Sunday, October 14, 2012

देश का सुसमृद्ध राज्य हरियाणा शर्मिदा नहीं










समाज विभांशु दिव्याल
, आहत है। इसलिए नहीं है कि राज्य में आये दिन बलात्कार हो रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि लगातार हो रहे बलात्कारों की घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बना रही हैं। मीडिया में हल्ला होता है और हरियाणा स्वयं को अपमानित-आहत महसूस करता है। वह कभी उपचार खोजता है, कभी सफाई देता है और कभी गुस्से में पलटवार करता है। उसकी एक खाप पंचायत फरमान जारी करती है कि लड़कियों की शादी पंद्रह वर्ष की उम्र में कर दी जाए, जैसे कि मुगलकाल में हिंदू परिवार लड़कियों को अपहरण आदि से बचाने के लिए उनकी शादी बचपन में ही कर दिया करते थे। हरियाणा के एक पूर्व मुख्यमंत्री पंचायत के इस फरमान पर अपने समर्थन की मुहर लगा देते हैं। एक आहत सरकारी प्रवक्ता बाकायदा मीडिया के सामने अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं कि नब्बे प्रतिशत मामलों में लड़कियां बलात्कार स्थल या स्थिति तक अपनी सहमति से ही पहुंचती हैं और गुंडों की गिरफ्त में फंस जाती हैं। एक और महिला मंत्री कहती हैं कि बलात्कार हर जगह हो रहे हैं, फिर हरियाणा को ही क्यों बदनाम किया जा रहा है। मतलब, हरियाणा में हो रहे बलात्कार कोई ऐसी परिघटना नहीं हैं कि इन्हें बेवजह तूल दिया जाए। एक तेजतर्रार महिला कांग्रेस प्रवक्ता बयान देती हैं कि बलात्कार की घटनाएं कानून- व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि किसी और वजह से हैं। किस वजह से है, इसकी व्याख्या नहीं दी गई। बलात्कार की घटनाओं पर भद्रजनों की ऐसी असंवेदनशील प्रतिक्रियाएं देश के साठोत्तरी संविधान के मुंह पर तमाचा प्रतीत हो सकती हैं; प्रगतिकामी चेतना के लोगों को सोलहवीं सदी की मानसिकता की उपज लग सकती हैं; औरतों की बराबरी और उनके संवैधानिक अधिकारों के पैरोकारों को गुस्से से भर सकती हैं; मीडिया के विचारवानों को उत्तेजित कर सकती हैं और स्वयं आधुनिकतावादी महिलाओं को गुस्से से भर सकती हैं। मगर खाप पंचायतों के फैसले और स्वयं संवैधानिक व्यवस्थाओं का बलात्कार करने वाली प्रतिक्रियाएं इस समय के एक बेहद अभद्र सामाजिक सच को भी उजागर कर रहे हैं। यह वह सच है जो महिलाओं को सुरक्षा देने में कानून-व्यवस्था की असफलता, राजनीतिक जमात की असंवेदनशीलता और सत्ता की चाह में किसी भी दुष्प्रवृत्ति के आगे घुटने टेक देने की लोकतांत्रिक प्रवृत्ति, खाप पंचायतों की जैसी कुलक जाहिल मानसिकता, सामाजिक-आर्थिक निर्णायक ताकतों की पुरुषवादी और रुढ़िवादी वैचारिकता और आधुनिक विचारवाहकों के आम जनता के दिमाग तक पहुंचने के प्रयासों की विफलता जैसे तत्वों से तैयार हुआ है। इस सच से आंखें तो चुराई जा सकती हैं, इसकी बयानी निंदा भी की जा सकती है; लेकिन इससे बचकर नहीं भागा जा सकता। किसी भी सामाजिक दुष्प्रवृत्ति पर चंद पढ़े-लिखे लोगों द्वारा विचार किया जाना और उसके विरुद्ध कानून बना दिया जाना एक बात है, लेकिन उस कानून के प्रति लोगों में आस्था जगाना, ऐसा वातावरण निर्मित करना जिससे लोग उस कानून का पालन कर सकें और कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध सामाजिक तौर पर सक्रिय हो सकें, एकदम दूसरी बात। अगर एक खाप पंचायत और एक पूर्व मुख्यमंत्री लड़की की शादी बचपन में ही करने की बात करते हैं, तो समझना चाहिए कि सामाजिक स्थिति कितनी गंभीर है। खाप पंचायत यह फरमान भी जारी कर सकती थी कि जो भी व्यक्ति किसी लड़की की इज्जत पर हाथ डालेगा उसे समूचा समाज मिलकर कानून के कटघरे में पहुंचाएगा और जो भी लोग उसका बचाव करेंगे उनका बहिष्कार किया जाएगा। अगर यह फरमान जारी होता तो स्थिति एकदम अलग होती और बेधड़क विचरण करने वाली बलात्कारी मानसिकता भयभीत होती। मगर ऐसा फरमान जारी करने के लिए एक खाप पंचायत का पुरुषवादी सोच से बाहर निकलकर आधुनिकतावादी सोच में दीक्षित होना जरूरी है। यही वह काम है जो हमारा लोकतंत्र साठ-सत्तर वर्षो में भी नहीं कर पाया है। उल्टे सारी चुनावी राजनीति ने, सिर्फ हरियाणा में ही नहीं बल्कि समूचे देश में, वोट की खातिर खाप मानसिकता के आगे सिर झुका दिया है, उससे समझौता कर लिया है। खाप मानसिकता और चुनावी राजनीति के घालमेल ने जो वातावरण तैयार किया है वह उसी तरह से एक बलात्कारी के पक्ष में जाता है, जिस तरह से एक भ्रष्टाचारी के पक्ष में। अगर कोई सर्वाधिक असुरक्षित है तो वह है अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ जीने की चाह रखने वाली औरत और अपनी मेहनत के साथ ईमानदारी से जीने की चाह रखने वाला आदमी। चुनावी राजनीति और खाप मानसिकता के घालमेल ने उस समूची मूल्यव्यवस्था को भी ढहा दिया है जो कभी प्रगतिगामी, अग्रगामी प्रतीत होती थी। अब लगता है जैसे समाज पुन: आदिम युग की ओर लौट चला है, जिसमें नैतिकता नहीं बल्कि पशुबल वर्चस्व स्थापित रहता था। एक बर्बर आदिम समाज ही औरतों, लड़कियों, बच्चियों के नाम यह फरमान जारी करता है कि तुम्हें बलात्कार से बचाने की जिम्मेदारी राज्य की नहीं है, महावीर पंचायत पुरुषों की नहीं है, बल्कि तुम्हारी अपनी है। अगर बलात्कार से बचना है तो खेलने-पढ़ने की उम्र में शादी कर लो, घर से बाहर मत निकलो, मोबाइल हाथ में मत लो और लड़कों से दोस्ती तो हरगिज मत रखो। परदे में रहो और अपने विरुद्ध हो रहे हर अपराध पर पर्दा डालती रहो। सुनो लड़कियों, इस लोकतंत्र की यही नसीहत है तुम्हें।

Rashtirya Sahara National Edition 14-10-2012 PeJ -10 लोकतंत्र

Saturday, October 13, 2012

लोकतंत्र और विकास




लोकतंत्र एक ढीली-ढाली व्यवस्था है, लेकिन इसकी उपलब्धियों के आगे तानाशाहियों का तेज फीका पड़ जाता है। दुनिया के पिछले दो सौ सालों के इतिहास का यह स्पष्ट निर्णय है। पहली नजर में यह बात अजीब सी लगती है कि राजनीतिक दांव-पेंचों की वजह से लस्त-पस्त और लचर हुई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने उपलब्धियों के लगभग हर मानदंड पर तानाशाहियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पूरी दुनिया पर जिस अमेरिका और पश्चिमी यूरोप का वर्चस्व है वहां लोकतंत्र है और विकास का प्रकाश भी है। पिछली शताब्दी में बीच-बीच में कभी जापान, साम्यवादी सोवियत संघ और फासीवादी जर्मनी का दबदबा जरूर बढ़ा, लेकिन इनमें से किसी भी किस्म की तानाशाही अपने देश को स्थायी रूप से समृद्ध नहीं बना सकी। तानाशाहियों के महल एक झटके में ही जमींदोज हो गए। दूसरी ओर जनतांत्रिक देश धीमी गति से ही सही, लेकिन मजबूती के साथ आगे बढ़ते रहे। जागरण फोरम के छठवें कान्क्लेव के विमर्श का विषय यही है। यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में ऐसा क्या है, जो उसे राजतंत्र, धर्मतंत्र, कुलीनतंत्र, सैनिकतंत्र और साम्यवादी अधिनायकतंत्र से हर हिसाब से सफल सिद्ध करता है? इस बहस का एक व्यावहारिक पहलू भी है। लोकतंत्र से कई बार गंभीर नागरिक भी इतने हताश हो जाते हैं कि उनको लोकतंत्र से ही अरुचि पैदा हो जाती है। पहले बुजुर्ग लोग अक्सर कहते मिल जाते थे कि इससे अच्छी तो अंग्रेजों की हुकूमत थी या देश की बुराइयों को दूर करने के लिए सैनिक शासन की जरूरत है। लोकतंत्र की ऐसी ही कुछ कमजोरियों के कारण ऐसे आंदोलनों और संगठनों को भी शक्ति मिलती है जो लोकतंत्र की आजादी का दुरुपयोग करके लोकतंत्र की ही हत्या करना चाहते हैं। यह सही समय है जब हम खतरे की इस घंटी को सुनें और इससे निपटने का रास्ता ढूंढें। सच्चाई यह है कि लोकतंत्र का विकल्प और अधिक लोकतंत्र ही हो सकता है। जागरण फोरम की बहस में यह बात और साफ हो जाएगी। हम देखेंगे कि लोकतंत्र न केवल एक उत्कृष्ट मानवीय व्यवस्था है, बल्कि उससे सर्वागीण और स्थायी विकास भी होता है। जनतंत्र में सर्वागीण और स्थायी विकास इसलिए संभव है, क्योंकि जनतंत्र में ही, बहुत कुछ वोटों की प्रतिद्वंद्वात्मक राजनीति की मजबूरी की वजह से ही सही और बहुत धीमे-धीमे ही सही, लेकिन देर-सबेर हर वंचित वर्ग का सशक्तीकरण होता है। पूरे उत्तर भारत में इसी विवशता में पिछड़ी जातियों का सशक्तीकरण हुआ, हालांकि इस अभियान को कभी गैर-कांग्रेसवाद, कभी लोहियावादी समाजवाद और कभी सामंतवाद-विरोधी कृषक वर्ग के गठबंधन का सैद्धांतिक नाम दिया गया। फिर उत्तर प्रदेश में जनतांत्रीकरण के इसी अभियान के अंतिम दौर में दलित वर्गो का सशक्तीकरण हुआ। देर-सबेर पूरे देश के बचे-खुचे निर्बल वर्गों को स्वतंत्र एवं सशक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा। जनतांत्रीकरण की इसी प्रक्रिया में विकास की कुंजी छिपी हुई है। जब सभी वर्गो का सशक्तीकरण हो जाएगा तो फिर धीरे-धीरे इन सभी वर्गो के विकास का रास्ता भी खुलेगा। शुरू में यह दिख सकता है कि किसी वर्ग का सशक्तीकरण तो हुआ, लेकिन उनका लाभ कुछ प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों तक सिमट गया है और राजनीति में जातिवाद का जहर अलग से घुल गया है। ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता। कुछ समय बाद हर वर्ग और हर क्षेत्र में विकास की मांग उठेगी। पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ऐसा ही हुआ है और अभी तक भारत की राजनीतिक यात्रा भी इसी रास्ते से चली है। जागरण फोरम के इस कान्क्लेव को उत्तर प्रदेश की राजधानी में आयोजित करने का निहितार्थ एकदम साफ है। देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की हैसियत से उत्तर प्रदेश लोकतंत्र और विकास के किसी भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ही रहेगा। अभिजात्य अर्थशास्ति्रयों ने उत्तर प्रदेश को बीमारू और काऊबेल्ट का भाग बनाकर उपहास का पात्र बनाया था, लेकिन आज वे स्वयं इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए गए हैं। पिछली योजनावधि में उत्तर प्रदेश की विकास दर लक्ष्य से ऊपर रही है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था का देश में दूसरा स्थान है। अगर वर्तमान सरकार ने अपने संकल्प को साकार करने की कोशिशें जारी रखीं तो उत्तर प्रदेश को बहुत खामोशी से देश की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था का दर्जा भी मिल सकता है। इस प्रदेश में बहुत ऐसे सकारात्मक तत्व हैं, जिनको अनदेखा किया गया है। विकास के संदर्भ में यह पूरे देश के लिए एक शुभ संकेत होगा। तेज विकास के लक्ष्य को पाने के लिए उत्तर प्रदेश पूरी तरह से सक्षम है। प्रदेश की एक विचित्र शक्ति यह है कि इसके सभी उप-क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान जरूर है, इसके बाद भी पूरे प्रदेश में असाधारण प्रादेशिक समरसता है। पिछले चुनाव में तो खुद सरकारी दल ने प्रदेश के विभाजन को मुद्दा बनाने का प्रयास किया था, लेकिन इसके बाद भी किसी भी क्षेत्र की जनता ने प्रदेश विभाजन की मांग का समर्थन नहीं किया। आश्चर्य का विषय यह है कि उत्तर प्रदेश में कभी भी राष्ट्रीय राजनीति को क्षेत्रीय राजनीति से अलग करके नहीं देखा गया। उत्तर प्रदेश को इस राष्ट्रवादी भावना के कारण नुकसान भी सहना पड़ा। उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक संस्कृति में सर्वागीण विकास के सूत्र छिपे हैं, लेकिन इन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यह प्रदेश स्वतंत्रता मिलने के बाद जमींदारी उन्मूलन के मामले में सबसे आगे रहा है। पूरे देश में यह अकेला प्रदेश है, जहां दलित नेतृत्व के किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला। यहां सांप्रदायिक प्रभाव की बात की जाती है, लेकिन इस पक्ष पर कम ध्यान दिया गया कि प्रदेश के इतिहास में सर्वाधिक मुस्लिम विधायक (68) होने के बाद भी कहीं कोई सांप्रदायिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती है। प्रदेश की जनता ने हर संकट के समय स्वस्थ राजनीतिक संकल्प का परिचय दिया है। 1989, 1991, 1993 और 1996 में अस्थिर विधानसभाओं के अनुभव से सीखकर इसी मतदाता ने पिछले दो बार से एक दल को पूर्ण बहुमत दिया है। इन बातों का आशय यह है कि प्रदेश की जनता में और वर्तमान शासन में राजनीतिक परिपक्वता है। दोनों स्तरों पर विकास की इच्छा दिखती है। उत्तर प्रदेश के विकास से लोकतंत्र और विकास की सैद्धांतिक मान्यता को ठोस व्यवहारिक रूप मिल सकता है। इस संदर्भ में सत्तारूढ़ दल के विकास के विचार की प्रशंसा भी होनी चाहिए। इस विकास का दायरा व्यापक है और इसका चेहरा मानवीय है। इसी समझ के कारण प्रदेश सरकार ने कल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर भी जोर दिया है। प्रदेश को इन कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे। इसके अतिरिक्त शासन को कृषि की उत्पादकता बढ़ाने पर और पूर्वांचल के आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करने पर विशेष जोर देना होगा। सर्वागीण विकास के सपने को साकार करने के लिए आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश मानवीय विकास सूचकांक के कई संकेतकों को सुधारने के लिए विशेष प्रयास करे। उत्तर प्रदेश का विकास भारतीय लोकतंत्र के आधार को अधिक मजबूत बनाएगा। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)
 Dainik Jagran National Edition, 13-10-2012 लोकतंत्र PeJ-8

लोकतंत्र और विकास




लोकतंत्र एक ढीली-ढाली व्यवस्था है, लेकिन इसकी उपलब्धियों के आगे तानाशाहियों का तेज फीका पड़ जाता है। दुनिया के पिछले दो सौ सालों के इतिहास का यह स्पष्ट निर्णय है। पहली नजर में यह बात अजीब सी लगती है कि राजनीतिक दांव-पेंचों की वजह से लस्त-पस्त और लचर हुई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने उपलब्धियों के लगभग हर मानदंड पर तानाशाहियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पूरी दुनिया पर जिस अमेरिका और पश्चिमी यूरोप का वर्चस्व है वहां लोकतंत्र है और विकास का प्रकाश भी है। पिछली शताब्दी में बीच-बीच में कभी जापान, साम्यवादी सोवियत संघ और फासीवादी जर्मनी का दबदबा जरूर बढ़ा, लेकिन इनमें से किसी भी किस्म की तानाशाही अपने देश को स्थायी रूप से समृद्ध नहीं बना सकी। तानाशाहियों के महल एक झटके में ही जमींदोज हो गए। दूसरी ओर जनतांत्रिक देश धीमी गति से ही सही, लेकिन मजबूती के साथ आगे बढ़ते रहे। जागरण फोरम के छठवें कान्क्लेव के विमर्श का विषय यही है। यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में ऐसा क्या है, जो उसे राजतंत्र, धर्मतंत्र, कुलीनतंत्र, सैनिकतंत्र और साम्यवादी अधिनायकतंत्र से हर हिसाब से सफल सिद्ध करता है? इस बहस का एक व्यावहारिक पहलू भी है। लोकतंत्र से कई बार गंभीर नागरिक भी इतने हताश हो जाते हैं कि उनको लोकतंत्र से ही अरुचि पैदा हो जाती है। पहले बुजुर्ग लोग अक्सर कहते मिल जाते थे कि इससे अच्छी तो अंग्रेजों की हुकूमत थी या देश की बुराइयों को दूर करने के लिए सैनिक शासन की जरूरत है। लोकतंत्र की ऐसी ही कुछ कमजोरियों के कारण ऐसे आंदोलनों और संगठनों को भी शक्ति मिलती है जो लोकतंत्र की आजादी का दुरुपयोग करके लोकतंत्र की ही हत्या करना चाहते हैं। यह सही समय है जब हम खतरे की इस घंटी को सुनें और इससे निपटने का रास्ता ढूंढें। सच्चाई यह है कि लोकतंत्र का विकल्प और अधिक लोकतंत्र ही हो सकता है। जागरण फोरम की बहस में यह बात और साफ हो जाएगी। हम देखेंगे कि लोकतंत्र न केवल एक उत्कृष्ट मानवीय व्यवस्था है, बल्कि उससे सर्वागीण और स्थायी विकास भी होता है। जनतंत्र में सर्वागीण और स्थायी विकास इसलिए संभव है, क्योंकि जनतंत्र में ही, बहुत कुछ वोटों की प्रतिद्वंद्वात्मक राजनीति की मजबूरी की वजह से ही सही और बहुत धीमे-धीमे ही सही, लेकिन देर-सबेर हर वंचित वर्ग का सशक्तीकरण होता है। पूरे उत्तर भारत में इसी विवशता में पिछड़ी जातियों का सशक्तीकरण हुआ, हालांकि इस अभियान को कभी गैर-कांग्रेसवाद, कभी लोहियावादी समाजवाद और कभी सामंतवाद-विरोधी कृषक वर्ग के गठबंधन का सैद्धांतिक नाम दिया गया। फिर उत्तर प्रदेश में जनतांत्रीकरण के इसी अभियान के अंतिम दौर में दलित वर्गो का सशक्तीकरण हुआ। देर-सबेर पूरे देश के बचे-खुचे निर्बल वर्गों को स्वतंत्र एवं सशक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा। जनतांत्रीकरण की इसी प्रक्रिया में विकास की कुंजी छिपी हुई है। जब सभी वर्गो का सशक्तीकरण हो जाएगा तो फिर धीरे-धीरे इन सभी वर्गो के विकास का रास्ता भी खुलेगा। शुरू में यह दिख सकता है कि किसी वर्ग का सशक्तीकरण तो हुआ, लेकिन उनका लाभ कुछ प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों तक सिमट गया है और राजनीति में जातिवाद का जहर अलग से घुल गया है। ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकता। कुछ समय बाद हर वर्ग और हर क्षेत्र में विकास की मांग उठेगी। पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ऐसा ही हुआ है और अभी तक भारत की राजनीतिक यात्रा भी इसी रास्ते से चली है। जागरण फोरम के इस कान्क्लेव को उत्तर प्रदेश की राजधानी में आयोजित करने का निहितार्थ एकदम साफ है। देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की हैसियत से उत्तर प्रदेश लोकतंत्र और विकास के किसी भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ही रहेगा। अभिजात्य अर्थशास्ति्रयों ने उत्तर प्रदेश को बीमारू और काऊबेल्ट का भाग बनाकर उपहास का पात्र बनाया था, लेकिन आज वे स्वयं इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए गए हैं। पिछली योजनावधि में उत्तर प्रदेश की विकास दर लक्ष्य से ऊपर रही है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था का देश में दूसरा स्थान है। अगर वर्तमान सरकार ने अपने संकल्प को साकार करने की कोशिशें जारी रखीं तो उत्तर प्रदेश को बहुत खामोशी से देश की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था का दर्जा भी मिल सकता है। इस प्रदेश में बहुत ऐसे सकारात्मक तत्व हैं, जिनको अनदेखा किया गया है। विकास के संदर्भ में यह पूरे देश के लिए एक शुभ संकेत होगा। तेज विकास के लक्ष्य को पाने के लिए उत्तर प्रदेश पूरी तरह से सक्षम है। प्रदेश की एक विचित्र शक्ति यह है कि इसके सभी उप-क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान जरूर है, इसके बाद भी पूरे प्रदेश में असाधारण प्रादेशिक समरसता है। पिछले चुनाव में तो खुद सरकारी दल ने प्रदेश के विभाजन को मुद्दा बनाने का प्रयास किया था, लेकिन इसके बाद भी किसी भी क्षेत्र की जनता ने प्रदेश विभाजन की मांग का समर्थन नहीं किया। आश्चर्य का विषय यह है कि उत्तर प्रदेश में कभी भी राष्ट्रीय राजनीति को क्षेत्रीय राजनीति से अलग करके नहीं देखा गया। उत्तर प्रदेश को इस राष्ट्रवादी भावना के कारण नुकसान भी सहना पड़ा। उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक संस्कृति में सर्वागीण विकास के सूत्र छिपे हैं, लेकिन इन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यह प्रदेश स्वतंत्रता मिलने के बाद जमींदारी उन्मूलन के मामले में सबसे आगे रहा है। पूरे देश में यह अकेला प्रदेश है, जहां दलित नेतृत्व के किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला। यहां सांप्रदायिक प्रभाव की बात की जाती है, लेकिन इस पक्ष पर कम ध्यान दिया गया कि प्रदेश के इतिहास में सर्वाधिक मुस्लिम विधायक (68) होने के बाद भी कहीं कोई सांप्रदायिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती है। प्रदेश की जनता ने हर संकट के समय स्वस्थ राजनीतिक संकल्प का परिचय दिया है। 1989, 1991, 1993 और 1996 में अस्थिर विधानसभाओं के अनुभव से सीखकर इसी मतदाता ने पिछले दो बार से एक दल को पूर्ण बहुमत दिया है। इन बातों का आशय यह है कि प्रदेश की जनता में और वर्तमान शासन में राजनीतिक परिपक्वता है। दोनों स्तरों पर विकास की इच्छा दिखती है। उत्तर प्रदेश के विकास से लोकतंत्र और विकास की सैद्धांतिक मान्यता को ठोस व्यवहारिक रूप मिल सकता है। इस संदर्भ में सत्तारूढ़ दल के विकास के विचार की प्रशंसा भी होनी चाहिए। इस विकास का दायरा व्यापक है और इसका चेहरा मानवीय है। इसी समझ के कारण प्रदेश सरकार ने कल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर भी जोर दिया है। प्रदेश को इन कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे। इसके अतिरिक्त शासन को कृषि की उत्पादकता बढ़ाने पर और पूर्वांचल के आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करने पर विशेष जोर देना होगा। सर्वागीण विकास के सपने को साकार करने के लिए आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश मानवीय विकास सूचकांक के कई संकेतकों को सुधारने के लिए विशेष प्रयास करे। उत्तर प्रदेश का विकास भारतीय लोकतंत्र के आधार को अधिक मजबूत बनाएगा। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)
 Dainik Jagran National Edition, 13-10-2012 लोकतंत्र PeJ-8