पांच हजार साल का जवान देश। सुनने में अटपटा लगता है। लेकिन सचाई यही है। ताजा जनगणना के आंकड़ों के बाद एक बार फिर से यह साफ हो गया है कि नब्बे के दशक से जिस डेमोग्राफिक डिविडेंड की बात हो रही है, वह भारत में परवान चढ़ रहा है। हमारी एक अरब बीस करोड़ की आबादी जवान है और इसके बूढ़े होने का फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है। इसी जवानी की वजह से हमारे देश में अगले 50 साल तक कमाने वाले हाथ, खाने वाले मुंह से काफी ज्यादा रहेंगे। और इसी बड़े वर्किग पॉपुलेशन की वजह से हमारा देश तरक्की करता रहा है। चीन बूढ़ा हो रहा है, अमेरिका बूढ़ा हो रहा है, यूरोप पहले ही बूढ़ा हो चुका है। लेकिन अपने देश में बुढ़ापे का बिल्कुल खतरा नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि बुढ़ापा भी हर इलाके में अलग-अलग समय पर आएगा। केरल में बुढ़ापा आने के कई साल बाद उत्तर प्रदेश और बिहार बूढ़ा होगा। ताजा जनगणना के बाद दूसरी अच्छी खबर यह है कि जिस जनसंख्या बम के फटने की आशंका जताई जा रही थी, वह बिल्कुल निराधार थी। करीब बीस साल पहले यह कहा जा रहा था कि जिस हिसाब से हमारे देश में जनसंख्या बढ़ रही है, उतनी तेजी से संसाधन बढ़ाना लगभग असम्भव है। और बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ी मुसीबत बन जाएगी। लेकिन अच्छी खबर यह है कि जनसंख्या में बढ़ोतरी की रफ्तार में काफी कमी हुई है। पहले जनसंख्या बढ़ने की हमारी सालाना दर 2.5 परसेंट से ज्यादा थी, जो अब घटकर 1.6 परसेंट हो गई है। यह कमी अनुमान से ज्यादा है। इतना ही नहीं कभी 'बीमारू' कहे जाने वाले राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश में भी जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार में काफी कमी आई है। जहां पिछले दशक में उत्तर प्रदेश में जनसंख्या बढ़ने की सालाना दर ढ़ाई परसेंट से भी ज्यादा थी, वह अब घटकर 2 परसेंट रह गई है। उसी तरह बिहार में बढ़ोतरी की दर 2.8 परसेंट से घटकर 2.5 परसेंट हो गई है। मतलब यह है कि गरीब राज्यों के गरीब परिवारों में भी यह चेतना तो निश्चित रूप से जगी है कि छोटा परिवार ही सुखी परिवार होता है। बदलाव की बयार जब वहां बहने लगे जहां बहुत कम लोगों को इसकी उम्मीद होती है, तो समझिए कि बदलाव वाकई दमदार है। यहां खास बात यह कि जहां एक ओर जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर विकास दर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। आजादी के बाद के लगभग चालीस सालों तक आर्थिक विकास दर और जनसंख्या विकास दर करीब-करीब बराबर थे। इसीलिए विकास के बावजूद संसाधन को हम नहीं बढ़ा पा रहे थे। लेकिन पिछले पंद्रह साल में जहां जनसंख्या विकास की दर दो परसेंट से कम रही है, वहीं आर्थिक विकास की दर 7 परसेंट से ज्यादा रही है। इसी वजह से तरक्की अब दिखने लगी है। तरक्की अब बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने में ही खत्म नहीं होती है। अब हम सरप्लस भी बना पा रहे हैं। जनगणना के आंकड़ों में सबसे अच्छी खबर यह है कि पहली बार मिशन साक्षरता में महिलाओं ने बाजी मारी है। पिछले दस साल में हमें 21 करोड़ लोगों को साक्षर बनाने में सफलता मिली है। इसमें 11 करोड़ महिलाएं हैं। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। समाज की ढेर सारी विकृतियों को दूर करने के लिए महिला सशक्तीकरण बेहद जरूरी है। और महिलाओं को शिक्षित बनाना सशक्तीकरण का बेहद अहम हथियार है। पिछले 10 साल में साक्षरता बढ़ाने में हमें जबरदस्त कामयाबी मिली है। 2001 में देश की 64 परसेंट आबादी ही साक्षर थी जो अब बढ़कर 74 परसेंट हो गई है। यानी दस साल में 10 परसेंट की बढ़ोतरी। इसके लिए सरकारी तंत्र शाबासी का हकदार है। इसी दौरान महिलाओं की साक्षरता दर 53 परसेंट से बढ़कर 65 परसेंट हो गई है। जनगणना के आंकड़ों के बाद यह तो साफ हो गया है कि बहुत कुछ अच्छा हो रहा है। लेकिन कुछ पुरानी चिंताएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। देश की कुल आबादी में महिलाओं का अनुपात बढ़ा है। 2001 में जहां 1000 पुरुषों की तुलना में 933 महिलाएं थीं, अब वह अनुपात बढ़कर 940 हो गया है। यह तो हुई अच्छी खबर। लेकिन डराने वाली बात यह है कि बच्चों में बालिकाओं की संख्या में कमी आई है। 2001 में 0 से 6 साल के बच्चों में जहां 1000 लड़कों की तुलना में 927 लड़कियां थीं, अब वह अनुपात घटकर 914 रह गया है। यह एक सच्चाई है कि हर 1000 लड़कियों की तुलना में 1005 लड़के पैदा होते हैं लेकिन विकसित समाज में यह अंतर अपने आप खत्म हो जाता है। लेकिन भारत में लड़कों की चाहत में मां- बाप लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार देते हैं। हाल के दिनों में बच्चों का लिंग जानने वाली तकनीक की पहुंच हर इलाके में बढ़ी है। कहीं इसी वजह से तो लड़कियों की संख्या में कमी नहीं आई है? मेरा मानना है कि बालिकाओं की संख्या में कमी निश्चित रूप से चिंताजनक है। लेकिन सब कुछ बुरा नहीं हो रहा है। जिन राज्यों में बालिकाओं की संख्या बहुत कम थी वहां हालात बदल रहे हैं। हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी हालात बदल रहे हैं। हरियाणा में 2001 में हर 1000 लड़कों के मुकाबले 820 लड़कियां थीं। अब यह संख्या बढ़कर 830 हो गई है। पंजाब में इन दस सालों में यह संख्या 793 से बढ़कर 846 हो गई है। इस तरह के आंकड़े उम्मीद जगाते हैं। इससे पता चलता है कि जिस समाज में महिलाओं की कद्र बिल्कुल नहीं थी, वहां महिलाओं को सम्मान देने के फायदों का अहसास हो रहा है। और यह बहुत अच्छी बात है। सामाजिक विकृतियों को खत्म होने में समय लगता है। पंजाब और हरियाणा में शायद बेटियों के महत्त्व की समझ बढ़ने लगी है। मेरा मानना है कि आर्थिक तरक्की के विकेंद्रीकरण से देश के दूसरे हिस्सों में भी यह बदलाव जल्दी ही शुरू होगा। '
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