणा इस संदर्भ में अच्छे उदाहरण हैं।
और तकरे में है विरोधाभास
नवउदारवादी नीतियों के अमल में आने के बाद से यह दावा किया जाता है कि आर्थिक संवृद्धि की रफ्तार तेज होने पर रोजगार के अवसर अनिवार्य रूप से बढ़ेंगे, गरीबी घटेगी और लोग खुशहाल होंगे। इस दावे को यदि हम जनसंख्या से जोड़ कर देखें तो एक अलग तथ्य उभरता है। 1981 से हमारे देश में आयु-संरचना में बदलाव आया है। बच्चों और बूढ़ों की संख्या में कमी आई है तथा उत्पादक और ग्राहक बनने लायक लोगों की आबादी बढ़ी है। इसे देखते हुए कहा जाता है कि काम करने वालों की संख्या ज्यादा हो तो इसका असर राष्ट्रीय आय पर पड़ता है। लेकिन व्यवहार में हम देखते हैं कि जबसे नवउदारवादी नीतियां शुरू हुई हैं, बेरोजगारी भी बढ़ी है।
नवउदारवादी नीतियों का दोष
आज संगठित क्षेत्र में रोजगार में भारी कमी आई है। इस वजह से ही युवा वर्ग व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हुआ है। कई बार वे रूढ़िवादी संगठनों के साथ भी चले जा रहे हैं। यदि आर्थिक विकास का तरीका नहीं बदलता तो एक जनसांख्यिकीय त्रासदी अवश्यम्भावी हो जाती है। लोगों के पास नौकरी नहीं होगी, काम नहीं होगा तो वे गलत दिशा में जाएंगे। संगठित क्षेत्र में रोजगार की कमी के चलते आज माइग्रेशन बढ़ा है, गरीबी तेजी से बढ़ती जा रही है। नवउदारवादी नीतियां ही इन ढांचागत बदलावों के लिए जिम्मेदार हैं।
अर्थव्यवस्था में तबाही का मंजर
आज कृषि पर आबादी की निर्भरता में कमी जरूर आई है पर इस अनुपात में आबादी में कमी नहीं आई। कृषि में सरकार जो भी सब्सिडी देती थी, उससे लगातार पीछे हट रही है। इसके पीछे कृषि में निजीकरण को बढ़ावा देने की मंशा काम कर रही है। इस खतरनाक प्रवृत्ति ने कृषि अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर तबाही ला दी है। जो लोग कृषि पर निर्भर थे उनके सामने पलायन या आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं छोड़ा जा रहा। इससे एक नए तरह का राजनीतिक संकट भी उत्पन्न हुआ है। असम और महाराष्ट्र में हिंदीभाषी लोगों पर हुए हमले इसी परिस्थिति का परिणाम हैं। आने वाले समय में यह संकट और बढ़ने वाला है।
अजीबोगरीब संकट
मनरेगा के बारे में काफी बढ़ा-चढ़ाकर कहा जा रहा है कि इससे रोजगार के लिए पलायन में कमी आ गई है पर मुझे तो ऐसा नहीं दिखाई देता। सरकार जिस फार्म या कांट्रैक्ट खेती को बढ़ावा दे रही है, उससे ग्रामीण लोगों की क्रय-क्षमता 1940 के दशक में चली गई है। एक तरफ बफर स्टॉक बढ़ गया है, अनाज सड़ रहे हैं, पर दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद केवल बी.पी.एल. परिवारों के लिए ही राशनिंग की जा रही है और एक विशाल भूखी आबादी को भोजन से वंचित किया जा रहा है। एक तरफ तो सरकार जनसंख्या कम होने से गरीबी कम होने की बात करती है, पर दूसरी तरफ वह बाजारीकरण को भी बढ़ावा दे रही है। इससे एक अजीब तरह का संकट उत्पन्न हो गया है। आर्थिक विकास, जन्म-दर और साक्षरता के बीच वैसा कोई सीधा-सरल सम्बंध नहीं है, जैसा बताने की कोशिश हो रही है। इसके पीछे कई दूसरी चीजें हैं। हम यहां गुजरात का उदाहरण ले सकते हैं जहां सम्पन्नता काफी है पर सामाजिक विकास के सूचकांक निम्न स्तर को प्रदर्शित करते हैं।
आसन्न विकरालता
शहरों की तरफ बेतहाशा उमड़ती चली आ रही आबादी और भीड़भाड़ की समस्या से निजात पाने के लिए वैसे तो सरकार ने जे.एन.एन.यू.आर.एम. जैसे कदम उठाए हैं, पर यह पर्याप्त नहीं है। सच तो यह है कि सरकार के पास शहर में आने वाले लोगों का कोई आंकड़ा नहीं है। ज्यादातर लोग असंगठित क्षेत्रों में हैं जिनका कोई लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं होता। दिल्ली में ही उत्तर- पूर्व की ज्यादातर कॉलोनियां मजदूर बस्तियां हैं जिन्हें सरकार की तरफ से कोई संरक्षण नहीं मिलता। एक बड़ी आबादी अल्पकालिक तौर पर भी शहर में आती है, और वह कहीं भी पंजीकृत नहीं होती। न तो उनके पास राशनकार्ड होता है और न उनके बच्चे स्कूल ही जा पाते हैं। अगर इस दिशा में जल्दी प्रयास नहीं किए गए तो यह समस्या विकराल रूप धारण करने वाली है। सबसे बड़ी आवश्यकता तो रोजगार की समस्या का कोई हल निकालना है और इसके लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करना ही एकमात्र सही तरीका हो सकता है। और कोई विकल्प नहीं है।
वैज्ञानिक विश्लेषण को मिले महत्व
जनगणना का सबसे अधिक महत्व इस बात को लेकर है कि इससे सेवा, व्यवसाय, कृषि आदि क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति का पता चलता है और देश तथा इसकी अर्थव्यवस्था में आने वाले बदलावों की ठोस जानकारी प्राप्त होती है। इन जानकारियों के आधार पर ही हम भविष्य की योजना भी तय करते हैं। जनसंख्या का ओ.बी.सी., एस.सी. या एस.टी. के अंतर्गत वर्गीकरण एक साम्प्रदायिक वर्गीकरण है जबकि आज सभी धर्मों में जातियां देखने में आ रही हैं। जाति जनगणना के लिए हमें 1931 के आंकड़ों की तरफ जाना पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि जनगणना में वैज्ञानिक विश्लेषण को महत्व दिया जाए। अभी वे क्या करने जा रहे हैं, पता नहीं चलता। उत्तर प्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि वहां जनसांख्यिकीय परिवर्तन तेज हुआ है पर उसके पड़ोसी राज्यों में ऐसे परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ते।
सरकार करे प्रभावी दखल
आज भारतीय समाज में विषमताएं तेजी से बढ़ रही हैं और इस बात से सरकार भी इनकार नहीं कर सकती। इस संकट के समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। पिछड़े हुए तबकों को उनका हक दिलाने के लिए सरकार को आगे आना ही होगा, पर फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि वह अंतर्विरोधों को कम करना चाहती है। वह विकास के एक प्रतिगामी रास्ते पर आगे बढ़ रही है और सब कुछ बाजार के हवाले करती जा रही है। यह स्थिति काफी संकटपूर्ण है।
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