Thursday, December 23, 2010

घोटालों का गणतंत्र

लेखक  राजनीतिक और आर्थिक तंत्र में भ्रष्टाचार की स्थापना को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे है…..

भारत राष्ट्रीय सुरक्षा की अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। किंतु इनमें से केवल एक- राजनीतिक भ्रष्टाचार ने भारतीय राष्ट्र के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। आज राष्ट्र वास्तव में बड़े घोटालों के गणतंत्र में तब्दील हो चुका है। व्यक्तिगत लाभ के लिए सरकारी पदों के दुरुपयोग का घुन राष्ट्र की शक्ति को खोखला कर रहा है। जब हथियारों की खरीद से लेकर नीतिगत बदलाव जैसे महत्वपूर्ण फैसले अकसर भ्रष्ट निहितार्थो से प्रभावित होते हैं, तब राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर आज भारत को एक शिथिल राष्ट्र के तौर पर देखा जा रहा है, तो इसके लिए प्रमुख रूप से दोषी भ्रष्टाचार है। भारत की इस ढिलाई से उन लोगों की बांछें खिल गई हैं जो इसकी सुरक्षा पर निशाना साधना चाहते हैं। एक पुरानी कहावत, सड़ी मछली का सिर नीचा से भारत की हालत जाहिर हो जाती है। यानी सिर उसी का झुकता है जिसका शरीर स्वस्थ नहीं होता। वास्तव में सरकार के तमाम अंगों में प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार का पहिया खुद-ब-खुद घूमता रहता है। यह भारत की आंतरिक सुरक्षा की कमजोर कड़ी बन गया है। जैसा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने पिछले साल कहा था कि मुंबई धमाकों को अधिक घातक बनाने के लिए जो प्लास्टिक के विस्फोटक इस्तेमाल किए गए थे, देश में उनकी तस्करी स्थानीय भ्रष्ट प्रशासन के कारण संभव हो सकी थी। किंतु जो तत्व भारतीय गणतंत्र को जर्जर बना रहा है वह है उच्च पदों पर संस्थागत भ्रष्टाचार। जब घरेलू नीति भ्रष्टाचार से गंभीर रूप से संक्रमित हो तो विदेश नीति दमदार हो ही नहीं सकती। विडंबना है कि आर्थिक उदारीकरण ने व्यक्तिगत लोभ को बढ़ाया है और इसकी वजह से समाज में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार फैला है। यहां तक कि विभिन्न परियोजनाओं को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मंजूरी प्रदान न करने से पुराने जमाने के लाइसेंस राज की याद ताजा हो जाती है। अब भारत में भ्रष्टाचार राष्ट्रीय लूट में बदल चुका है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत संस्थागत रूप से दुर्बल होता जा रहा है। यहां इतने घोटाले होने लगे हैं कि लोगों का गुस्सा कुछ ही समय में ठंडा पड़ जाता है। वास्तव में, किसी बड़े घोटाले के खुलासे के बाद लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए इसके बाद के छोटे घोटाले को उछाला जाता है। भ्रष्टाचार के घोटाले अब तो जैसे टीवी धारावाहिक बन गए हैं। उतने ही दिलचस्प और नाटकीय। जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार घोटाले की जांच प्रक्रिया की बात आगे बढ़ा देती है। इसमें सुनिश्चित किया जाता है कि घोटाले से लाभ उठाने वाले बच निकलें और लूट की रकम भी वसूल न हो पाए। किसी भुलावे में न रहें। मॉरिशस जैसे सुरक्षित आश्रयों से अंतरराष्ट्रीय वित्त का देश में प्रवाह साफ-साफ आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आना चाहिए। जब आर्थिक अनुबंधों पर हस्ताक्षर होते हैं या फिर नीतिगत फैसले लिए जाते हैं तो घूसखोरी के कारण राष्ट्रीय हितों पर कुठाराघात से परहेज नहीं किया जाता। भारत उन देशों में शीर्ष पर है जिनकी राष्ट्रीय संपदा चुराकर स्विस बैंकों में जमा की जा रही है। फिर भी, किसी भी भारतीय राजनेता को देश के खिलाफ जंग छेड़ने के आरोप में फांसी पर नहीं लटकाया गया है। भारत दो प्रकार के आतंक का हमला झेल रहा है। ये हैं जिहादी और इसके खुद के राजनेता द्वारा की जा रही राष्ट्रीय धन के साथ लूट-खसोट। भ्रष्टाचार की संस्कृति का घातक प्रभाव राष्ट्रीय क्षमताओं में Oास से परिलक्षित होता है। भारत की आर्थिक गतिशीलता की जड़ें निजी क्षेत्र के नेतृत्व में होने वाले विकास में हैं। किंतु चीन के विपरीत, भारत में जिस भी क्षेत्र में सरकार भागीदार है, वहां प्रदर्शन बहुत खराब है। राष्ट्र की अधोगति भारत को अपने हित सुरक्षित रखने में सबसे बड़ी बाधा है। इसी कारण राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नेपथ्य में चला जाता है। आज, आत्मप्रशंसित अतुल्य भारत की कोई सुनियोजित राष्ट्रीय सुरक्षा नीति या सुपरिभाषित रक्षा नीति, या फिर घोषित आतंक विरोधी सिद्धांत नहीं है। भारत विश्व की एकमात्र ऐसी बड़ी शक्ति है, जो मूलभूत रक्षा जरूरतों के लिए अन्य शक्तियों पर निर्भर है। उच्च श्रेणी के सामरिक पहुंच वाले हथियारों व अन्य सुविधाओं का निर्माण करने के बजाए भारत ने हथियार जुटाने के लिए पैसे लुटाने का रास्ता अपनाया हुआ है। परिणामस्वरूप, पिछले दशक में भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियारों का आयातक देश बन गया है, जबकि युद्ध में निर्णायक जीत हासिल करने की इसकी क्षमता धीरे-धीरे खत्म हो रही है। क्या कोई अन्य देश भारत से अधिक अतुल्य हो सकता है! भारत की सुरक्षा अनंत घोटालों में तब्दील हो गई है। यहां तक कि नियंत्रक और महालेखापरीक्षक द्वारा हथियारों की खरीद के तरीके पर उंगली उठाए जाने के बाद भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। इस प्रकार के आयात अकसर खुली निविदा और पारदर्शिता के बिना ही होते हैं। यह राजनीतिक भ्रष्टाचार का प्रमुख श्चोत है। भारत ने सिद्ध कर दिया है कि जितना भ्रष्ट तंत्र होगा, उतने ही शक्तिशाली भ्रष्टाचार करने वाले तत्व होंगे। एक भ्रष्ट व्यवस्था इसमें शामिल होने वालों को तेजी से भ्रष्ट बना देती है। इस प्रकार के भ्रष्टाचार से सरकारी या राजनीतिक दलों के स्तर से नहीं निपटा जा सकता। आखिरकार, भ्रष्टाचार का बड़ा हिस्सा राजनेताओं की जेबों में ही पहुंचता है और उनके लोभ को और भड़का देता है। अन्य राष्ट्रीय चुनौतियों की तरह भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण कुशल नेतृत्व और सुशासन का लोप है। ईमानदार नेतृत्व को प्रोत्साहन, शासन में सुधार, राजकोषीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उपाय, रिश्वतखोरी के खिलाफ तंत्र की मजबूती, सरकार की जवाबदेही और जनता के सक्रिय योगदान से ही भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकती है। राजनीति और व्यापार में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए स्वतंत्र जांच एजेंसियों का गठन अनिवार्य शर्त है। भारत में ये एजेंसियां ऐसे लोगों द्वारा नियंत्रित हैं, जिनमें से अधिकांश खुद भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद आज महामारी का रूप ले चुके हैं। ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के बाद भी भारत में साम्राज्यवादी सिद्धांतों पर आधारित घरेलू राजनीतिक वर्ग विकसित हुआ है, जो अब भी साम्राज्यवादी तौर-तरीकों से संचालित हो रहा है। शोषण और लूट-खसोट से मुक्ति पाने के लिए भारत को स्वतंत्रता के दूसरे संघर्ष से गुजरना होगा। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Wednesday, December 22, 2010

उत्तर प्रदेश में ब्लाक प्रमुख चुनाव

लखनऊ जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव की तरह से यूपी में क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष यानी ब्लाक प्रमुख चुनाव में भी सत्तारुढ़ दल समर्थित उम्मीदवारों के सामने विरोधी दलों के प्रत्याशी पस्त हो गए हैं। उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने के लिए हर संभव जतन किए जा रहे हैं। अनेक स्थानों पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस भी सहयोग दे रही है। नतीजा यह है कि कुल 821 ब्लाकों में से करीब 308 पर ब्लाक प्रमुख निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इनमें ज्यादातर बसपा विधायकों, मंत्रियों, सासंदों आदि के परिजन हैं। शेष ब्लाकों पर बुधवार को मतदान भी है और मतगणना भी। सत्ताधारी दल समर्थित दबंग उम्मीदवारों से प्रताडि़त हो रहे विरोधी प्रत्याशियों की ओर से की जा रही शिकायतों से आजिज आकर जहां चुनाव आयोग ने सख्ती दिखाई है वहीं उच्च न्यायालय ने भी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि आयोग की मांग पर मतदान केंद्रों पर केंद्रीय व अर्धसैनिक बलों की तैनाती की जाए। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से भी कहा है कि वह प्रेक्षकों की नियुक्ति करे। चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद गैर बसपा दलों के सैकड़ों उम्मीदवार ब्लाक प्रमुख का चुनाव लड़ने में सफल नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें नामांकन ही नहीं करने दिया गया। कई जगह बीडीसी सदस्यों का अपहरण भी किया गया। विरोधी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सत्ता समर्थित उम्मीदवारों ने हर किस्म के हथकंडे अपनाए हैं। शाहजहांपुर जिले के ददरौल ब्लाक में पिछड़ा वर्ग कल्याणमंत्री अवधेश वर्मा के समर्थकों ने सरेआम तीन लोगों को उस समय उठा लिया जब वे अपने नेता का नामांकन कराने जा रहे थे। आयोग ने यहां का चुनाव रोक दिया है। आयोग ने हरदोई और बलिया में मंडलायुक्तों की मौजूदगी में चुनाव कराने का निर्देश दिया है। सीतापुर में बसपा सांसद कैसर जहां व उनके विधायक पति जासमीर अंसारी के खिलाफ उम्मीदवार तथा मतदाताओं को धमकाने की शिकायत का संज्ञान में लेते हुए खैराबाद ब्लाक का चुनाव पर्यवेक्षक की मौजूदगी में पीएसी की सुरक्षा में कराने का आदेश दिया है। बुलंदशहर जिले के एक ब्लाक का चुनाव भी स्थगित कर दिया है। आयोग में करीब 278 शिकायतें दर्ज हुई हैं। आरोपियों में अधिकारी, विधायक व मंत्री भी शामिल हैं। जिलाधिकारियों की रपटों पर निर्भर आयोग की सख्ती हर कहीं काम नहीं आ रही है। उन्नाव के पुरवा ब्लाक में नामांकन पत्र भरने जा रहे गोवर्धन पटेल को परिजनों समेत पीटा गया। पुलिस ने मदद करने के बजाय उन्हें एक बसपा नेता के हवाले कर दिया। जब चुनाव आयोग से शिकायत हुई तो जिला प्रशासन ने यह विचित्र रिपोर्ट दी कि गोवर्धन को उन लोगों ने पीटा जो उसे उसकी मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती चुनाव लड़ाना चाहते थे। यह दंबगई का ही असर है कि कई जिलों में ब्लाक प्रमुख चुनाव की नौबत नहीं आई। सहारनपुर की 11 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ। 10 सीटों पर सत्ता पक्ष के अलावा किसी अन्य ने पर्चा नहीं भरा। एक सीट बाकी थी, उस पर भी मंगलवार को नाम वापस ले लिया गया।

Saturday, December 18, 2010

लोकतंत्र की लीक

भारत से अमेरिका तक लीक की महिमा फैली हुई है। वाटरगेट के टेपों से पता चला था कि चुनाव में अपनी उम्मीदवारी को मजबूत और विरोधी दल की उम्मीदवारी को कमजोर करने के लिए क्या-क्या करामात की जा सकती है। जब ये रहस्योद्घाटन हुए, तब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने कहा था, मैं घपलेबाज नहीं हूं। हालांकि लीक हुए कागजों ने साबित किया कि उन्होंने घपलेबाजी की थी। वह थे तो निर्लज्ज ही पर हमारे नेताओं जितना नहीं इसलिए आखिर में उन्होंने इस्तीफा दे ही दिया। हमारे एक नेता ने कहा था कि मैं जान दे दूंगा पर इस्तीफा नहीं दूंगा। जनतंत्र नैतिकता की लीक पर चलने का नाम है। इस लीक से हटकर कोई भी लोकतंत्र नहीं चल सकता। इसकी कोशिश की जाएगी तो लीक पर लीक होंगे। जिस देश में जितने ज्यादा लीक होते हैं, वहां का लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होता चलता है। क्या यह खेद की बात नहीं है कि अमेरिका में दूसरा वाटरगेट नहीं हुआ? क्या चुनाव प्रक्रिया को भ्रष्ट करने में निक्सन को कोई खास महारत हासिल थी और उनके बाद के दूसरे उम्मीदवार पाक-साफ रहे? अगर ऐसा लगता है तो इसका मतलब है कि निक्सन के उत्तराधिकारी अपने-अपने वाटरगेट से बचे रहे। अब तो ऐसा लगता है कि हर नेता और हर मंत्री के साथ कम से कम एक वाटरगेट होना ही चाहिए। सच बाहर आने के लिए कसमसाता रहता है। बस उसे सेंधमार चाहिए जो उसे गोपनीयता के कंटीले तारों से मुक्त कर सके। भारत सरकार बहुत उदार और सहिष्णु है। नीरा राडिया के सनसनीखेज टेप सामने आए तो वह न शरमाई न घबराई। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह में यह एक बड़ी समानता है। राव भी किसी रहस्योद्घाटन से न शरमाते थे न घबराते थे। उनका मौन बड़ी से बड़ी घटना से भी नहीं टूटता था। मनमोहन सिंह ने भी वैसी ही स्थितिप्रज्ञता साधी हुई है। उन्हें इस बात पर भी गुस्सा नहीं आया कि नाडिया की बातचीत वाले टेप लीक कैसे हुए? हर स्त्री-पुरुष की तरह हर सरकार भी अपनी गोपनीयता को बचाए रखना चाहती है। यह गोपनीयता भंग होती है तो वह दुर्वासा की तरह क्रुद्ध हो उठती है, लेकिन भारत सरकार खामोश रही। अंत में, उद्योगपति रतन टाटा को अदालत में पेश होकर यह दरख्वास्त करनी पड़ी कि इस लीक कांड की जांच की जाए। सरकार को अपनी इज्जत की परवाह नहीं है, लेकिन रतन टाटा को अपनी इज्जत की फिक्र है। मजेदार बात यह है कि उन्होंने इन टेपों की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी है। कुछ पत्रकारों ने जरूर कहा है कि उनकी बातचीत को संदर्भ से काट कर पेश किया गया है, लेकिन इन्होंने भी अपने शब्दों को झुठलाया नहीं है। वह सिर्फ यह निवेदन कर रहे हैं कि इन शब्दों का अर्थ वह नहीं है जो और लोग समझ रहे हैं। ऐसे लगता है कि जिनकी बातचीत टेप हो जाती है, उनके लिए एक अलग शब्दकोश बनाना होगा। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार दुनिया भर में अनोखी है। उसे शर्म नहीं आती, सिर्फ गुस्सा आता है। टेपों से जो सूचनाएं सामने आई हैं उनकी प्रामाणिकता के बारे में एक क्षण के लिए फिर भी संदेह हो सकता है, पर विकिलीक्स ने अपने वेबसाइट पर जो दस्तावेज लीक किए हैं, उनकी सत्यता के बारे में किसी को शक नहीं है। क्या इसीलिए अमेरिकी सरकार बौखलाई हुई है और किसी भी कीमत पर अपने तथाकथित लोकतंत्र की कीमत पर भी विकीलीक्स के संचालक जूलियन असांगे को जेल में देखना चाहती है? यह उसका दबंगपन है। वैसा ही दबंगपन, जैसा उसने पहले वियतनाम में दिखलाया था बाद में इराक और इफगानिस्तान में। मुन्ना बदनाम हो चुका है पर वह इस बदनामी को धोने के लिए यह प्रतिज्ञा तक नहीं करना चाहता कि अब मैं शरीफों की तरह आचरण करुंगा। भारत सरकार खुद को शरीफ नहीं मानती। वह जानती है कि उसके मंत्री भ्रष्ट हैं, उसके नौकरशाह बेईमान हैं। दरअसल, इन्हीं के बल पर हमारी सरकारें चल रही हैं, सभी राजनीतिक दल चल रहे हैं लगभग पूरा उच्च और उच्च-मध्य वर्ग चल रहा है। इसलिए जब भी भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने आता है तो जनता के सिवाय कोई भी विचलित नहीं होता। जिस औरत के साथ रोज दो-चार बलात्कार होते हैं वह किसी भी नए बलात्कार से विचलित होना छोड़ देती है। यह नहीं कह सकते कि वह बलात्कार की आदी हो चुकी है। सच यह है कि वह पूरी तरह निराश हो चुकी है। जब उसके रखवाले ही बलात्कारी हों, तब वह किससे फरियाद करे? भारत में टाटा और उनको छोड़ कर जिनकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई है, राडिया से बातचीत लीक हो जाने से किसी को अप्रन्नता नहीं है। सब ताली बजा रहे हैं। पर अमेरिका में अनेक महानुभाव चिंतित हैं कि सरकार के गोपनीय दस्तावेज लीक होते रहें तो शासन कैसे चलेगा? खुशी की बात यह है कि पूरा अमेरिका इससे सहमत नहीं है। यह वही वर्ग है जो अमेरिकी सरकार की लोकतंत्र-विरोधी गतिविधियों से आहत है और अपने समाज को निरोग देखना चाहता है। हम सभी को इनसे सहमत होना चाहिए। यह समझना कठिन है कि लोकतांत्रिक सरकारों को इतनी गोपनीयता की जरूरत क्यों पड़ती है। सुरक्षा मामलों को छोड़कर कोई ऐसा काम नहीं होना चाहिए जिसके बारे में जनता को बताया नहीं जा सके। अगर आप लीक पर चलेंगे, तो ऐसा कुछ होगा ही नहीं जिसके लीक हो जाने का डर हो।
 

Tuesday, December 7, 2010

जाति-मजहब की राजनीति को तमाचा

उमेश चतुर्वेदी 
पहले गुजरात के स्थानीय निकाय और हाल के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक ऐसा संदेश भी दिया है, जिस पर कम ही राजनीतिक विश्लेषकों की निगाह जा रही है। अब तक मुस्लिम वोटरों को ऐसा थोक वोट बैंक माना जाता रहा है, जो बहुसंख्यक वोटों के बरक्स कहीं ज्यादा भरोसेमंद रहा है। उसके बारे में यह भी अवधारणा रही है कि पंथनिरपेक्ष पार्टियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करने वाली पार्टियों के लिए ही मतदान करता रहा है, लेकिन गुजरात और बिहार चुनाव के नतीजे इस अवधारणा को बदलते हुए प्रतीत हो रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को ऐसी पार्टी माना जाता रहा है, जिसे मुस्लिम वोटरों का समर्थन नहीं मिल सकता। सांप्रदायिकता के समर्थन और विरोध के आधार पर आगे बढ़ रही मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में इस तथ्य को अब तक स्वीकार्य माना जाता रहा है, लेकिन बिहार के चुनावों ने अब साबित कर दिया है कि मौजूदा राजनीति शास्त्र के इस सिद्धांत की पड़ताल करने और मुस्लिम मतदाताओं के बदलते नजरिए को नए सिरे से देखने का वक्त आ गया है। हालांकि अब तक के पैमाने के मुताबिक जो पंथनिरपेक्ष ताकतें हैं, उनके लिए इस तथ्य को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। कठिनाई तो उस भारतीय जनता पार्टी को भी होगी, जिसके नाम के साथ ही हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विशेषण सदा के लिए चस्पा हो चुका है। राजनीतिशास्ति्रयों की नजर में अल्पसंख्यक समुदाय हमेशा बहुसंख्यक समाज को सशंकित नजरिए से देखता है। लिहाजा लोकतांत्रिक समाज में वह बहुसंख्यक समुदाय की तुलना में एक ऐसे थोक वोट बैंक की तरह व्यवहार करता है, जहां बहुसंख्यकों के बरक्स उसकी जाति-उपजाति और वर्ग का अस्तित्व मायने नहीं रखता। आजादी के पहले से ही भारतीय मुस्लिम समुदाय को इसी नजरिए से देखा जाता रहा है और इसी आधार पर हर चुनाव के ऐन पहले उनके रुझान पर खास ध्यान दिया जाता रहा है। चुनाव विश्लेषक इसी आधार पर भावी वोटिंग रुझानों और उसके नतीजों की गणना करते रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों की चुनावी रणनीति बनाने में भी यह भावी रुझान ही आधार बनता रहा है, लेकिन गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों और बिहार चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों की भारी जीत ने चुनावी विश्लेषण की अब तक की परिपाटी को बदलने की दिशा में कदम उठा दिया है। अब तक यह माना जाता रहा है कि भारतीय मुसलमान पंथनिरपेक्षता का दावा करने वाली उसी पार्टी को वोट देते हैं, जिन्हें वह भारतीय जनता पार्टी को हराने के काबिल मानते हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और बिहार में लालू यादव की हैसियत भाजपा को शिकस्त देने वाले की ही रही है। इस आधार पर अगर लालू यादव एक बार फिर खुद की पार्टी के बहुमत का दावा कर रहे थे तो इसमें उनकी गलती नहीं थी। बिहार में 16.5 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, लेकिन इसी तरह करीब 11 प्रतिशत यादव वोटर हैं। कुल मिलाकर उन्हें इन वोटरों का समर्थन मिलता रहा है। यह वोट बैंक ही तीस प्रतिशत बनता है। फिर लालू प्रसाद यादव की छवि पंथनिरपेक्षता के अलंबरदार की रही है। पिछड़ी जातियों में भी उनका मजबूत आधार माना जाता रहा है। इस आधार पर तो उनकी घोषणा में कोई गलती नहीं मानी जा सकती, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजों ने लालू की इस उम्मीद पर तुषारापात किया है। बिहार में चुनाव अभियान शुरू होने से पहले कट्टर छवि वाले बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के प्रचार में शामिल करने पर नीतीश कुमार ने एतराज जताया था। नीतीश कुमार को डर था कि इन दोनों नेताओं के आने से बिहार के मुस्लिम वोटर उनका साथ छोड़ जाएंगे। बीजेपी ने उनका ख्याल रखते हुए मोदी और वरुण को बिहार नहीं भेजा। इस आधार पर नीतीश के ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी जीतने चाहिए थे, लेकिन हुआ ठीक उलटा है। बीजेपी को मिली 91 सीटों में से 30 सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों से ही आई हैं, जबकि जेडीयू के सिर्फ 12 विधायक ही मुस्लिम बहुल इलाकों से चुने गए हैं। बहरहाल, इन सभी 42 सीटों में मुस्लिम वोटरों की तादाद कहीं भी 20 फीसदी से कम नहीं है। पूर्णिया के जिस अमौर से बीजेपी के सबा जफर ने बाजी मारी है, वहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 75 फीसदी है। पूर्णिया के ही बसई में मुस्लिम वोटरों की तादाद करीब 69 फीसदी है। कायदे से यहां से आरजेडी या कांग्रेस का प्रत्याशी जीतना चाहिए था, लेकिन बाजी बीजेपी के संतोष कुमार के हाथ लगी है। इसी तरह कटिहार के प्राणपुर से बीजेपी के विनोद सिंह और कदवा से भोला राय विधायक बने हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद 50 फीसदी से ज्यादा है। बीते सितंबर में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बरसों से चली आ रही मान्यता गुजरात में भी ढह गई। आजादी के बाद से ही खेड़ा जिले की यह विधानसभा सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती रही है। करीब पचास फीसदी मुस्लिम वोटरों वाली इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अलावा दूसरे किसी दल की जीत की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी, बीजेपी के लिए यहां सफलता पाना दूर की कौड़ी ही माना जाता था। मुस्लिम विरोधी और सांप्रदायिकता का राजनीतिक कलंक ढोती रही बीजेपी ने जब सितंबर में इस सीट को 24 हजार के भारी अंतर से जीत लिया तो पहली बार माना जाने लगा कि बीजेपी को लेकर मुसलमानो का नजरिया बदलने लगा है। इस जीत से उत्साहित नरेंद्र मोदी ने यह ऐलान करने में देर नहीं लगाई कि 65 फीसदी मुस्लिम वोटरों के सहयोग के बिना बीजेपी की यह जीत नहीं हो सकती थी, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे सिर्फ उपचुनाव का तात्कालिक उबाल माना गया। हालांकि इसके ठीक एक महीने बाद हुए स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी ने 24 जिला पंचायतों में से 21 और 208 तालुका पंचायतों में से 162 को भारी बहुमत से जीत लिया। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का 53 नगरपालिकाओं में से 41 पर कब्जा हो गया। इसके पहले अक्टूबर में ही हुए चुनाव में बीजेपी ने अहमदाबाद, बड़ोदरा, राजकोट, सूरत, जामनगर और भावनगर नगर निगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा। इन चुनाव नतीजों से साफ है कि भाजपा को लेकर मुस्लिम वोटरों के मन में रही गांठ टूट रही है। यह गांठ का टूटना ही है कि मुस्लिम वोट बैंक ऐसा थोक वोट बैंक नहीं रहा, जो बहुसंख्यक वोटरों के सांप्रदायिकता की डर में जाति-वर्ग भुलाकर सिर्फ मुस्लिम के तौर पर वोट डालते रहे हैं। बिहार के विधानसभा चुनाव ने इसी अवधारणा को आगे बढ़ाने में मदद दी है। भाजपा और उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम विरोधी संगठन ही माना जाता रहा है। उसके सहयोगी संगठनों का आक्रामक रवैया इस अवधारणा को पुष्ट करने का आधार भी मुहैया कराता रहा है। हालांकि केंद्र में 1998 में सरकार बनाने के बाद भाजपा को अपने कट्टर रवैये में बदलाव लाना पड़ा, लेकिन उसकी तमाम उदार कोशिशें भी कम से कम बौद्धिक जगत में बीजेपी को लेकर जारी पारंपरिक अवधारणा को तोड़ने में कामयाब नहीं हो पाई। यही वजह रही कि भाजपा के कट्टर विरोधी लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस मुस्लिम वोटरों के सहज विकल्प माने जाते रहे, लेकिन हाल के इन दो चुनावों ने इस अवधारणा को तोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। अगर यही ट्रेंड चलता रहा तो आने वाले दिनों में कांग्रेस को ही नहीं, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। भाजपा को जहां और ज्यादा उदार चेहरा अख्तियार करना पड़ सकता है तो वहीं कांग्रेस-लालू को मुस्लिम वोटरों पर अपने एकाधिकार को तिलांजलि देनी पड़ सकती है। इससे भारतीय राजनीति और मतदान प्रक्ति्रया में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। भले ही इसका नुकसान और फायदा दोनों ही तरफ के दलों को उठाना पड़ सकता है। भारतीय लोकतंत्र की सफलता एक ऐसे वोटर के अस्तित्व को स्थापित करना है, जो अपने विवेक के आधार पर अपना वोट दे, जाति-वर्ग और दूसरे तरह के पूर्वाग्रहों को अपने मतदान के दौरान हावी न होने दे। अगर इस दिशा में भारतीय मुसलमान भी बढ़ा तो निश्चित समझिए, सबसे ज्यादा फायदा भारतीय लोकतंत्र का ही होगा।