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Tuesday, July 10, 2012

ई-बुक्स के बाजार में पिछड़ते हिंदी लेखक


पिछले करीब तीन महीनों से ईएल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानी तीन किताबें- फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं। जेम्स की इन किताबों ने अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इस पर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीविजन अधिकार खरीद रहा है । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के वेबसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सिरीज लिखना शुरू किया। एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ। लोकप्रियता के दबाव और ई-रीडर्स की मांग पर उसे बार-बार लिखने को मजबूर होना पड़ा। इस तरह शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया। पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुनर्लेखन किया और उसे फिर से ई-रीडर्स के लिए पेश कर दिया। पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त वेबसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल बुखार की तरह फैल गई। चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वह बन गई ईएल जेम्स। उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली। इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए। यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर। इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई-बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है। उनकी पहली कोशिश यह होने लगी है कि वह अधीर ऐसे पाठकों की क्षुधा को शांत करें जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है। ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था। जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था। पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था। पुस्तक छपने की प्रक्रिया में भी वक्त लगता था। पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता फिर उसकी दो-तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी। कवर डिजायन होता था। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था। यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता था। पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्म्य बना लेता था। कई बार तो लेखक और पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षो तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वह हाथों हाथ खरीद लेता था, लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली। अब तो ई-लेखन का दौर आ गया है। ई-लेखन और ई-पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है। अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाय सीधा संवाद संभव हो गया है। लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं। ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं। फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं। ईएल जेम्स की सुपरहिट ट्रायोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है। दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है। कह सकते हैं कि वह सब कुछ इंस्टैंट चाहते हैं। उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है। अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़ने वाला यह पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है। इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा है। कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे है, जो कि ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था। जेम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ देखी की जा सकती है। पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानी कुल तेरह किताबें। एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वह तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें। पैटरसन की साल भर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई-पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ है, बल्कि उनकी लोकप्रियता में और इजाफा ही हुआ है, लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं। ई-रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वह भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं। प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वह उतना ही बड़ा स्टार होगा। जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने अपनी तरह एक अलग ही रणनीति भी बनाई हुई है। अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होने वाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई-रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं। जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही उपलब्ध होता है। इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है। जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है। उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वह मालामाल हो जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि कारोबार करने वाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही रहते हैं। मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी-छोटी कहानियां सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में लिखी। उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वह अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्रकाशक के साथ-साथ अब लेखक भी ज्यादा से ज्यादा लिखकर खुद को कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा ही कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है। इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किग साइट्स से परहेज है। उनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी कोई वेबसाइट अभी तक नहीं है। हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं। नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं और वह अपनी धीमी रफ्तार से लेखन करते आ रहे हैं। हालांकि वह रोना यही रोते हैं कि पाठक नहीं हैं। वक्त के साथ अगर नहीं चलेंगे तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा। हिंदी के लेखकों के लिए यह वक्त चेतने का है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, April 25, 2011

लोकतंत्र को शर्मसार करता वाक्या


अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के जश्न और उसके बाद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर आरोपों की बौछार ने पूरे देश में ऐसा माहौल बना दिया जैसे कि वही देश की सबसे बड़ी समस्या हो। इस पूरे विवाद में सीडी के सरताज अमर सिंह की एंट्री ने इस गंभीर मुद्दे को और भी अधिक मनोरंजक बनाने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई। सीडी के शोर के बीच एक ऐसी खबर दबकर रह गई जिसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया और साठ साल से ज्यादा पुराने हमारे गणतंत्र पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। देश में सबसे ज्यादा साक्षर लोगों के प्रदेश के रूप में एक अलग पहचान बना चुका केरल में एक ऐसा वाकया हुआ जो सभ्य समाज के मुंह पर करारा तमाचा है। केरल सरकार में एक वरिष्ठ दलित अधिकारी के रिटायर होने के दिन ही उनके दफ्तर में काम करने वाले लोगों ने पूरे दफ्तर का शुद्धीकरण कर डाला। सूबे के रजिस्ट्री विभाग में इंसपेक्टर जनरल के पद पर काम करने वाले एके रामकृष्णन जब पिछले 31 मार्च को सेवानिवृत्त हुए तो उस दिन उनकी विदाई के बाद उनके ही दफ्तर में काम करने वाले कुछ लोगों ने उनकी कार को पहले पानी से धोया और फिर मंत्रोच्चार के बीच सार्वजनिक रूप से कार का शुद्धीकरण किया गया। बात इतने पर ही नहीं रुकी अगले दिन तो रजिस्ट्रार के दफ्तर के लोगों ने और आगे बढ़कर रामकृष्णन के बैठनेवाले कमरे और उनकी कुर्सी को भी पवित्र पानी में गाय के गोबर को घोलकर उससे साफ किया। पानी में गाय के गोबर को मिलाकर शुद्धीकरण करने की केरल में पुरानी मान्यता है। एक सरकारी दफ्तर में सरेआम इस तरह का वाकया हो और पूरा दफ्तर खामोश रहकर देखता रहे तो इस बात का पता चलता है कि हमारे समाज में जाति व्यवस्था कितने अंदर तक पैठ चुकी है। केरल की राजधानी में यह सब कुछ तब घटित हो रहा था जबकि लगभग एक पखवाड़े बाद सूबे में विधानसभा का चुनाव होने वाला था। अफसोस यह की किसी भी राजनीतिक दल ने इस शर्मनाक वाकये को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। उस कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर कोई जनआंदोलन नहीं छेड़ा और न ही कोई मुहिम चलाई जो अपने आपको महात्मा गांधी की विरासत का वारिस कहते नहीं थकती। उस कांग्रेस पार्टी के नेताओं को भी यह मुद्दा नहीं लगा जिसके केरल के ही नेता और अब केंद्र में मंत्री वायलार रवि के बेटे के विवाह के बाद गुरुवायूर मंदिर को शुद्ध किया गया था। सामाजिक समानता की बात करनेवाली वामपंथी पार्टी जो कि इस वक्त तक केरल में सत्ता में है,उसने भी इस मामले के सामने आने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की। इस मामले में शिकायत मिलने के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने सरकार के राजस्व विभाग से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है। रिपोर्ट आने के बाद क्या कोई कार्रवाई हो पाएगी इस सवाल का जबाव तो अभी समय के गर्भ में ही है। एक जमाने में केरल के समाज में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता समाज में गहरे तक धंसा था। स्वामी विवेकानंद ने केरल के समाज में भेदभाव की उस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी और महात्मा गांधी ने भी केरल के मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह चलाए थे। केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूर मंदिर में भी दलितों और गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय तक जनआंदोलन चला था, लेकिन तमाम आंदलनों और समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार ने भी इस सामजिक बुराई को कम किया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि दलितों के साथ भेदभाव सिर्फ केरल में ही हो रहा है। चंद साल पहले उत्तर प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाए थे कि उनके दफ्तर के सहयोगी ने उनके बैठने की जगह का शुद्धीकरण किया था। उस मामले में भी शिकायत हुई थी लेकिन क्या कार्रवाई हुई यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। इससे समझा जा सकता है कि इस तरह के मामलों पर सरकार भी खुद को मजबूर पाती है और ऐसे लोगों के खिलाफ किसी तरह के कदम उठाने से बचना ही ज्यादा बेहतर उपाय मानती है। केरल के अलावा हिमाचल प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अब भी एक बोर्ड ने सार्वजनिक तौर पर मंदिर के बाहर टांग रखा है कि लंगर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है। आखिर यह किस तरह के समाज की तस्वीर है जहां उसके ही लोगों का प्रवेश किसी धार्मिक विशेष स्थान में वर्जित है। देश की आजादी के चौंसठ साल बाद भी सार्वजनिक रूप से इस तरह के बोर्ड मंदिरों में लगे हुए हैं और प्रशासन इनकी तरफ से आंखें मूंदे सो रहा है अथवा निष्कि्रय बना हुआ है। साफ है कि हमारी सरकारों को इसकी ज्यादा फिक्र नहीं है। इससे तो यही प्रतीत होता है कि सरकार की मूक सहमति इस तरह की मान्यताओं के पक्ष में है या फिर वो इस तरह की सामाजिक कुरीतियों को हटाने के प्रति उदासीन है। मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलेगा, मंदिर के गर्भ गृह में महिलाओं को भी प्रवेश नहीं मिलेगा, लेकिन हम प्रगतिशील समाज हैं और हम आधुनिक हैं। इस तरह के दकियानूसी और घटिया विचार के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। आज हमारा देश विश्व में सुपर पॉवर बनने का सपना देख रहा है। विश्व में हम सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का ख्बाब देख रहे हैं, लेकिन समाज में इन विसंगतियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा आंदोलन किया जा रहा है। तथाकथित सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे और सरकार के आला मंत्री भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बनाने में जुटे हैं। कांग्रेस के हाईप्रोफाइल नेता दिग्विजय सिंह लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं, लेकिन किसी के पास यह सोचने की फुरसत नहीं है कि समाज के निचले पायदान पर जीवन जी रहे लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और वो किस तरह जहालत और अपमानजनक जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं। दलितों के घर में रात बिताने और उनके हाथ का खाना खाने वाले कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी को भी देश में दलितों के उत्थान की चिंता हो सकती है, लेकिन उनकी तरफ से दलितों के उत्थान के लिए कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। क्या दलितों के घर में खाना भर खा लेने या उनके घर में रात बिता लेने से समाज में उनको मान्यता या फिर बराबरी का हक मिल पाएगा? दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ कड़े कानून भर बना देने से उनका हित हो जाएगा या फिर उन पर अत्याचार रुक जाएंगे यह सोचना भी गलत है। कानून को सख्ती से लागू करना और समाज में उसका भय होना जरूरी है और यह तभी हो पाएगा जब ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई होगी और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलेगी। समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जारी यह जंग जायज है। इस मुहिम को हर तरह का और हर तबके का समर्थन मिलना चाहिए, लेकिन देश में भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या अब भी दलितों की समाज में दयनीय स्थिति है। इस दिशा में देश के कर्ताधर्ताओं के साथ-साथ सिविल सोसाइटी को भी विचार करना होगा। गांधीजी ने अप्रैल 1921 में अहमदाबाद में सप्रेस्ड क्लास कांफ्रेंस के अपने भाषण में कहा था-जब तक देश का हिंदू समाज छूआछूत को अपने धर्म का हिस्सा मानता रहेगा और जब तक हिंदू समाज अपने समाज के साथ रहने वाले कुछ लोगों को छूना पाप समझता रहेगा तब तक स्वराज हासिल करना मुमकिन नहीं है। गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी बड़ी लड़ाई लड़ लें और उसमें चाहे हमें कितनी भी बड़ी सफलता हासिल हो जाए, लेकिन जब तक हमारे समाज में केरल जैसी घटनाएं घटती रहेंगी, तब तक हमारी जीत का कोई मतलब नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)