अन्ना हजारे सहित नागरिक समाज के उन पांचों सदस्यों ने अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा कर दी है जो लोकपाल बिल के गठन के लिए बनी समिति के सदस्य हैं। सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के समर्थक हजारे और उनके साथियों का यह कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गये आंदोलन के अनुरूप है जिसे देश में प्रशंसनीय नजरों से देखा जाएगा। हालांकि, यह घोषणा उन लोगों को शायद ही संतुष्ट कर पाएगी जो आंदोलन के समय से ही हजारे के पीछे पड़ हुए हैं और तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगा कर भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी पहल की धार कुंद करने की हरसंभव कोशिशें कर रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास प्रयासों की हजारे ने तारीफ की तो उन पर साम्प्रदायिक होने का आरोप मढ़ दिया गया। आरोप लगाने वालों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जिक्र तक नहीं किया जिनकी भी तारीफ हजारे ने साथ साथ इसी सिलसिले में की थी। हजारे ने चुनाव व्यवस्था में सुधारों की बात करते हुए जब यह जिक्र छेड़ा कि कैसे वोटरों को शराब और पैसों की रिश्वत बांटकर राजनीतिक पार्टियां जीत का इंतजाम करती हैं तो उन्हें लोकतंत्र का खलनायक बताया जाने लगा। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के मौके पर जब राज्य से साठ करोड़ रुपए से अधिक की नकदी और सामान बरामद किए गए हैं जो मतदाताओं को रिश्वत में बांटे जाने थे, तब आरोप लगाने वालों ने चुप्पी साध ली है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कृष्णमूर्ति भी मानते हैं कि वोटरों को रिश्वत से बरगलाने की इतनी बड़ी कोशिश उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। जाहिर है रिश्वतखोरी की ऐसी साजिश के पीछे राजनीतिक पार्टियों की आपाधापी है जो किसी भी तरह सत्ता पर काबिज होना चाहती हैं। जानकार तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस चुनाव में दो हजार करोड़ की रिश्वत बांटी गई है और टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले की काली कमाई का एक हिस्सा इसमें भी खर्चा गया है। अब आप समझ सकते हैं कि अन्ना हजारे के नाम से क्यों राजनीतिक पार्टियों की धड़कनें तेज चलने लगती हैं और जन लोकपाल बिल को किनके विरोध का सामना करना पड़ रहा है! एक सुखद संयोग यह है कि हजारे के आंदोलन की सफल समाप्ति के बाद पांच राज्यों में हुए चुनावों में वोटरों ने खासकर युवा वर्ग ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। वोट डालने को लेकर मतदाताओं की उदासीनता राजनीतिक भ्रष्टाचार बढ़ने की एक बड़ी वजह है। ऐसा लगता है कि हजारे के आंदोलन की सकारात्मक प्रतिक्रिया का असर इन चुनावों पर भी पड़ा है। आश्र्चय इस बात का है कि लोकपाल बिल बनाने की जिम्मेदारी ओढ़ने वाली केंद्र सरकार के मंत्री ऐसे असर से अछूते क्यों चल रहे हैं। लोकपाल बिल बनाने वाली समिति के एक महत्वपूर्ण सदस्य कानून मंत्री वीरप्पा मोइली एक ओर तो इस कानून को तय समय सीमा में बनाने का आश्वासन देते घूम रहे हैं और दूसरी तरफ हजारे के आंदोलन को बुरा-भला कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। लखनऊ में छात्रों से मुखातिब मोइली ने कहा है कि सत्याग्रह और नागरिक अवज्ञा जैसे आंदोलन संविधान विरोधी हैं जिनकी इस लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। जाहिर है कि उनके मुख से हजारे के प्रति रोष फूट रहा है। लेकिन, वह यह भूल गए हैं कि ऐसे आंदोलनों की नींव पर ही गांधी ने देश को आजादी दिलाई थी।
Saturday, April 16, 2011
वो क्यों खफा हैं हजारे से
अन्ना हजारे सहित नागरिक समाज के उन पांचों सदस्यों ने अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा कर दी है जो लोकपाल बिल के गठन के लिए बनी समिति के सदस्य हैं। सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के समर्थक हजारे और उनके साथियों का यह कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गये आंदोलन के अनुरूप है जिसे देश में प्रशंसनीय नजरों से देखा जाएगा। हालांकि, यह घोषणा उन लोगों को शायद ही संतुष्ट कर पाएगी जो आंदोलन के समय से ही हजारे के पीछे पड़ हुए हैं और तमाम तरह के अनर्गल आरोप लगा कर भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी पहल की धार कुंद करने की हरसंभव कोशिशें कर रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास प्रयासों की हजारे ने तारीफ की तो उन पर साम्प्रदायिक होने का आरोप मढ़ दिया गया। आरोप लगाने वालों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जिक्र तक नहीं किया जिनकी भी तारीफ हजारे ने साथ साथ इसी सिलसिले में की थी। हजारे ने चुनाव व्यवस्था में सुधारों की बात करते हुए जब यह जिक्र छेड़ा कि कैसे वोटरों को शराब और पैसों की रिश्वत बांटकर राजनीतिक पार्टियां जीत का इंतजाम करती हैं तो उन्हें लोकतंत्र का खलनायक बताया जाने लगा। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के मौके पर जब राज्य से साठ करोड़ रुपए से अधिक की नकदी और सामान बरामद किए गए हैं जो मतदाताओं को रिश्वत में बांटे जाने थे, तब आरोप लगाने वालों ने चुप्पी साध ली है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कृष्णमूर्ति भी मानते हैं कि वोटरों को रिश्वत से बरगलाने की इतनी बड़ी कोशिश उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। जाहिर है रिश्वतखोरी की ऐसी साजिश के पीछे राजनीतिक पार्टियों की आपाधापी है जो किसी भी तरह सत्ता पर काबिज होना चाहती हैं। जानकार तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस चुनाव में दो हजार करोड़ की रिश्वत बांटी गई है और टू-जी स्पेक्ट्रम महाघोटाले की काली कमाई का एक हिस्सा इसमें भी खर्चा गया है। अब आप समझ सकते हैं कि अन्ना हजारे के नाम से क्यों राजनीतिक पार्टियों की धड़कनें तेज चलने लगती हैं और जन लोकपाल बिल को किनके विरोध का सामना करना पड़ रहा है! एक सुखद संयोग यह है कि हजारे के आंदोलन की सफल समाप्ति के बाद पांच राज्यों में हुए चुनावों में वोटरों ने खासकर युवा वर्ग ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। वोट डालने को लेकर मतदाताओं की उदासीनता राजनीतिक भ्रष्टाचार बढ़ने की एक बड़ी वजह है। ऐसा लगता है कि हजारे के आंदोलन की सकारात्मक प्रतिक्रिया का असर इन चुनावों पर भी पड़ा है। आश्र्चय इस बात का है कि लोकपाल बिल बनाने की जिम्मेदारी ओढ़ने वाली केंद्र सरकार के मंत्री ऐसे असर से अछूते क्यों चल रहे हैं। लोकपाल बिल बनाने वाली समिति के एक महत्वपूर्ण सदस्य कानून मंत्री वीरप्पा मोइली एक ओर तो इस कानून को तय समय सीमा में बनाने का आश्वासन देते घूम रहे हैं और दूसरी तरफ हजारे के आंदोलन को बुरा-भला कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। लखनऊ में छात्रों से मुखातिब मोइली ने कहा है कि सत्याग्रह और नागरिक अवज्ञा जैसे आंदोलन संविधान विरोधी हैं जिनकी इस लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। जाहिर है कि उनके मुख से हजारे के प्रति रोष फूट रहा है। लेकिन, वह यह भूल गए हैं कि ऐसे आंदोलनों की नींव पर ही गांधी ने देश को आजादी दिलाई थी।
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